श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-सप्तमः स्कन्धः-अध्याय-39
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-सप्तमः स्कन्धः-एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
उनतालीसवाँ अध्याय
देवी-पूजन के विविध प्रकारों का वर्णन
देवीगीतायां श्रीदेव्याः पूजाविधिवर्णनम्

हिमालय बोले — हे देवेश्वरि ! हे महेश्वरि ! हे करुणासागरे ! हे अम्बिके ! अब आप यथार्थरूप से अपने पूजन की विधि को भलीभाँति बतलाइये ॥ १ ॥

श्रीदेवी बोलीं — हे राजन् ! हे पर्वतश्रेष्ठ ! मैं यथार्थरूप में जगदम्बा को प्रसन्न करने वाली पूजाविधि बता रही हूँ, महती श्रद्धा के साथ आप इसे सुनिये ॥ २ ॥

मेरी पूजा दो प्रकार की है — बाह्य और आभ्यन्तर । बाह्य पूजा भी वैदिकी और तान्त्रिकी — दो प्रकार की कही गयी है ॥ ३ ॥ हे भूधर ! वैदिकी पूजा भी मूर्तिभेद से दो प्रकार की होती है । वेददीक्षा से सम्पन्न वैदिकों द्वारा वैदिकी पूजा की जानी चाहिये और तन्त्रोक्त दीक्षा से युक्त पुरुषों के द्वारा तान्त्रिकी पूजा की जानी चाहिये । इस प्रकार पूजा के रहस्य को न समझकर जो अज्ञानी मनुष्य इसके विपरीत करता है, उसका सर्वथा अध: पतन हो जाता है ॥ ४-५१/२

उसमें जो पहली वैदिकी पूजा कही गयी है, उसे मैं बता रही हूँ, हे भूधर ! तुम अनन्त मस्तक, नेत्र तथा चरण वाले मेरे जिस महान् रूप का साक्षात् दर्शन कर चुके हो और जो समस्त शक्तियों से सम्पन्न, प्रेरणा प्रदान करने वाला तथा परात्पर है; उसी रूप का नित्य पूजन, नमन, ध्यान तथा स्मरण करना चाहिये। हे नग ! मेरी प्रथम पूजा का यही स्वरूप बताया गया है। आप शान्त होकर समाहित मन से और दम्भ तथा अहंकार से रहित होकर उसके परायण होइये, उसी का यजन कीजिये, उसी की शरण में जाइये और चित्त से सदा उसी का दर्शन-जप-ध्यान कीजिये ॥ ६–१० ॥ अनन्य एवं प्रेमपूर्ण भक्ति से मेरे उपासक बनकर यज्ञों के द्वारा मेरी पूजा कीजिये और तपस्या तथा दान के द्वारा मुझे पूर्णरूप से सन्तुष्ट कीजिये। ऐसा करने पर मेरी कृपा से आप भवबन्धन से छूट जायँगे ॥ १११/२

जो मेरे ऊपर निर्भर रहते हैं और अपना चित्त मुझमें लगाये रखते हैं, वे मेरे उत्तम भक्त माने गये हैं । यह मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं शीघ्र ही इस भवसागर से उनका उद्धार कर देती हूँ ॥ १२१/२

हे राजन्! मैं सर्वथा कर्मयुक्त ध्यान से अथवा भक्तिपूर्ण ज्ञान से ही प्राप्त हो सकती हूँ । केवल कर्मों से ही मेरी प्राप्ति सम्भव नहीं है ॥ १३१/२

