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श्रीभगवती शतक
(पञ्जाब के सिद्ध सन्त पूज्य दौलतराम जी रचित)

नमो भगवती ! जागती ज्योति-ज्वाला ।
तुही रक्ष-पाला कृपाला दयाला ॥
तुही दीन के दुःख-दारिद्र हरती ।
तुही भक्त को पार संसार करती ॥ १ ॥

तुही भूरि सुख की सदा देन-हारी ।
सभी छोंड़ि मैं ओट लीन्ही तिहारी ॥
नमो योगिनी ! योग में योग-माया ।
नमो भारती ! भीर में जो सहाया ॥ २ ॥
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तुही हंस – आरूढ़िनी गूढ़ गीता ।
चरण में परयो मातु ! कीजै अभीता ॥
तुही दोष-अपराध को दूर करनी ।
तुही विश्व-सामुद्र में मातु ! तरनी ॥ ३ ॥

तुही मोक्ष सुख-सार की देन-हारी ।
चरण में परयो है शरण ओट भारी ॥
कटो मोह-माया कि अब मातु ! बेरी ।
अबेरी करी पीर मेरी न हेरी ॥ ४ ॥

नमो वाक-बानी ! अलौकिक कहानी ।
जपें सिद्ध गन्धर्व मुनि-वृन्द ज्ञानी ।
तुही भगवती ! भूरि सुख की देवैया ।
महा ओघ-अघ-झार कलि की कटैया ॥ ५ ॥

परयो है शरण आन तेरी भवानी ।
नमो हो, नमो हो, नमो राज-रानी ॥
तुही सृष्टि-करनी, सदा कष्ट-हरनी ।
तुही भौन-भरनी, महा-वेद-वरनी ॥ ६ ॥

नमो शारदा ! पारदा दीन दासै ।
तुही सब जगत बीच विद्या प्रकासै ॥
महा-तेज तेरो, कहा को बखाने ?
सदा शेष औ वेद कह नेति मानै ॥ ७ ॥

करो दुरि मेरे जिते पाप भारे ।
परयो दारिदी दीन द्वारे तिहारे ॥
सुरक्षा करो मातु ! मेरी सदाई ॥
तुही देश-परदेश में हो सहाई ॥ ८ ॥

गही मैं महा-दीन हो ओट तेरी ।
न दूजो भरोसो सुनो मातु ! मेरी ॥
नमो शैलपुत्री ! शिवा शम्भू-रानी ।
उमा अम्बिका विश्व की मातु ! दानी ॥ ९ ॥
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रमै तु रमा-रूप ह्वै राज-द्वारे ।
महा-तामसी घीर योधा पछारे ॥
बसी कोट ते ब्रह्म लौं ज्योति तेरी ।
सभी जीव में तू सदा मातु ! मेरी ॥ १० ॥

सदा सातहू द्वीप में दीप तेरी ।
नमो मातु ! मेरी कटो पाप-बेरी ॥
तुही पालनी रूप-संहारनी है ।
तुही तारनी दोन-उद्धारनी है ॥ ११ ॥

नमो शङ्ख-धारी, नमो चक्र-पानी ।
नमो वाक-बानी, महा-तेज-सानी ! ॥
नमो ईश्वरी, अन्नपूर्णा विशाला !
तुही काल की काल-रूपा कराला ॥ १२ ॥

तुही चण्डिका, दण्डिका दुष्ट जन की ।
गहो मातु ! मेरी सदा पैज पन को ॥
तुही भूचरी खेचरी ह्वै विराजै ।
तुही खण्ड ब्रह्मण्ड के खण्ड साजै ॥ १३ ॥

नमो उग्र-दन्ती, नमो उग्र-केशी ।
नमो हो महेशी ! नमो उग्र-भेषी !॥
तुही राज को रङ्क करि दुःख डारे ।
तुही रङ्क के शीश पै छत्र धारै ॥ १४ ॥

लखी ना परे मातु ! लीला तिहारी ।
सभी जक्त में शक्ति तेरी निहारी ॥
नमो नारसिंही ! शिवा शम्भु-प्यारी ।
नमो तेज-वन्ती, अवन्ती-कुमारी ! ॥ १५ ॥

महा-रूप में रूप तेरो प्रकासै ।
तुही योग-माया, महा-तेज भासै ॥
तुहीं ब्रह्म में, ब्रह्म है ब्रह्म-चरणी ।
महा-मोह-सामुद्र ते पार करनी ॥ १६ ॥

तुही शीतला शाम्भवी भद्र-काली ।
तुही वैष्णवी, हिङ्गला पैज पाली ॥
महा-स्वर्ग पाताल में वास करनी ।
तिहुँ लोक में भक्त-भण्डार भरनी ॥ १७ ॥

तुही दुष्ट-दल दैत्य को दूर करनी ।
तुही अग्नि आकाश त्रैलोक्य धरनी ॥
तुही चण्ड-चामुण्ड क्षण में खपाए ।
नमो हो चमुण्डा ! सदा योग-माये ! ॥ १८ ॥

तुही धूम्रलोचन कियो नाश अम्बा !
तुही काज में कीजिए क्यों विलम्बा ? ॥
तुही कालिका, काल को रूप धारी ।
हनो शत्रु मेरे जिते भूमि भारी ॥ १९ ॥

महा-पाप अवगुण क्षमो क्षेम-रूपा ।
महा-पातकी हौं, परयो पाप-कूपा ॥
तुही कृष्ण ह्वै कंस को शीश काट्यो ।
तुहीं भूमि में दुष्ट को दीह डाट्यो ॥ २० ॥

तुही राम को रूप धरि लङ्क धाई ।
हन्सयो जाय रावण सखा पूत भाई ॥
धरयो चक्र तोमर महा-तेजवन्ती ।
महा-दुष्ट योधा नशावै भवन्ती ॥ २१ ॥

सदा सर्वदा दीन-जन तै बचाए ।
गऊ विप्र धरणी मुनी देव गाए ।
सदा सन्त को मोद की देन-हारी ।
महा-योग-संयोग में तु बिहारी ॥ २२ ॥

करे सेव पूरी, जिन्हें बैठि सेवी ।
नमो सिद्ध-करनी भगत-काज देवी ॥
नहीं पाठ-पूजा न जप-योग मो में ।
नमो पातकी-तारणी पैज तो में ॥ २३ ॥

बिना तोहिं मैं पीर काको सुनाऊँ ?
दिना-रैनि तेरे चरण ध्यान लाऊँ ॥
तुही तीन गुण में त्रिधा ताप हरती ।
तुही दानवों से समर-भूमि लरती ॥ २४ ॥

तुही मन्त्र में, यन्त्र में शक्ति-रूपी ।
तुही वेद-विद्या, तुही भक्ति-रूपी ॥
तुही भूमि-आकाश की ओट धारी ।
तुही सात पाताल में मातु ! चारी ॥ २५ ॥

तुही ग्रन्थ में, पन्थ में है सहाई ।
तुही देव-गन्धर्व मुनि-सिद्ध गाई ॥
दिपै राज और तेज में ज्योति तेरी ।
करो काज पूरे, नमो मातु ! मेरी ॥ २६ ॥

महा-दीन की सार, अब मातु ! लीजै ।
धरो शीस पै हाथ, निरभै करीजै ॥
महा-पातकी की कटै जो न फाँसी ।
घटै बिर्द तेरो, जगत होय हाँसी ॥ २७ ॥

कहो, कौन के द्वार पै मैं पुकारों ?
बिना कौन तेरे, हितू है हमारो ? ॥
सु-ध्याऊँ, मनाऊँ सदा पाँय तेरे ।
कहो, को मनोरथ करै सिद्ध मेरे ? ॥ २८ ॥

नमो कुषमाण्डी, नमो घण्ट-चण्डा !
नमो काल-रात्री, नमो हो अखण्डा ! ॥
नमो हो सकन्दी, नमो हो अबन्दी !
नमो हो प्रबन्दी, नमो वेद-छन्दी ! ॥ २९ ॥

तुही जाप में, ताप में, योग में है ।
तुही कर्म में, धर्म में, भोग में है ।
सदा शम्भु ध्यावैं, समाधी लगावैं ।
विधी-विष्णु तेरो नहीं अन्त पावैं ॥ ३० ॥

तुही द्वे भुजा औ प्रगट अठ-भुजारी ।
भगत हेतु लीला विविध तैं पसारी ॥
नहीं पाव तेरो कोई आदि-अन्ता ।
अनन्ता भनन्ता सभी साधु-सन्ता ॥ ३१ ॥

महा है मही-मध्य, मेधा तिहारी ।
अटल ज्योति तेरी, अटल तेज भारी ॥
खड्यो हाथ लै छत्र दिनकर दुवारे ।
निशाकर लिए चौर दिन-रैन ढारे ॥ ३२ ॥

धरे हाथ वीणा, करैं गान नारद ।
तुही रूप की राशि, शारद विशारद ! ॥
खड़ी हाथ जोरे जिती देव-नारी ।
करैं आरती स्वच्छ पूजा तिहारी ॥ ३३ ॥

बजैं शङ्ख वीणा नफीरी नगारे ।
रहै भीर तोरे सदा ही दुवारे ॥
महा-मन्द हौं, पाप को हौं निवासी ।
कटो जाल मेरे, महा-मोह फाँसी ॥ ३४ ॥

नमो अम्ब ! आशा करो आस पूरी ।
नमो मातु ! मनसा करो दुःख दूरी ॥
नमो नैन-देवी ! मुकुन्दी अनन्दी ।
करो स्वच्छ वाणी भगत-भाव चन्दी ॥ ३५ ॥

नमो जालिपा ! धर्मिनी काँगड़े-सी ।
कमक्षा कपरदी नमो काल-भेसो ॥
तुही भीम बैराट को रूप शक्ती ।
सदाऽऽनन्द-कारी तिहारी सु-भक्ती ॥ ३६ ॥

तुही पाप मेटे, सदा शान्ति ऐनी ।
सदा मोक्ष देनी, प्रयागै त्रिवेनी ॥
तुही सरस्वती गङ्ग सूरज-सुता-सी ।
तुही तेज में तेज-रासी प्रकासी ॥ ३७ ॥

तुही मोह लीने, महा-योग-योगी ।
तुही अम्ब ! नव खण्ड के भोग भोगी ॥
तुही राग औ रङ्ग में रूप-रासी ।
तुम्हारी प्रभा भास्कर में प्रकासी ॥ ३८ ॥

प्रगट आग में, तु दिपै तेजवन्ती ।
मही में प्रगट, बासना-सी लसन्ती ॥
तुही शाख अरु पात में बीज-रूपा ।
अधामा अनामा अनूपा स्वरूपा ॥ ३९ ॥

तुही जक्त में, भक्त में, बास-कारी ।
नमो भैरवी ! दक्ष-कन्या कुमारी ॥
तुही वर्ण में, धर्म में, ध्यान-रूपा ।
लसै विश्व में, तू प्रतिज्ञा-स्वरूपा ॥ ४० ॥

नमो ईश्वरी ! तू प्रकट ईश-माया ।
सती शोभ-शोभा, सदा भूमि छाया ॥
दिपै भाल पै बाल-शशि की प्रभासी ।
अरुण कञ्ज-नैनी नमो कीर-नासी ॥ ४१ ॥

तिरीछी भृकुटि ज्यों धनुष शम्भु-प्यारी !
उपमा अतुल जक्त जमनी तिहारी ॥
सजै अङ्ग में लाल चोला अमोला ।
गरे फूल-माला सुधा-सान बोला ॥ ४२ ॥

मुकुत-हार लोनो लसे मातु ! नीके ।
करो सिद्ध पूरे सबै काम जी के ॥
सुरासर असुर हास में फाँस लीने ।
किए देव निर्भय असुर-वृन्द छीने ॥ ४३ ॥

नमो मोहिनी-रूप अम्बे भवानी ! ।
जपैं जाप योगी, धरै ध्यान ध्यानी ॥
न नामैं, न रूपैं, न कामी, न धामी ।
न मोहैं, न लोभैं, न क्षोभैं, अजामी ॥ ४४ ॥

नमो हो अभेदी-अखेदी-अकामा !
नमो सर-गुणी निरगुणी रूप-रामा ! ॥
तुही यन्त्र औ मन्त्र में रूप धारी ।
तुही शेष को रूप धर भूमि धारी ॥ ४५ ॥

नमो विश्व-विश्वेश्वरी कर्णकारम् ।
तुही भक्त भै हारिणी भव अधारम् ॥
नमो शक्ति-रूपा, नमो बाण-धारी !
नमो शूल-वारी, नमो चक्र-चारी ! ॥ ४६ ॥

नमो श्याम-काली, कपाली मसानी ।
नमो सिह-वाही, सभी लोक मानी ॥
नमो दैत्य-खण्डी प्रचण्डी सुचण्डी !
नमो नेम-पाली मही-मध्य मण्डी ॥ ४७ ॥

शिवा, भद्रिका, भद्र-रूपा, अरूपा ।
दया, शान्ति और तुष्टि-रूपा अनूपा ॥
नमो सच्चिदानन्दिनी, शुद्ध बानी !
नमो वेद-बानी, बखानी सु-ज्ञानी ॥ ४८ ॥

नमो घोर संग्राम-करनी, सु-बरनी ।
जगत में प्रकट है तिहारी सु-करनी ॥
नमो सुन्दरी ! शुभ शोभा तिहारी ।
उमा रोहिणी राधिका तू कुमारी ॥ ४९ ॥

नमो दिव्य आकाश में वास वासी ।
नमो हो विलासी दिपै तेज-रासी ॥
तुही गङ्ग हो, शम्भु के शीस वासी ।
तुही विष्णु के सङ्ग, रमती रमा-सी ॥ ५० ॥

तुही राम-रानी, रमी जनकजा-सी ।
तुही कृष्ण-प्यारी, बनी राधिका-सी ॥
तुही शक्ति हो, चार युग में प्रकासी ।
तुही भोग-भोगी, सँयोगी उदासी ॥ ५१ ॥

तुही ज्ञान-देनी, सदा तुङ्ग नैनी ।
तुही दीन मालीन की सार लैनी ॥
नमो शुभ्र-श्रेणी, नमो शुभ्र-बैनी ।
नमो पाप-क्षैनी, नमो मोक्ष-दैनी ॥ ५२ ॥

नमो धूप-छाया, नमो चन्द्र-काया ।
नमो पौन-पौनी, नमो दीन-दाया ! ॥
नमो हो सवित्री, उपर्ना मृणानी ।
नमो काम-रूपा, अरूपा भवानी ! ॥ ५३ ॥

नमो डाकिनी-शाकिनी भूत-भामा !
लिए नाम तेरो ललामा सु-श्यामा ॥
नमो अन्तरक्षी, नमो अन्त्र-यामी !
नमो हो अगाधी, नमो हो अधामी ॥ ५४ ॥

नमो हो अजीती, नमो हो हठीली !
नमोऽहं अडोली, नमोऽहं अकेली ! ॥
नमोऽहं अनादी, नमोऽहं अबादी ।
नमो पद्म-बादी, नमामी अगाधी ॥ ५५ ॥

तुही सिद्धि पर-सिद्ध है अष्ट आदी ।
तुही प्रकट नव निद्धि है रूप आदी ॥
तुही भक्ति-रूपी मनी-मन-निवासी ।
तुही विश्व-रमनी, तुही है उदासी ॥ ५६ ॥

तुही योग में, यज्ञ में वेद-वानी ।
तुही राग में, रङ्ग में है भवानी ॥
तुही यामिनी, कालिका दुष्ट-दमनी ।
तुही उर्वशी, अप्सरा, देव-रमनी ॥ ५७ ॥

तुही कालिका, रमे दल दुष्ट केते ।
कहै कौन तेरे चरित मञ्जु जेते ॥
अपर्णा सुपर्णा, सुवर्णा अकामा ।
सबै सिद्ध ध्यावैं तुम्हैं शम्भु-वामा ॥ ५८ ॥

कहूँ तेजवन्ती कहूँ लाजवन्ती ।
कहूँ गानवन्ती बजन्ती अनन्ती ॥
कहूँ दुष्ट गञ्जे, कहूँ कोट-भञ्जे ।
कहूँ सन्त रञ्जे, नमो मातु मञ्जे ॥ ५९ ॥

