श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-35
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
पैंतीसवाँ अध्याय
विभिन्न पापकर्मों से प्राप्त होने वाली विभिन्न योनियों का वर्णन
नानाकर्मविपाकफलकथनम्

धर्मराज बोले — हे साध्वि ! देवताओं की उपासना के बिना कर्म-बन्धन से मुक्ति नहीं होती । शुद्ध कर्म का बीज शुद्ध होता है और कुकर्म से नरक की प्राप्ति होती है ॥ १ ॥ हे पतिव्रते ! जो ब्राह्मण पुंश्चली स्त्री का अन्न खाता है अथवा जो इसके साथ भोग करता है, वह मरने के पश्चात् अत्यन्त कष्टदायक कालसूत्र नामक नरक में जाता है और उस कालसूत्र में सौ वर्षों तक पड़ा रहता है। तत्पश्चात् मानवयोनि में जन्म लेकर वह सदा रोगी रहता है। उसके बाद वह द्विज शुद्ध हो जाता है ॥ २-३ ॥ एक पतिवाली स्त्री पतिव्रता तथा दो पतिवाली स्त्री कुलटा कही गयी है। तीन पतिवाली स्त्री धर्षिणी, चार पति वाली पुंश्चली, पाँच-छः पति वाली वेश्या तथा सात-आठ पति वाली स्त्री को पुंगी जानना चाहिये। इससे अधिक पुरुषों से सम्बन्ध रखने वाली स्त्री को महावेश्या कहा गया है, वह सभी जाति लोगों के लिये अस्पृश्य है ॥ ४-५ ॥

जो द्विज कुलटा, धर्षिणी, पुंश्चली, पुंगी, वेश्या तथा महावेश्या के साथ समागम करता है; वह निश्चित – रूप से मत्स्योद नामक नरक में जाता है। उस नरक में कुलटागामी सौ वर्षों तक, धर्षिणीगामी उससे चार गुने अर्थात् चार सौ वर्षों तक, पुंश्चलीगामी छ: सौ वर्षों तक, वेश्यागामी आठ सौ वर्षों तक और पुंगीगामी एक हजार वर्षों तक निवास करता है, महावेश्या के साथ गमन करने वाले कामुक व्यक्ति को दस हजार वर्षों तक वहाँ रहना पड़ता है; इसमें संशय नहीं है। वहाँ पर यमदूत से पीटा जाता हुआ वह तरह- तरह की यातना भोगता है । उसके बाद कुलटागामी तीतर, धर्षिणीगामी कौवा, पुंश्चलीगामी कोयल, वेश्यागामी भेड़िया और पुंगीगामी सूअर की योनि में भारतवर्ष में सात जन्मों तक पैदा होते रहते हैं ऐसा कहा गया है। महावेश्या से समागम करने वाला मनुष्य सेमर का वृक्ष होता है ॥ ६–१०१/२

जो अज्ञानी मनुष्य चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के अवसर पर भोजन करता है, वह अन्न के दानों की संख्या के बराबर वर्षों तक अरुन्तुद नामक नरककुण्ड में जाता है। तत्पश्चात् वह मनुष्ययोनि में उत्पन्न होता है। उस समय वह उदररोग से पीड़ित, प्लीहारोग से ग्रस्त, काना तथा दन्तविहीन हो जाता है; उसके बाद उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ११-१२१/२

जो अपनी कन्या का वाग्दान करके उसे किसी अन्य पुरुष को प्रदान कर देता है, वह पांसुकुण्ड नामक नरक में सौ वर्षों तक वास करता है और उसी धूलराशि का भोजन करता है । हे साध्वि ! जो मनुष्य अपनी कन्या के धन का हरण करता है, वह पांशुवेष्ट नामक नरककुण्ड में सौ वर्षों तक वास करता है । वह वहाँ बाणों की शय्या पर लेटा रहता है और मेरे दूत उसे पीटते रहते हैं ॥ १३-१४१/२

