September 14, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-008 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ आठवाँ अध्याय गणेशजी की बाललीला के सन्दर्भ में उद्धत तथा धुन्धुर नामक दैत्यों के वध की कथा और चित्र नामक गन्धर्व के उद्धार का आख्यान अथः अष्टमोऽध्यायः नक्रमोक्षणं ब्रह्माजी बोले — अत्यन्त पराक्रमशालिनी उस विरजा नामक राक्षसी के वध का समाचार सुनकर उद्धत तथा धुन्धुर नामक महान् बल से सम्पन्न दो राक्षस महात्मा कश्यपजी के आश्रममण्डल में आये । तोते का रूप धारण किये हुए उन दोनों को देखकर बालक गणेश दूध पीना छोड़कर माता अदिति से बोले — ‘ इन दोनों तोतों को लाकर मुझे खेलने के लिये दो।’ तब माता उनसे बोली — ‘आकाश में उड़ने वाले ये दोनों पक्षी भूमि पर स्थित मुझ स्त्री के द्वारा पकड़े जाने योग्य नहीं हैं । फिर भी यदि मैं इन्हें पकड़ने जाऊँगी तो ये उड़कर आकाश में चले जायँगे।’॥ १-३१/२ ॥ तब बालक गणेश ने माता की गोद से उतरकर उन दोनों को बाज पक्षी की भाँति झपटकर पकड़ लिया। उन पक्षियों ने अपने पंखों के आघात से तथा चोंच के द्वारा बालक को बहुत मारा, किंतु उस बालक ने उन्हें बलपूर्वक धरती पर पटक दिया ॥ ४-५ ॥ तब उन दोनों ने अपना राक्षसरूप धारणकर प्राणों का परित्याग कर दिया। उनकी देह के भार से भयभीत पृथ्वी अत्यन्त विह्वल हो गयी। उनके शरीर दो कोश की दूरी तक के वृक्षों को भीषण शब्दपूर्वक तोड़ते हुए गिर पड़े। उन दोनों राक्षसों को देखकर अदिति ने झट से अपना बालक पकड़ लिया ॥ ६-७ ॥ कश्यपमुनि ने उन राक्षसों के विशाल शरीर को देखा। लोगों ने उनके शरीरों को काटकर लकड़ी एकत्र कर चिता बनाकर उनका दाह किया। मुनि ने बालक के अभ्युदय की कामना से अद्भुत शान्ति की, उस शिशु के पराक्रम को देखकर वे महान् आश्चर्य करने लगे ॥ ८-९ ॥ उस समय पुत्र को गोद में लिये हुई अदिति से वे परम प्रसन्न होकर बोले — ‘देवगण तथा देवराज इन्द्र भी जिन राक्षसराजों को नहीं मार सके, तोते का रूप धारण करने वाले उन दोनों को हमारे इस शिशु ने खेल-खेल में ही मार डाला।’ पुनः अदिति पर क्रुद्ध होकर बोले — ‘तुमने इस बालक को अकेले क्यों छोड़ दिया ? ॥ १०-११ ॥ आज जगदीश्वर ने ही इस बालक की रक्षा की है, इसकी आयु कितनी है – यह मुझे ज्ञात नहीं है। हे पतिव्रते! बिना भूले हुए इस बालक की तुम्हें प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी है ॥ १२ ॥ पर्वत के समान विशाल इन दोनों राक्षसों को इसने कैसे मारा, निश्चित ही यह राक्षसों के रहने का स्थान है, यहाँ यह मेरा बालक कैसे जीवित रह सकेगा ? ‘ ॥ १३ ॥ ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर वे दोनों दम्पती आश्चर्यचकित हो गये । उस प्रकार के बालक को स्नान कराकर उन दोनों ने स्वयं भी स्नान किया, और वहींपर सो गये ॥ १४ ॥ चार वर्ष की अवस्था में वह बालक अपने आश्रम के बाहर कुछ दूरी पर स्थित एक सरोवर के पास में गया । वह सरोवर कमल के पुष्पों से समन्वित था, उसमें अनेक मगर तथा मत्स्य रहते थे। उस सरोवर के आस-पास तमाल, सरल, जम्बू, आम्र तथा कटहल के अनेक वृक्ष थे। विविध प्रकार के वृक्षों तथा लताओं से वह घिरा हुआ था और अनेक प्रकार के फलों तथा पुष्पों से सुशोभित था । नाना प्रकार के पक्षीगण वहाँ स्थित थे, अनेक मुनिगणों से समन्वित था । उस सरोवर का जल उसी प्रकार अत्यन्त निर्मल तथा रमणीय था, जैसे कि सत्पुरुषों का अन्तःकरण निर्मल होता है ॥ १५–१७ ॥ उस दिन सोमवती अमावास्या और व्यतीपात योग था, इसलिये देवी अदिति उस सरोवर में स्नान करने आयीं, वे अपने बालक को सरोवर के तट पर बैठाकर, कण्ठ तक के पानी में अन्दर गयीं । माता के पास जाने के लिये वह बालक भी उछलकर जल के मध्य में गिर पड़ा। वह जल में क्रीडा कर ही रहा था कि उसी समय एक मगरमच्छ ने उसको पकड़ लिया ॥ १८-१९ ॥ जल के मध्य में स्थित माता अदिति ‘दौड़ो-दौड़ो’— इस प्रकार से चिल्लाने लगीं, बालक को पकड़ने के लिये वे आयीं, किंतु वे उसे पकड़ न सकीं ॥ २० ॥ वह मगरमच्छ बालक को जल के अन्दर खींचता था और माता बालक को बाहर को खींचती थीं। तदनन्तर वह मगर बालकसहित माँ को बहुत दूर तक पानी के अन्दर खींच ले गया ॥ २१ ॥ तब वह बालक अपनी माता से बोला — ‘इस मगर से आप मुझ पुत्र को छुड़ायें नहीं। मैं तुम्हारे साथ सदैव रहूँगा, मेरी मृत्यु नहीं होगी, मैं बलवान् हूँ’ ॥ २२ ॥ बालकसहित उस माता अदिति को आकण्ठ जल में निमग्न और अत्यन्त व्याकुल देखकर उसको बलपूर्वक निकालने के लिये शिष्यगण उछलकर जल में कूद पड़े । किंतु उस बलवान् मगरमच्छ से छुड़ाने में वे भी समर्थ न हो सके। तब बालक ने अपने अत्यन्त पराक्रम का प्रदर्शन किया और खेल – खेल में उस मगरमच्छ को जल से बाहर भूमि पर फेंक दिया। जैसे वायु पके हुए फल को गिरा डालती है, और जैसे बालक पत्थर के छोटे टुकड़े को फेंक डालता है, वैसे ही बालक गणेश ने मगर को फेंक दिया ॥ २३–२५ ॥ उसका एक योजन विस्तारवाला अद्भुत शरीर चूर-चूर होकर जमीन पर गिरा हुआ दिखायी दिया। वह निश्चेष्ट तथा प्राणशून्य हो गया था। उसे निष्प्राण देखकर बालक तथा शिष्योंसहित अदिति अत्यन्त प्रसन्नता को प्राप्त हुई, तदनन्तर दिव्य शरीर वाला होकर वह चित्र नामक गन्धर्व उससे बोला — ॥ २६-२७ ॥ हे गजानन! मैं पूर्वकाल में गन्धर्वों का राजा था। मेरे विवाह के समय सभी गन्धर्व मेरे घर आये हुए थे ॥ २८ ॥ मैंने उन सबकी भलीभाँति पूजा की, किंतु वैवाहिक कार्यों को करते हुए मैं महर्षि भृगु की पूजा न कर पाया । इससे मुनि मेरे ऊपर कुपित हो गये ॥ २९ ॥ उन्होंने मुझे शाप दे डाला कि तुम सरोवर के मध्य में रहनेवाले विशाल मगरमच्छ हो जाओगे। मुनि के शाप को सुनकर मैंने उस शाप से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की ॥ ३० ॥ तब मुनि बोले कि जब कश्यपनन्दन गजानन तुम्हारा स्पर्श करेंगे, तब तुम अपने पूर्व शरीर को प्राप्त कर लोगे। इस समय मैंने आपको भलीभाँति जान लिया है, आप गजानन ही बालकरूप धारण किये हुए हैं। आप ही सम्पूर्ण जगत् के स्वामी, कर्ता, रक्षक तथा संहारकर्ता हैं ॥ ३१-३२ ॥ आप निर्गुण, अहंकाररहित, सत्, असत् एवं परम कारण हैं, आप विविध अवतार धारणकर भक्तों की रक्षा करते हैं और दुष्टों का संहार करते हैं ॥ ३३ ॥ आप सर्वत्र व्याप्त हैं, पूर्णकाम हैं और अनेकों ब्रह्माण्डों के एकमात्र स्वामी हैं। आप मुनियों के लिये भी अगम्य और मन तथा वाणी से परे हैं ॥ ३४ ॥ इस प्रकार स्तुति करके तथा उन्हें प्रणाम करके और उन बालरूपधारी गजानन का पूजन करके उसने उनकी बार-बार प्रदक्षिणा की, फिर वह चला गया ॥ ३५ ॥ अदिति ने बालक को गोद में लिया और उसे प्यार करके अपना स्तनपान कराने लगीं। अदिति के मन में बड़ा ही आश्चर्य हुआ, तदुपरान्त वे आनन्दित होकर अपने भवन को गयीं ॥ ३६ ॥ वहाँ उन्होंने महर्षि कश्यप को प्रणामकर सम्पूर्ण वृत्तान्त उन्हें बतलाया। आश्चर्यचकित होकर मुनि कश्यप ने अदिति से कहा — ‘ये तो परमेश्वर हैं। मैं समझता हूँ कि लीला करने के लिये ही इन्होंने मनुष्य शरीर धारण किया है। ये देवताओं तथा असुरों के लिये भी अशक्य प्रतीत होने वाले और भी अन्य अद्भुत कर्मों को करेंगे, जिन्हें हम इन्हीं के कृपा-प्रसाद से देख पायेंगे। अतः अपना कल्याण चाहने वालों को चाहिये कि इन गणेशजी की वे दृढ़तापूर्वक भक्ति करें’ ॥ ३७–३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत क्रीडाखण्ड में ‘नक्र [रूपधारी चित्र गन्धर्व]-की मुक्ति का वर्णन’ नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥ Content is available only for registered users. 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