October 1, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-027 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ सत्ताईसवाँ अध्याय भीम नामक व्याध और राक्षस के पूर्वजन्म का वृत्तान्त अथः सप्तविंशतीतमोऽध्यायः बालचरिते साम्बदुःशासनवर्णनं व्यासजी बोले — भगवान् विष्णु के नाभिकमल से प्रादुर्भूत हे ब्रह्मन्! आप मुझे यह बताने की कृपा करें कि पूर्वजन्म में वह व्याध कौन था और वह पिंगाक्ष नामक राक्षस कौन था? उनका कैसा शील था और कैसा आचरण था? हे प्रभो! उन वामनभगवान् ने अनुष्ठान क्यों किया और गजाननरूपधारी भगवान् ने उन्हें कैसे वर प्रदान किया ? ॥ १-२ ॥ गणेशजी का गणेशलोक पृथक् रूप से अन्यत्र कैसे प्रतिष्ठित है ? और क्यों उन्हें शमी प्रिय है ? यह सब आप मुझे शीघ्र ही बतायें ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी बोले — मुने! आपने जो कुछ पूछा है, वह सब मैं आपको बताता हूँ। वह व्याध (भीम) पूर्वजन्म में [साम्ब नामक ] एक राजा था। [ उसे वह राजपद कैसे प्राप्त हुआ, इस इतिहास का श्रवण करो- प्राचीनकाल की बात है,] सभी शुभ (राजोचित) लक्षणों से समन्वित एक राजा हुए। वे सभी शास्त्रों के प्रवक्ता, यज्ञ करनेवाले, विनयी, लज्जाशील और देवताओं एवं अतिथियों की पूजा करनेवाले थे ॥ ४-५ ॥ उनके गजारोही, अश्वारोही, रथारोही तथा पैदल सैनिकों की गणना नहीं की जा सकती थी। वे बड़े ही दानी, शूरवीर, मेधावी एवं इन्द्र के समान वैभव से समृद्ध थे। उनके ध्वज तथा शत्रुजित् नामक दो प्रधान अमात्य थे। जो बड़े ही बुद्धिमान् थे। उन्होंने अपनी प्रतिभा से शुक्राचार्य तथा वाणी के अधिपति बृहस्पति को भी पराजित कर दिया था । वे दोनों अपने शस्त्र के तेज से सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतने में समर्थ थे ॥ ६-७१/२ ॥ उन राजा की मदनावती नाम की सुलक्षणा पत्नी थी। वह मदनावती पतिव्रता, धर्मशीला, सुन्दर मुखवाली तथा सब कुछ जानने वाली थी। तीनों लोकों में उसके समान अन्य कोई कामिनी नहीं थी ॥ ८-९ ॥ वह दीनों, अनाथों, वृद्धजनों तथा अतिथियों पर दया करने वाली थी। इस प्रकार वे दोनों पति-पत्नी यज्ञ, दान एवं साधुजनों की पूजा में निरत रहते थे ॥ १० ॥ उनके सद्व्यवहार से नगर में निवास करने वाले तथा जनपदों में रहने वाले सभी नागरिक सन्तुष्ट रहते थे । जो उनके शत्रु थे, वे भी राजा के सज्जनों द्वारा प्रशंसित सन्धि, यान आदि छः गुणों का अनुकरण करते थे ॥ ११ ॥ इस प्रकार उन पुण्यकीर्ति राजा ने इस पृथिवी पर बहुत वर्षों तक भलीभाँति शासन किया। कालयोग से एक दिन राजा की मृत्यु हो गयी । उन्होंने मरणासन्न अवस्था में विधि-पूर्वक सहस्रों गौओं का दान किया। साथ ही दस महादान तथा अन्य अष्टदानों को भी प्रदान किया ॥ १२-१३ ॥ राजा के मृत हो जाने पर सम्पूर्ण नगरी उनके लिये शोक करने लगी । पुत्र न होने के कारण उनकी धर्मपत्नी ने भी उन्हीं के साथ सहगति प्राप्त की ॥ १४ ॥ मन्त्रियों ने ब्राह्मणों के द्वारा उनके सभी और्ध्वदैहिक संस्कार सम्पन्न कराये और एकादशाह के दिन भक्तिपूर्वक विविध दान प्रदान किये ॥ १५ ॥ राजा की मृत्यु के एक मास बीत जाने पर उन दोनों मन्त्रियों ने राजा के उत्तराधिकारी के रूप में किसी कुलीन, राज्य चलाने योग्य, बुद्धिमान्, सत्त्वसम्पन्न, शूरवीर, सत्यशाली तथा पराक्रमी व्यक्ति के विषय में आपस में मन्त्रणा की। तब उन्होंने राजा के द्वारा पहले से निश्चित किये गये राजा के दायाद अर्थात् रक्तसम्बन्ध से उत्तराधिकारी बान्धव दुर्धर्ष के महान् बलसम्पन्न साम्ब नामक क्षेत्रज पुत्र को राजगद्दी पर बैठाने का निश्चय करके सभी पुरवासियों तथा जनपदनिवासियों एवं ब्राह्मणों से पूछकर और उनकी आज्ञा प्राप्तकर शुभ मुहूर्त तथा शुभ लग्न में नाना प्रकार की सामग्रियों द्वारा ब्राह्मणों के साथ उसका राज्याभिषेक कर दिया ॥ १६-१९ ॥ व्यासमुनि बोले — हे पितामह! हे कृपानिधे ! आप सर्वज्ञ हैं, अतः आप बतलायें कि साम्ब क्षेत्रज पुत्र के रूप में कैसे उत्पन्न हुआ और वह किस जाति का था ? ॥ २० ॥ ब्रह्माजी बोले — हे मुने! पुत्रप्राप्ति के लिये दुर्धर्ष ने बहुत प्रकार के प्रयत्न किये, किंतु दुर्दैव के कारण उन्हें कोई भी पुत्र प्राप्त नहीं हुआ। एक धीवर में आसक्त मनवाली उसकी पत्नी प्रमदा ने शुभ मुहूर्त में पुत्र को उत्पन्न किया, किंतुकोई जान नहीं सका कि वह जारज पुत्र है ॥ २१-२२ ॥ उन दोनों अमात्यों ने जितने भी राजचिह्न थे, सभी उस साम्ब नामक पुत्र को प्रदान किये। राजकोष सहित सम्पूर्ण राष्ट्र और सारा राज्य उसे प्रदान कर दिया ॥ २३ ॥ वे दोनों अमात्य जिस प्रकार पहले स्थित थे, उसी प्रकार अमात्य पद पर प्रतिष्ठित हुए। राज्य प्राप्तकर दुर्धर्ष का पुत्र वह साम्ब राजलक्ष्मी के कारण उन्मत्त हो गया। स्त्री, मांस तथा मदिरा में आसक्त वह साम्ब हाथी की भाँति आलसी हो गया। वह प्रतिदिन दुराचरण में परायण रहने लगा और नीति के मार्ग से पराङ्मुख हो गया ॥ २४-२५ ॥ उसने धनिकों का सारा धन लेकर उन्हें राज्य से ‘बाहर निकाल दिया और वह ब्राह्मणों तथा सत्पुरुषों का अपमान करने लगा। उसने उनकी वंश-परम्परा से चली आ रही आजीविका का हरण कर उन्हें राज्य से बाहर निर्वासित कर दिया। उन दोनों अमात्यों ने उसे नीति की शिक्षा दी, किंतु उसने उनके वचनों को नहीं माना ॥ २६-२७ ॥ उन दोनों दयालु अमात्यों ने बार-बार उसे समझाया तो उसने रुष्ट होकर उन दोनों को जंजीर से बाँध दिया। माता-पिता ने उस हृदयहीन पुत्र को समझाते हुए कहा — अरे दुष्ट! जिनके कृपाप्रसाद से तुमने निष्कंटक राज्य प्राप्त किया, उन दोनों सज्जन अमात्यों को तुमने बन्धन में डाल दिया ? किंतु उस दुष्ट ने माता-पिता के भी अमृतमय वचनों का उल्लंघन करके उन दोनों को बन्धन में डालकर उन्हें भी कारागार में डाल दिया ॥ २८-२९१/२ ॥ उसका दुष्टबुद्धि नामक अत्यन्त दुष्ट मित्र निरन्तर उसके साथ रहता था। साम्ब ने उसी को अपना सचिव बनाया और उसे अश्व, सुवर्ण, घोड़े, विविध रत्न, दिव्य वस्त्र, रंकु जाति के हिरणों के बालों से बने ओढ़ने के वस्त्र, असंख्य दासी- दास, वाहन, ग्राम, नारिक आदि खाद्य प्रदान किया और यह भी घोषणा करवायी कि जो इसकी आज्ञा का पालन नहीं करेगा, उसका सिर बलपूर्वक काट दूंगा। सभी लोगों से ऐसा कहकर साम्ब अन्तःपुर में चला गया ॥ ३०-३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘अमात्यनिग्रह’ नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe