श्री अर्जुन-कृत ‘श्रीदुर्गा-स्तवन’
।। संजय उवाच ।।
धार्तराष्ट्र-बलं दृष्ट्वा, युद्धाय समुपस्थितम ।
अर्जुनस्य हितार्थाय, कृष्णो वचनमब्रवीत् ।। 1 ।।
।। श्रीभगवानुवाच ।।
शुचिर्भूत्वा महा-बाहि, संग्रामाभिमुखे स्थितः ।
पराजयाय शत्रूणां, दुर्गा-स्तोत्रमुदीरय ।। 2 ।।durga
।। संजय उवाच ।।
एवमुक्तोऽर्जुनः संख्ये, वासुदेवेन धीमता ।
अवतीयं रथात् पार्थः, स्तोत्रमाह कृताञ्जलिः ।। 3 ।।
विनियोग – ॐ अस्य श्रीभगवती दुर्गा स्तोत्र मन्त्रस्य श्रीकृष्णार्जुन स्वरूपी नर नारायणो ऋषिः, अनुष्टुप् छन्द, श्रीदुर्गा देवता, ह्रीं बीजं, ऐं शक्ति, श्रीं कीलकं, मम अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।
ऋष्यादिन्यास- 
श्रीकृष्णार्जुन स्वरूपी नर नारायणो ऋषिभ्यो नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्रीदुर्गा देवतायै नमः हृदि, ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये, ऐं शक्त्यै नमः पादयो, श्रीं कीलकाय नमः नाभौ, मम अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।
कर न्यास – ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्याम नमः, ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा, ॐ ह्रूं मध्यमाभ्याम वषट्, ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां हुं, ॐ ह्रौं कनिष्ठाभ्यां वौष्ट्, ॐ ह्रः करतल करपृष्ठाभ्यां फट् ।
अंग-न्यास – ॐ ह्रां हृदयाय नमः, ॐ ह्रीं शिरसें स्वाहा, ॐ ह्रूं शिखायै वषट्, ॐ ह्रैं कवचायं हुं, ॐ ह्रौं नैत्र-त्रयाय वौष्ट्, ॐ ह्रः अस्त्राय फट् ।

ध्यान –
सिंहस्था शशि-शेखरा मरकत-प्रख्या चतुर्भिर्भुजैः,
शँख चक्र-धनुः-शरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता ।
आमुक्तांगद-हार-कंकण-रणत्-कांची-क्वणन् नूपुरा,
दुर्गा दुर्गति-हारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्-कुण्डला ।।

मानस पूजन – ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः लं पृथिव्यात्मकं गन्धं समर्पयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः हं आकाशात्मकं पुष्पं समर्पयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः यं वाय्वात्मकं धूपं घ्रापयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः रं वहृयात्मकं दीपं दर्शयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि। ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः सं सर्वात्मकं ताम्बूलं समर्पयामि।

