श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-30
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-त्रिंशोऽध्यायः
तीसवाँ अध्याय
दिव्य लोकों की प्राप्ति कराने वाले पुण्यकर्मों का वर्णन
यमेन कर्मविपाककथनम्

सावित्री बोली — हे यम ! जिस कर्म के प्रभाव से पुण्यवान् मनुष्य स्वर्ग आदि अन्य लोकों में जाते हैं, उसे मुझे बताने की कृपा कीजिये ॥ १ ॥

धर्मराज बोले — [ हे साध्वि !] जो भारतवर्ष में विप्र को अन्न का दान करता है, वह दान दिये गये अन्न की संख्या बराबर वर्षों तक शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है । अन्नदान महादान है। जो अन्य लोगों को भी अन्नदान करता है, वह भी अन्न के दानों की संख्या के बराबर वर्षों तक शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है । अन्नदान से बढ़कर न कोई दान हुआ है और न होगा । इस दान में पात्र – परीक्षा अथवा समय – सम्बन्धी नियम की कोई आवश्यकता नहीं होती है ॥ २-४ ॥ हे साध्वि ! यदि कोई मनुष्य देवताओं अथवा ब्राह्मणों को आसन का दान करता है, तो वह दस हजार वर्षों तक विष्णुलोक में निवास करता है ॥ ५ ॥  जो मनुष्य ब्राह्मण को दूध देने वाली दिव्य गाय प्रदान करता है, वह उस गाय के शरीर में विद्यमान रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित रहता है ॥ ६ ॥ [ साधारण दिनों की अपेक्षा] पुण्य-दिन में दिये गये गोदान का फल चार गुना, तीर्थ में सौ गुना और नारायणक्षेत्र में गोदान का फल करोड़ गुना होता है ॥ ७ ॥ जो मनुष्य भारतवर्ष में भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को गाय प्रदान करता है, वह दस हजार वर्षों तक चन्द्रलोक में निवास करता है ॥ ८ ॥ जो व्यक्ति किसी ब्राह्मण को उभयमुखी (प्रसव करती हुई ) गाय का दान करता है, वह उस गाय के शरीर में विद्यमान रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है ॥ ९ ॥

जो मनुष्य ब्राह्मण को स्वच्छ तथा मनोहर छत्र प्रदान करता है, वह दस हजार वर्षों तक वरुणलोक में आनन्दित रहता है ॥ १० ॥ हे साध्वि ! जो मनुष्य पीड़ित शरीर वाले दुःखी ब्राह्मण को एक जोड़ा वस्त्र प्रदान करता है, वह दस हजार वर्षों तक वायुलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ११ ॥ जो व्यक्ति किसी ब्राह्मण को वस्त्रसहित शालग्राम का अर्पण करता है, वह चन्द्रमा तथा सूर्य की स्थितिपर्यन्त वैकुण्ठ में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ १२ ॥ जो मनुष्य किसी ब्राह्मण को दिव्य तथा मनोहर शय्या का दान करता है, वह चन्द्रमा तथा सूर्य के स्थिति – काल तक चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित होता है ॥ १३ ॥ जो देवताओं तथा ब्राह्मणों को दीपक का दान करता है, वह मन्वन्तरपर्यन्त अग्निलोक में वास करता है ॥ १४ ॥ भारतवर्ष में जो मनुष्य ब्राह्मण को हाथी का दान करता है, वह इन्द्र की आयुपर्यन्त उनके आधे आसन पर विराजमान रहता है ॥ १५ ॥ भारतवर्ष में जो मनुष्य ब्राह्मण को अश्व का दान करता है, वह जब तक चौदहों इन्द्रों की स्थिति बनी रहती है, तबतक वरुणलोक में आनन्द प्राप्त करता है ॥ १६ ॥

