May 12, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-सप्तमः स्कन्धः-अध्याय-31 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-सप्तमः स्कन्धः-एकत्रिंशोऽध्यायः इकतीसवाँ अध्याय तारकासुर से पीड़ित देवताओं द्वारा भगवती की स्तुति तथा भगवती का हिमालय की पुत्री के रूप में प्रकट होने का आश्वासन देना हिमालयगृहे पार्वतीजन्मविषये देवान् प्रति देवीकथनवर्णनम् जनमेजय बोले — [ हे मुने!] हिमालय के शिखर पर आविर्भूत जिस परम ज्योति के विषय में आप पहले बता चुके हैं, उसे मुझे विस्तार से बताइये ॥ १ ॥ ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य होगा, जो भगवती के कथामृत का पान करता हुआ उससे विरत हो जाय; क्योंकि अमृत पीने वालों की मृत्यु तो सम्भव है, किंतु इस कथामृत का पान करने वाले की मृत्यु नहीं हो सकती ॥ २ ॥ व्यासजी बोले — आप धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, भाग्यवान् हैं और महात्माओं द्वारा शिक्षित किये गये हैं; इसी से भगवती के प्रति आपकी निश्छल भक्ति है ॥ ३ ॥ हे राजन् ! एक प्राचीन कथा सुनिये। अग्नि में सती देह के दग्ध हो जाने पर भगवान् शिव व्याकुल होकर इधर-उधर भ्रमण करने लगे और अन्त में किसी स्थान पर ठहर गये। इसके बाद उन आत्मनिष्ठ शिव ने प्रपंचज्ञान से शून्य होकर मन को समाधिस्थ करके भगवती के स्वरूप का ध्यान करते हुए कुछ समय वहीं पर व्यतीत किया ॥ ४-५ ॥ स्थावर-जंगममय तीनों लोक सौभाग्य से रहित हो गये । समुद्रों, द्वीपों और पर्वतोंसहित सम्पूर्ण जगत् शक्तिहीन हो गया। सभी प्राणियों के हृदय में प्रवहमान आनन्द सूख गया और सभी लोग चिन्ता से पीड़ित मन वाले तथा खिन्नमनस्क हो गये। सभी दुःखरूपी समुद्र में डूब गये और रोगग्रस्त हो गये । हे राजन् ! सती के अभाव से उस समय ग्रहों, देवताओं, अधिभूत तथा अधिदैवत-इन सबका व्यवहार विपरीत हो गया और समस्त प्राणी अपनी मर्यादा से विचलित हो गये ॥ ६-८१/२ ॥ उसी समय तारक नामक एक महान् असुर उत्पन्न हुआ। वह दैत्य ब्रह्माजी से वरदान पाकर तीनों लोकों का शासक हो गया। भगवान् शंकर का जो औरस पुत्र होगा, वही तुम्हारा संहारक होगा — देवाधिदेव ब्रह्मा द्वारा इस प्रकार की कल्पित मृत्यु का वर पाकर वह महासुर तारक शंकरजी के औरस पुत्र के अभाव के कारण [निर्भीक होकर ] गर्जन तथा निनाद करने लगा ॥ ९-११ ॥ इससे सभी देवता अपना-अपना स्थान छोड़कर भाग गये। शिव का कोई औरस पुत्र न होने के कारण देवताओं को महान् चिन्ता हुई । वे सोचने लगे कि शंकरजी की भार्या तो है नहीं, तो पुत्रोत्पत्ति कैसे होगी ? ऐसी स्थिति में हम भाग्यहीनों का कार्य किस प्रकार सिद्ध होगा ? ॥ १२-१३ ॥ इस प्रकार की चिन्ता से व्याकुल सभी देवता वैकुण्ठलोक गये और उन्होंने एकान्त में भगवान् विष्णु से सब कुछ बताया। इस पर उन्होंने उपाय बताते हुए कहा — आप सब चिन्ता से व्यग्र क्यों हो रहे हैं ? वे भगवती शिवा कामनाएँ पूर्ण करने वाले कल्पवृक्ष के समान हैं। मणिद्वीप में विराजमान रहने वाली भगवती भुवनेश्वरी सदा जागती रहती हैं ॥ १४-१५ ॥ हम लोगों के दोष के कारण ही हमारे प्रति उनकी उपेक्षा है, कोई अन्य कारण नहीं है । हमें सीख प्रदान करने के लिये ही जगदम्बा ने हमें यह शिक्षा प्रदान की है ॥ १६ ॥ जिस प्रकार प्यार करने अथवा डाँटने-फटकारने — किसी भी स्थिति में माता बालक के प्रति निर्दयता का व्यवहार नहीं करती, वैसे ही गुण-दोष पर नियन्त्रण करने वाली जगदम्बा के विषय में भी जानना चाहिये ॥ १७ ॥ पुत्र से तो पग-पग पर अपराध होता है, माता को छोड़कर जगत् में दूसरा कौन उसे सह सकता है। अतः आप लोग निष्कपट चित्तवृत्ति के साथ उन भगवती पराम्बा की शरण में अविलम्ब जाइये । वे आप लोगों का कार्य अवश्य सिद्ध करेंगी ॥ १८-१९ ॥ सभी देवताओं को यह उपदेश देकर देवेश्वर महाविष्णु अपनी भार्या लक्ष्मी तथा देवताओं के साथ शीघ्र चल पड़े और महाद्रि गिरिराज हिमालय पर आ गये। वहाँ सभी देवता पुरश्चरण कर्म में संलग्न हो गये। हे राजन्! अम्बायज्ञ की विधि जानने वाले देवतागण अम्बायज्ञ करने लगे। सभी देवता शीघ्रतापूर्वक तृतीया आदि व्रत सम्पादित करने में लग गये ॥ २०-२२ ॥ कुछ लोग समाधि लगाकर बैठ गये, कुछ लोग भगवती के नामजप में लीन हो गये, कुछ लोग सूक्तपाठ करने लगे और कुछ लोग नामों का पारायण करने में निष्णात हो गये । इसी प्रकार कुछ देवता मन्त्र पारायण में तत्पर हो गये, कुछ कृच्छ्रव्रत करने लगे, कुछ अन्तर्याग करने में संलग्न हो गये और कुछ देवता न्यास आदि में तत्पर हो गये। कुछ देवता सावधान होकर हृल्लेखाबीज-मन्त्र से पराशक्ति जगदम्बा की पूजा करने लगे। हे जनमेजय ! इस प्रकार बहुत वर्षों तक भगवती की आराधना करते हुए समय व्यतीत हुआ ॥ २३-२५ ॥ तदनन्तर चैत्रमास की शुक्लपक्ष की नवमी तिथि में शुक्रवार को श्रुतियोंद्वारा प्रतिपादित एक महान् ज्योति अकस्मात् सबके समक्ष प्रकट हुई। चारों वेद मूर्तिमान् होकर चारों दिशाओं में उसकी स्तुति कर रहे थे, वह ज्योति करोड़ों सूर्यो की प्रभा के समान आलोकित थी, उसमें करोड़ों चन्द्रमाओं की शीतलता विद्यमान थी, वह करोड़ों बिजलियों के समान अरुण आभा से युक्त थी, वह परम ज्योति न ऊँची, न तिरछी, न मध्य में अपितु सभी ओर व्याप्त थी। आदि और अन्त से हीन वह तेज हाथ आदि अंगों से युक्त नहीं था। वह तेज न स्त्रीरूप, न पुरुषरूप अथवा न उभय रूप में ही था ॥ २६–२९ ॥ हे राजन् ! उस ज्योति की दीप्ति से उन देवताओं की आँखें बन्द हो गयीं। इसके बाद धैर्य धारणकर जब देवताओं ने देखा तब वह दिव्य तथा मनोहर आभा उन्हें नव-यौवनसे सम्पन्न अति सुन्दर अंगोंवाली तथा कुमारी अवस्थावाली स्त्री के रूप में दृष्टिगोचर हुई ॥ ३०-३१ ॥ उद्यत्पीनकुचद्वन्द्वनिन्दिताम्भोजकुड्मलाम् । रणत्किङ्किणिकाजालसिञ्जन्मञ्जीरमेखलाम् ॥ ३२ ॥ कनकाङ्गदकेयूरग्रैवेयकविभूषिताम् । अनर्घ्यमणिसम्भिन्नगलबन्धविराजिताम् ॥ ३३ ॥ तनुकेतकसंराजन्नीलभ्रमरकुन्तलाम् । नितम्बबिम्बसुभगां रोमराजिविराजिताम् ॥ ३४ ॥ कर्पूरशकलोन्मिश्रताम्बूलपूरिताननाम् । कनत्कनकताटङ्कविटङ्कवदनाम्बुजाम् ॥ ३५ ॥ अष्टमीचन्द्रबिम्बाभललाटामायतभ्रुवम् । रक्तारविन्दनयनामुन्नसां मधुराधराम् ॥ ३६ ॥ कुन्दकुड्मलदन्ताग्रां मुक्ताहारविराजिताम् । रत्नसम्भिन्नमुकुटां चन्द्ररेखावतंसिनीम् ॥ ३७ ॥ मल्लिकामालतीमालाकेशपाशविराजिताम् । काश्मीरबिन्दुनिटिलां नेत्रत्रयविलासिनीम् ॥ ३८ ॥ पाशाङ्कुशवराभीतिचतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् । रक्तवस्त्रपरीधानां दाडिमीकुसुमप्रभाम् ॥ ३९ ॥ सर्वशृङ्गारवेषाढ्यां सर्वदेवनमस्कृताम् । सर्वाशापूरिकां सर्वमातरं सर्वमोहिनीम् ॥ ४० ॥ प्रसादसुमुखीमम्बां मन्दस्मितमुखाम्बुजाम् । अव्याजकरुणामूर्तिं ददृशुः पुरतः सुराः ॥ ४१ ॥ उनके उन्नत तथा विशाल दोनों वक्ष:स्थल पूर्ण विकसित कमल को भी तिरस्कृत कर रहे थे। वे बजती हुई किंकिणी तथा मधुर ध्वनि करती हुई नूपुर एवं करधनी धारण किये हुए थीं। वे सुवर्ण के बाजूबन्द, मुकुट तथा कण्ठहार से सुशोभित थीं। वे बहुमूल्य मणियों से जड़ा हुआ हार गले में धारण किये हुए थीं। केतकी के नूतन पत्तों के समान उनके कपोलों पर काले भ्रमरसदृश केश लटक रहे थे। उनका नितम्बस्थल अत्यन्त मनोहर था। वे सुन्दर रोमावलियों से अत्यन्त शोभा पा रही थीं। उनका मुख कर्पूर के छोटे-छोटे टुकड़ों से युक्त ताम्बूल से परिपूर्ण था। उनके कमलसदृश मुख पर सुवर्णमय कुण्डल की मधुर ध्वनि हो रही थी । उनका ललाट अष्टमी के चन्द्रमण्डल की आभा के समान सुशोभित हो रहा था और उसपर उनकी फैली हुई विशाल भौंहें महान् शोभा पा रही थीं । उनके नेत्र लाल कमल के समान थे, नासिका उन्नत थी तथा ओष्ठ मधुर थे ॥ ३२-३६ ॥ वे भगवती कुन्द की पूर्ण विकसित कलियों के समान सुन्दर दाँतों से सुशोभित थीं। वे मोतियों की माला धारण किये हुए थीं। वे रत्नजटित मुकुट पहने हुई थीं। वे चन्द्ररेखारूपी शिरोभूषण से सुशोभित हो रही थीं; उनके केश की वेणी में मल्लिका और मालती पुष्पों की माला विद्यमान थी । केसर की बिन्दी से उनका ललाट सुशोभित था । वे तीन नेत्रों से शोभा पा रही थीं। तीन नेत्रों वाली वे