September 15, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-009 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ नौवाँ अध्याय हाहा-हूहू तथा तुम्बुरु नामक गन्धर्वो का कश्यपमुनि के आश्रम में आना, गन्धर्वों द्वारा पंच-देवों का पूजन, बालक गणेश द्वारा लीलापूर्वक पंचदेवों की मूर्तियों को अदृश्य कर देना, माता को अपने मुख में समस्त ब्रह्माण्ड को प्रतिष्ठित दिखाना तथा गन्धर्वों को विश्वात्मारूप दिखाकर उनके भ्रम को निवारित करना, गन्धर्वों द्वारा गणेश स्तवन अथः नवमोऽध्यायः बालचरिते हाहादिस्तुति ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! मैं बालरूपधारी गणेशजी के अन्य चरित का भी वर्णन आपसे करता हूँ, जो समस्त पापों का नाशक है। उसे आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥ १ ॥ एक बार की बात है, हाहा, हूहू तथा तुम्बुरु नामक गन्धर्व कैलास जाने की इच्छा से महर्षि कश्यपजी के आश्रम में पहुँचे। वे गन्धर्व वीणा को हाथ में लेकर वीणा बजाते हुए गान कर रहे थे, वे भगवान् विष्णु की भक्ति में निरत रहने वाले थे। शंख, चक्र, गदा, पद्म एवं तुलसी की माला से सुशोभित थे। उनके शरी रके अंगों में गोपीचन्दन का अनुलेपन लगा हुआ था, उन्होंने पीताम्बर धारण कर रखा था और वे अत्यन्त मनोहर थे। महर्षि कश्यपजी ने उनका बहुत आदर- मान किया और यथाविधि उनकी पूजा की ॥ २-४ ॥ उन्हें प्रणाम करके कश्यपजी बोले — ‘मेरे किसी पुण्य के प्रभाव से ही धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष — इस चतुर्विध पुरुषार्थ को प्रदान करने वाले आप-जैसे महापुरुषों का दर्शन मुझे हुआ है। आज मेरा तप धन्य हो गया, मेरा जन्म लेना सफल हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, मेरा ज्ञान धन्य हो गया और यह मेरा आश्रम धन्य हो गया। आपके यहाँ आगमन का उद्देश्य मैं नहीं जानता हूँ, उसे आप बतायें’ ॥ ५-६ ॥ इस प्रकार से पूछे गये वे गन्धर्व उनके वचन को सुनकर उनसे बोले — ‘हम लोग कैलास-दर्शन की इच्छा से आये हैं और इसी में हमें आपका दर्शन हो गया ॥ ७ ॥ आज हमारा पाप नष्ट हो गया और हमारा जन्म लेना सफल हो गया। हमें लगता है कि अब परम सिद्धि हमसे दूर नहीं है, हमें परम विश्रान्ति प्राप्त हुई है ॥ ८ ॥ हम लोग भगवान् शंकर का दर्शन करने को उत्सुक हैं, अतः हम लोग जाते हैं, हमें आज्ञा प्रदान कीजिये ।’ उनके वचनों को सुनकर तपोनिधि कश्यपजी पुनः बोले — आप लोग भोजन करने के अनन्तर थोड़ी देर विश्राम करके ही यहाँ से जायँ, बिना भोजन लिये यहाँ से कोई नहीं गया है । तदनन्तर महर्षि ने स्नान आदि के लिये जल प्रदान किया और उनके लिये भोजन का निर्माण करवाया ॥ ९-१० ॥ तदनन्तर मननशीलों में श्रेष्ठ वे हाहा-हूहू आदि गन्धर्व स्नान के पश्चात् देवताओं की पूजा करने लगे ॥ ११ ॥ वे देवी पार्वती, शिव, विष्णु, गणेश तथा सूर्यनारायण की पूजा करके मुहूर्तभर के लिये ध्यान में स्थित हो गये। उसी समय बालकों के साथ बाहर खेलने के अनन्तर बालक विनायक जब घर के अन्दर आये तो वहाँ उन्होंने पंचदेवों की उन मूर्तियों का दर्शन किया। उन्होंने शीघ्र ही मूर्तियों को उठाकर बाहर फेंक दिया और वे स्वयं अग्निगृह ( यज्ञशाला) – में चले गये ॥ १२-१३ ॥ तदनन्तर वे अपने सारे शरीर में भस्म लगाकर अन्तर्धान हो गये। जब उन गन्धर्वों का ध्यान टूटा तो उन्होंने सामने रखी हुई मूर्तियों को नहीं देखा ॥ १४ ॥ उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ और वे सभी आपस में ही कहने लगे, किस दैत्य ने कर्म की हेतुभूता हमारी इन मूर्तियों को चुराया है ॥ १५ ॥ क्या कोई गन्धर्व, राक्षस या यक्ष इन मूर्तियों को चुराने आये अथवा क्या हमारे सत्त्व की परीक्षा लेने के लिये ये मूर्तियाँ स्वतः ही अन्तर्धान हो गयीं ! ॥ १६ ॥ तदनन्तर वे महान् क्रोध करते हुए मुनि कश्यप के पास पूछने के लिये आये और बोले — ‘आपके घर में जब हम लोग ध्यानपरायण थे, उसी बीच कैसे सब मूर्तियाँ गायब हो गयीं? जन्मजात वैर रखने वाले प्राणी भी जब आपके आश्रम में परस्पर के वैर का त्यागकर क्रीड़ा करते हैं, देवता भी जब आपसे भयभीत रहते हैं, तब इस आश्रम में लुटेरे कैसे आ गये?’ ॥ १७-१८ ॥ उनका वह वचन सुनकर मुनि कश्यप अत्यन्त रुष्ट हो गये। उन्होंने यह जान लिया कि मूर्ति प्राप्त किये बिना ये भोजन नहीं करेंगे ॥ १९ ॥ तब मुनिश्रेष्ठ कश्यपजी ने अपने शिष्यों को बुलाकर उनसे कहा कि ‘मेरे जन्म से लेकर आज तक इस आश्रम में कोई चोर-लुटेरा नहीं आया, दैववश कौन यहाँ दस्यु बन गया, इस विषय में तुम लोग बतलाओ ?’ महर्षि कश्यप के इस क्रुद्ध वचन को सुनकर वे शिष्य अपने गुरु से कहने लगे — ॥ २०-२१ ॥ हे स्वामिन्! हम लोग चोर नहीं हैं, आप अपने पुत्र के विषय में तो जानते ही हैं, दोषों को गिनाने में हम लोगों को पाप लगेगा, अतः वह सब हम नहीं बतायेंगे । उनकी बात सुनकर मुनि कश्यपजी ने हाथ में छड़ी ले ली और वे पुत्र को खोजते हुए निकल पड़े तो अग्निशाला में उन्होंने उसको देखा ॥ २२-२३ ॥ वे बालक गणेश को उन गन्धर्वों के पास ले आये, उन लोगों ने उसे शिव के समान देखा । क्रोध से मूर्च्छित कश्यपजी ने उन्हीं के सामने विनायक से कहा — ॥ २४ ॥ अरे वत्स! तुम शीघ्र ही मूर्तियों को ले आओ, नहीं तो तुम आज मेरे हाथों मरोगे। तब निडर गणेशजी बोले — ‘ हे तात! मूर्तियों को मैंने नहीं लिया है। आप जो-जो भी शपथ लेने को कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगा ।’ ऐसा कहते हुए पिता के भय से भयभीत वे बालक गणेश अत्यधिक रुदन करने लगे ॥ २५-२६ ॥ अत्यन्त विह्वल होकर वे अपने मुख को फैलाकर भूमि पर गिर पड़े। उसी समय माता अदिति भी वहाँ आ पहुँचीं, तब बालक ने उनसे कहा — ॥ २७ ॥ ‘यदि मैंने देवताओं की मूर्तियों को खा लिया है, तो मेरे मुख में देखो’, फिर जब उसने मुख खोला तो माता ने मुख के अन्दर समस्त विश्व को स्थित देखा ॥ २८ ॥ , वे आश्चर्यचकित होकर भय से अत्यन्त विह्वल हो मूर्च्छित हो गयीं और भूमि पर गिर पड़ीं। इसके अनन्तर मुख के अन्दर उन हाहा-हूहू आदि गन्धर्वों तथा मुनि कश्यप ने कैलासपर्वत, सपरिकर भगवान् शंकर, वैकुण्ठ, विष्णु भगवान्, ब्रह्मा, सत्यलोक, इन्द्र तथा उनकी पुरी अमरावती, पर्वत एवं वनों से समन्वित पृथ्वी और उसमें रहने वाले लोगों, नदियों, सागरों, यक्षों, राक्षसों, पन्नगों, वृक्षों, पक्षिगणों, चौदह भुवनों, इन्द्रादि देवताओं, [स्वर्गादि ] समस्त लोकों, समस्त पातालों तथा दसों दिशाओं को देखा ॥ २९–३२ ॥ जब माता को चैतन्य हुआ, तो उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्तनपान कराया। उन विश्वात्मा का इस प्रकार दर्शन कर मुनि कश्यप ने उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने मन में यह निश्चय किया कि जिन साक्षात् परमात्मा ने मेरे घर में अवतार लिया है, उन्हीं को मैं प्रताड़ित करने जा रहा था ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर कश्यपमुनि ने उन गन्धर्वों से कहा कि ‘आप लोग भोजन कर लें। इस महाबली बालक को ताड़ित करने में मैं समर्थ नहीं हूँ ॥ ३५ ॥ समष्टि तथा व्यष्टिरूप धारण करने वाले इस बालक को आपलोग अपना उग्ररूप दिखाकर भयभीत करें। यदि आप लोगों में शक्ति है तो मूर्तियों को प्राप्त करने के लिये इसे ताड़ित करें’ ॥ ३६ ॥ वे कहने लगे कि हम लोग आपके घर में बिना पंचायतन देवों की मूर्तियों को प्राप्त किये अन्न अथवा कन्दमूल – कुछ भी भक्षण नहीं करेंगे ॥ ३७ ॥ तदनन्तर इस प्रकार कहने वाले उन गन्धर्वों ने बालक को पाँच रूपों में देखा। उस एक ही बालक को दुर्गा, विष्णु, सूर्य, शिव तथा गणेश — इस प्रकार से पाँच रूपों वाला देखा। तब स्वस्थमन होकर उन गन्धर्वों ने उन बालरूप गणेश को प्रणाम किया, उनकी पूजा की और वे उनकी स्तुति करने लगे। क्षणभर में वे उसे बालकरूप में देखते थे और दूसरे ही क्षण वे उन्हें पाँच रूपोंवाले दिखायी देते थे ॥ ३८-३९ ॥ फिर अगले ही क्षण वे महान् भयकारी रूप धारण कर लेते थे और कभी समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड को अपने में समेटे हुए दिखायी देते थे। तब उन्हें ही उन्होंने षड्रससम्पन्न नैवेद्यान्न का भोग लगाकर स्वयं भी भोजन किया। इसके बाद वे उस विश्वरूपधारी बालक गणेश की भक्तिपूर्वक स्तुति करने लगे ॥ ४० ॥ ॥ त्रय ऊचुः ॥ अज्ञानेन विमोहितं जगदिदं संसारचक्रे भ्रमन् नानाभेदधिया स्वरूपविमुखं नानाविधिभ्रामितम् । नानापाशनियन्त्रितं निजकृतैः कर्माङ्कुरैर्भ्रंशितं नानारूपमरूपमेकमगुणं हित्वा भवन्तं विभो ॥ ४१ ॥ अन्ये ते चरणारविन्दनिरता हित्वा फलं याजका आत्मानं स्वपरेषु वर्ष्मसु सदा सञ्चिन्तयन्तोऽमलाः । ते ज्ञानेन विधूय सर्वकलुषं दग्ध्वाङ्कुरान्कर्मजान् त्वामेवाशु विशन्ति सर्वसरितो वार्द्धिं यथा मेघजाः ॥ ४२ ॥ ये केचिद्भजनानुरक्तमनसः सिद्धिं गता भूयसीं ते तत्रैवं निमग्नमानसतया विस्मृत्य पादाम्बुजम् । ते कृच्छादुपरहय चोत्तमपदं तस्मात्पतन्तो निजा- दज्ञानान्नविदुर्विषं हि पिबतो हित्वाऽमृतं दुर्लभम् ॥ ४३ ॥ तस्मान्नो जननं भवेद्यदि शुभं यद्वाऽशुभं त्वत्स्मृति – रास्तां तत्र निरन्तरं शुभकरी भक्तिश्च दुःखनाशिनी । एवं चेद् भ्रमतां कदापि हि भवेत् संसारपाथोनिधेः निस्तारो भवतः कृपेक्षणवशात् सर्वात्मने ते नमः ॥ ४४ ॥ तवावतारान् न हि कोऽपि शक्तो वेत्तुं कथं वा कतिचित् कदेति । योगीश मायेश गुणेश भूमन् नमो नमस्ते भगवन् नमस्ते ॥ ४५ ॥ तीनों गन्धर्व बोले — हे विभो ! विविध प्रकार के स्वरूप धारण करने वाले, रूपहीन, अद्वितीय एवं सगुण स्वरूप धारण करने वाले आपकी भक्ति न करने के कारण ही यह सम्पूर्ण जीव-जगत् अज्ञान से मोहित होकर संसार-चक्र में भ्रमण कर रहा है । नाना प्रकार की भेद- बुद्धि से ग्रस्त होकर आपके स्वरूप से विमुख हुआ यह विविध प्रकार से भ्रमित हो रहा है और अपने द्वारा किये गये विविध प्रकार के कर्मों के अंकुरों से भ्रंशित और नाना प्रकार के पाशों में जकड़ा हुआ है ॥ ४१ ॥ दूसरे जो भक्तजन कर्मफल की उपेक्षा करके आपके चरणारविन्दों की सेवामें परायण हैं, अपनी आत्मा को ही दूसरे के शरीर में प्रतिष्ठित देखने वाले हैं, निरन्तर परमात्मा के ध्यान में परायण हैं, निर्मल अन्तःकरणवाले हैं, वे ज्ञान से समस्त पापों का प्रक्षालन करके, सभी कर्मांकुरों को दग्ध करके आपमें उसी प्रकार सत्वर प्रवेश करते हैं, जिस प्रकार कि मेघों के जल से व्याप्त सभी नदियाँ समुद्र में प्रविष्ट होती हैं ॥ ४२ ॥ और कुछ लोग जो आपकी भक्ति में परायण चित्तवाले हैं, वे जब बहुत-सी सिद्धियों को प्राप्त कर लेते हैं तो उन्हीं में आसक्त मनवाले होकर आपके चरणारविन्द को भूल जाते हैं, वे तो बड़े कष्ट से उत्तम पद को प्राप्त करके भी अज्ञानवश [तत्त्वको] न जानने के कारण अपने वास्तविक पद से उसी प्रकार पतन को प्राप्त होते हैं, जैसे कि व्यक्ति दुर्लभ अमृत को छोड़कर विष का पान करता है ॥ ४३ ॥ अतएव हमारा जन्म चाहे किसी शुभ योनि में हो अथवा किसी अशुभ योनि में, हमें आपकी स्मृति निरन्तर बनी रहे और समस्त दुःखों का उच्छेद करने वाली आपकी मंगलमयी भक्ति सदा बनी रहे । यदि ऐसा हो जाय तो संसार-समुद्र में भ्रमण करते हुए हम लोगों का उद्धार आपकी कृपादृष्टि से कभी-न-कभी हो ही जायगा । हे सर्वात्मन्! आपको नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे योगेश्वर! आपके अवतार क्यों होते हैं, कितने होते हैं तथा कब होते हैं, इन्हें जानने में कोई भी समर्थ नहीं है । हे मायापति ! हे गुणेश्वर ! हे भूमन्! आपको बार-बार नमस्कार है । हे भगवन्! आपको नमस्कार है ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार स्तुति करने के अनन्तर वे हाहा-हूहू आदि गन्धर्व पंचदेवों की पूजा करके तथा उस बालक महोत्कट गणेश की चेष्टाओं के प्रति विस्मित होते हुए भगवान् शिव के निवास-स्थान कैलास की ओर चले गये ॥ ४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में बालचरित के अन्तर्गत ‘हाहा आदि गन्धर्वों के द्वारा की गयी गजानन-स्तुति का वर्णन’ नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥ Content is available only for registered users. 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