।। अर्जुन उवाच ।।
नमस्ते सिद्ध-सेनानि, आर्ये मन्दर-वासिनी !
कुमारी कालि कापालि, कपिले कृष्ण-पिंगले ।।4।।
भद्र-कालि ! नमस्तुभ्यं, महाकालि नमोऽस्तुते ।
चण्डि चण्डे नमस्तुभ्यं, तारिणि वर-वर्णिनि ।।5।।
कात्यायनि महा-भागे, करालि विजये जये !
शिखि पिच्छ-ध्वज-धरे, नानाभरण-भूषिते ।।6।।
अट्ट-शूल-प्रहरणे, खड्ग-खेटक-धारिणे !
गोपेन्द्रस्यानुजे ज्येष्ठे, नन्द-गोप-कुलोद्भवे ।।7।।
महिषासृक्-प्रिये नित्यं, कौशिकि पीत-वासिनि !
अट्टहासे कोक-मुखे, नमस्तेऽस्तु रण-प्रिये ।।8।।
उमे शाकम्भरि श्वेते, कृष्णे कैटभ-नाशिनि !
हिरण्याक्षि विरूपाक्षि, सु-धूम्राक्षि नमोऽस्तु ते ।।9।।
वेद-श्रुति-महा-पुण्ये, ब्रह्मण्ये जात-वेदसि !
जम्बू-कटक-चैत्येषु, नित्यं सन्निहितालये ।।10।।
त्वं ब्रह्म-विद्यानां, महा-निद्रा च देहिनाम् ।
स्कन्ध-मातर्भगवति, दुर्गे कान्तार-वासिनि ।।11।।
स्वाहाकारः स्वधा चैव, कला काष्ठा सरस्वती ।
सावित्री वेद-माता च, तथा वेदान्त उच्यते ।।12।।
स्तुताऽसि त्वं महा-देवि ! विशुद्धेनान्तरात्मा ।
जयो भवतु मे नित्यं, त्वत्-प्रसादाद् रणाजिरे ।।13।।
कान्तार-भय-दुर्गेषु, भक्तानां चालयेषु च ।
नित्यं वससि पाताले, युद्धे जयसि दानवान् ।।14।।
त्वं जम्भिनी मोहिनी च, माया ह्रीः श्रीस्तथैव च ।
सन्ध्या प्रभावती चैव, सावित्री जननी तथा ।।15।।
तुष्टिः पुष्टिर्धृतिर्दीप्तिश्चन्द्रादित्य-विवर्धनी ।
भूतिर्भूति-मतां संख्ये, वीक्ष्यसे सिद्ध-चारणैः ।।16।।
।। संजय उवाच ।।
ततः पार्थस्य विज्ञाय, भक्तिं मानव-वत्सला ।
अन्तरिक्ष-गतोवाच, गोविन्दस्याग्रतः स्थिता ।।17।।
।। देव्युवाच ।।
स्वल्पेनैव तु कालेन, शत्रून् जेष्यसि पाण्डव !
नरस्त्वमसि दुर्धर्ष, नारायण-सहाय-वान् ।।18।।
अजेयस्त्वं रणेऽरीणामपि, वज्र-भृतः स्वयम् ।
।। संजय उवाच ।।
इत्येवमुक्ता वरदा, क्षणेनान्तरधीयत ।।19।।
लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो, मेने विजयमात्मनः ।
आरुरोह ततः पार्थो, रथं परम-सम्मतम् ।।20।।
कृष्णार्जुननावेक-रथौ, दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ।
।। फल-श्रुति ।।
यः इदं पठते स्तोत्रं, कल्यं उत्थाय मानवः ।।21।।
यक्ष-रक्षः-पिशाचेभ्यो, न भयं विद्यते सदा ।
न चापि रिपवस्तेभ्यः, सर्पाद्या ये च दंष्ट्रिणः ।।22।।
न भयं विद्यते तस्य, सदा राज-कुलादपि ।
विवादे जयमाप्नोति, बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।।23।।
दुर्गं तरति चावश्यं, तथा चोरैर्विमुच्यते ।
संग्रामे विजयेन्नित्यं, लक्ष्मीं प्राप्न्नोति केवलाम् ।।24।।
आरोग्य-बल-सम्पन्नो, जीवेद् वर्ष-शतं तथा ।
एतद् दृष्टं प्रसादात्तु, मया व्यासस्य धीमता ।।25।।
।। श्रीमन्महा-भारते-भीष्म-पर्वणि श्रीदुर्गा-स्तोत्रं ।।
जो मनुष्य प्रातःकाल इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे यक्ष, राक्षस और पिशाचों से कभी भय नहीं होता । विवाद में विजय प्राप्त होती है और बन्दी बन्धन से मुक्त हो जाता है । दुर्गम संकट का निवारण होता है और चोरों से मुक्ति होती है । इतना ही नहीं, इस स्तोत्र का पाठ करने वाला आरोग्य और बल से सम्पन्न होकर सौ वर्षों की आयु प्राप्त करता है ।

प्रयोग विधि
उक्त स्तोत्र ‘महाभारत’ के ‘भीष्म पर्व’ से उद्धृत है।

१॰ इसकी साधना भगवती के मन्दिर अथवा घर में एकान्त में करनी चाहिये। ‘घी’ के दीपक में बत्ती के लिये अपनी नाप के बराबर रूई के सूत को 5 बार मोड़कर बटे तथा बटी हुई बत्ती को कुंकुम से रंगकर भगवती के सामने दीपक जलायें।
नवरात्र या सर्व सिद्धि योग से पाठ का प्रारम्भ करें कुल 9 या 21 दिन पाठ करें तथा प्रतिदिन 9 या 21 बार आवृत्ति करें। पाठ के बाद हवन करें। लाल वस्त्र तथा आसन प्रशस्त है। साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन करें।
इससे सभी प्रकार की बाधाएं समाप्त होती है तथा दरिद्रता का नाश होता है। शासकीय संकट, शत्रु बाधा की समाप्ति के लिये अनुभूत सिद्ध प्रयोग है।
२॰ नित्य दुर्गा-पूजा (सप्तशती-पाठ) के बाद उक्त स्तव के ३१ पाठ १ महिने तक किए जाएँ। या
३॰ नवरात्र काल में १०८ पाठ नित्य किए जाएँ, तो उक्त “दुर्गा-स्तवन” सिद्ध हो जाता है।

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