कहूँ दोष-दाहे, बचन तो निबाहे ।
सदा शक्ति साची, भगत की पनाहे ॥
क्षमो क्षेम-रूपी, महा-क्षोभ मेरे ।
क्षमो द्वन्द-क्षेमी, जिते दोष घेरे ॥ ६० ॥

क्षमो राज-राजेश्वरी, पीर तन की ।
क्षमो दीन-दाया, धरे आश धन की ॥
क्षमो कूर कर्मान के भेद-भेदी ।
क्षमो जैयन्ती, देव-दानव अखेदी ॥ ६१ ॥

क्षमो छलन-हारी, छली नाहिं माया ।
क्षमो नेति नारायणी नति गाया ॥
क्षमो दीन को, दीह-दारिद भवानी !
क्षमो दोष-दूषण, करी शुद्ध बानी ॥ ६२ ॥

क्षमो काम अरु क्रोध, कलि-कूर चारी ।
महा-दीन भारी, गही ओट सारी ॥
नमो निद्धि दीजै, भली सिद्धि आठै ।
महा-बुद्धि दीजै, सदा शुद्ध पाठे ॥ ६३ ॥

भली लक्ष दीजै, कृपा-दीठि कीजै ।
महा-तेज दीजै, बली छिद्र छीजै ॥
सदा आपनी भक्ति दीजै, न खीजै ।
सदा वंश की वृद्धता मातु ! दीजै ॥ ६४ ॥

अरोगी सदा देह दीजे, गती जो ।
रहे ध्यान तो में, जिते साल जी जो ॥
हनो सींव दुख का, नमो खानि सुख की ।
कठिन जो कलुष की गती, तीव्र रुख की ॥ ६५ ॥

महा-मन्द-भागी, कुकर्मी अभागी ।
रहों चर्ण लागी, क्षमो क्षेम-पागी ॥
नमो रूप-राशी, निशाकर-कला-सी ।
प्रभाकर-प्रभा-सी, छटा-सी रमा-सी ॥ ६६ ॥

नमो चन्द्र-वदनी, नमो दुष्ट-कदनी !
नमो मोद-सदनी, नमो रूप-मदनी ! ॥
नमो हंस-गमनी, नमो विश्व-रमनी !
नमो दैत्य-शमनी, नमो दीह-भवनी ! ॥ ६७ ॥

नमो शुभ्र-केशी, सु-भेषा सु-देशी !
विशेषी महेशी, नमो क्रान्त-धेशी ॥
परे जो तिहारे शरण दीन भारे ।
कई अम्ब ! तारे विचारे निहारे ॥ ६८ ॥

जहाँ बैठि ध्याई, तहीं पैठि जाई ।
भई है सहाई, जिते रङ्क-राई ॥
कहा काज छाई, मेरी बेर माई ?
इती बेर लाई, न पीरा मिटाई ॥ ६९ ॥

धरी है तिहारी, हिये ओट भारी ।
सुनो कान दै मातु ! बिनती हमारी ॥
नमो मञ्जु-घोषी, नमो दीन-पोषी ।
नमो शत्रु-शोषी, नमो हो अदोषी ॥ ७० ॥

नमो चक्रवाली, नमो बक्र-शाली !
नमो हो, नमो भक्त की रक्ष-पाली ! ॥
नमो कण्ठ-गेही, न मोही अछेही !
नमो हो अदेही, नमो दीन-गेही ! ॥ ७१ ॥

नमो हो अदेही, नमो शुद्ध-वानी ।
ऋषी देव-ज्ञानी, कहानी न जानी ॥
नमो रैनि-काया, नमो मुण्ड-माली !
नमोऽहं त्रिलोकी, नमोऽहं कुशाली ! ॥ ७२ ॥

नमो भावनीयं, नमो रम्य-राशी !
नमोऽहं मृणाली, नमो काल-नाशी ! ॥
नमो ब्रह्म-दुहिता, नमो ब्रह्म-पाली !
नमो सेवकै, तारनी रक्ष-पाली ! ॥ ७३ ॥

नमो देवतानी, महा-आनि मानी ।
नमो गम्य-ज्ञानी, न जानी महानी ॥
नमो दिव्य सिंहासनी, चन्द्र-चूड़ी !
नमो गूढ़-गूढ़ी, नमो रूढ़-रूढ़ी ! ॥ ७४ ॥