जो व्यक्ति ब्राह्मणके लिये उत्तम शिबिकाका दान करता है, वह भी चौदह इन्द्रोंकी स्थितितक वरुणलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ १७॥ हे साध्वि ! जो मनुष्य ब्राह्मणको उत्तम वाटिका प्रदान करता है, वह मन्वन्तरपर्यन्त वायु- लोक प्रतिष्ठित होता है ॥ १८ ॥ जो व्यक्ति ब्राह्मणको पंखा तथा श्वेत चँवरका दान करता है, वह निश्चितरूपसे दस हजार वर्षोंतक वायुलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ १९ ॥ जो मनुष्य धान्य तथा रत्नका दान करता है, वह दीर्घायु तथा विद्वान् होता है। दान देनेवाला तथा  लेनेवाला—वे दोनों निश्चय ही वैकुण्ठलोकमें चले जाते हैं ॥ २० ॥ जो मनुष्य भारतवर्ष में निरन्तर भगवान् श्रीहरिके नामका जप करता है, वह दीर्घजीवी होता है और मृत्यु उससे सदा दूर रहती है ॥ २१ ॥ भारतवर्षमें जो विद्वान् पुरुष पूर्णिमाकी रातके कुछ शेष रहनेपर दोलोत्सव कराता है, वह जीवन्मुक्त होता है, इस लोक में सुख भोगकर वह अन्तमें विष्णुके धामको प्राप्त होता है और वहाँ सौ मन्वन्तरकी अवधि- तक निश्चितरूपसे निवास करता है। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें यह उत्सव मनानेपर उससे भी दुगुना फल प्राप्त होता है और वह व्यक्ति कल्पपर्यन्त जीवित रहता है – ऐसा ब्रह्माजीने कहा है ॥ २२-२४ ॥ भारतवर्षमें जो मनुष्य ब्राह्मणको तिलका दान करता है, वह तिलों की संख्या के बराबर वर्षों तक शिवजीके धाममें आनन्द प्राप्त करता है । वहाँ से पुनः उत्तम योनि में जन्म पाकर वह दीर्घकाल तक जीवित रहते हुए सुख भोगता है । तिलसे परिपूर्ण ताँबेके पात्र का दान करनेसे उससे भी दूना फल प्राप्त होता है ॥ २५-२६ ॥ भारत में जो मनुष्य उपभोग करनेयोग्य पतिव्रता तथा सुन्दर कन्याको अलंकारों तथा वस्त्रोंसे विभूषित करके उसे किसी ब्राह्मणको भार्याके रूपमें अर्पण करता है, वह चौदहों इन्द्रों की स्थितिपर्यन्त चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और वहाँपर स्वर्गकी अप्सराओंके साथ दिन–रात आनन्द प्राप्त करता रहता है । उसके बाद वह निश्चय ही गन्धर्वलोकमें दस हजार वर्षोंतक निवास करता है और वहाँपर उर्वशीके साथ क्रीडा करते हुए दिन-रात आनन्द प्राप्त करता है । तत्पश्चात् उसे हजारों जन्मतक सुन्दर, साध्वी, सौभाग्यवती, कोमल तथा प्रिय सम्भाषण करनेवाली भार्या प्राप्त होती है ॥ २७-३० ॥

जो मनुष्य ब्राह्मण को सुन्दर फल प्रदान करता है, वह जितने फल दिये गये होते हैं; उतने वर्षों तक इन्द्रलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है । इसके बाद वह उत्तम योनि में जन्म लेकर श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करता है । फल वाले वृक्षों के दान का फल उससे भी हजार गुना अधिक बताया गया है। जो मनुष्य ब्राह्मण को केवल फलदान करता है, वह भी दीर्घ काल तक स्वर्ग में निवास करके पुनः भारतवर्ष में जन्म ग्रहण करता है ॥ ३१–३३ ॥ भारतवर्ष में जो मनुष्य अनेक प्रकार के द्रव्यों से युक्त तथा नानाविध धान्यों से परिपूर्ण विशाल भवन ब्राह्मण को प्रदान करता है, वह सौ मन्वन्तर तक देवलोक में निवास करता है । तदनन्तर उत्तम योनि में जन्म पाकर वह महान् धनाढ्य हो जाता है ॥ ३४-३५ ॥ हे साध्वि! पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में जो मनुष्य हरी- भरी फसलों से सम्पन्न सुन्दर भूमि भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को अर्पण करता है, वह निश्चितरूप से सौ मन्वन्तर तक वैकुण्ठलोक में प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् पुनः उत्तम योनि में जन्म लेकर वह बहुत महान् राजा होता है। सौ जन्मों तक भूमि उसका त्याग नहीं करती और वह श्रीयुक्त, धनवान् तथा पुत्रवान् राजा होता है ॥ ३६-३८ ॥

