श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-012
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
बारहवाँ अध्याय
काशीनरेश का मुनि कश्यप के आश्रम में आगमन और अपने पुत्र का विवाह सम्पादित करवाने की प्रार्थना करना, मुनि कश्यप द्वारा बालक विनायक को काशिराज के साथ भेजना, मार्ग में विनायक द्वारा धूम्राक्ष राक्षस का वध एवं उसके दोनों पुत्रों को उड़ाकर नरान्तक के पास भेजना, नरान्तक का दूतों को युद्ध का आदेश, विनायक द्वारा निशाचरों का वध
अथः द्वादशोऽध्यायः
निशाचरवध

ब्रह्माजी बोले — सातवें वर्ष में प्रविष्ट होने पर बालक विनायक ने स्नान करने के अनन्तर सन्ध्यावन्दनादि नित्यकर्म सम्पन्न करके अपने मस्तक पर कान्तिमान् मुकुट धारण किया। अपने चारों हाथों में अंकुश, परशु, कमल तथा सभी को भयभीत करने वाला पाश धारणकर वे सिंह के ऊपर विराजमान हुए ॥ १-२ ॥ उन्होंने दण्ड, मृगचर्म, कानों में सुवर्णनिर्मित तथा रत्नजटित कुण्डल धारण किये। कमण्डलु, कुश तथा श्रेष्ठ पीताम्बर धारण किया ॥ ३ ॥ ललाट में कस्तूरी का तिलक और अल्प प्रकाश वाले चन्द्रमा को धारण किया। गले में मोती के दानों की माला और नाभिदेश में नागराज शेषनाग को धारण किया ॥ ४ ॥

तदनन्तर उन्होंने अपनी लीला से पृथ्वी तथ आकाशमण्डल को कँपाते हुए उच्च स्वर में गर्जन किया । उस गर्जन को मेघों की ध्वनि समझकर चातकों ने अपना मुख फैला लिया । उछलती हुई बड़ी-बड़ी नदियों ने अपने जल से नभोमण्डल को सिंचित कर डाला। उस समय देवी अदिति तथा महर्षि कश्यप दोनों अति आनन्दित हो गये ॥ ५-६ ॥ आज हम धन्य हो गये तथा हमारे पूर्वज भी धन्य हो गये हैं — इस प्रकार से वे अपनी प्रशंसा करने लगे। उसी समय काशी के राजा भी उस आश्रम में प्रविष्ट हुए । परस्पर आलिंगन करके वे सभी उस समय परम आनन्दित हुए। वे सभी परस्पर नमस्कार करके आसन पर बैठ गये ॥ ७-८ ॥

मुनि कश्यप ने उन काशिनरेश को षड्रसों से समन्वित स्वादिष्ट अन्न का भोजन कराया। थोड़ी देर विश्राम करने के अनन्तर महर्षि कश्यप ने राजा से पूछा — ‘आपके आगमन का क्या कारण है ? ॥ ९ ॥ हे राजन्! बड़े ही पुण्यके प्रभाव से आज हमें आप श्रीमान्‌ का दर्शन प्राप्त हुआ है, किंतु आजतक आपने मुझ पुरोहित का कोई भी समाचार क्यों नहीं लिया ? ‘ ॥ १० ॥

ब्रह्माजी बोले — महर्षि कश्यपजी की यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ बोले — ‘हे ब्रह्मन् ! मैं राज्य के संचालन कार्य में अत्यन्त व्यस्त मनवाला हो गया था, अतः मेरे अपराध को आप क्षमा कीजिये ॥ ११ ॥ हे प्रभो! मेरे पुत्र का विवाह होना निश्चित हुआ है, अतः मैं आपको ले जाने के लिये आया हूँ। हे मुने! आज आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हो गया ॥ १२ ॥ आप शीघ्र चलें और विवाह का कार्य सम्पन्न करने के अनन्तर पुनः लौट आयें। आपके आगमन के बिना श्रेष्ठ लोगों में मेरी प्रशंसा नहीं हो पायेगी, इसलिये हे महामुने! मैं आपको ही लेने आया हूँ’ ॥ १३१/२