नमो मस्तके, लेख-लेखी विधाता ।
नमो जीव-दाता, नमो शस्त्र-ज्ञाता ! ॥
नमो कण्ठ-वासा, करो शत्रु-नासा ।
चरण कञ्ज-युग मञ्जु दासा पियासा ॥ ७५ ॥

सदा भक्ति दीजै, छली क्षोभ छीजै ।
महा-दीन की मातु ! विनती सुनीजै ॥
लगी आनि तुव चर्ण में आस मेरी ।
भयो क्षोभ-सागर, करो पार बेरी ॥ ७६ ॥

महा-पातकी द्वार पै, मैं पुकारों ।
यथा और तारे, तथा मोहिं तारो ॥
नमो हो अकर्मी, नमो शुद्ध-कर्मी ! ।
नमो धाम-धर्मी, अवर्मी अमर्मी ! ॥ ७७ ॥

नमो श्रेष्ठ-वेष्ठा, नमो रूप-चेष्टा !
सुध्याऊँ मनाऊँ सदा, सिन्धु-श्रेष्ठा ॥
नमो ऊर्द्धनी, मूर्द्धनी, ऊर्द्ध-वासी !
नमो सिर्जनी, सत-गुणी सम-प्रकाशी ! ॥ ७८ ॥

नमो सत-घनी, चित-घनी, मोद-रासी !
नमो विश्व-व्यापी, तिमिर घोर-नाशी ! ॥
नमो तर्जनी, गर्जनी, दुष्ट-दाही !
नमो बेप्र-बाही, नमो शाह-शाही ! ॥ ७९ ॥

नमो मङ्गलीका, नमो हो अलीका !
नमो अर्थ अम्बे ! करो सिद्ध नीका ॥
नमो क्षीर-सैनी, नमो धीर-बैनी ।
महामोक्ष-क्षैनी, नमो कान्ति-ऐनी ॥ ८० ॥

नमो ज्ञान-तीता, नमो हो अतीता ।
नमो दीन-माता, भवानी अभीता ! ॥
नमो हंस-वाही, नमो वे अथाही ! ।
सदा जै, सदा जै, सदा जै अगाही ॥ ८१ ॥

नमो रूप आला, जगत में उजाला ।
निवासी हिमाला, नमो जोति-ज्वाला ! ॥
नमो फूल-धारी, नमो व्योम-चारी !
नमो हो, नमो जागती ज्योति भारी ॥ ८२ ॥

नमो रागिनी, भागनी, भूरि-दाया !
नमो शक्ति-शोभा, सदा हो सहाया ॥
दिनै-रैनि ‘दौलत’ चरण ध्यान लावे ।
कृपा-दीठि कीजो, महा-मोद पावे ॥ ८३ ॥

नमो अम्ब, जगदम्ब ! जननी दयाला ।
नमो भाग-भाली, कला है निराला ॥
नमो हेम-वरणी, नमो चक्र-धरणी !
असुर दूर-करनी, भवन सन्त-भरनी ॥ ८४ ॥

नमो ब्रह्म-श्रोती, नमो ब्रह्म-वेती !
नमो ब्रह्म-रक्षा, नमो ब्रह्म-चेती ! ॥
नमो ब्रह्म-बेटी, गिरा गौरि वरणी !
कृपा-दृष्टि-करणी, विपद-जाल-हरणी ! ॥ ८५ ॥

नमो बुद्धि-दाता, नमो हो विख्याता !
नमो हेम-गाता, नमो विश्व-माता ! ॥
नमो शारदा, सिद्ध-करनी सु-आसा ।
करो आनि मेरे हिये में निवासा ॥ ८६ ॥

धरे हाथ पुस्तक, सुभग स्वच्छ बीना ।
करैं गान गौरव, सदा सन्त भीना ॥
नहीं बाहु-बल थोरहु मातु ! मेरे ।
चरण की शरण मैं गही पास तेरे ॥ ८७ ॥

नमो क्रोधनी कालिका, तेग-धारी !
सुनो कान दै मातु ! विनती हमारी ॥
यथा दुष्ट तैं दैत्य चाबै अछैये ।
तथा शत्रु मेरे चबैये अघैये ॥ ८८ ॥