विप्र भक्तिपूर्वक पार्थिव शिवलिंग की पूजा नहीं करता, वह त्रिशूल धारण करने वाले भगवान् शिव के प्रति अपराधजन्य पाप के कारण शूलप्रोत नामक अत्यन्त भयानक नरककुण्ड में जाता है । वहाँ सौ वर्ष तक रहने के पश्चात् वह सात जन्मों तक वन्य पशु होता है । उसके बाद सात जन्मों तक देवल होता है, फिर उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ १५-१६१/२

जो किसी विप्र को कुण्ठित कर देता है और उसके भय से वह काँपने लगता है, वह उस द्विज के शरीर में जितने रोम होते हैं, उतने वर्षों तक प्रकम्पनकुण्ड में निवास करता है ॥ १७१/२

कोपाविष्ट मुखवाली जो स्त्री अपने पति को क्रोधभरी दृष्टि से देखती है और कटु वाणी में उससे बात करती है, वह उल्मुक नामक नरककुण्ड में जाती है। वहाँ पर मेरे दूत उसके मुख में निरन्तर प्रज्वलित अंगार डालते रहते हैं और उसके सिर पर डंडे से प्रहार करते रहते हैं । उसके पति के शरीर में जितने रोम होते हैं, उतने वर्षों तक उस स्त्री को उस नरक- कुण्ड में रहना पड़ता है। उसके बाद मानवजन्म प्राप्त करके वह सात जन्मों तक विधवा रहती है । विधवा का जीवन व्यतीत करने के पश्चात् वह रोग से ग्रस्त हो जाती है, तत्पश्चात् उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ १८–२०१/२

जो ब्राह्मणी शूद्र के साथ भोग करती है, वह अन्धकूप नामक नरककुण्ड में जाती है । अन्धकारमय तथा तप्त शौचजलयुक्त उस कुण्ड में वह दिन-रात पड़ी रहती है और उसी तप्त शौचजल का भोजन करती है। मेरे दूतों के द्वारा पीटी जाती हुई वह वहाँ अत्यन्त सन्तप्त रहती है । वह स्त्री चौदह इन्द्रों की स्थितिपर्यन्त उस शौचजल में डूबी रहती है । तत्पश्चात् वह एक हजार जन्म तक कौवी, एक सौ जन्म तक सूकरी, एक सौ जन्म तक सियारिन, एक सौ जन्म तक कुक्कुटी, सात जन्म तक कबूतरी और सात जन्म तक वानरी होती है। इसके बाद वह भारतवर्ष में सर्वभोग्या चाण्डाली होती है, उसके बाद वह व्यभिचारिणी धोबिन होती है और सदा यक्ष्मारोग से ग्रस्त रहती है। तत्पश्चात् वह कोढ़रोग से युक्त तैलकारी ( तेलिन) होती है और उसके बाद शुद्ध हो जाती है ॥ २१-२५१/२

वेश्या वेधनकुण्ड में, पुंगी दण्डताडनकुण्ड में, महावेश्या जलरन्ध्रकुण्ड में, कुलटा देहचूर्णकुण्ड में, स्वैरिणी दलनकुण्ड में और धृष्टा शोषणकुण्ड में वास करती है । हे साध्वि ! मेरे दूत से पीटी जाती हुई वह वहाँ यातना भोगती रहती है । उसे एक मन्वन्तर तक निरन्तर विष्ठा और मूत्र का भक्षण करना पड़ता है। उसके बाद वह एक लाख वर्ष तक विष्ठा के कीट के रूप में रहती है और फिर उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ २६–२८१/२

