May 25, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-26 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-षड्विंशोऽध्यायः छब्बीसवाँ अध्याय सावित्रीदेवी की पूजा-स्तुति का विधान सावित्रीपूजाविधिकथनम् नारदजी बोले — तुलसी की यह अमृततुल्य कथा तो मैंने सुन ली, अब आप सावित्री की कथा कहने की कृपा कीजिये। ऐसा सुना गया है कि वे सावित्री वेदों की जननी हैं। वे सर्वप्रथम किससे उत्पन्न हुईं, जगत् में सर्वप्रथम इनकी पूजा किसने की और बाद में किन लोगों ने इनकी पूजा की ? ॥ १-२ ॥ श्रीनारायण बोले — हे मुने! सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने वेदमाता सावित्री की पूजा की, इसके बाद वेदों ने और तदनन्तर विद्वद्गणों ने इनका पूजन किया। तत्पश्चात् भारतवर्ष में राजा अश्वपति ने इनका पूजन किया और इसके बाद चारों वर्ण के लोग इनकी पूजा करने लगे ॥ ३-४ ॥ नारद बोले — हे ब्रह्मन् ! वे अश्वपति कौन थे, सर्वप्रथम उन्होंने सर्वपूज्या उन देवी की पूजा किस कामना की तथा बाद में किन लोगों ने उनका पूजन किया ? ॥ ५ ॥ श्रीनारायण बोले — हे मुने! मद्रदेश में अश्वपति नामक एक महान् राजा हुए। वे अपने शत्रुओं के बल का नाश करने वाले तथा मित्रों का दुःख दूर करने वाले थे ॥ ६ ॥ उनकी महारानी मालती नाम से विख्यात थीं । वे रानी धर्मनिष्ठ थीं। वे उनके लिये उसी प्रकार थीं, जैसे गदाधारी विष्णु के लिये लक्ष्मी ॥ ७ ॥ हे नारद! वे रानी मालती नि:सन्तान थीं । अतः उन्होंने वसिष्ठ के उपदेशानुसार भगवती सावित्री की भक्तिपूर्वक आराधना की। किंतु रानी को देवी से न तो कोई संकेत मिला और न उनके दर्शन ही हुए, अतः कष्ट से व्याकुल होकर दु:खित मन से वे घर चली गयीं ॥ ८-९ ॥ राजा अश्वपति ने उन्हें दुःखित देखकर नीतिपूर्ण वचनों से समझाया। इसके बाद भक्तिपूर्वक सावित्री की तपस्या के लिये वे पुष्करक्षेत्र में चले गये । वहाँ पर उन्होंने इन्द्रियों को वश में करके सौ वर्ष तक तपस्या की। उन्हें सावित्री के दर्शन तो नहीं हुए, किंतु प्रत्यादेश प्राप्त हुआ। हे नारद! उन नृपेन्द्र ने यह अशरीरी आकाशवाणी सुनी — [ हे राजेन्द्र ! ] तुम गायत्री का दस लाख जप करो ॥ १०-१२ ॥ इसी बीच वहाँ मुनि पराशर आ गये । राजा ने उन्हें प्रणाम किया । तदनन्तर मुनि राजा से कहने लगे ॥ १३ ॥ मुनि बोले — एक बार का गायत्री-जप दिनभर के पाप का नाश कर देता है। दस बार गायत्री – जप करने से दिन और रात का पाप नष्ट हो जाता है I गायत्री का सौ बार का जप महीनेभर के संचित पाप को हर लेता है और एक हजार बार का जप वर्षभर के संचित पाप का नाश कर देता है । गायत्री का एक लाख जप इस जन्म के किये गये पापों तथा दस लाख जप अन्य जन्मों में किये गये पापों को नष्ट कर देता है । गायत्री के एक करोड़ जप से सभी जन्मों में किये गये पाप भस्म हो जाते हैं और इससे भी दस गुना जप विप्रों की मुक्ति कर देता है ॥ १४–१६१/२ ॥ द्विज को चाहिये कि हाथ को सर्प के फण के आकार का बनाकर अँगुलियों को परस्पर पूर्णरूप से सटाकर छिद्ररहित कर ले फिर हाथ को नाभिस्थान से ऊपर की ओर हृदयदेश तक लाकर कुछ नीचे की ओर झुकाये हुए उसे स्थिर करके स्वयं पूरब की ओर मुख करके जप करे । अनामिका मध्य भाग से नीचे की ओर होते हुए प्रदक्षिण क्रम से तर्जनी के मूल तक जाना चाहिये, करमाला के जप का यही नियम है ॥ १७-१८१/२ ॥ हे राजन् ! श्वेतकमल के बीजों अथवा स्फटिक-मणि की पवित्र माला बनाकर तीर्थ में या किसी देवालय में जप करना चाहिये । पीपल के पत्र अथवा कमल पर संयमपूर्वक माला को रखकर गोरोचन से अनुलिप्त करे, फिर गायत्री मन्त्र का उच्चारण करके विद्वान् पुरुष माला को स्नान कराये । तत्पश्चात् उसी माला से विधिपूर्वक गायत्री – मन्त्र का सौ बार जप करना चाहिये अथवा पंचगव्य या गंगाजल से स्नान कराकर शुद्ध की हुई माला से भी जप किया जा सकता है ॥ १९-२२ ॥ हे राजर्षे ! इस क्रम से आप दस लाख गायत्री का जप कीजिये । इससे आपके तीन जन्मों के पापों का नाश हो जायगा और आप भगवती सावित्री का साक्षात् दर्शन प्राप्त करेंगे ॥ २३ ॥ हे राजन् ! आप पवित्र होकर प्रतिदिन प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकाल की सन्ध्या सदा कीजिये । सन्ध्या न करने वाला व्यक्ति अपवित्र रहता है और वह समस्त कर्मों के लिये अयोग्य हो जाता है । वह दिन में जो भी सत्कर्म करता है, उसके फल का अधिकारी नहीं रह जाता है ॥ २४-२५ ॥ जो ब्राह्मण प्रातः एवं सायंकाल की सन्ध्या नहीं करता, वह शूद्र के समान है और समस्त ब्राह्मणोचित कर्मों से बहिष्कृत कर देने योग्य है ॥ २६ ॥ जो विप्र जीवनपर्यन्त सदा त्रिकाल-सन्ध्या करता है, वह तपस्या तथा तेज के कारण सूर्य के समान हो जाता है। उसके चरण कमल की धूल से पृथ्वी शीघ्र पवित्र हो जाती है । जो द्विज सन्ध्या करने के कारण पवित्र हो चुका है, वह तेज से सम्पन्न तथा जीवन्मुक्त ही है। उसके स्पर्शमात्र से सभी तीर्थ पवित्र हो जाते हैं और उसके पास से पाप उसी प्रकार भाग जाते हैं, जैसे गरुड को देखते ही सर्प ॥ २७-२९ ॥ सम्पादित पूजा को देवगण तथा पिण्ड-तर्पण को पितृगण स्वेच्छापूर्वक स्वीकार नहीं करते हैं ॥ ३० ॥ जो द्विज त्रिकालसन्ध्या नहीं करता, उसके द्वारा जो व्यक्ति मूलप्रकृति की भक्ति नहीं करता, उनके मन्त्र की आराधना नहीं करता और उनका उत्सव नहीं मनाता; वह विषहीन सर्प की तरह तेज-रहित होता है ॥ ३१ ॥ जो द्विज विष्णु मन्त्र से विहीन है, त्रिकालसन्ध्या से रहित है और एकादशी व्रत से वंचित है; वह विषहीन सर्प की भाँति निस्तेज होता है ॥ ३२ ॥ जो ब्राह्मण भगवान् श्रीहरि को अर्पण किया गया नैवेद्य प्रसादरूप में ग्रहण नहीं करता, धोबी का काम करता है, बैल पर बोझा ढोने का काम करता है, शूद्रों का अन्न खाता है; वह विषहीन सर्प के समान है ॥ ३३ ॥ जो ब्राह्मण शूद्रों का शव जलाता है, शूद्र स्त्री का पति बनता है और शूद्रों के लिये भोजन तैयार करता है; वह विषहीन सर्प की भाँति निस्तेज होता है ॥ ३४ ॥ जो द्विज शूद्रों से दान लेता है, शूद्रों का यज्ञ कराता है, मुनीमी का काम करता है और तलवार लेकर पहरेदारी करके जीविकोपार्जन करता है; वह विषहीन सर्प की भाँति तेजशून्य होता है ॥ ३५ ॥ जो ब्राह्मण कन्या-विक्रय करता है, भगवान् का नाम बेचता है, पति तथा पुत्र से हीन और ऋतुस्नाता स्त्री “मासिक धर्म के बाद स्नान करने वाली स्त्री” के यहाँ भोजन करता है, स्त्रियों के व्यभिचार से अपनी आजीविका चलाता है और सूदखोर होता है; वह विषहीन सर्प के समान तेजरहित होता है। जो द्विज विद्या का विक्रय करता है, वह भी विषहीन सर्प के सदृश होता है। जो ब्राह्मण सूर्योदय हो जाने के बाद सोता रहता है, भोजन में मछली ग्रहण करता है और भगवती की पूजा से वंचित है; वह विषहीन सर्प के समान निस्तेज है ॥ ३६-३८ ॥ हे मुने! ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ पराशर ने राजा अश्वपति को सावित्री की पूजा के सम्पूर्ण विधान तथा ध्यान आदि आवश्यक प्रयोग बतला दिये। महाराज अश्वपति को सम्पूर्ण उपदेश देकर मुनि अपने आश्रम चले गये। तत्पश्चात् राजा ने भगवती सावित्री की विधिवत् उपासना करके उनके दर्शन प्राप्त किये तथा उन्हें अभीष्ट वर भी प्राप्त हो गया ॥ ३९-४० ॥ नारदजी बोले — उन मुनि पराशर ने राजा अश्वपति को सावित्री के किस ध्यान, पूजा-विधान, स्तोत्र तथा मन्त्र का उपदेश देकर प्रस्थान किया था ? साथ ही राजा ने किस विधान से वेदमाता सावित्री की भलीभाँति पूजा की और इस प्रकार उनकी विधिवत् पूजा करके उन्होंने कौन-सा वर प्राप्त किया ? [हे प्रभो!] सावित्री का वह परम महिमामय, अत्यन्त रहस्ययुक्त और वेदप्रमाणित सम्पूर्ण प्रसंग संक्षेप में सुनना चाहता हूँ ॥ ४१–४३ ॥ श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] ज्येष्ठमास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि को संयमपूर्वक रहकर व्रती को चतुर्दशी तिथि में व्रत करके शुद्ध समय में भक्तिपूर्वक सावित्री की पूजा करनी चाहिये ॥ ४४ ॥ यह व्रत चौदह वर्ष का है । इसमें चौदह फलसहित चौदह प्रकार के नैवेद्य अर्पण किये जाते हैं । पुष्प, धूप, वस्त्र तथा यज्ञोपवीत आदि से विधिपूर्वक पूजन करके नैवद्य अर्पण करना चाहिये। एक मंगल कलश स्थापित करके उसपर पल्लव रख दे । तत्पश्चात् गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव तथा पार्वती की सम्यक् पूजा करके द्विज को आवाहित कलश पर अपनी इष्टदेवी सावित्री का ध्यान करना चाहिये ॥ ४५–४७ ॥ माध्यन्दिनी शाखा में भगवती सावित्री का जो ध्यान, स्तोत्र, पूजा-विधान तथा सर्वकामप्रद मन्त्र प्रतिपादित किया गया है, उसे आप सुनिये ॥ ४८ ॥ ध्यान इस प्रकार है — तप्तकाञ्चनवर्णाभां ज्वलन्तीं ब्रह्मतेजसा । ग्रीष्ममध्याह्नमार्तण्डसहस्रसम्मितप्रभाम् ॥ ४९ ॥ ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां रत्नभूषणभूषिताम् । वह्निशुद्धांशुकाधानां भक्तानुग्रहविग्रहाम् ॥ ५० ॥ सुखदां मुक्तिदां शान्तां कान्तां च जगतां विधेः । सर्वसम्पत्स्वरूपां च प्रदात्रीं सर्वसम्पदाम् ॥ ५१ ॥ वेदाधिष्ठातृदेवीं च वेदशास्त्रस्वरूपिणीम् । वेदबीजस्वरूपां च भजे तां वेदमातरम् ॥ ५२ ॥ ‘भगवती सावित्री का वर्ण तप्त सुवर्ण की प्रभा के समान है, ये ब्रह्मतेज से देदीप्यमान हैं, ये ग्रीष्म ऋतु के मध्याह्नकालीन हजारों सूर्यों की सम्मिलित प्रभा से सम्पन्न हैं, इनका मुखमण्डल प्रसन्नता तथा मुसकान से युक्त है, ये रत्नमय आभूषणों से अलंकृत हैं, अग्नि के समान विशुद्ध वस्त्र इन्होंने धारण कर रखा है, भक्तों पर कृपा करने के लिये ही इन्होंने यह विग्रह धारण किया है, ये सुख प्रदान करनेवाली हैं, मुक्ति देने वाली हैं, ये शान्त स्वभाव वाली हैं, जगत् की रचना करने वाले ब्रह्माजी की प्रिया हैं, ये सर्वसम्पत्तिस्वरूपिणी हैं, सभी प्रकार की सम्पदाएँ प्रदान करनेवाली हैं, वेद की अधिष्ठात्री देवी हैं तथा समस्त वेद-शास्त्र इन्हीं के स्वरूप हैं — ऐसी उन वेदबीजस्वरूपा वेदमाता सावित्री की मैं उपासना करता हूँ।’ ॥ ४९–५२ ॥ इस ध्यान के द्वारा देवी सावित्री का ध्यान करके नैवेद्य अर्पण करना चाहिये, तदनन्तर हाथों को सिर से लगाकर पुनः ध्यान करके भक्तिपूर्वक व्रती को कलश पर देवी सावित्री का आवाहन करना चाहिये ॥ ५३ ॥ तदनन्तर वेदोक्त मन्त्रों का उच्चारण करते हुए सोलह प्रकार के पूजनोपचार अर्पण करके विधिपूर्वक महादेवी सावित्री की पूजा तथा स्तुति करके उन्हें प्रणाम करना चाहिये। आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, शीतल जल, वस्त्र, भूषण, माला, चन्दन, आचमन और मनोहर शय्या — ये ही देने योग्य सोलह उपचार हैं ( इनके निम्न मन्त्र हैं ) ॥ ५४–५६ ॥ [ आसन – ] हे देवि ! श्रेष्ठ काष्ठ से निर्मित अथवा स्वर्णनिर्मित यह देवताओं का आधारस्वरूप पुण्यप्रद आसन मैंने आपको श्रद्धापूर्वक निवेदित किया है ॥ ५७ ॥ [ पाद्य- -] परम प्रीति उत्पन्न करने वाला, पुण्यप्रद तथा पूजा का अंगभूत यह पवित्र तीर्थजल मेरे द्वारा आपको पाद्यरूप में अर्पित किया गया है ॥ ५८ ॥ [अर्घ्य – ] दूर्वा, पुष्प, तुलसी तथा शंखजल से समन्वित यह पवित्र तथा पुण्यदायक अर्घ्य मैंने आपको अर्पण किया है ॥ ५९ ॥ [ स्नान – ] चन्दन मिलाकर सुगन्धित किया गया जल तथा सुगन्ध फैलाने वाला यह तैल आपको भक्तिपूर्वक निवेदित किया है, आप इसे स्नानहेतु स्वीकार करें ॥ ६० ॥ [ अनुलेपन – ] हे अम्बिके ! सुगन्धित द्रव्यों से निर्मित, दिव्य गन्ध प्रदान करने वाला तथा चन्दनजल से मिश्रित यह पवित्र तथा प्रीतिदायक अनुलेपन मैंने आपको भक्तिपूर्वक अर्पण किया है ॥ ६१ ॥ [ धूप – ] हे परमेश्वरि ! समस्त मंगल प्रदान करनेवाला, पुण्यदायक, सुगन्धयुक्त, सुखदायक तथा सर्वमंगलरूप यह उत्तम धूप मैंने आपको अर्पण किया है, आप ग्रहण करें ॥ ६२१/२ ॥ [ दीप – ] अन्धकार के नाश के बीजस्वरूप, प्रकाश फैलानेवाला यह दीपक मैंने आपको जगत् के दर्शनार्थ अर्पित किया है ॥ ६३१/२ ॥ [ नैवेद्य – ] सन्तुष्टि, पुष्टि, प्रीति तथा पुण्य प्रदान करने वाले एवं भूख शान्त करने वाले इस स्वादिष्ट नैवेद्य को आप स्वीकार करें ॥ ६४१/२ ॥ [ ताम्बूल – ] कर्पूर आदि से सुवासित, तुष्टिदायक, पुष्टिप्रद तथा रम्य यह उत्तम ताम्बूल मैंने आपको निवेदित किया है ॥ ६५१/२ ॥ [ शीतल जल – ] प्यास का शमन करने वाले, जगत् जीवन तथा प्राणरूप इस परम शीतल जल को आप स्वीकार करें ॥ ६६१/२ ॥ [ वस्त्र – ] कपास तथा रेशम से निर्मित, देह के शोभास्वरूप तथा सभाओं में सौन्दर्य की वृद्धि करने वाले इस वस्त्र को आप स्वीकार करें ॥ ६७१/२ ॥ [ आभूषण – ] सुवर्ण आदि से निर्मित, प्रभायुक्त, सदा शोभा बढ़ाने वाले, सुखदायक तथा पुण्यप्रद इस रत्नमय आभूषण को आप स्वीकार करें ॥ ६८१/२ ॥ [ फल- ] अनेक वृक्षों से उत्पन्न, विविध रूपोंवाले, फलस्वरूप तथा फल प्रदान करने वाले इस फल को आप स्वीकार करें ॥ ६९१/२ ॥ [ पुष्पमाला – ] सभी मंगलों का मंगल करनेवाली, सर्वमंगलरूपा, अनेक प्रकार के पुष्पों से विनिर्मित, परम शोभा से सम्पन्न, प्रीतिदायिनी तथा पुण्यमयी इस माला को आप स्वीकार करें ॥ ७०-७१ ॥ [ सिन्दूर— ] हे देवि ! पुण्यप्रद तथा सुगन्धपूर्ण इस गन्ध को आप स्वीकार करें। ललाट की शोभा बढ़ाने वाले, भूषणों में परम श्रेष्ठ तथा अत्यन्त मनोहर इस सिन्दूरको आप स्वीकार करें ॥ ७२ ॥ [ यज्ञोपवीत – ] पवित्र सूत्रों से निर्मित, विशुद्ध, ग्रन्थि (गाँठ)-से युक्त तथा वैदिक मन्त्रों से शुद्ध किये गये इस यज्ञोपवीत को आप स्वीकार करें ॥ ७३१/२ ॥ [हे नारद!] विद्वान् पुरुष मूलमन्त्रों का उच्चारण करते हुए इन द्रव्यों को भगवती सावित्री के लिये अर्पण करके स्तोत्र-पाठ करे और इसके बाद व्रती ब्राह्मण को भक्तिपूर्वक दक्षिणा प्रदान करे । ‘सावित्री’ – इस शब्द में चतुर्थी विभक्ति लगाकर उसके अन्त में स्वाहा तथा उसके पूर्व में लक्ष्मी, माया और कामबीजों को लगाने से ‘श्रीं ह्रीं क्लीं सावित्र्यै स्वाहा’ – यह अष्टाक्षर मन्त्र कहा गया है। माध्यन्दिनी शाखा में वर्णित, सभी कामनाओं का फल प्रदान करने वाले तथा विप्रों के जीवनस्वरूप सावित्री – स्तोत्र को आपके सामने व्यक्त करता हूँ — इसे ध्यानपूर्वक सुनिये ॥ ७४-७६१/२ ॥ हे नारद! प्राचीन काल की बात है — गोलोक में विराजमान श्रीकृष्ण ने सावित्री को ब्रह्मा के पास जाने की आज्ञा दी, किंतु वे सावित्री उनके साथ ब्रह्मलोक जाने को तैयार नहीं हुईं। तब कृष्ण के कहने पर ब्रह्माजी भक्तिपूर्वक वेदमाता सावित्री का स्तवन करने लगे । तदनन्तर उन सावित्री ने परम प्रसन्न होकर ब्रह्मा को पति बनाना स्वीकार कर लिया ॥ ७७-७८१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — सच्चिदानन्द विग्रहवाली, मूलप्रकृति-स्वरूपिणी तथा हिरण्यगर्भरूपवाली हे सुन्दरि ! आप मुझ पर प्रसन्न हों । परम तेजमय विग्रहवाली, परमानन्दस्वरूपिणी तथा द्विजातियों के लिये जातिस्वरूपा हे सुन्दरि ! आप मुझ पर प्रसन्न हों । नित्या, नित्यप्रिया, नित्यानन्दस्वरूपिणी तथा सर्वमंगलमयी हे देवि ! हे सुन्दरि ! आप मुझ पर प्रसन्न हों । ब्राह्मणों की सर्वस्वरूपिणी, मन्त्रों की सारभूता, परात्परा, सुख प्रदान करने वाली तथा मोक्षदायिनी हे देवि ! हे सुन्दरि ! आप मुझपर प्रसन्न हों । विप्रों के पापरूपी ईंधन को दग्ध करने के लिये प्रज्वलित अग्नि की शिखा के समान तथा ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली हे देवि ! हे सुन्दरि ! आप मुझपर प्रसन्न हों । मनुष्य मन, वाणी अथवा शरीर से जो भी पाप करता है, वह सब आपके स्मरणमात्र से जलकर भस्म हो जायगा ॥ ७९ – ८४१/२ ॥ इस प्रकार स्तुति करके जगत् की रचना करने वाले ब्रह्माजी वहीं पर सभा-भवन में विराजमान हो गये । तब वे सावित्री ब्रह्माजी के साथ ब्रह्मलोक के लिये प्रस्थित हो गयीं ॥ ८५१/२ ॥ [ हे मुने!] इसी स्तोत्रराज से राजा अश्वपति ने भगवती सावित्री की स्तुति करके उनका दर्शन किया और उनसे मनोभिलषित वर भी प्राप्त किया। जो मनुष्य सन्ध्या करके इस स्तोत्रराज का पाठ करता है, वह उस फल को प्राप्त कर लेता है, जो चारों वेदों का पाठ करने से मिलता है ॥ ८६-८७ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘सावित्रीपूजाविधिकथन’ नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥ Content is available only for registered users. 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