जो व्यक्ति उत्तम गोशाला तथा गाँव ब्राह्मण को प्रदान करता है, वह एक लाख मन्वन्तर तक वैकुण्ठलोक में प्रतिष्ठित होता है । तत्पश्चात् श्रेष्ठ कुल में जन्म पाकर वह लाखों गाँवों से सम्पन्न हो जाता है और लाख जन्मों तक भूमि उसका साथ नहीं छोड़ती ॥ ३९-४० ॥ भारतभूमि पर जो मनुष्य ब्राह्मण को उत्तम प्रजाओं से युक्त, उत्कृष्ट, पकी हुई फसलों से सम्पन्न तथा अनेक प्रकार के कमलयुक्त जलाशयों, वृक्षों, फलों और लताओं से सुशोभित नगर प्रदान करता है; वह दस लाख इन्द्रों की स्थितिपर्यन्त कैलास में सुप्रतिष्ठित होता है । इसके बाद वह भारतवर्ष में उत्तम योनि में जन्म लेकर राजेश्वर होता है और लाखों नगर प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है। दस हजार वर्षों तक धरा उस मनुष्य का साथ नहीं छोड़ती और वह निश्चितरूप से पृथ्वीतल पर सर्वदा महान् ऐश्वर्य से सम्पन्न रहता है ॥ ४१–४४ ॥ जो मनुष्य अत्यन्त उत्तम अथवा मध्यम श्रेणीवाले, प्रजाओं से परिपूर्ण, बावली – तड़ाग से युक्त तथा अनेक प्रकार के वृक्षों से सम्पन्न एक सौ नगरों का दान किसी द्विज को करता है, वह करोड़ मन्वन्तर की अवधि तक वैकुण्ठलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है । वह फिर से उत्तम वंश में जन्म लेकर जम्बूद्वीप का अधिपति होता है और जैसे इन्द्र स्वर्ग में सुशोभित होते हैं, वैसे ही वह परम ऐश्वर्यवान् होकर पृथ्वीलोक में शोभा प्राप्त करता है। करोड़ों जन्मों तक पृथ्वी उसका साथ नहीं छोड़ती और वह महान् राजराजेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित होकर कल्प के अन्त तक जीवित रहता है ॥ ४५–४८ ॥

जो मनुष्य ब्राह्मण को अपना सम्पूर्ण अधिकार दे देता है, उसे अन्त में चौगुना फल प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४९ ॥ जो व्यक्ति तपस्वी ब्राह्मण को जम्बूद्वीप का दान देता है, वह अन्त में सौ गुना फल प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५० ॥ जम्बूद्वीप की भूमि का दान कर वाले, समस्त तीर्थों में निवास करने वाले, सभी तपस्याओं में रत रहने वाले, सम्पूर्ण श्रेष्ठ स्थानों में निवास करने वाले, अपना सर्वस्व दान करने वाले तथा समस्त प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त किये हुए महेश्वरी जगदम्बा के भक्त को पुनः संसार में जन्म नहीं लेना पड़ता ॥ ५१-५२ ॥ भगवती जगदम्बा के उपासकों के समक्ष असंख्य ब्रह्माओं का लय हो जाता है, किंतु वे भगवती भुवनेश्वरी के परम धाम मणिद्वीप में निवास करते रहते हैं ॥ ५३ ॥ भगवती के मन्त्र की उपासना करने वाले पुरुष मानव-शरीर त्यागने के अनन्तर जन्म, मृत्यु एवं जरारहित ऐश्वर्यमय दिव्यरूप धारण करके उन भगवती की सारूप्यमुक्ति प्राप्त कर उनकी सेवामें सदा संलग्न रहते हैं। वे मणिद्वीप में निवास करते हुए खण्डप्रलय का अवलोकन करते रहते हैं ॥ ५४-५५ ॥ देवता, सिद्ध तथा समग्र विश्व एक निश्चित अवधि पर नष्ट हो जाते हैं; किंतु जन्म, मृत्यु और जरा से रहित देवीभक्त विनाश को प्राप्त नहीं होते ॥ ५६ ॥