मुनि कश्यप बोले — हे नृपश्रेष्ठ ! इस समय मेरा चातुर्मास्य व्रत चल रहा है, इसलिये मैं तो नहीं आ पाऊँगा। हे राजन्! यदि आप इच्छुक हैं तो मेरे पुत्र को ले जाइये, वह सब प्रकार से समर्थ है ॥ १४१/२

राजा बोले — हे मुने! आप अपने पुत्र को आज्ञा प्रदान करें, हम दोनों शीघ्र ही यहाँ से चलेंगे ॥ १५ ॥

राजा की यह बात सुनकर मुनि कश्यप अपने पुत्र से बोले — ‘हे विनायक! यद्यपि तुम्हारे जाने से मैं बहुत दुखी रहूँगा, तथापि इन राजा की अनुरोधपूर्ण वाणी से मैं तुम्हें इनके साथ भेज रहा हूँ’ ॥ १६१/२

उस आज्ञा को शिरोधार्यकर तथा माता-पिता दोनों के चरणों की वन्दना करके विनायक बाहर आये और राजा ने उन्हें रथ पर बिठाया। राजा स्वयं भी उन महर्षि कश्यप और देवी अदिति के चरणों में प्रणामकर रथ में आरूढ़ हुए ॥ १७-१८ ॥

उस समय देवी अदिति वहाँ पर आयीं और नृपश्रेष्ठ काशिनरेश से बोलीं — हे राजन् ! मेरे इस बालक की निरन्तर रक्षा करनी चाहिये। मेरा यह बालक जहाँ-जहाँ भी जाता है, वहाँ-वहाँ अनेक उत्पात होते हैं, अतः आपको बड़े ही प्रयत्नपूर्वक इसकी रक्षा वैसे ही करनी होगी, जैसे कि पलकें आँख की पुतली की रक्षा करती हैं ॥ १९-२० ॥ जिस प्रकार आप मेरे पुत्र को ले जा रहे हैं, वैसे ही आप वापस भी लायें । ‘ठीक है, ऐसा ही होगा।’ अदिति से इस प्रकार कहकर राजा ने प्रणाम करके उन्हें विदा किया। तदनन्तर बालक गणेश के साथ राजा काशीनरेश ने वायु के सदृश वेगवान् रथ से प्रस्थान किया। रथ के द्वारा मार्ग में जाते हुए राजा को एक घनघोर वन दिखायी दिया ॥ २१-२२ ॥

वह नरान्तक के चाचा का अत्यन्त रमणीय स्थान था । उसका नाम धूम्राक्ष था, वह रौद्रकेतु का भाई तथा बड़ा ही पराक्रमी था। उस धूम्राक्ष ने दस हजार वर्ष तक सहस्र किरणों वाले भगवान् सूर्य की प्रसन्नतापूर्वक नित्य आराधना करते हुए अत्यन्त दारुण तप किया था ॥ २३-२४ ॥ वह तीनों लोकों को अपने वश में करने की इच्छा से सभी का संहार कर सकने वाले आयुध की अभिलाषा रखता था । वह वृक्ष की शाखा में दोनों पैरों को अटकाकर नीचे मुख लटकाये हुए धुएँ का पान करता था । इस प्रकार बहुत समय तक साधना करते हुए उसके सामने अमोघ अस्त्र प्रकट हुआ ॥ २५-२६ ॥

