May 18, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-20 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-विंशोऽध्यायः बीसवाँ अध्याय तलातल, महातल, रसातल और पाताल तथा भगवान् अनन्त का वर्णन तलातलादिलोकवर्णनेऽनन्तवर्णनम् श्रीनारायण बोले — उस सुतल के नीचे के विवर को ‘तलातल’ कहा गया है । वहाँ त्रिपुराधिपति मय नामक महान् दानव रहता है ॥ १ ॥ त्रिलोकी की रक्षा के लिये भगवान् शंकर ने उसकी तीनों पुरियाँ भस्म करके उसके यहाँ रहने की व्यवस्था कर दी। उसे देवाधिदेव शिव की कृपा से यहाँ सुखदायक राज्य प्राप्त हो गया है ॥ २ ॥ अपने समस्त कार्यों के अभ्युदय के लिये बड़े-बड़े भयानक राक्षसगण अनेक प्रकार की माया रचने में परम प्रवीण उस मायावियों के भी गुरु मय की पूजा करते हैं ॥ ३ ॥ उस तलातल के नीचे अति प्रसिद्ध ‘महातल’ नामक विस्तृत विवर है । उसमें कद्रू से उत्पन्न हुए अनेक सिरोंवाले क्रोधी सर्पों का एक बहुत बड़ा समूह रहता है । हे विप्र ! उनमें प्रधान सर्पों के नाम आपको बताता हूँ — कुहक, तक्षक, सुषेण और कालिय । ये विशाल फनवाले, महान् शक्ति से सम्पन्न तथा अत्यन्त भयानक होते हैं। इनकी जाति ही बड़ी क्रूर होती है। वे सभी केवल पक्षिराज गरुड से ही आतंकित रहते हैं। अनेक प्रकार की क्रीडा करने में परम दक्ष ये सर्प अपनी स्त्रियों, सन्तानों, सुहृदों तथा परिवारजनों के साथ प्रमत्त होकर वहाँ विहार करते रहते हैं ॥ ४-७ ॥ उसके भी नीचे ‘रसातल’ नाम वाले विवर में ‘पणि’ नाम के दैत्य और दानव रहते हैं, जो निवातकवच, हिरण्यपुरवासी और कालेय कहे गये हैं । देवताओं से इनकी शत्रुता रहती है ॥ ८-९ ॥ वे जन्म से ही महान् पराक्रमी तथा साहसी होते हैं, किंतु अखिल जगत् के स्वामी भगवान् श्रीहरि के तेज से कुण्ठित पराक्रम वाले होकर वे सर्पों की भाँति छिपकर सदा उस विवर में पड़े रहते हैं । इन्द्र की दूती सरमा मन्त्र-वर्णरूप 1 वाक्यों के प्रभाव से असुर कष्ट पा चुके हैं — इसी बात का स्मरण करके वे हमेशा भयभीत रहते हैं ॥ १०- १११/२ ॥ इससे भी नीचे स्थित ‘पाताललोक ‘में मुख्यरूप से वासुकि, शंख, कुलिक, श्वेत, धनंजय, महाशंख, धृतराष्ट्र, शंखचूड, कम्बल, अश्वतर और देवोपदत्तक आदि महान् क्रोधी, बड़े-बड़े फनों वाले तथा महान् विषधर सर्प निवास करते हैं; वे सब नागलोक के अधिपालक हैं ॥ १२–१४ ॥ उनमें कोई सर्प पाँच फनों वाले, कोई सात फनों वाले और कोई दस फनों वाले हैं । कुछ सर्पों के सौ सिर तथा कुछ के हजार सिर हैं । हे देवर्षे ! जगमगाती हुई मणियाँ धारण करने वाले वे क्रोधयुक्त सर्प अपनी मणियों के तेज से पाताल-विवर के घोर अन्धकार-समूह को नष्ट कर देते हैं ॥ १५-१६१/२ ॥ इस पाताललोक के नीचे तीस हजार योजन की दूरी पर भगवान् श्रीहरि की एक तामसी कला विराजमान है । सम्पूर्ण देवताओं से सम्यक् पूजित इस कला का नाम अनन्त है ॥ १७-१८ ॥ अहंरूप अभिमान का लक्षण होने के कारण यह द्रष्टा तथा दृश्य का कर्षण करके एक कर देती है, इसीलिये पांचरात्र आगम के अनुयायी इसे संकर्षण कहते हैं ॥ १९ ॥ हजार सिरों वाले इन अनन्तमूर्ति भगवान् शेष के एक सिर पर रखा हुआ यह गोलाकार समग्र भूमण्डल सरसों के दाने की भाँति दिखायी पड़ता है ॥ २०१/२ ॥ समय आने पर जब ये भगवान् अनन्त चराचर जगत् के संहार की इच्छा करते हैं, तब इनकी भौंहों के विवर से ग्यारह रुद्रों से सुशोभित विग्रह वाले सांकर्षण नामक रुद्र प्रकट हो जाते हैं ॥ २१-२२ ॥ ये रुद्र तीन नेत्रों से शोभा पाते हैं, ये स्वयं तीन नोकों वाला त्रिशूल लेकर खड़े हो जाते असीम शक्ति से सम्पन्न ये रुद्र अखिल प्राणिजगत् का संहार करने वाले हैं ॥ २३ ॥ उन भगवान् शेषनाग के दोनों चरणकमलों के नख स्वच्छ तथा लाल मणियों के समान देदीप्यमान हैं। जब बड़े-बड़े नागराज एकान्तभक्ति से युक्त होकर प्रधान भक्तों के साथ भगवान् शेष के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं, तब उन्हें माणिक्यजटित कुंडल की प्रभा से प्रकाशित अपने मुख, सुन्दर कपोल तथा गण्डस्थल उनके मणिसदृश नखों में दृष्टिगोचर होने लगते हैं ॥ २४–२६ ॥ वहाँ नागराजों की सुन्दर तथा कान्तियुक्त अंगों वाली कुमारियाँ भी रहती हैं। लम्बी, विशाल, स्वच्छ, सुन्दर तथा मनोहर भुजाओं से सुशोभित वे कुमारियाँ इधर- उधर घूमा करती हैं। वे अपने अंगों में चन्दन, अगुरु और कस्तूरी का लेपन किये रहती हैं ॥ २७-२८ ॥ उन भगवान् संकर्षण के स्पर्शजन्य कामावेश से समन्वित तथा मधुर मुस्कान से युक्त होकर उन अनुराग-मद से उन्मत्त विघूर्णित रक्त नेत्रों वाले तथा करुणापूर्ण दृष्टि वाले भगवान ्को वे नागकन्याएँ आशीर्वाद की आशा से लज्जापूर्वक निहारती रहती हैं ॥ २९-३० ॥ अनन्त पराक्रम वाले, अत्यन्त उदार हृदय वाले, अनन्त गुणों के सागर, महान् तेजस्वी, क्रोध – रोष आदि के वेगों को रोकने वाले, असीम शक्ति के आगार- स्वरूप वे आदिदेव भगवान् अनन्त सभी देवताओं से प्रपूजित होकर सिद्धों, देवताओं, असुरों, नागों, विद्याधरों, गन्धर्वों और मुनिगणों के द्वारा निरन्तर ध्यान किये जाते हुए लोकों के कल्याणार्थ वहाँ विराजमान रहते हैं ॥ ३१–३३ ॥ निरन्तर प्रेम के मद से मुग्ध एवं विह्वल नेत्रों वाले वे भगवान् अपनी अमृतमयी वाणी से सभी देवताओं तथा अपने पार्षदगणों को भी सन्तुष्ट किये रहते हैं । वे कभी भी न मुरझाने वाले निर्मल और नवीन तुलसी- दलों से सुशोभित वैजयन्ती की माला धारण किये रहते हैं। वह माला मतवाले भौंरों के समूहों की मधुर गुंजार से सदा सुशोभित रहती है । वे देवदेव भगवान् शेष नीले रंग का वस्त्र धारण करते हैं और उनके कान में केवल एक कुंडल सुशोभित रहता है। वे अविनाशी भगवान् अपनी विशाल भुजा हल की मूठ पर रखे रहते हैं । सुवर्णमयी पृथ्वी को अपने सिर पर धारण किये हुए भगवान् शेष पीठ पर हौदा रखे किसी मतवाले हाथी की भाँति सुशोभित होते हैं । इस प्रकार श्रेष्ठ भगवद्भक्तों ने उदार लीलाओं वाले भगवान् शेष का वर्णन किया है ॥ ३४–३७ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत आठवें स्कन्ध का ‘तलातलादि- लोकों के वर्णन में अनन्त का वर्णन’ नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥ 1. एक कथा आती है कि जब पणि नामक दैत्यों ने पृथ्वी को रसातल में छिपा लिया, तब इन्द्र ने उसे ढूँढ़ने के लिये सरमा नाम की एक दूती को भेजा था । सरमा से दैत्यों ने सन्धि करनी चाही, परंतु सरमा ने सन्धि न करके इन्द्र की स्तुति करते हुए कहा था — ‘हता इन्द्रेण पणयः शयध्वम्’ (हे पणिगण ! तुम इन्द्र के हाथ से मरकर पृथ्वी पर सो जाओ ) इसी शाप के कारण उन्हें सदा इन्द्र का डर लगा रहता है । See Also :- श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय २४ Content is available only for registered users. 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