जो मनुष्य कार्तिक महीने में भगवान् श्रीहरि को तुलसी अर्पण करता है, वह श्रीहरि के धाम में तीन युगों तक आनन्दपूर्वक निवास करता है । तदनन्तर उत्तम कुल में जन्म लेकर वह निश्चितरूप से भगवान्‌ की भक्ति प्राप्त करता है और इस भारतभूमि में रहने वाले जितेन्द्रिय पुरुषों में अति श्रेष्ठ हो जाता है ॥ ५७-५८ ॥ जो व्यक्ति अरुणोदय के समय गंगा के मध्य स्नान करता है, वह साठ हजार युगों तक भगवान् श्रीहरि के धाम में आनन्द प्राप्त करता है । वह श्रेष्ठ कुल में जन्म पाकर विष्णुमन्त्र की सिद्धि करता है और अन्त में पुनः मानवशरीर त्यागकर भगवान् श्रीहरि के धाम में चला जाता है। उस वैकुण्ठधाम से फिर पृथ्वीतल पर उसका दुबारा जन्म नहीं होता । भगवान्‌ का सारूप्य प्राप्त करके वह सदा उनकी सेवामें संलग्न रहता है ॥ ५९–६१ ॥ जो व्यक्ति प्रतिदिन गंगा में स्नान करता है, वह सूर्य की भाँति पृथ्वीलोक में पवित्र माना जाता है और उसे पग-पग पर अश्वमेधयज्ञ का फल मिलता है, यह सर्वथा निश्चित है। उसकी चरण- रज से पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। अन्त में वह वैकुण्ठधाम पहुँचकर सूर्य तथा चन्द्रमा की स्थितिपर्यन्त वहाँ आनन्द प्राप्त करता है। तदनन्तर उत्तम कुल में पुनः जन्म लेकर उसे अवश्य ही भगवान् श्रीहरि की भक्ति सुलभ होती है । वह जीवन्मुक्त, परम तेजस्वी, तपस्वियों में श्रेष्ठ, स्वधर्मपरायण, निर्मलहृदय, विद्वान् तथा जितेन्द्रिय होता है ॥ ६२–६४१/२

मीन और कर्कराशि पर रहते समय सूर्य अत्यधिक तपते हैं। जो पुरुष उस समय भारत में सुवासित जल का दान करता है, वह चौदहों इन्द्रों की स्थितिपर्यन्त कैलास में आनन्द भोगता है । तत्पश्चात् उत्तम योनि में जन्म पाकर रूपवान्, सुखी, शिवभक्त, तेजस्वी तथा वेद-वेदांग का पारगामी विद्वान् होता है ॥ ६५–६७ ॥ जो मनुष्य वैशाख महीने में ब्राह्मण को सत्तू का दान करता है, वह उस सत्तू के कणों की संख्या के बराबर वर्षों तक शिवलोक में आनन्दपूर्वक निवास करता है ॥ ६८ ॥ भारतवर्ष में जो मनुष्य श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करता है, वह अपने सौ जन्मों में किये गये पापों से छूट जाता है, इसमें सन्देह नहीं है । जबतक चौदहों इन्द्रों की स्थिति बनी रहती है, तबतक वह वैकुण्ठलोक में आनन्द का भोग करता है । इसके बाद वह पुन: उत्तम योनि में जन्म लेकर निश्चितरूप से भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त करता है ॥ ६९-७० ॥