तपस्या करने वाले उस धूम्राक्ष नामक राक्षस के लिये वह अस्त्र भगवान् सूर्य ने भेजा था। उस अस्त्र के आकाश तक व्याप्त महान् तेज को बालक विनायक ने देखा। उन्होंने शीघ्र ही उछलकर उस तेजोमय अस्त्र को उसी प्रकार पकड़ लिया, जैसे गरुड़ सर्प को पकड़ लेता है। यह देखकर महामनस्वी काशिराज आश्चर्य में पड़ गये ॥ २७-२८ ॥ उन्होंने मन में यह विचार किया कि तीनों लोकों में लाभ, हानि तथा जीवन के विषय में दैव के अतिरिक्त अन्य कोई हेतु नहीं है । इस अस्त्र की प्राप्ति मुझे नहीं बल्कि सहसा इस बालक को हुई है । तदनन्तर बालक विनायक ने उस अस्त्र की शक्ति को ज्ञात करने के लिये उसको हाथ में लेकर तोला और फेंका ॥ २९-३० ॥

उसी समय वह अस्त्र भयानक शब्द करता हुआ शीघ्र ही ऊपर को गया और धूम्राक्ष के ऊपर गिरा, जिससे उस राक्षस का शरीर तत्काल दो भागों में बँट गया ॥ ३१ ॥ गिरते हुए उसके शरीर के दोनों भागों ने बड़ी-बड़ी चट्टानों तथा वृक्षों को चूर-चूर कर डाला और दो हजार हाथ तक की पृथ्वी उसके गिरने से ढक गयी ॥ ३२ ॥ उस राक्षस धूम्राक्ष के दो पुत्र जो जघन तथा मनु नाम से विख्यात थे और पिता की सेवा-शुश्रूषा में लगे रहते थे, वे पिता की वैसी स्थिति देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। उन्होंने पास में ही स्थित बालक विनायक को भी देखा। तब वे दोनों काल तथा यम के समान अपना मुख खोलकर उसके पास दौड़ पड़े ॥ ३३-३४ ॥

उन जघन तथा मनु नामक राक्षसों ने अत्यन्त क्रोध के आवेश में होकर काशीनरेश से कहा कि ‘इस बालक को लाकर तुमने हमारे पिता को क्यों मरवाया है? प्राचीन समय की बात है, मेरे पिता धूम्राक्ष ने ही नरान्तक से तुम्हारी रक्षा की थी, अरे राजन्! उसे युक्तिपूर्वक मार करके अब तुम जीवित कैसे रह सकते हो?’ ॥ ३५-३६ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार का वचन सुनकर वे काशीनरेश अत्यन्त व्याकुल होकर काँपने लगे और अपने मन में विचार करने लगे कि मैं कश्यपजी के अपस्मार – रोगी के समान इस बालक को अपने साथ क्यों लाया ? यदि नरान्तक क्रुद्ध हो गया तो वह बलपूर्वक मेरे राज्य का हरण कर लेगा, तब मेरी रक्षा कौन करेगा? ऐसा सोचकर राजा शपथपूर्वक बोले — ॥ ३७-३८१/२

राजा बोले — अरे निशाचरो ! मैं ब्राह्मण तथा ईश्वर की शपथ लेकर कहता हूँ कि इस निमित्त मैं इस बालक को कदापि नहीं लाया हूँ। यह मेरे पुरोहित महर्षि कश्यप का पुत्र है और विवाह का कार्य सम्पादित करने के लिये मेरे द्वारा लाया गया है ॥ ३९-४० ॥ आप लोग मेरे पुत्र के विवाह में विघ्न न करें। इस बालक को ले जायँ। राजा की इस प्रकार की बात पूरी हो जाने पर मुनिपुत्र वह विनायक राजा से बोला — ॥ ४१ ॥

बालक को शत्रु के हाथ में क्यों सौंप रहे हैं? आप अदिति तथा कश्यप को क्या उत्तर देंगे ?  यदि महर्षि कश्यप क्रुद्ध हो जायँगे तो वे आपको भस्म कर डालेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ४२१/२