अपनी चारों भुजाओं में पाश, अंकुश, वर और अभय मुद्राएँ धारण किये हुए थीं । वे लाल रंग का वस्त्र पहने हुए थीं । उनके शरीर की प्रभा दाडिम के पुष्प के समान थी । वे शृंगार के सभी वेषों से अलंकृत थीं और समस्त देवताओं से नमस्कृत हो रही थीं। इस प्रकार देवताओं ने सभी प्राणियों की आशाओं को पूर्ण करने वाली, सभी की जननी, सबको मोहित करने वाली, प्रसन्नतायुक्त सुन्दर मुखमण्डल वाली, मन्द-मन्द मुसकानयुक्त मुखकमल वाली और विशुद्ध करुणा की साक्षात् मूर्तिस्वरूपा माता जगदम्बा को अपने सामने देखा ॥ ३७–४१ ॥ उन करुणामूर्ति भगवती को देखकर देवताओं ने आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया। आनन्दाश्रु से रुँधे हुए कण्ठ वाले सभी देवता कुछ भी नहीं बोल सके ॥ ४२ ॥ किसी प्रकार धैर्य धारणकर प्रेम के आँसुओं से परिपूर्ण नेत्रों वाले वे देवगण शीश झुकाकर भक्तिपूर्वक जगदम्बिका की स्तुति करने लगे ॥ ४३ ॥ ॥ देवा ऊचुः ॥ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥ ४४ ॥ तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरसि तरसे नमः ॥ ४५ ॥ देवीं वाचमजनयन्त देवा-स्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतैतु ॥ ४६ ॥ कालरात्रिं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम् । सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ॥ ४७ ॥ महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥ ४८ ॥ नमो विराट्स्वरूपिण्यै नमः सूत्रात्ममूर्तये । नमोऽव्याकृतरूपिण्यै नमः श्रीब्रह्ममूर्तये ॥ ४९ ॥ यदज्ञानाज्जगद्भाति रज्जुसर्पस्रगादिवत् । यज्ज्ञानाल्लयमाप्नोति नुमस्तां भुवनेश्वरीम् ॥ ५० ॥ नुमस्तत्पदलक्ष्यार्थां चिदेकरसरूपिणीम् । अखण्डानन्दरूपां तां वेदतात्पर्यभूमिकाम् ॥ ५१ ॥ पञ्चकोशातिरिक्तां तामवस्थात्रयसाक्षिणीम् । नुमस्त्वंपदलक्ष्यार्थां प्रत्यगात्मस्वरूपिणीम् ॥ ५२ ॥ नमः प्रणवरूपायै नमो ह्रीङ्कारमूर्तये । नानामन्त्रात्मिकायै ते करुणायै नमो नमः ॥ ५३ ॥ देवताओं ने कहा — देवी को नमस्कार है, महादेवी शिवा को निरन्तर नमस्कार है, प्रकृति एवं भद्रा को नमस्कार है; हमलोग नियमपूर्वक उन्हें प्रणाम करते हैं ॥ ४४ ॥ उन अग्निसदृश वर्णवाली, ज्ञान से जगमगाने वाली, दीप्तिमयी, कर्मफलों की प्राप्तिहेतु सेवन की जाने वाली भगवती दुर्गा की शरण हम ग्रहण करते हैं । पार करने योग्य संसार-सागर से तरने के लिये उन भगवती को नमस्कार है ॥ ४५ ॥ विश्वरूप देवताओं ने जिस वैखरी वाणी को उत्पन्न किया, उसी को अनेक प्रकार के प्राणी बोलते हैं। वे कामधेनुतुल्य, आनन्ददायिनी और अन्न तथा बल देने वाली वाररूपिणी भगवती उत्तम स्तुति से संतुष्ट होकर हमारे समीप पधारें ॥ ४६ ॥ हम सब देवतागण कालरात्रिस्वरूपिणी, वेदों द्वारा स्तुत, विष्णु की शक्तिस्वरूपा, स्कन्दमाता ( शिवशक्ति), सरस्वती (ब्रह्मशक्ति), देवमाता अदिति, दक्षपुत्री सती तथा पावन भगवती शिवा को नमस्कार करते हैं ॥ ४७ ॥ हम महालक्ष्मी को जानते हैं और उन सर्वशक्ति-स्वरूपिणी का ध्यान करते हैं। वे भगवती हमें ज्ञान – ध्यान में प्रवृत्त करें ॥ ४८ ॥ इस विराट्-रुप धारण करने वाली को नमस्कार है, सूक्ष्मरूप धारण करने वाली को नमस्कार है, अव्यक्तरूप धारण करने वाली को नमस्कार है और श्रीब्रह्ममूर्तिस्वरूपिणी देवी को नमस्कार है ॥ ४९ ॥ भगवती को न जानने के कारण यह जगत् जिन मनुष्य को रस्सी में सर्प, माला आदि की भाँति प्रतीत होता है और जिसे जान लेने पर यह भ्रान्ति नष्ट हो जाती है, उन जगदीश्वरी को हम नमस्कार करते हैं ॥ ५० ॥ ‘तत्’ पद की लक्ष्यार्थ, एकमात्र चिन्मय स्वरूपवाली, अखण्डानन्दस्वरूपिणी तथा वेदों के तात्पर्य की भूमिकास्वरूपिणी उन भगवती को हम नमन करते हैं ॥ ५१ ॥ पंचकोश से अतिरिक्त, तीनों अवस्थाओं की साक्षिणी, ‘त्वम्’ पद की लक्ष्यार्थ तथा प्रत्यगात्मस्वरूपिणी उन जगदम्बा को हम नमस्कार करते हैं ॥ ५२ ॥ प्रणवरूपवाली भगवती को नमस्कार है। ह्रींकारविग्रहवाली भगवती को नमस्कार है । अनेक मन्त्रों के स्वरूपवाली आप करुणामयी देवी को बार-बार नमस्कार है ॥ ५३ ॥ देवताओं के इस प्रकार स्तुति करने पर मणिद्वीप में निवास करने वाली तथा मत्त कोयल के समान ध्वनि करने वाली भगवती मधुर वाणी में कहने लगीं ॥ ५४ ॥ देवी बोलीं — आप सभी देवतागण अपना वह कार्य बताइये, जिसके लिये आप सब यहाँ एकत्रित हुए हैं। सर्वदा वर प्रदान करने वाली मैं भक्तों की कामना पूर्ण करने हेतु कल्पवृक्ष हूँ ॥ ५५ ॥ मेरे रहते भक्तिपरायण आप सब देवताओं को कौन-सी चिन्ता है ? मैं इस दुःखमय संसारसागर से अपने भक्तों का उद्धार कर देती हूँ । हे श्रेष्ठ देवतागण ! आप लोग मेरी इस प्रतिज्ञा को सत्य समझिये ॥ ५६१/२ ॥ हे राजन् ! भगवती की यह स्नेहमयी वाणी सुनकर देवताओं के मन में अत्यन्त प्रसन्नता हुई और वे निर्भय होकर उनसे अपना दुःख कहने लगे ॥ ५७१/२ ॥ देवता बोले — हे परमेश्वरि ! इस त्रिलोकी में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो सब कुछ जानने वाली तथा सबकी साक्षिस्वरूपा आप भगवती के लिये अज्ञात हो ॥ ५८१/२ ॥ हे शिवे ! असुरराज तारक हम लोगों को दिन-रात पीड़ित कर रहा है । ब्रह्माजी ने शिवजी के औरसपुत्र के द्वारा उसका वध सुनिश्चित किया है । हे महेश्वरि ! आप तो जानती ही हैं कि शिव की कोई भार्या नहीं है । हम अल्पबुद्धि प्राणी सब कुछ जानने वाली आपसे क्या कहें, [आप देह धारणकर अवतरित हों] इसी प्रयोजन से हम लोगों ने आपसे निवेदन किया है। हे अम्बिके ! दूसरी बात भी ध्यान रखें। आपके चरणकमल में हम लोगों की अविचल भक्ति सर्वदा बनी रहे । देह की रक्षा के निमित्त यह हमारा दूसरा मुख्य निवेदन है ॥ ५९-६२ ॥ उनकी यह बात सुनकर भगवती परमेश्वरी ने कहा — ‘गौरी’ नामक मेरी जो शक्ति है, वह हिमालय के घर आविर्भूत होगी । आप लोग ऐसा प्रयत्न कीजिये कि वह शिव को प्रदान कर दी जाय, वही गौरी आप लोगों का कार्य सिद्ध करेगी। मेरे चरणकमल में आप लोगों की भक्ति सदा आदरपूर्वक बनी रहे । हिमालय भी अत्यन्त भक्ति के साथ मनोयोग से मेरी उपासना कर रहे हैं; अत: उनके घर जन्म लेना मैंने प्रियकर माना है ॥ ६३–६५ ॥ व्यासजी बोले — [ वहाँ देवताओं के साथ विद्यमान] हिमालय ने भी देवी की वह अति कृपापूर्ण वाणी सुनकर आँसुओं से रुँधे कंठ तथा अश्रुपूर्ण नेत्रों से महाराज्ञी भगवती से यह वचन कहा — आप जिस पर कृपा करना चाहती हैं, उसे अति महान् बना देती हैं अन्यथा कहाँ जड़ तथा स्थाणु मैं और कहाँ सच्चित्स्वरूपिणी आप ॥ ६६-६७ ॥ हे अनघे! सैकड़ों जन्मों में अश्वमेध आदि यज्ञों तथा समाधि से प्राप्त होने वाले पुण्यों से भी आपका पिता बन पाना असम्भव है । अब जगत् में मेरी कीर्ति फैल जायगी। लोग कहेंगे — अहो ! इस हिमालय की पुत्री के रूप में स्वयं जगज्जननी उत्पन्न हुई हैं, ये बड़े धन्य तथा भाग्यशाली हैं ॥ ६८-६९ ॥ जिनके उदर में करोड़ों ब्रह्माण्ड स्थित हैं, वे ही जगदम्बा जिसकी कन्या होकर जन्म लें, उसके समान इस पृथ्वी पर कौन हो सकता है ? ॥ ७० ॥ जिनके वंश में मेरे जैसा [ भाग्यशाली ] उत्पन्न हुआ है, मेरे ऐसे उन पूर्वजों के निवास के लिये कैसा श्रेष्ठ स्थान निर्मित हुआ होगा – यह मैं नहीं जानता ॥ ७१ ॥ जिस प्रकार आपने स्नेहपूर्ण कृपा करके मुझे गौरी का पिता होने का अवसर प्रदान किया, उसी प्रकार अब आप सम्पूर्ण वेदान्त के सिद्धान्तभूत अपने स्वरूप को मुझे बताइये ॥ ७२ ॥ हे परमेश्वरि ! वेदसम्मत ज्ञान, भक्ति तथा योग का मुझे उपदेश करें, जिससे मैं आपके स्वरूप को प्राप्त हो जाऊँ ॥ ७३ ॥ व्यासजी बोले — उनकी यह बात सुनकर प्रसन्नता से प्रफुल्लित मुखकमलवाली उन भगवती ने श्रुतियों में निहित रहस्य का वर्णन करना आरम्भ किया ॥ ७४ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकोंवाली श्रीमद्देवीभागवतमहापुराणसंहिताके अन्तर्गत सातवें स्कन्धका ‘हिमालयके घरमें पार्वतीके जन्मके विषयमें देवताओंके प्रति देवीके कथनका वर्णन’ नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥ Content is available only for registered users. 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