May 25, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-34 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-चतुस्त्रिंशोऽध्यायः चौंतीसवाँ अध्याय विभिन्न पापकर्म तथा उनके कारण प्राप्त होने वाले नरकों का वर्णन नानाकर्मविपाकफलवर्णनम् यमराज बोले — [ हे सावित्रि!] भारतवर्ष में जो कोई निर्दयी तथा क्रूर व्यक्ति खड्ग से किसी जीव को काटता है या कोई नरघाती धन के लोभ से किसी मनुष्य की हत्या करता है, वह चौदहों इन्द्रों की स्थितिपर्यन्त असिपत्रवन नामक नरक में वास करता है। उनमें भी जो ब्राह्मणों की हत्या करता है, वह सौ मन्वन्तर तक वहाँ रहता है । तलवार की धार से उसके शरीर के अंग निरन्तर कटते रहते हैं । आहार न मिलने और यमदूतों से पीटे जाने के कारण वह जोर-जोर से चिल्लाता रहता है। तत्पश्चात् वह सौ जन्मों तक मन्थान नामक कीड़ा, सौ जन्मों तक सूअर, सात जन्मों तक मुर्गा, सात जन्मों तक सियार, सात जन्मों तक बाघ, तीन जन्मों तक भेड़िया और सात जन्मों तक मेंढक होता है, साथ ही वह यमदूत से निरन्तर पीटा भी जाता है। इसके बाद वह भारतवर्ष में महिष होता है, फिर उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ १-५१/२ ॥ हे सति ! जो मनुष्य गाँवों और नगरों को जलाता है, वह क्षुरधार नामक नरक में क्षत-विक्षत अंगोंवाला होकर तीन युगों तक रहता है । तत्पश्चात् वह शीघ्र ही प्रेत होता है और मुँह से आग उगलते हुए पृथ्वी पर घूमता रहता है । फिर वह सात जन्मों तक अपवित्र मल-मूत्र आदि पदार्थों को खाता रहता है और सात जन्मों तक कपोत होता है । तदनन्तर सात जन्मों तक मानवयोनि में उत्पन्न होता है और महान् शूलरोग से पीड़ित रहता है। पुनः वह सात जन्मों तक गलित कुष्ठरोग से ग्रस्त रहता है और तत्पश्चात् वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है ॥ ६–८१/२ ॥ जो मनुष्य दूसरे के कान में अपना मुख लगाकर परायी निन्दा करता है, परदोष निकालकर बड़ी-बड़ी डींग हाँकता है और देवता तथा ब्राह्मण की निन्दा करता है, वह सूचीमुख नामक नरक में तीन युगों तक वास करता है । वहाँ उसके शरीर में निरन्तर सूई चुभायी जाती है । तत्पश्चात् वह सात जन्मों तक बिच्छू, सात जन्मों तक सर्प, सात जन्मों तक वज्रकीट और सात जन्मों तक भस्मकीट की योनि में रहता है। तदनन्तर मानवयोनि में जन्म लेकर वह महाव्याधि से ग्रस्त रहता है, पुनः शुद्ध हो जाता है ॥ ९–१११/२ ॥ जो व्यक्ति गृहस्थों के घर में सेंध लगाकर वस्तुओं की चोरी करता है और गौओं, बकरों तथा भेड़ों को चुरा लेता है; वह गोकामुख नामक नरक में जाता है । वहाँ पर यमदूत के द्वारा पीटा जाता हुआ वह तीन युगों तक वास करता है । तत्पश्चात् वह सात जन्मों तक रोगग्रस्त गौ की योनि में, तीन जन्मों तक भेड़ की योनि में और तीन जन्मों तक बकरे की योनि में जन्म पाता है । तत्पश्चात् वह मानवयोनि में उत्पन्न होता है, उस समय वह नित्य रोगी, दरिद्र, भार्याहीन, बन्धु-बान्धवरहित और दुःखी रहता है, उसके बाद वह शुद्ध हो जाता है ॥ १२–१५ ॥ सामान्य द्रव्यों की चोरी करने वाला नक्रमुख नामक नरक में जाता है। वहाँपर वह यमदूतके द्वारा पीटा जाता हुआ तीन वर्षों तक निवास करता है, तदनन्तर वह सात जन्मों तक रोग से पीड़ित रहने वाला बैल होता है। उसके बाद वह मानवयोनि में जन्म लेकर महान् रोगों से ग्रस्त रहता है और फिर शुद्ध हो जाता है ॥ १६-१७ ॥ जो मनुष्य गायों, हाथियों, घोड़ों और सर्पों का वध करता है; वह महापापी गजदंश नामक नरक में जाता है और तीन युगों तक वहाँ वास करता है । यमदूत उसे हाथी – दाँत से निरन्तर पीटते रहते हैं तत्पश्चात् वह तीन जन्मों तक हाथी, तीन जन्मों तक घोड़े, तीन जन्मों तक गाय और तीन जन्मों तक म्लेच्छ की योनि में पैदा होता है, तदनन्तर वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है ॥ १८-१९१/२ ॥ जो मनुष्य पानी पीती हुई प्यासी गाय को वहाँ से हटा देता है, वह कीड़ों से भरे तथा तप्त जल से युक्त गोमुख नामक नरक में जाता है। वहाँपर वह एक मन्वन्तर की अवधि तक सन्तप्त रहता है। तदनन्तर वह सात जन्मों तक अन्त्य जाति में उत्पन्न होकर गोहीन, महान् रोगी तथा दरिद्र मनुष्य के रूप में रहता है। उसके बाद वह व्यक्ति शुद्ध हो जाता है ॥ २०–२२ ॥ जो भारतवर्ष में शास्त्र – वचन की आड़ लेकर गोहत्या, ब्रह्महत्या, स्त्रीहत्या, भिक्षुहत्या तथा भ्रूणहत्या करता है और जो अगम्या स्त्री के साथ समागम करता है, वह महापापी व्यक्ति चौदह इन्द्रों के स्थितिपर्यन्त कुम्भीपाक नरक में वास करता है । यमदूत के द्वारा वह निरन्तर पीटा जाता है, जिससे उसके शरीर के अंग चूर-चूर हो जाते हैं । उसे कभी आग में गिराया जाता है और कभी काँटों पर लिटाया जाता है। उसे कभी तप्त तेल में, कभी प्रतप्त लोहे में और ताँबे में डाला जाता है, जिससे वह प्रत्येक क्षण तपता रहता है। उसके बाद वह हजार जन्मों तक गीध, सौ जन्मों तक सूअर, सात जन्मों तक कौवा और सातं जन्मों तक सर्प होता है। उसके बाद वह साठ हजार वर्षों तक विष्ठा का कीड़ा और अनेक जन्मों तक बैल होता है । तत्पश्चात् मानवयोनि में जन्म लेकर कोढ़ी तथा दरिद्र होता है ॥ २३–२८ ॥ सावित्री बोली — आतिदेशिकी ब्रह्महत्या तथा गोहत्या कितने प्रकार की होती है ? मनुष्यों के लिये कौन स्त्री अगम्य होती है और कौन मनुष्य सन्ध्या से विहीन है, कौन अदीक्षित है, तीर्थ- प्रतिग्रही कौन है ? कौन ग्रामयाजी द्विज है तथा कौन देवल ब्राह्मण है ? हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ! जो ब्राह्मण शूद्रों के यहाँ रसोइया का काम करता है, प्रमत्त है और शूद्रापति है — इन सभी के समस्त लक्षणों को आप मुझे बतलाइये ॥ २९–३१ ॥ धर्मराज बोले — हे साध्वि ! हे सुन्दरि ! श्रीकृष्ण में तथा उनकी मूर्ति में, अन्य देवताओं में तथा उनकी प्रतिमा में, शिव में तथा शिवलिंग में, सूर्य में तथा सूर्यकान्तमणि में, गणेश में तथा उनकी मूर्ति में और दुर्गा में तथा उनकी प्रतिमा में जो भेदबुद्धि रखता है, उसे [आतिदेशिकी] ब्रह्महत्या लगती है ॥ ३२-३३ ॥ जो व्यक्ति अपने गुरु अपने इष्टदेव तथा जन्म देने वाली माता में भेद मानता है; वह ब्रह्महत्या पाप का भागी होता है ॥ ३४ ॥ जो भगवान् विष्णु के भक्तों तथा दूसरे देवताओं की पूजा करने वाले ब्राह्मणों में भेदबुद्धि करता है, उसे ब्रह्महत्या का पाप लगता है ॥ ३५ ॥ जो मनुष्य ब्राह्मण के चरणोदक तथा शालग्राम के जल में भेदबुद्धि करता है, वह ब्रह्महत्या के पाप का भागी होता है ॥ ३६ ॥