धर्म से भक्ति उत्पन्न होती है और भक्ति से परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त होता है। श्रुति और स्मृति के द्वारा जो कुछ भी प्रतिपादित है, वही धर्म कहा गया है । अन्य शास्त्रों के द्वारा जो निरूपित किया गया है, उसे धर्माभास कहा जाता है ॥ १४-१५ ॥ मुझ सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिसम्पन्न भगवती से वेद उत्पन्न हुआ है और इस प्रकार मुझमें अज्ञान का अभाव रहने के कारण श्रुति भी अप्रामाणिक नहीं है। श्रुति के अर्थ को लेकर ही स्मृतियाँ निकली हुई हैं। अतः श्रुतियों और मनु आदि स्मृतियों की प्रामाणिकता स्वयंसिद्ध है ॥ १६-१७ ॥ स्मृति आदि में कहीं-कहीं कटाक्षपूर्वक वामाचार- सम्बन्धी वेद विरुद्ध कही गयी बात को भी लोग धर्म के रूप में स्वीकार करते हैं, किंतु वैदिक विद्वानों के द्वारा वह अंश कभी भी ग्राह्य नहीं है ॥ १८ ॥ अन्य शास्त्रकर्ताओं के वाक्य अज्ञानमूलक भी हो सकते हैं । अतः अज्ञानदोष से दूषित होने के कारण उनकी उक्ति की कोई प्रामाणिकता नहीं है । इसलिये मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले को धर्म की प्राप्ति के लिये सदा वेद का आश्रय ग्रहण करना चाहिये ॥ १९१/२

जिस प्रकार लोक राजा की आज्ञा की अवहेलना कभी नहीं की जाती, वैसे ही मनुष्य मुझ सर्वेश्वरी भगवती की आज्ञास्वरूपिणी उस श्रुति का त्याग कैसे कर सकते हैं? मेरी आज्ञा के पालन के लिये ही तो ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि जातियाँ मेरे द्वारा सृजित की गयी हैं । अब मेरी श्रुति की वाणी का रहस्य समझ लीजिये ॥ २०-२११/२

भूधर ! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं विभिन्न अवतार धारण करती हूँ। हे राजन् ! इसीलिये देवताओं और दैत्यों का विभाग हुआ है । २२-२३ ॥ जो लोग उन धर्मो का सदा आचरण नहीं करते, उन्हें शिक्षा देने के लिये मैंने अनेक नरकों की व्यवस्था कर रखी है, जिनके सुननेमात्र से भय उत्पन्न हो जाता है ॥ २४ ॥ जो लोग वेदप्रतिपादित धर्म का परित्याग करके अन्य धर्मका आश्रय लेते हैं, राजा को चाहिये कि वह ऐसे अधर्मियों को अपने राज्य से निष्कासित कर दे । ब्राह्मण उन अधार्मिकों से सम्भाषण न करें और द्विजगण उन्हें अपनी पंक्ति में न बैठायें ॥ २५१/२

इस लोक में श्रुति-स्मृति विरुद्ध नानाविध अन्य जो भी शास्त्र हैं, वे हर प्रकार से तामस हैं । वाम, कापालक, कौलक और भैरवागम — ऐसे ही शास्त्र हैं, जो मोह में डाल देने के लिये शिवजी के द्वारा प्रतिपादित किये गये हैं — इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी कारण नहीं है ॥ २६-२७१/२

वेदमार्ग से च्युत होने के कारण जो उच्च कोटि के ब्राह्मण दक्षप्रजापति के शाप से, महर्षि भृगु के शाप से और महर्षि दधीचि के शाप से दग्ध कर दिये गये थे; उनके उद्धार के लिये भगवान् शंकर ने सोपान क्रम से शैव, वैष्णव, सौर, शाक्त तथा गाणपत्य आगमों की रचना की । उनमें कहीं-कहीं वेदविरुद्ध अंश भी कहा गया है। वैदिकों को उस अंश के ग्रहण कर लेने में कोई दोष नहीं होता है ॥ २८-३१ ॥ वेद से सर्वथा भिन्न अर्थ को स्वीकार करने के लिये द्विज अधिकारी नहीं है । वेदाधिकार से रहित व्यक्ति ही उसे ग्रहण करने का अधिकारी है । अतः वैदिक पुरुष को पूरे प्रयत्न के साथ वेद का ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि वेद – प्रतिपादित धर्म से युक्त ज्ञान ही परब्रह्म को प्रकाशित कर सकता है ॥ ३२-३३ ॥