इस भारतवर्ष में जो मनुष्य शिवरात्रि का व्रत करता है, वह सात मन्वन्तरों के काल तक शिवलोक में आनन्द से रहता है ॥ ७१ ॥ जो मनुष्य शिवरात्रि के दिन भगवान् शंकर को बिल्वपत्र अर्पण करता है, वह बिल्वपत्रों की जितनी संख्या है उतने वर्षों तक उस शिवलोक में आनन्द भोगता है । पुनः श्रेष्ठ योनि प्राप्त करके वह निश्चय ही शिवभक्ति प्राप्त करता है और विद्या, पुत्र, श्री, प्रजा तथा भूमि – इन सबसे सदा सम्पन्न रहता है ॥ ७२-७३ ॥ जो व्रती चैत्र अथवा माघ में पूरे मासभर, आधे मास, दस दिन अथवा सात दिन तक भगवान् शंकर की पूजा करता है और हाथ में बेंत लेकर भक्तिपूर्वक उनके सम्मुख नर्तन करता है, वह उपासना के दिनों की संख्या के बराबर युगों तक शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ७४-७५ ॥ जो मनुष्य भारतवर्ष में श्रीरामनवमी का व्रत सम्पन्न करता है, वह विष्णु धाम में सात मन्वन्तर तक आनन्द करता है। पुन: उत्तम योनि में जन्म पाकर वह निश्चय ही राम की भक्ति प्राप्त करता है और जितेन्द्रियों में सर्वश्रेष्ठ तथा महान् धनी होता है ॥ ७६-७७ ॥

हे साध्वि ! जो मनुष्य विविध प्रकार के नैवेद्यों, उपहार-सामग्रियों, धूप-दीप आदि पूजनोपचारों के द्वारा भगवती प्रकृति की शारदीय महापूजा करता है तथा उस अवसर पर नृत्य, गीत, वाद्य आदि के द्वारा अनेकविध मंगलोत्सव मनाता है; वह सात मन्वन्तरों की अवधि तक शिवलोक में निवास करता है । पुनः उत्तम योनि में जन्म पाकर वह मनुष्य निर्मल बुद्धि, अपार सम्पत्ति तथा पुत्र-पौत्रों की अभिवृद्धि प्राप्त करता है । वह हाथी, घोड़े आदि वाहनों से सम्पन्न तथा महान् प्रभावशाली राजराजेश्वर हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ ७८–८११/२

शारदीय नवरात्र की शुक्लाष्टमी तिथि से प्रारम्भ करके एक पक्ष तक नित्य पवित्र भारतभूमि पर जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उत्तम षोडशोपचार अर्पित करके भगवती महालक्ष्मी की पूजा करता है, वह चौदह इन्द्रों के कालपर्यन्त गोलोक में वास करता है । तत्पश्चात् उत्तम कुल में जन्म लेकर वह राजराजेश्वर बनता है ॥ ८२–८४ ॥ जो भारतवर्ष में कार्तिकपूर्णिमा को सैकड़ों गोपों तथा गोपियों को साथ लेकर रासमण्डल-सम्बन्धी उत्सव मनाकर शिला पर या प्रतिमा में सोलहों प्रकार के पूजनोपचारों से भक्तिपूर्वक राधासहित श्रीकृष्ण की पूजा सम्पन्न करता है, वह ब्रह्माजी के स्थितिपर्यन्त गोलोक में निवास करता है । पुनः भारतवर्ष में जन्म पाकर वह श्रीकृष्ण की स्थिर भक्ति प्राप्त करता है । भगवान् श्रीहरि की क्रमशः सुदृढ़ भक्ति तथा उनका मन्त्र प्राप्त करके देह-त्याग के अनन्तर वह पुनः गोलोक चला जाता है। वहाँ श्रीकृष्ण के समान रूप प्राप्त करके वह उनका प्रमुख पार्षद बन जाता है । पुनः वहाँ से उसका पतन नहीं होता, वह जरा तथा मृत्यु से सर्वथा रहित हो जाता है ॥ ८५–८९ ॥ जो व्यक्ति शुक्ल अथवा कृष्णपक्ष की एकादशी का व्रत करता है, वह ब्रह्मा के आयुपर्यन्त वैकुण्ठलोक में आनन्दका भोग करता है। पुनः भारतवर्ष में जन्म लेकर वह निश्चय ही श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त करता है और वह क्रमशः एकमात्र श्रीहरि के प्रति अपनी भक्ति को सुदृढ़ करता जाता है । अन्त में मानव देह त्यागकर वह पुनः गोलोक चला जाता है और वहाँ पर श्रीकृष्ण का सारूप्य प्राप्त करके उनका पार्षद बन जाता है । वहाँ से पुनः संसार में उसका आगमन नहीं होता और वह सदा के लिये जरा तथा मृत्यु से मुक्त हो जाता है ॥ ९०-९२१/२