जो मनुष्य शिव के नैवेद्य तथा भगवान् विष्णु के नैवेद्य में भेदबुद्धि रखता है, वह ब्रह्महत्या के पाप का भागी होता है ॥ ३७ ॥ जो व्यक्ति सर्वेश्वरों के भी ईश्वर, सभी कारणों के कारण, सबके आदिस्वरूप, सभी देवताओं के आराध्य, सबकी अन्तरात्मा, एक होते हुए भी अपनी योगमाया के प्रभाव से अनेक रूप धारण करने में सक्षम तथा निर्गुण श्रीकृष्णमें और ईशान शिवजी में भेद करता है; उसे ब्रह्महत्या का पाप लगता है ॥ ३८-३९ ॥ जो मनुष्य भगवती शक्ति की उपासना करने वाले के प्रति द्वेषभाव रखता है तथा शक्ति – शास्त्रों की निन्दा करता है, उसे ब्रह्महत्या का पाप लगता है ॥ ४० ॥ जो मनुष्य वेदों में प्रतिपादित रीति से पितृपूजन तथा देवार्चन का त्याग कर देता है और निषिद्ध विधि से कर्म सम्पन्न करता है, वह ब्रह्महत्या के पाप का भागी होता है ॥ ४१ ॥ जो भगवान् हृषीकेश और उनके मन्त्रों की उपासना करनेवालों की निन्दा करता है और जो पवित्रों के भी पवित्र, ज्ञानानन्द, सनातन, वैष्णवों के परम आराध्य तथा देवताओं के सेव्य परमेश्वर की पूजा नहीं करते; अपितु निन्दा करते हैं, वे ब्रह्महत्या के पाप के भागी होते हैं ॥ ४२-४३ ॥ जो कारण ब्रह्मरूपिणी, सर्वशक्तिस्वरूपा, सर्वजननी, सर्वदेवस्वरूपिणी, सबके द्वारा वन्दित तथा सर्वकारण-रूपिणी मूलप्रकृति महादेवी की सदा निन्दा करते हैं; उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लगता है ॥ ४४-४५ ॥ जो मनुष्य पुण्यदायिनी कृष्णजन्माष्टमी, रामनवमी, शिवरात्रि, एकादशी और रविवार — इन पाँच पुण्य पर्वों के अवसरपर व्रत नहीं करते, वे चाण्डाल से भी बढ़कर पापी हैं और उन्हें ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥ ४६-४७ ॥ जो इस भारतवर्ष में अम्बुवाचीयोग (आर्द्रा नक्षत्र के प्रथम चरण) – में पृथ्वी खोदते हैं या जल में शौच आदि करते हैं, उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लगता है ॥ ४८ ॥ जो मनुष्य अपने गुरु, माता, पिता, साध्वी भार्या, पुत्र तथा अनिन्दनीय आचरण करने वाली पुत्री का भरण-पोषण नहीं करता; उसे ब्रह्महत्या का पाप लगता है ॥ ४९ ॥ जिसका विवाह न हुआ हो, जिसने पुत्र न देखा हो, अर्थात् पुत्रवान् न हो तथा जो भगवान् श्रीहरि की भक्ति से विमुख हो, वह ब्रह्महत्या के पाप का भागी होता है ॥ ५० ॥ जो मनुष्य भगवान् श्रीहरि को नैवेद्य अर्पण किये बिना भोजन करता है, विष्णु का नित्य पूजन नहीं करता और पवित्र पार्थिव लिंग का पूजन नहीं करता; उसे ब्रह्महत्यारा कहा गया है ॥ ५१ ॥ जो किसी मनुष्य को गाय पर प्रहार करते हुए देखकर उसे नहीं रोकता और जो गाय तथा ब्राह्मण के बीच से निकलता है, वह गोहत्या के पाप का भागी होता है ॥ ५२ ॥ जो मूर्ख ब्राह्मण गायों को डंडों से पीटता है और बैल पर सवारी करता है, उसे प्रतिदिन गोहत्या का पाप लगता है ॥ ५३ ॥ जो व्यक्ति गायों को जूठा अन्न खिलाता है, बैल की सवारी करने वाले को भोजन कराता है और बैल की सवारी करने वाले का अन्न खाता है; उसे निश्चितरूप से गोहत्या का पाप लगता है ॥ ५४ ॥ जो ब्राह्मण शूद्रापति के यहाँ यज्ञ कराता है और उसका अन्न ग्रहण करता है, वह एक सौ गोहत्या के पाप का भागी होता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५५ ॥ जो मनुष्य पैर से अग्नि का स्पर्श करता है, गायों को पैर से मारता है और स्नान करके बिना पैर धोये देवालय में प्रवेश करता है; उसे गोहत्या का पाप लगता है ॥ ५६ ॥ जो व्यक्ति गीले पैर भोजन करता है, गीले पैर सोता है और सूर्योदय के समय भोजन करता है; उसे अवश्य ही गोहत्या का पाप लगता है ॥ ५७ ॥ जो द्विज पति – पुत्रहीन स्त्री का तथा योनिजीवी व्यक्ति का अन्न खाता है और जो त्रिकाल सन्ध्या से विहीन है, उसे भी गोहत्या का पाप लगता है ॥ ५८ ॥ जो स्त्री अपने पति तथा देवता में भेदबुद्धि रखती है तथा कटु वचनों से अपने पति को पीड़ित करती है, उसे निश्चितरूप से गोहत्या का पाप लगता है ॥ ५९ ॥ जो मनुष्य गोचरभूमि को जोतकर उसमें अनाज बोता है या तालाब अथवा दुर्ग में फसल उगाता है, उसे निश्चय ही गोहत्या का पाप लगता है ॥ ६० ॥ जो व्यक्ति पुत्र के मोह से अथवा अज्ञान के कारण गोवध के प्रायश्चित्त में व्यतिक्रम करता है, उसे निश्चित- रूप से गोहत्या का पाप लगता है ॥ ६१ ॥ जो गाय का स्वामी अराजकता तथा दैवोपद्रव के अवसर पर गाय की रक्षा नहीं करता तथा जो गाय को पीड़ा पहुँचाता है, उस मूर्ख को निश्चय ही गोहत्या का पाप लगता है ॥ ६२ ॥ जो मनुष्य प्राणियों, देवमूर्ति, अग्नि, जल, नैवेद्य, पुष्प तथा अन्न को लाँघता है; वह निश्चितरूप से गोहत्या के पाप का भागी होता है ॥ ६३ ॥ मेरे पास कुछ नहीं है — ऐसा जो सदा कहता है, झूठ बोलता है, दूसरों को ठगता है और देवता तथा गुरु द्वेष करता है, उसे गोहत्या का पाप अवश्य लगता है ॥ ६४ ॥ हे साध्वि ! जो मनुष्य देवप्रतिमा, गुरु तथा ब्राह्मण को देखकर आदरपूर्वक प्रणाम नहीं करता, उसे निश्चित-रूप से गोहत्या का पाप लगता है ॥ ६५ ॥ जो ब्राह्मण प्रणाम करनेवाले को क्रोधवश आशीर्वाद नहीं देता और विद्यार्थी को विद्या प्रदान नहीं करता, उसे अवश्य ही गोहत्या का पाप लगता है ॥ ६६ ॥ [ हे साध्वि !] यह मैंने आतिदेशिकी ब्रह्महत्या और गोहत्या का वर्णन कर दिया, अब मैं मनुष्यों के लिये गम्य स्त्री के विषय में तुमसे कह रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो ॥ ६७ ॥ सभी मनुष्यों को केवल अपनी भार्या के साथ गमन करना चाहिये — यह वेदों का आदेश है। उसके अतिरिक्त अन्य स्त्री अगम्य है — ऐसा वेदवेत्ताओं ने कहा है ॥ ६८ ॥ हे सुन्दरि ! यह सब सामान्य नियम कहा गया, अब कुछ विशेष नियमों को सुनो। जो स्त्रियाँ विशेषरूप से गमन करने योग्य नहीं हैं, उनके विषय में बता रहा हूँ; ध्यानपूर्वक सुनो ॥ ६९ ॥ पतिव्रते ! शूद्रों के लिये ब्राह्मण की पत्नी और ब्राह्मणों के लिये शूद्र की पत्नी अति अगम्य तथा निन्द्य है – ऐसा लोक और वेद में प्रसिद्ध है ॥ ७० ॥ ब्राह्मणी के साथ समागम करने से शूद्र एक सौ गोहत्या के पाप का भागी होता है और वह निश्चितरूप से कुम्भीपाक नरक प्राप्त करता है तथा उस शूद्र के साथ ब्राह्मणी भी कुम्भीपाक नरक में जाती है । अतः शूद्रों के लिये ब्राह्मण की स्त्री तथा ब्राह्मणों के लिये शूद्र की स्त्री सर्वथा अगम्य है ॥ ७११/२ ॥ यदि कोई विप्र शूद्रा नारी का सेवन करता है तो वह वृषलीपति कहा जाता है । वह विप्रजाति से च्युत हो जाता है और वह चाण्डाल से भी बढ़कर अधम कहा गया है। उसके द्वारा दिया गया पिण्ड विष्ठातुल्य तथा तर्पण मूत्र के समान हो जाता है। उसके द्वारा प्रदत्त पिण्ड आदि पितरों तथा देवताओं को प्राप्त नहीं होता । करोड़ों जन्मों में पूजन तथा तप करके उस ब्राह्मण के द्वारा अर्जित किया गया पुण्य शूद्रा नारी के साथ गमन करने से नष्ट हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है। सुरापान करने वाला, वेश्याओं का अन्न खाने वाला, शूद्रा नारी का सेवन करने वाला, तप्त मुद्रा तथा तप्त त्रिशूल आदि से दागे गये शरीर वाला तथा एकादशी को अन्न ग्रहण करने वाला ब्राह्मण कुम्भीपाक नरक में जाता है ॥ ७२–७६ ॥ ब्रह्माजी ने गुरु की पत्नी, राजा की पत्नी, सौतेली माँ, पुत्री, पुत्रवधू, सास, गर्भवती स्त्री, बहन, पतिव्रता स्त्री, सहोदर भाई की पत्नी, मामी, दादी, नानी, मौसी, भतीजी, शिष्या, शिष्य की पत्नी, भाँजे की स्त्री और भाई के पुत्र की पत्नी को अति अगम्या कहा है। जो नराधम काममोहित होकर इनके साथ गमन करता है, उसे वेदों में मातृगामी कहा गया है और उसे सौ ब्रह्महत्या का पाप लगता है । वह कोई भी कर्म करने का पात्र नहीं रह जाता, वह अस्पृश्य है और लोक में तथा वेद में सब जगह उसकी निन्दा होती है । वह महापापी अत्यन्त क्लेशदायक कुम्भीपाक नरक में जाता है ॥ ७७–८१ ॥ जो शास्त्रोक्त विधान से सन्ध्या नहीं करता अथवा सन्ध्या करता ही नहीं और जो तीनों कालों की सन्ध्या से रहित है, वह द्विज सन्ध्याहीन द्विज कहा गया है ॥ ८२ ॥ जो अहंकार के कारण विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य तथा गणेश — इन देवों के मन्त्र की दीक्षा ग्रहण नहीं करता, उसे ‘अदीक्षित’ कहा गया है ॥ ८३ ॥ गंगा के प्रवाह के दोनों ओर की चार हाथ की चौड़ी भूमि को गंगागर्भ कहते हैं; वहींपर भगवान् नारायण निवास करते हैं । उस नारायणक्षेत्र में मृत्यु को प्राप्त होने वाला व्यक्ति भगवान् श्रीहरि के धाम में पहुँच जाता है ॥ ८४ ॥ वाराणसी, बदरिकाश्रम, गंगासागरसंगम, पुष्करक्षेत्र, हरिहरक्षेत्र, प्रभासक्षेत्र, कामाख्यापीठ, हरिद्वार, केदारक्षेत्र, मातृपुर, सरस्वती नदी के तट, पवित्र वृन्दावन, गोदावरीनदी, कौशिकीनदी, त्रिवेणीसंगम और हिमालय — इन तीर्थों में जो मनुष्य कामनापूर्वक दान लेता है; वह तीर्थप्रतिग्राही है और इस दानग्रहण के कारण वह कुम्भीपाक नरक जाता है ॥ ८५–८८ ॥ जो ब्राह्मण शूद्रों की सेवा करता है तथा उनके यहाँ यज्ञ आदि कराता है, उसे ग्रामयाजी कहा गया है। देवता की पूजा करके अपनी आजीविका चलाने वाला ब्राह्मण देवल कहा गया है । शूद्र के यहाँ रसोई बनाकर आजीविका चलाने वाले विप्र को सूपकार कहा गया है। सन्ध्या तथा पूजनकर्म से विमुख विप्र को प्रमत्त तथा पतित कहा गया है ॥ ८९-९० ॥ हे कल्याणि ! वृषलीपति के समस्त लक्षणों का वर्णन मैंने कर दिया है । ये सब महापापी हैं और वे कुम्भीपाक नामक नरक में जाते हैं । [ हे साध्वि ! ] जो पापी दूसरे कुण्डों में जाते हैं, उनके विषय में अब मैं तुम्हें बता रहा हूँ; ध्यानपूर्वक सुनो ॥ ९१ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध के ‘नारायण-नारद- संवाद में सावित्री-उपाख्यान के अन्तर्गत नानाकर्मविपाकफलवर्णन’ नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥ Content is available only for registered users. 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