श्रीदुर्गा-सप्तशती-पाठ के विविध क्रम
‘श्रीदुर्गा-सप्तशती’ के स्वाध्याय अर्थात् पाठ की कई विधियाँ है। ‘मरीच-कल्प’ में लिखा है कि ‘सप्तशती’ का पाठ करने के पहले ‘रात्रि-सूक्त’ का पाठ करना चाहिए और जब उसका पाठ कर चुके, तब अन्त में ‘देवी-सूक्त’ का पाठ करे।
– दूसरा मत यह है कि ‘सप्तशती’ का पाठ उसके अंगों के सहित करना चाहिए। ये अंग है – कवच, अर्गला, कीलक, प्राधानिक रहस्य, वैकृतिक रहस्य और मूर्ति-रहस्य। इनमें कवच, अर्गला और कीलक का पाठ पहले और तीनों रहस्यों का अन्त में करे। इसी को ‘षडंग-पाठ’ कहते हैं।durga
‘सप्तशती-रहस्य’ में लिखा है कि पहले अर्गला, तब कीलक, उसके बाद कवच, तब दस न्यास, स्तुति, त्रयोदश अध्याय, प्राधानिक, वैकृतिक और मूर्ति-रहस्य और परम देवी-सूक्त के क्रम से सप्तशती का पाठ करे।
‘मातृका-भेद-तन्त्र’ में लिखा है कि ‘सप्तशती’ एक प्रकार का माला-मन्त्र है, जिसे वीजात्मक नवार्ण-मन्त्र से पुटित कर पढना चाहिए।
– कवच, अर्गला, कीलक, न्यास सहित नवार्ण-मन्त्र का १०८ जप, रात्रि-सूक्त, दुर्गा-सप्तशती के १३ अध्यायों का पाठ, न्यास सहित नवार्ण-मन्त्र का १०८ जप आदि के क्रम से पाठ करने की विधि “नागोजी” ने निर्दिष्ट की है।
“नीलकण्ठ” ने कवच, अर्गला, कीलक, रात्रि-सूक्त, न्यास सहित नवार्ण-मन्त्र का १०८ जप, दुर्गा-सप्तशती के १३ अध्यायों का पाठ, देवी-सूक्त के क्रम से पाठ करने को कहा है।
– एक मत यह है कि ‘सप्तशती’-पाठ’ के पहले मार्कण्डेय-पुराण के ‘सरस्वती-सूक्त’ का अवश्य पाठ करना चाहिए।
श्रीदुर्गा-सप्तशती में तीन चरित हैं, इनको अलग-अलग क्रम से करने पर अलग-अलग कामना फल विशेष रुप से मिलता है। जो निम्न प्रकार है –
(तंत्र ग्रंथ एवं निर्णय सिन्धु)
१॰ महा-विद्या – प्रथम, द्वितीय और तृतीय चरित के क्रम से पाठ करना। -सर्वकामना हेतु।
२॰ महा-तन्त्री – प्रथम, तृतीय और द्वितीय चरित के क्रम से पाठ करना। – शत्रुनाश एवं लक्ष्मी प्राप्ति हेतु।
३॰ चण्डी – प्रथम, द्वितीय और तृतीय चरित के क्रम से पाठ करना। – शत्रुनाश।
४॰ सप्तशती – द्वितीय, प्रथम और तृतीय चरित के क्रम से पाठ करना। -लक्ष्मी व ज्ञान-प्राप्ति एवं उत्कीलन।
५॰ मृत-सञ्जीवनी – तृतीय, प्रथम और द्वितीय के क्रम से पाठ करना। – आरोग्य लाभ।
६॰ महा-चण्डी – तृतीय, द्वितीय और प्रथम चरित के क्रम से। – शत्रुनाश एवं लक्ष्मी प्राप्ति हेतु।
७॰ रुप-दीपिका – ‘रुपं देही’ इस श्लोकार्द्ध और नवार्ण मन्त्र से प्रत्येक श्लोक को सम्पुटित करके। – विजय एवं आरोग्य
८॰ चतुःषष्टि योगिनी – चौंसठ योगिनियों के योग से। – बालोपद्रव शमन।
९॰ परा – ‘परा-बीज’ के योग से।
१०॰ निकुंभला – द्वितीय, प्रथम और तृतीय चरित के क्रम से पाठ करना। – रक्षा हेतु, विजय हेतु (शूलेन पाहि नो॰॰॰ से सम्पुटित)।
११॰ विलोम (संहार-क्रम) – ७०१वें श्लोक से प्रथम श्लोक तक विलोम क्रम से।
१२॰ अक्षरशः विलोम पाठ – १३वें अध्याय से प्रथम अध्याय तक।
इसी तरह प्रत्येक चरित के पहले भैरव नामावली पाठ का विधान भी मिलता है, गढवाल व अन्य सम्प्रदायों में हर अध्याय से पहले भैरव नामावली का पाठ करने का क्रम भी मिलता है।
‘सप्तशती’ में यही और इतने ही भेद की बातें नहीं है, किन्तु इनके सिवा ‘सम्पुट-पाठ’ अर्थात् ‘सप्तशती’ के प्रत्येक मन्त्र और अन्त में कोई ‘बीज’ या सप्तशती का ही कोई मन्त्र जोडकर ‘सप्तशती’ का पाठ करना; वृद्धि-पाठ अर्थात् एक दिन एक पाठ, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन तीन, चौथे दिन चार, पाँचवें दिन पाँच, छठे दिन छः, सातवें दिन सात, आठवें दिन आठ व नवें दिन नौ – इस क्रम से ‘नवरात्र में पाठ करना आदि के सिवा ‘शत-चण्डी’ एवं ‘सहस्त्र-चण्डी’ आदि के विराट् आयोजन का भी विधान किया गया है।

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