श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-004
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
चौथा अध्याय
नरान्तक की भूलोक और नागलोक पर विजय
अथः चतुर्थोऽध्यायः
भूतलरसातलविजय

व्यासजी बोले — हे ब्रह्मन् ! मैंने आपके मुख से देवान्तक के चरित का भक्तिपूर्वक श्रवण किया, अब आप मुझे यह बतायें कि नरान्तक ने क्या किया ? ॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे ब्रह्मन् ! हे सत्यवतीपुत्र! तुम्हारे [गणेशजी से सम्बन्धित कथाओं के प्रति] परम आदरभाव को देखकर अब मैं तुमसे उसे कहूँगा, संयतचित्त होकर उसे श्रवण करो। अनेक दैत्यसमूहों से घिरे हुए नरान्तक ने पृथ्वी पर जाकर विध्वंस का ताण्डव मचा दिया, उसने कुछ राजाओं को मार डाला ॥ २-३ ॥ बहुत-से राजाओं को मारा गया देखकर [शेष ] सभी राजा उसकी शरण में चले आये। जिस प्रकार ज्ञान से अज्ञान और सूर्योदय से अन्धकार पलायमान हो जाता है, उसी प्रकार वह जिस-जिस [शत्रु] सेना की ओर देखता था, वह दसों दिशाओं में भाग खड़ी होती थी। इस प्रकार नरान्तक ने सम्पूर्ण भूमण्डल को अपने वश में कर लिया ॥ ४-५ ॥

जो राजा उसकी शरण में आ गये थे, उनको अधीनता स्वीकार कर लेने के कारण उसने उन्हें उनके पदों पर पुनः स्थापित कर दिया और जो मार डाले गये थे, उनके पुत्रों को करदाता [राजा] – के रूप में नियुक्त कर दिया। जो राजा उससे युद्ध करने को उद्यत हुए थे, उनको भी उसने अपना सेवक बना लिया और अपने मनोनुकूल दैत्यों को उनके पदों पर स्थापित कर दिया ॥ ६-७ ॥ उसने समुद्ररूपी वलय से घिरी हुई [ सम्पूर्ण ] पृथ्वी का पालन किया। [उस समय] उसके आतंक रूपी भार से देवता, मनुष्य और किन्नर अत्यन्त पीड़ित हो गये। यज्ञ और स्वाध्यायकर्म से रहित मुनिजन [उस समय] पर्वतों की गुफाओं में चले गये। ‘वेद का त्याग करना दोषयुक्त है’  — ऐसा विचारकर वे मन में ही वेद का अभ्यास करते थे। आतंकित मनवाले होने के कारण तपस्या भी नहीं कर पा रहे थे ॥ ८–९१/२

तब नरान्तक ने नागलोक को जीतने की इच्छा से अनेक प्रकार की मायाओं का ज्ञान रखने वाले अत्यन्त बलवान् दैत्यों को वहाँ भेजा। वे वहाँ गरुड़ का रूप धारण करके गये और उन श्रेष्ठ नागों का भक्षण करने लगे ॥ १०-११ ॥ उन दानवों के द्वारा असंख्य नागों का भक्षण कर लिये जाने के उपरान्त मोतियों, रत्नों, अनेक प्रकार के सुन्दर दिव्य वस्त्र और दस हजार नागकन्याओं को साथ लिये शेषनाग उनके सम्मुख गये। उन्होंने वह सब [उपहार के रूप में] उन्हें देकर उन असुरों से सन्धि कर ली ॥ १२-१३ ॥ उन अनन्त सिरवाले शेषनाग ने नरान्तक के आदेशानुसार उसका शासन स्वीकार कर लिया और वार्षिक कर देना भी स्वीकार कर लिया ॥ १४ ॥ तब भी उस दैत्य (नरान्तक) – ने अनेक दैत्योंसहित एक श्रेष्ठ दैत्य को रसातल में सर्वाध्यक्ष के रूप में नियुक्त करवाया और साथ ही वहाँ नियुक्त उस दैत्य को नरान्तक ने अपने इस आदेश की सूचना भिजवायी कि ‘यदि तुम नागों में कोई विकृति (विद्रोह की भावना) देखो, तो दूत के मुख से हमें सूचित करो। हम सम्पूर्ण नागों का वध कर डालेंगे’ ॥ १५–१६१/२

उसे इस प्रकार की शिक्षा देकर उन सभी दैत्यों ने मृत्युलोक में स्थित नरान्तक के पास जाकर सारा वृत्तान्त उससे कहा । मृत्युलोक और पाताललोक में उत्पन्न होने वाली वे सभी वस्तुएँ जो स्वर्गलोक में दुर्लभ थीं, उन्हें तथा [दोनों लोकों के] सम्पूर्ण वृत्तान्त नरान्तक देवान्तक के लिये सदा भेजा करता था ॥ १७–१९ ॥ उसी प्रकार देवान्तक भी उसके लिये वह सब कुछ भेजा करता था, जो भूतल पर दुर्लभ है। इस प्रकार वे दोनों परम प्रसन्नतापूर्वक त्रैलोक्य का राज्य करते थे ॥ २० ॥

[राजा ] सोमकान्त बोले — [हे मुने!] उन दोनों का वध किस रूप से, किस अस्त्र-शस्त्र से, किस अवतार द्वारा और कैसे हुआ ? वह सब मुझे बतलाइये ॥ २१ ॥

भृगुजी बोले — [हे राजन्! व्यासजी द्वारा] इसी प्रकार का प्रश्न किये जाने पर चतुर्मुख ब्रह्माजी ने व्यासजी के प्रति परम प्रसन्नतापूर्वक जो कथा कही थी, उसे ही मैं तुमसे कहता हूँ ॥ २२ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने! दुर्जय और वरगर्वित उन दोनों को जिसने अवतार लेकर, जिस रूप से और जिस अस्त्र-शस्त्र से मारा था तथा ब्रह्मा [आदि देवताओं] ने अपने-अपने लोकों को जिस प्रकार [पुनः ] प्राप्त किया था और देवताओं को भी अपने अधिकारों की प्राप्ति हुई, वह सब कहता हूँ । हे मुने! आदरपूर्वक सुनो ॥ २३-२४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत क्रीडाखण्ड में ‘व्यासप्रश्न’ नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.