यदि ब्राह्मण किसी परायी ब्राह्मणी के साथ, क्षत्रिय क्षत्राणी के साथ, वैश्य किसी वैश्या के साथ और शूद्र किसी शूद्रा के साथ भोग करता है; तो अपने ही वर्ण की परायी स्त्रियों के साथ भोग करने वाले वे पुरुष कषाय नामक नरक में जाते हैं। वहाँ वे कषाय (खारा) तथा गर्म जल पीते हुए सौ वर्ष तक पड़े रहते हैं। उसके बाद वे ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि पुरुष शुद्ध होते हैं । उसी प्रकार यातनाएँ भोगकर वे ब्राह्मणी आदि स्त्रियाँ भी शुद्ध होती हैं — ऐसा पितामह ब्रह्मा ने कहा है ॥ २९–३११/२

हे पतिव्रते ! जो क्षत्रिय अथवा वैश्य किसी ब्राह्मणी के साथ समागम करता है, वह मातृगामी होता है और वह शूर्प नामक नरक में वास करता है । ब्राह्मणी सहित वह मनुष्य सूप के आकार के कीड़ों के द्वारा नोचा जाता है। वहाँ वह अत्यन्त गर्म मूत्र का सेवन करता है और मेरे दूत उसे पीटते हैं । वहाँ पर वह चौदह इन्द्रों के आयुपर्यन्त यातना भोगता है । उसके बाद वह सात जन्मों तक सूअर और सात जन्मोंतक बकरा होता है, तत्पश्चात् वह शुद्ध हो जाता है ॥ ३२-३४१/२

जो मनुष्य हाथ में तुलसीदल लेकर की गयी प्रतिज्ञा का पालन नहीं करता अथवा मिथ्या शपथ लेता है, वह ज्वालामुख नामक नरक में जाता है। उसी प्रकार जो मनुष्य अपने हाथ में गंगाजल, शालग्रामशिला अथवा किसी देवता की प्रतिमा लेकर की गयी प्रतिज्ञा का पालन नहीं करता, वह भी ज्वालामुख नरक में जाता है। जो मनुष्य किसी दूसरे व्यक्ति के दाहिने हाथ में अपना दायाँ हाथ रखकर अथवा किसी देवालय में स्थित होकर की गयी प्रतिज्ञा को पूर्ण नहीं करता, वह भी ज्वालामुख नरक में जाता है। जो द्विज किसी ब्राह्मण अथवा गाय का स्पर्श करके की गयी प्रतिज्ञा का पालन नहीं करता, वह ज्वालामुख नामक नरक में जाता है । उसी तरह जो मनुष्य अपने मित्र के साथ द्रोह करता है, कृतघ्न है, विश्वासघात करता है और झूठी गवाही देता है, वह भी ज्वालामुख नरक में जाता है। ये लोग उस नरक में चौदह इन्द्रों की स्थितिपर्यन्त निवास करते हैं । मेरे दूत अंगारों से उन्हें दागते हैं और बहुत पीटते हैं ॥ ३५-४०१/२

तुलसी का स्पर्श करके मिथ्या शपथ लेने वाला सात जन्म तक चाण्डाल होता है, उसके बाद उसकी शुद्धि होती है। गंगाजल का स्पर्श करके की गयी प्रतिज्ञा का पालन न करने वाला पाँच जन्म तक म्लेच्छ होता है, उसके बाद वह शुद्ध होता है । हे सुन्दरि ! शालग्रामशिला का स्पर्श करके की गयी प्रतिज्ञा का पालन न करने वाला सात जन्म तक विष्ठा का कीड़ा होता है। किसी देवप्रतिमा का स्पर्श करके जो मिथ्या प्रतिज्ञा करता है, वह सात जन्म तक ब्राह्मण- गृहस्थ के घर कीड़ा होता है, इसके बाद उसकी शुद्धि हो जाती है । किसी के दाहिने हाथ पर अपना दाहिना हाथ रखकर मिथ्या शपथ लेने वाला सात जन्म तक सर्प होता है । उसके बाद ब्रह्मज्ञानविहीन मानव होता है, पुनः शुद्ध हो जाता है । जो देवमन्दिर में मिथ्या वचन बोलता है, वह सात जन्म तक देवल होता है । ब्राह्मण आदि को स्पर्श करके झूठी प्रतिज्ञा करने वाला निश्चितरूप से बाघयोनि में जन्म लेता है । उसके बाद वह तीन जन्म तक गूँगा और फिर तीन जन्म तक बहरा होता है । वह भार्यारहित, बन्धु-बान्धवों से विहीन तथा निःसन्तान रहता है, तत्पश्चात् शुद्ध हो जाता है। जो मित्र के साथ द्रोह करता है, वह नेवला होता है; जो दूसरों का उपकार नहीं मानता, वह गैंडा होता है; जो विश्वासघाती होता है, वह सात जन्म तक भारतवर्ष में बाघ होता है और जो झूठी गवाही देता है, वह सात जन्म तक मेढक होता है। वह अपनी सात पीढ़ी पहले तथा सात पीढ़ी बादके पुरुषोंका अधःपतन करा देता है ॥ ४१–४७१/२

