श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-04
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-चतुऽर्थोऽध्यायः
चौथा अध्याय
महाराज प्रियव्रत का आख्यान तथा समुद्र और द्वीपों की उत्पत्ति का प्रसंग
भुवनकोशविषये प्रियव्रतवंशवर्णनम्

श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] स्वायम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत थे, वे नित्य पिता की सेवामें संलग्न रहते थे तथा सत्य – धर्म का पालन करते थे ॥ १ ॥ विश्वकर्मा नामक प्रजापति की सुन्दर रूपवाली कन्या बर्हिष्मती के साथ प्रियव्रत ने विवाह किया था, जो स्वभाव तथा कर्म में उन्हीं के सदृश थी ॥ २ ॥ प्रियव्रत ने उस बर्हिष्मती से पवित्र आत्मावाले दस गुणी पुत्रों और ऊर्जस्वती नामक एक कन्या को उत्पन्न किया, जो सबसे छोटी थी ॥ ३ ॥ आग्नीध्र, इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, महावीर, रुक्मशुक्र, घृतपृष्ठ, सवन, मेधातिथि, वीतिहोत्र और कवि  — इन नामों से ये दसों पुत्र अग्निसंज्ञक कहे गये हैं ॥ ४-५ ॥ इन दस पुत्रों में कवि, सवन और महावीर – ये तीन पुत्र विरागी हो गये। आत्मविद्या में निष्णात तथा ब्रह्मचर्यव्रत के पालक वे सभी पुत्र परमहंस नामक आश्रम में आनन्दपूर्वक स्पृहा रहित भाव से रहने लगे ॥ ६-७ ॥ प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से तीन पुत्र उत्पन्न हुए; जो उत्तम, तामस और रैवत — इन नामोंसे विख्यात हुए। ये महान् प्रतापी पुत्र एक-एक मन्वन्तर के अधिपति बने ॥ ८१/२

अपराजेय बल तथा इन्द्रियों वाले महाराज प्रियव्रत ने इस पृथ्वी पर ग्यारह अर्बुद (दस करोड़) वर्षों तक राज्य किया ॥ ९१/२

एक बार की बात है — जब सूर्य पृथ्वी के प्रथम भाग में प्रकाशित हो रहे थे, तब दूसरे भाग में अन्धकार हो गया। इस प्रकार का संकट देखकर राजा केमन में तत्काल यह विचार उत्पन्न हुआ कि मेरे शासन करते हुए पृथ्वी पर अन्धकार कैसे उत्पन्न हुआ? मैं अपने योगबल से पृथ्वी पर से इसका निवारण कर दूँगा ॥ १०–१२ ॥ ऐसा निश्चय करके स्वायम्भुव मनु के पुत्र उन प्रियव्रत ने सूर्य -सदृश तेजवाले रथ पर आसीन होकर जगत्‌ को प्रकाशित करते हुए पृथ्वी की सात प्रदक्षिणाएँ कीं ॥ १३ ॥ उन राजा प्रियव्रत के परिक्रमण करते समय पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ रथ के पहिये पड़े थे, वे स्थान लोक-हित के लिये सात समुद्र बन गये ॥ १४ ॥ पृथ्वी की परिक्रमा बीच के स्थल विभागानुसार सात द्वीप के रूप में हो गये और रथ के पहियों के धँसने से बने हुए सात समुद्र उनकी परिखा (खाई) – के रूप में हो गये ॥ १५ ॥ तभी से पृथ्वी पर सात द्वीप हो गये; जो जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप के नाम से प्रसिद्ध हुए । उत्तरोत्तर क्रम से उनका परिमाण दुगुना है ॥ १६-१७ ॥ उन द्वीपों के बाहर चारों ओर विभाग – क्रम से समुद्र आप्लावित हैं। वे क्षारोद, इक्षुरसोद, सुरोद, घृतोद, क्षीरोद, दधिमण्डोद और शुद्धोद नाम से जाने गये। तभी से  भूमण्डल पर ये सातों समुद्र विख्यात हो गये ॥ १८-१९ ॥

क्षारोद समुद्र से घिरा हुआ जो पहला द्वीप है, वह जम्बूद्वीप नाम से विख्यात है । राजा प्रियव्रत ने अपने आग्नीध्र नामक पुत्र को उस द्वीप का स्वामी बनाया था ॥ २० ॥ प्रियव्रत-पुत्र इध्मजिह्व इक्षुरस से आप्लावित इस दूसरे प्लक्षद्वीप के शासक हुए ॥ २१ ॥ महाराज प्रियव्रत ने सुरोदधि से आप्लावित शाल्मली द्वीप का राजा अपने पुत्र यज्ञबाहु को बनाया ॥ २२ ॥ प्रियव्रत के पुत्र हिरण्यरेता घृतोद नामक समुद्र से घिरे हुए अति रमणीक कुशद्वीप के राजा हुए ॥ २३ ॥ महान् बलशाली प्रियव्रतपुत्र घृतपृष्ठ क्षीरसागर के द्वारा चारों ओर से घिरे क्रौंचद्वीप नामक पाँचवें द्वीप के स्वामी हुए ॥ २४ ॥ प्रियव्रत के उत्तम पुत्र मेधातिथि दधिमण्डोद नामक समुद्र से आवृत तथा अन्य द्वीपों से अपेक्षाकृत सुन्दर शाकद्वीप के राजा बने ॥ २५ ॥ अपने पिता प्रियव्रत की अनुमति पाकर पुत्र वीतिहोत्र शुद्धोद नामक समुद्र से घिरे पुष्करद्वीप के राजा हुए ॥ २६ ॥ महाराज प्रियव्रत ने अपनी ऊर्जस्वती नामक कन्या शुक्राचार्य को अर्पित कर दी थी। शुक्राचार्य की सर्वविश्रुत कन्या देवयानी उन्हीं ऊर्जस्वती के गर्भ से उत्पन्न हुई थी ॥ २७ ॥

इस प्रकार अपने पुत्रों में सातों द्वीपों का विभाजन करके महाराज प्रियव्रत ने विवेक सम्पन्न होकर योगमार्ग का आश्रय ग्रहण किया ॥ २८ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत आठवें स्कन्ध का ‘भुवनकोश के विषय में प्रियव्रत के वंश का वर्णन’ नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥

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