सम्पूर्ण इच्छाओं को त्यागकर मेरी ही शरण को प्राप्त, सभी प्राणियों पर दया करने वाले, मान-अहंकार से रहित, मन से मेरा ही चिन्तन करने वाले, मुझमें ही अपना प्राण समर्पित करने वाले तथा मेरे स्थानों का वर्णन करने में संलग्न रहने वाले जो संन्यासी, वानप्रस्थ, गृहस्थ और ब्रह्मचारी मेरे ऐश्वरसंज्ञक योग की सदा भक्तिपूर्वक उपासना करते हैं — मुझमें निरन्तर अनुरक्त रहने वाले उन साधकों के अज्ञानजनित अन्धकार को मैं ज्ञानरूपी सूर्य के प्रकाश से नष्ट कर देती हूँ; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३४-३६१/२

हे पर्वतराज ! इस प्रकार मैंने पहली वैदिक पूजा के स्वरूप का संक्षेप में वर्णन कर दिया। अब दूसरी पूजा के विषय में बता रही हूँ ॥ ३७१/२

मूर्ति, वेदी, सूर्य-चन्द्रमण्डल, जल, बाणलिंग, यन्त्र, महापट अथवा हृदयकमल में सगुण रूपवाली परात्पर भगवती का इस प्रकार ध्यान करे कि —

सगुणां करुणापूर्णां तरुणीमरुणारुणाम् ।
सौन्दर्यसारसीमां तां सर्वावयवसुन्दरीम् ॥ ४० ॥
शृङ्गाररससम्पूर्णां सदा भक्तार्तिकातराम् ।
प्रसादसुमुखीमम्बां चन्द्रखण्डशिखण्डिनीम् ॥ ४१ ॥
पाशाङ्कुशवराभीतिधरामानन्दरूपिणीम् ।

वे करुणा से परिपूर्ण हैं, तरुण अवस्था में विद्यमान हैं, अरुण के समान अरुण आभा से युक्त हैं और सौन्दर्य के सारतत्त्व की सीमा हैं। इनके सम्पूर्ण अंग परम मनोहर हैं, वे शृंगाररस से परिपूर्ण हैं तथा सदा भक्तों के दु:ख से दु:खी रहा करती हैं । इन जगदम्बा का मुख-मण्डल प्रसन्नता से युक्त रहता है; वे मस्तक पर बालचन्द्रमा तथा मयूरपंख धारण की हुई हैं; उन्होंने पाश, अंकुश, वर तथा अभयमुद्रा धारण कर रखा है; वे आनन्दमय रूप से सम्पन्न हैं —  इस प्रकार ध्यान करके अपने वित्त- सामर्थ्य के अनुसार विभिन्न उपचारों से भगवती की पूजा करनी चाहिये ॥ ३८–४२ ॥

जब तक अन्तः पूजा में अधिकार नहीं हो जाता, तब तक यह बाह्यपूजा करनी चाहिये । पुनः अन्तःपूजा में अधिकार हो जाने पर उस बाह्यपूजा को छोड़ देना चाहिये। जो आभ्यन्तरपूजा है, उसे ज्ञानरूप मुझ ब्रह्म में चित्त का लय होना कहा गया है। उपाधिरहित ज्ञान ही मेरा परम रूप है, अतः मेरे ज्ञानमयरूप में अपना आश्रयहीन चित्त लगा देना चाहिये ॥ ४३-४४१/२

इस ज्ञानमयरूप के अतिरिक्त यह मायामय जगत् पूर्णतः मिथ्या है। अतः भव-बन्धन के नाश के लिये एकनिष्ठ तथा योगयुक्त चित्त से मुझ सर्व-साक्षिणी तथा आत्मस्वरूपिणी भगवती का चिन्तन
करना चाहिये ॥ ४५-४६ ॥ हे पर्वतश्रेष्ठ! इसके बाद मैं बाह्यपूजा का विस्तारपूर्वक वर्णन कर रही हूँ, आप सावधान मन से सुनिये ॥ ४७ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत सातवें स्कन्ध का ‘देवीगीता में श्रीदेवी की पूजाविधि का वर्णन’ नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥

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