जो मनुष्य भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि को इन्द्र की पूजा करता है, वह साठ हजार वर्षों तक इन्द्रलोक में सम्मानित होता है। जो भारतवर्ष में रविवार, संक्रान्ति अथवा शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को सूर्य की पूजा करके भोजन में हविष्यान्न ग्रहण करता है, वह चौदहों इन्द्रों के आयुपर्यन्त सूर्यलोक में सुप्रतिष्ठित होता है । इसके बाद भारतवर्ष में फिर से जन्म लेकर वह आरोग्ययुक्त तथा श्रीसम्पन्न होता है ॥ ९३-९५१/२

जो मनुष्य ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवती सावित्री का पूजन करता है, वह सात मन्वन्तरों की अवधि तक ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। पुनः पृथ्वी पर लौटकर वह श्रीमान्, अतुल पराक्रमी, चिरंजीवी, ज्ञानवान् तथा सम्पदासम्पन्न हो जाता है ॥ ९६-९७१/२

जो मनुष्य माघ महीने के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को भक्तिपूर्वक सोलहों प्रकार के पूजनोपचारों को अर्पणकर सरस्वती की पूजा करता है, वह ब्रह्मा के आयुपर्यन्त मणिद्वीप में दिन- -रात प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और पुन: जन्म ग्रहणकर महान् कवि तथा पण्डित होता है ॥ ९८-९९१/२

भारतवर्ष में जो जीवनभर भक्ति से सम्पन्न होकर ब्राह्मण को नित्य गौ और सुवर्ण आदि प्रदान करता है, वह उस गौ के शरीर में जितने रोम होते हैं, उससे भी दुगुने वर्षों तक विष्णुलोक में वास करता है और वहाँ भगवान् श्रीहरि के साथ मंगलमय क्रीड़ा तथा उत्सव करते हुए आनन्द का भोग करता है । तत्पश्चात् पुनः भारतवर्ष में जन्म पाकर श्रीसम्पन्न, पुत्रवान्, विद्वान्, ज्ञानवान् तथा हर प्रकार से सुखी राजराजेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित होता है ॥ १००–१०२१/२

भारतवर्ष में जो मनुष्य ब्राह्मणों को मिष्टान्न का भोजन कराता है, वह उस ब्राह्मण के शरीर में जितने रोम होते हैं, उतने वर्षों तक विष्णुलोक में आनन्द प्राप्त करता है। तत्पश्चात् वहाँ से पुन: इस लोक में जन्म लेकर वह सुखी, धनवान्, विद्वान्, दीर्घजीवी, श्रीमान् तथा अतुलनीय पराक्रम वाला होता है ॥ १०३-१०४१/२