जो द्विज नित्यक्रिया से विहीन तथा जड़ता से युक्त है, वेदवाक्योंमें जिसकी आस्था नहीं है, जो कपटपूर्वक उनका सदा उपहास करता है, जो व्रत तथा उपवास नहीं करता और दूसरों के उत्तम विचारों की निन्दा करता है, वह धूम्रान्ध नामक नरक में धूम का ही भक्षण करते हुए एक सौ वर्षतक निवास करता है । उसके बाद वह क्रम से सौ जन्मों तक अनेक प्रकार का जलजन्तु होता है । तत्पश्चात् वह अनेक प्रकार की मत्स्ययोनि में जन्म लेता है, उसके बाद उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ४८-५०१/२

जो मनुष्य देवता तथा ब्राह्मण की सम्पत्ति का उपहास करता है, वह अपनी दस पीढ़ी पहले तथा दस पीढ़ी बाद के पुरुषों का पतन कराकर स्वयं धूम्र तथा अन्धकार से युक्त धूम्रान्ध नामक नरक में जाता है। वहाँ पर धुएँ से कष्ट सहते हुए तथा धुएँ का ही भोजन करते हुए वह चार सौ वर्ष तक रहता है । उसके बाद वह भारतवर्ष में सात जन्म तक चूहे की योनि में जन्म पाता है । तदनन्तर वह अनेक प्रकार के पक्षियों तथा कीड़ों की योनि में जाता है, उसके बाद अनेकविध वृक्ष तथा पशु होने के अनन्तर वह मनुष्ययोनि में जन्म ग्रहण करता है ॥ ५१-५४ ॥ जो विप्र ज्योतिषविद्या से अपनी आजीविका चलाता है, वैद्य होकर चिकित्सावृत्ति से आजीविका चलाता है, लाख – लोहा आदि का व्यापार करता और रस आदि का विक्रय करता है; वह नागों से व्याप्त नागवेष्टन नामक नरक में जाता है और नागों से आबद्ध होकर अपने शरीर के रोमप्रमाण वर्षों तक वहाँ निवास करता है, तत्पश्चात् उसे नानाविध पक्षी – योनियाँ मिलती हैं और उसके बाद वह मनुष्य होता है, तत्पश्चात् वह सात जन्म तक गणक और सात जन्म तक वैद्य होता है । पुनः गोप, कर्मकार और रंगकार होकर शुद्ध होता है ॥ ५५-५७१/२

हे पतिव्रते ! मैंने प्रसिद्ध नरककुण्डों का वर्णन कर दिया। इनके अतिरिक्त और भी छोटे-छोटे कुण्ड हैं, जो प्रसिद्ध नहीं हैं, अपने कर्मों का फल भोगने के लिये पापी लोग वहाँ जाते हैं और विविध योनियों में भ्रमण करते रहते हैं, अब तुम और क्या सुनना चाहती हो ? ॥ ५८-५९ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘नानाकर्मविपाकफलकथन’ नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥

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