नमो अर्ब औ खर्ब की मातु ! दाता ।
इड़ा आरजा भारती भू विख्याता ॥
नमो पालनी दालनी दीन-दूषा ।
नमो भक्त-चण्डी, अनन्दी पियूषा ॥ ८९ ॥

नमो सन्त-हिय-मानसर की मराली !
गिरैं सन्त पद-कञ्ज पै भौंर-पाली ॥
सु-दीजो भला भक्त-सौरभ-सुगन्धी ।
सदा सेवते देवते जय मुकुन्दी ॥ ९० ॥

नमो दीठि-रूपा, नमो हो अदीठा !
नमो दुष्ट-दाही, नमो देव-ईठा ! ॥
नमो काम-चारी, नमो शुभ-अचारी ! ।
जपैं ब्रह्मचारी, अगति गति तिहारी ॥ ९१ ॥

नमो जालिपा, विश्व मो रूप इच्छा ।
चहैं देव-दारा, खड़े द्वार भिक्षा ॥
नमो रूप- भावी, नमो हो अभावी !
जोई तोहिं भावो, सोई बात फावी ॥ ९२ ॥

नमो शान्त-वर्मा, सु-कर्मा सु-केशी !
नमो व्यक्त जातीन के वेश भेशी ॥
नमो देव सन्तत, नमो देव-अंशा !
मुनी विप्र योगीश करते प्रशंसा ॥ ९३ ॥

नमो तुङ्ग-ध्वजनी, नमो नग-निवासी !
नमो भानु–भाशी, प्रभा-सी कला-सी ! ॥
नमो सौम्य-रूपा, नमो सत्य-बैनी !
नमो चारु-नैनी, नमो हो विजैनी ! ॥ ९४ ॥

नमो लाल-चीरी, नमो ज्योति-हीरी ! ।
नमो वीर-वीरी, नमो धीर-धीरी ! ॥
नमो लङ्क-डेसी, अजैसी हमेसी ।
नमो शक्ति-भेषी, नमो वाकधेशी ! ॥ ९५ ॥

नमो युद्ध-करनी, नमो बुद्धि-धरनी !
नमो काज-करनी, नमो पीर-हरनी ! ॥
नमो भौन-भरनी, नमो ताप-दलनी !
नमो सन्त-शरणी, नमो दुष्ट-भलनी ! ॥ ९६ ॥

नमो तारनी, कारनी मोक्ष-दाता !
आनन्द-स्वरूपा, अनूपा विख्याता ! ॥
चतुर वेद गावैं, चतुर कूट-चारी ।
प्रकट चन्द्रिका मातु ! कीरति तिहारी ॥ ९७ ॥

कटै मोह-माया औ भव-जाल भारी ।
कहै दास जो मातु ! कीरति तिहारी ॥
तुही मोक्ष-देनी, सदा ज्ञान-रूपा ।
सदा सच्चिदानन्दनी, भूप-भूपा ॥ ९८ ॥

प्रकट मन्त्र में मातु ! सत्या प्रकाशी ।
सदा मोद-कारी, अनन्दी हुलासी ॥
तुही भूमि आकाश की है अधारा ।
तुही कष्ट आरिष्ट को है निवारा ॥ ९९ ॥

करो दास की आस पूरी, भवानी !
तुही दास अवलम्ब है, अम्ब ! दानी ॥
सदा शरण तेरी, हरो पीर मेरी ।
कहा कारने मातु ! कीनी अबेरी ? ॥ १०० ॥

॥ फल- श्रुति ॥

पढे पाठ जोई, नितै नेम प्राता ।
करैं काज पूरे, सदा सिद्धि-माता ॥
नमो जक्त-अम्बे ! जितै दोष-राशी ।
नहीं काव्य की रीति, यामे प्रकाशी ॥ १०१ ॥

दोऊ हाथ जोरे, खड़ो दीन द्वारे ।
महा-पातकी, दास ‘दौलत’ पुकारे ॥
करो सिद्धि कारज, धरे दीन ध्यानम् ।
सदा त्राहि मानं, सदा त्राहि मानम् ॥ १०२ ॥

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