भारतवर्ष में जो मनुष्य भगवान् श्रीहरि के नाम का स्वयं कीर्तन करता है अथवा इसके लिये दूसरे को प्रेरणा देता है, वह जपे गये नामों की संख्या के बराबर युगों तक विष्णुलोक प्रतिष्ठित होता है और वहाँ से पुन: इस लोक में आकर वह सुखी तथा धनवान् होता है ॥ १०५-१०६ ॥ यदि भगवान्‌ का नामजप नारायणक्षेत्र में किया जाय तो उसका फल करोड़ों गुना अधिक होता है । जो मनुष्य नारायणक्षेत्र में भगवान् श्रीहरि के नाम का एक करोड़ जप करता है, वह सम्पूर्ण पापों से रहित होकर जीवन्मुक्त हो जाता है — यह सत्य है । उसका पुनर्जन्म नहीं होता, वह वैकुण्ठलोक में प्रतिष्ठित होता है। वह भगवान् विष्णु का सारूप्य प्राप्त कर लेता है और वहाँ से उसका पतन नहीं होता है । इस प्रकार वह भगवान् विष्णु की परम भक्ति सुलभ कर लेता है और अन्ततः उसे भगवान् विष्णु की सारूप्यमुक्ति प्राप्त हो जाती है ॥ १०७–१०९ ॥ जो मनुष्य प्रतिदिन पार्थिव लिंग बनाकर शिव की पूजा करता है और जीवनपर्यन्त इस नियम का पालन करता है, वह शिवलोक को प्राप्त होता है और उस पार्थिव लिंग में विद्यमान रजकणों की संख्या के बराबर वर्षों तक शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है । वहाँ से पुनः भारतवर्ष में जन्म लेकर वह महान् राजा होता है ॥ ११०-१११ ॥ जो मनुष्य प्रतिदिन शालग्राम का पूजन करता है और शालग्रामशिला के जल का पान करता है, वह सौ ब्रह्मा की आयु तक वैकुण्ठलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। उसके बाद फिर से जन्म लेकर भगवान् श्रीहरि की दुर्लभ भक्ति प्राप्त करता है और पुनः विष्णुलोक में सुप्रतिष्ठित होता है और उसका पतन नहीं होता ॥ ११२-११३ ॥

जो मनुष्य समस्त तपों तथा व्रतों को सम्पन्न कर लेता है, वह चौदह इन्द्रों के कालपर्यन्त वैकुण्ठ में निवास करता है। वहाँ से पुनः भारतवर्ष में जन्म ग्रहणकर वह महान् सम्राट् होता है । तदनन्तर वह मुक्त हो जाता है और फिर उसे दुबारा जन्म नहीं लेना पड़ता ॥ ११४-११५ ॥ जो सभी तीर्थों में स्नान तथा पृथ्वी की प्रदक्षिणा कर लेता है, वह निर्वाणपद को प्राप्त होता है और पुन: पृथ्वीलोक में उसका जन्म नहीं होता है ॥ ११६ ॥ जो पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में अश्वमेधयज्ञ करता है, वह उस अश्व के शरीर में जितने रोएँ होते हैं; उतने वर्षों तक इन्द्र के आधे आसन पर विराजमान रहता है। राजसूय यज्ञ करने से मनुष्य इससे भी चार गुना फल प्राप्त करता है ॥ ११७ ॥ भगवती का यज्ञ सभी यज्ञों से भी श्रेष्ठ कहा गया है। हे वरानने! विष्णु और ब्रह्मा ने पूर्वकाल में इस यज्ञ को किया था और त्रिपुरासुर का वध करने के लिये महादेव शंकरजी ने भी इस यज्ञ को सम्पन्न किया था । हे सुन्दरि ! यह शक्ति-यज्ञ सम्पूर्ण यज्ञों में प्रधान है; तीनों लोकों में इस यज्ञ के समान कोई भी यज्ञ नहीं है ॥ ११८-१२० ॥