मुनि कश्यपजी के बालक उन विनायक के इस प्रकार कहने पर वे दोनों राक्षस उसे खा जाने के लिये उसी प्रकार दौड़ पड़े, जैसे कि विडाल चूहे को खाने के लिये दौड़ पड़ता है। तब बालक विनायक ने अपना मुख फैलाकर भयानक गर्जना की ॥ ४३-४४ ॥ उस गर्जना को सुनकर तीनों लोक काँप उठे। उसके द्वारा छोड़े गये निःश्वास से वे दोनों राक्षस उड़कर उसी प्रकार बादलों के बीच पहुँच गये, जैसे कि आँधी के द्वारा कोई तिनका उड़ा दिया जाता है ॥ ४५ ॥ दो मुहूर्त बीत जाने के अनन्तर वे दोनों राक्षस जघन और मनु नरान्तक के नगर में अलग-अलग स्थानों में ऐसे गिरे, जैसे कि आँधी-तूफान के द्वारा पर्वत के शिखर पर दो बड़ी-बड़ी चट्टानें गिरी हों। उन दोनों के गिरे शरीरों से अनेक घर चूर-चूर हो गये ॥ ४६-४७ ॥

उस समय मुख द्वारा किये गये चीत्कार तथा हाथ द्वारा किये गये उरताडन के शब्दों से महान् हाहाकार होने लगा। तब ‘यह क्या हो गया? यह क्या हो गया’ – ऐसा कहते हुए दूत दौड़ते हुए वहाँ आये ॥ ४८ ॥ राक्षस धूम्राक्ष के दोनों पुत्र मर गये हैं — ऐसा सुनकर दूतों ने उन दोनों को ठीक से देखा तो उन्हें जीवित देखकर उन्होंने उन्हें सावधान किया ॥ ४९ ॥

तदनन्तर उन दोनों जघन और मनु ने दूतों को सारा वृत्तान्त क्रमशः बतलाया कि किस प्रकार कश्यप के पुत्र ने पिता धूम्राक्ष का वध किया और कैसे वे दोनों उसके श्वास छोड़ने से यहाँ आ गिरे। साथ ही यह भी बताया कि वह बालक काशिराज के साथ रथ में बैठकर जा रहा है । दूतों ने इस प्रकार की बात सुनकर नरान्तक से उस बालक के विषय में बतलाया ॥ ५०-५१ ॥ अपने निरपराध चाचा धूम्राक्ष के वध और कश्यपऋषि के अपराधी पुत्र विनायक का काशिराज के साथ गमन का समाचार सुनकर नरान्तक की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं, तदनन्तर उसने अपने समक्ष हजार की संख्या में स्थित निशाचरों को देखकर उस बालक को पकड़ लाने की उन्हें आज्ञा दी — ॥ ५२-५३ ॥

‘हे राक्षसो! मुनि कश्यप के पुत्र को पकड़कर ले आओ । यदि वह युद्ध करे तो उसे मार डालना। अथवा तुम उस काशिराज के रथ को ही यहाँ ले आना। अब तुम लोग शीघ्र ही जाओ’ ॥ ५४ ॥

आदेश पाते ही वे सभी राक्षस वायु के समान तीव्र वेग से शीघ्र ही चल पड़े, वहाँ उन्होंने महर्षि कश्यपजी के पुत्र बालक विनायक तथा काशिराज को देखा, उन दोनों ने भी उन निशाचरों को देखा । तदनन्तर बालक विनायक ने भयभीत कर देने वाली भीषण गर्जना की, जिसे सुनकर कई निशाचर प्राणों का परित्यागकर भूमि पर गिर पड़े ॥ ५५-५६ ॥ कुछ राक्षस भाग चले, कुछ पैर टूट जाने पर वहाँ से निकल पड़े, बालक विनायक के बाणों से कुछ राक्षसों के सिर कट गये और कुछ विद्ध उदरवाले हो गये। किसी-किसी के मुख कट गये, किसी की आँखें फूट गयीं और किन्हीं के जंघा तथा बाहुएँ भग्न हो गयीं; कुछ दूसरे निशाचर भाग करके नरान्तक के पास आ पहुँचे और उन्होंने बालक विनायक द्वारा किये गये उत्पात का सारा समाचार नरान्तक को सुनाया ॥ ५७-५८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘बालचरित के अन्तर्गत विनायककृत निशाचरवध’ नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥

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