श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-सप्तमः स्कन्धः-अध्याय-36
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-सप्तमः स्कन्धः-षट्‌त्रिंशोऽध्यायः
छत्तीसवाँ अध्याय
भगवती के द्वारा हिमालय को ज्ञानोपदेश – ब्रह्मस्वरूप का वर्णन
देवीगीतायां ब्रह्मविद्योपदेशवर्णनम्

देवी बोलीं हे राजन् ! इस प्रकार आसन पर सम्यक् विराजमान होकर योग से युक्त चित्तवाले साधक को निष्कपट भक्ति के साथ मुझ ब्रह्मस्वरूपिणी भगवती का ध्यान करना चाहिये ॥ १ ॥ जो प्रकाशस्वरूप, सबके अत्यन्त समीप स्थित, हृदयरूपी गुफा में स्थित होने के कारण ‘गुहाचर’ नाम से प्रसिद्ध परम तत्त्व है; उसी में जितने भी चेष्टायुक्त, श्वास लेने वाले तथा नेत्र खोलने-मूँदने वाले प्राणी हैं वे सब उस ब्रह्म में ही कल्पित हैं ॥ २ ॥ जो सत्कारणरूप माया तथा असत्कार्यरूप जगत् — इन दोनों की अपेक्षा श्रेष्ठ, प्राणियों के ज्ञान से परे अर्थात् उनके ज्ञान का अविषय, सर्वोत्कृष्ट तथा सबको प्रकाशित करने वाला, अणु से भी अणु (सूक्ष्म) है और जिसमें सभी लोक तथा उसमें रहनेवाले प्राणी स्थित हैं उस ब्रह्म को आप लोग जानिये ॥ ३ ॥ जो अक्षरब्रह्म है – वही सबका प्राण है, वही वाणी है, वही सबका मन है, वही परम सत्य तथा अमृतस्वरूप है । अतः हे सौम्य [ पर्वतराज ] ! उस भेदन करने योग्य ब्रह्मस्वरूप लक्ष्य का भेदन करो ॥ ४ ॥

हे सौम्य! उपनिषदरूपी महान् धनुषास्त्र लेकर उस पर उपासना द्वारा तीक्ष्ण किये गये बाण को स्थापित करो और इसके बाद विषयों से विरक्त और भगवद्भावभावित चित्त के द्वारा उस बाण को खींचकर उस अक्षररूप ब्रह्म को लक्ष्य करके वेधन करो ॥ ५ ॥ प्रणव धनुष, जीवात्मा बाण और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है । प्रमादरहित होकर उसका भेदन करना चाहिये और बाण की भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिये ॥ ६ ॥ जिसमें स्वर्ग, पृथ्वी, अन्तरिक्ष और सम्पूर्ण प्राणों के सहित मन ओतप्रोत है, उसी एकमात्र परब्रह्म को जानो और अन्य बातों का परित्याग कर दो; [ भवसागर से पार होने के लिये ] यही अमृत का सेतु है ॥ ७ ॥ रथ के चक्के में लगे अरों की भाँति जिस हृदय में शरीर की नाडियाँ एकत्र स्थित हैं – उसी हृदय में विविध रूपों में प्रकट होने वाला परब्रह्म निरन्तर संचरण करता है ॥ ८ ॥ संसार समुद्र से पार होने के लिये ‘ओम्’ – इस प्रणवमन्त्र के जप से परमात्मा का ध्यान करो । आपका कल्याण हो। वह परमात्मा अन्धकार से सर्वथा परे ब्रह्मलोकस्वरूप दिव्य आकाश (हृदय) – में प्रतिष्ठित है ॥ ९ ॥

वह परब्रह्म मनोमय है और सबके प्राण तथा शरीर का नियमन करता है । वह समस्त प्राणियों के हृदय में निहित रहकर अन्नमय स्थूल शरीर में प्रतिष्ठित है । जो आनन्दस्वरूप तथा अमृतमय परमात्मा सर्वत्र प्रकाशित हो रहा है, उसे विज्ञान (अपरोक्षानुभूति) – के द्वारा बुद्धिमान् पुरुष भलीभाँति दृष्टिगत कर लेते हैं ॥ १० ॥ उस कार्य-कारणरूप परमात्मा को देख लेने पर इस जीव के हृदय की ग्रन्थि का भेदन हो जाता है अर्थात् अनात्मपदार्थों में स्वरूपाध्यास समाप्त हो जाता है, सभी सन्देह दूर हो जाते हैं और सभी कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ११ ॥ वह निष्कल (व्यापक) ब्रह्म स्वर्णमय परकोश (आनन्दमयकोश) – में विराजमान है । वह शुभ्र तथा परम प्रकाशित वस्तुओं का भी प्रकाशक है। उसे आत्मज्ञानी पुरुष ही जान पाते हैं ॥ १२ ॥ वहाँ न तो सूर्य प्रकाश फैला सकता है, न चन्द्रमा और ताराओं का समुदाय ही, न ये बिजलियाँ ही वहाँ प्रकाशित हो सकती हैं; फिर यह लौकिक अग्नि कैसे प्रकाशित हो सकती है । उसी के प्रकाशित होने पर सब प्रकाशित होते हैं । यह सम्पूर्ण जगत् उसी के प्रकाश से आलोकित होता है ॥ १३ ॥ यह अमृतस्वरूप ब्रह्म ही आगे है, यह ब्रह्म ही पीछे है और यह ब्रह्म ही दाहिनी तथा बायीं ओर स्थित है। यह ब्रह्म ही ऊपर तथा नीचे फैला हुआ है। यह समग्र जगत् सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है ॥ १४ ॥ जिसका इस प्रकार का अनुभव है, वह श्रेष्ठ मनुष्य कृतार्थ है । ब्रह्म को प्राप्त पुरुष नित्य प्रसन्नचित्त रहता है; वह न शोक करता है और न किसी प्रकार की आकांक्षा रखता है ॥ १५ ॥