साध्वि ! पूर्व काल की बात है, दक्षप्रजापति ने महान् उत्सव के साथ भगवती का यज्ञ किया था, जिसमें दक्ष प्रजापति तथा शंकर में परस्पर कलह हो गया। क्रोध में आकर ब्राह्मणों ने नन्दी को तथा नन्दी ने ब्राह्मणों को शाप दे दिया । इसलिये चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करनेवाले शिव ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर डाला ॥ १२१-१२२ ॥ प्राचीन काल में दक्षप्रजापति, धर्म, कश्यप, शेषनाग, मुनि कर्दम, स्वायम्भुव मनु, उनके पुत्र प्रियव्रत, शिव, सनत्कुमार, कपिल तथा ध्रुव — ये सभी लोग भगवतीयज्ञ सम्पन्न कर चुके हैं ॥ १२३-१२४ ॥ देवीयज्ञ करने वाला पुरुष हजारों राजसूययज्ञों का फल निश्चित – रूप से प्राप्त कर लेता है । देवीयज्ञ से बढ़कर फल प्रदान करने वाला कोई यज्ञ नहीं है — ऐसा वेद में कहा गया है ॥ १२५ ॥ देवीयज्ञ करने वाला सौ वर्ष तक जीवित रहकर अन्त में जीवन्मुक्त हो जाता है, यह सत्य है । वह इस लोक में ज्ञान तथा तप में साक्षात् भगवान् विष्णु के तुल्य हो जाता है ॥ १२६ ॥

हे वत्से ! हे भामिनि ! जिस प्रकार देवताओं में विष्णु, विष्णुभक्तों में नारद, शास्त्रोंमें वेद, वर्णों में ब्राह्मण, तीर्थों में गंगा, पुण्यात्मा पवित्रों में शिव, व्रतों में एकादशी, पुष्पों में तुलसी, नक्षत्रों में चन्द्रमा, पक्षियों में गरुड, स्त्रियों में मूलप्रकृति; राधा; सरस्वती तथा पृथिवी, शीघ्रगामी तथा चंचल इन्द्रियों में मन, प्रजापतियों में ब्रह्मा, प्रजाओं में राजा, वनों में वृन्दावन, वर्षों में भारतवर्ष, श्रीमान् लोगों में श्री, विद्वानों में सरस्वती, पतिव्रताओं में भगवती दुर्गा और सौभाग्यवती श्रीकृष्ण – भार्याओं में राधा सर्वोपरि हैं, उसी प्रकार समस्त यज्ञों में देवीयज्ञ श्रेष्ठ है ॥ १२७–१३२ ॥ एक सौ अश्वमेधयज्ञ करने से मनुष्य इन्द्रपद पा जाता है। एक हजार अश्वमेध करके राजा पृथु ने विष्णुपद प्राप्त किया था ॥ १३३ ॥ सम्पूर्ण तीर्थों के स्नान, समस्त यज्ञों की दीक्षा, सभी व्रतों, तपों तथा चारों वेदों के पाठों का पुण्य और पृथ्वी की प्रदक्षिणा — इन सभी साधनों के फल- स्वरूप शक्तिस्वरूपा भगवती जगदम्बा की सेवा सुलभ हो जाती है, जो प्राणी को मोक्ष प्रदान कर देती है ॥ १३४-१३५ ॥ पुराणों, वेदों तथा इतिहासों में सर्वत्र भगवती के चरणकमल की उपासना को ही सारभूत बताया गया है । उन भगवती के चरित्र का वर्णन, उनका ध्यान, उनके नाम तथा गुणों का कीर्तन, उनके स्तोत्रों का स्मरण, उनकी वन्दना, उनका नाम-जप, उनके चरणोदक तथा नैवेद्य का ग्रहण — यह सब नित्य सम्पादित करना चाहिये । हे साध्वि ! यह सर्वसम्मत तथा सभी के लिये अभीष्ट भी है ॥ १३६–१३८ ॥

हे वत्से ! तुम निर्गुण परब्रह्मस्वरूपिणी पराम्बा भगवती मूलप्रकृति की उपासना करो । अब तुम अपने पति को ग्रहण करो और सुखपूर्वक अपने भवन में निवास करो। मनुष्यों का यह मंगलमय कर्मविपाक मैंने तुमसे कह दिया, यह प्रसंग सबके लिये अभीष्ट, सर्वसम्मत, श्रेष्ठ तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करनेवाला है ॥ १३९-१४० ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘यम के द्वारा कर्मविपाककथन’ नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥

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