हे राजन्! भय दूसरे से हुआ करता है; द्वैतभाव न रहने पर [संसार से] भय नहीं होता । उस ज्ञानी से मेरा कभी वियोग नहीं होता और मुझसे उस ज्ञानी का वियोग कभी नहीं होता ॥ १६ ॥ हे पर्वत ! आप यह निश्चित जान लीजिये कि मैं ही वह हूँ और वही मेरा स्वरूप है । जिस किस  भी स्थान में ज्ञानी रहे, उसको वहीं मेरा दर्शन होता रहता है ॥ १७ ॥ मैं कभी भी न तीर्थ में, न कैलासपर और न तो वैकुण्ठ में ही निवास करती हूँ। मैं केवल अपने ज्ञानी भक्त के हृदयकमल में निवास करती हूँ । मेरे ज्ञानपरायण भक्त की एक बार की पूजा मेरी करोड़ों पूजाओं का फल प्रदान करती है ॥ १८१/२

जिसका चित्त चित् स्वरुप ब्रह्म में लीन हो गया, उसका कुल पवित्र हो गया, उसकी जननी कृतकृत्य हो गयी और पृथ्वी उसे धारण करके पुण्यवती हो गयी ॥ १९१/२

हे पर्वत श्रेष्ठ ! आपने जो ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध में पूछा था, वह सब मैंने बता दिया। अब इसके आगे बताने योग्य कुछ शेष नहीं है। भक्तिसम्पन्न तथा शीलवान् ज्येष्ठ पुत्र तथा इसी प्रकार के गुणवाले शिष्य को इसे बताना चाहिये, किसी दूसरे से इसे कभी प्रकाशित नहीं करना चाहिये। जिसकी परमदेव परमेश्वर में परम भक्ति है तथा जिस प्रकार परमेश्वर में है; उसी प्रकार गुरु में भी है, उस महात्मा पुरुष के हृदय में ही ये बताये हुए रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं ॥ २०–२२१/२

जिसके द्वारा इस ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया जाता है, वह साक्षात् परमेश्वर ही है । उपदिष्ट विद्या का प्रत्युपकार करने में मनुष्य सर्वथा असमर्थ है, इसलिये वह गुरु का सदा ऋणी रहता है । ब्रह्मजन्म प्रदान करने वाला (ब्रह्म-तत्त्व का साक्षात्कार कराने वाला) गुरु माता-पिता से भी श्रेष्ठ कहा गया है; क्योंकि माता-पिता से प्राप्त जीवन तो नष्ट हो जाता है, किंतु गुरु द्वारा प्राप्त ब्रह्मजन्म कभी नष्ट नहीं होता ॥ २३-२४१/२

हे पर्वत! ‘तस्मै न द्रुह्येत्’ अर्थात् उन गुरु से द्रोह नहीं करना चाहिये । इत्यादि वचन वेद ने भी कहे हैं । अतः शास्त्रसिद्धान्त है कि ब्रह्मज्ञानदाता गुरु सबसे श्रेष्ठ होता है । हे नग ! शिव के रुष्ट होने पर गुरु रक्षा कर सकते हैं, किंतु गुरु के रुष्ट होने पर शंकर भी रक्षा नहीं कर सकते, अतः पूर्ण प्रयत्न से गुरु को सन्तुष्ट रखना चाहिये। तन-मन-वचन से सर्वदा गुरुपरायण रहना चाहिये, अन्यथा कृतघ्न होना पड़ता है और कृतघ्न हो जाने पर उद्धार नहीं होता ॥ २५–२७१/२

पूर्व समय की बात है – अथर्वणमुनि के द्वारा इन्द्र से ब्रह्मविद्या की याचना किये जाने पर इन्द्र ने अथर्वणमुनि को ब्रह्मविद्या इस शर्त पर बतायी कि किसी अन्य को बताने पर आपका सिर काट लूँगा । अश्विनीकुमारों के याचना करने पर मुनि ने उन्हें ब्रह्मविद्या का उपदेश कर दिया और इन्द्र ने मुनि का सिर काट लिया । तदनन्तर सुरश्रेष्ठ दोनों वैद्यों ने उनके सिर को कटा देखकर घोड़े का सिर मुनि पर पुनः जोड़ दिया । हे भूधर ! हे पर्वतराज ! इस प्रकार महान् संकट से सम्पादित होने वाली ब्रह्मविद्या को जिसने प्राप्त कर लिया, वह धन्य तथा कृतकृत्य है ॥ २८–३० ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत सातवें स्कन्ध का ‘देवीगीता में ब्रह्मविद्योपदेशवर्णन’ नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥

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