श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-38
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-अष्टत्रिंशोऽध्यायः
अड़तीसवाँ अध्याय
धर्मराज का सावित्री से भगवती की महिमा का वर्णन करना और उसके पति को जीवनदान देना
सावित्र्युपाख्यानवर्णनम्

सावित्री बोली — [ हे प्रभो ! ] आप मुझे भगवती की भक्ति प्रदान कीजिये; वह देवीभक्ति समस्त तत्त्वों का तत्त्व, मनुष्यों के लिये मुक्तिद्वार का मूल कारण, नरकरूपी समुद्र से तारनेवाली, मुक्ति के तत्त्वों का आधार, सभी अशुभों का नाश करने में समर्थ, समस्त कर्मवृक्षों को काटने वाली तथा मनुष्य के द्वारा किये गये पापों का हरण करने वाली है ॥ १-२ ॥ [हे भगवन्!] मुक्ति कितने प्रकार की होती है और उनके क्या लक्षण हैं ? देवीभक्ति के स्वरूप, भक्ति भेद तथा किये हुए कर्मों के भोग के नाश के विषय में मुझे बताइये । हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! ब्रह्मा के द्वारा निर्मित स्त्रीजाति तत्त्वज्ञान से रहित होती है, अतः आप संक्षेप में मुझे सारभूत बात बताइये ॥ ३-४ ॥ हे प्रभो ! दान, यज्ञ, तीर्थ, स्नान, व्रत और तप ये सब अज्ञानी मनुष्य को ज्ञान देने से होने वाले पुण्यफल की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं । पिता की अपेक्षा माता सौ गुनी श्रेष्ठ हैं, यह निश्चित है, किंतु ज्ञान प्रदान करने वाला गुरु माता से भी सौ गुना अधिक श्रेष्ठ होता है ॥ ५-६ ॥

धर्मराज बोले — हे वत्से ! तुम्हारे मन में पहले जो भी अभिलषित वर था, वह सब मैं दे चुका हूँ, अब जो तुम भगवती की भक्ति चाहती हो, वह भी मेरे वर के प्रभाव से तुम्हें प्राप्त हो जाय ॥ ७ ॥ हे कल्याणि ! तुम जो श्रीदेवी का गुणकीर्तन सुनना चाहती हो, वह उसे करने वाले, सुनने वाले तथा इसके विषय में पूछनेवाले इन सभी के कुल का उद्धार कर देता है ॥ ८ ॥ भगवान् शेषनाग अपने हजार मुखों से उसे बता नहीं सकते और मृत्युंजय महादेव भी अपने पाँच मुख से उसका वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं ॥ ९ ॥ चारों वेदों की उत्पत्ति तथा सम्पूर्ण लोकों का विधान करने वाले ब्रह्मा अपने चार मुखों से उसका वर्णन नहीं कर सकते, उसी प्रकार सर्वज्ञ विष्णु भी उसका वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं ॥ १० ॥ भगवान् कार्तिकेय अपने छः मुखों से उसका वर्णन नहीं कर सकते और योगीश्वरों के गुरु के भी गुरु श्रीगणेश भी भगवती की महिमा का वर्णन कर सकने में समर्थ नहीं हैं यह निश्चित है ॥ ११ ॥

सम्पूर्ण शास्त्रों के सारभूत चारों वेद तथा उन्हें जानने वाले जो विद्वान् हैं ये सब उन भगवती के गुणों की एक कला तक को नहीं जानते ॥ १२ ॥ सरस्वती भी जड़ के समान होकर उन भगवती के गुणों का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं। सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, धर्म, कपिल तथा सूर्य ये लोग तथा ब्रह्माजी के अन्य बुद्धिमान् पुत्रगण भी उनकी महिमा का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं, तो फिर अन्य जड़बुद्धिवाले लोगों की बात ही क्या ! ॥ १३-१४ ॥ श्रीदेवी के जिन गुणों का वर्णन करने में सिद्ध, मुनीन्द्र तथा योगीजन भी समर्थ नहीं हैं, उनका वर्णन करने में हम तथा अन्य लोग भला किस प्रकार समर्थ हो सकते हैं? ॥ १५ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवगण भगवती के जिस चरणकमल का ध्यान करते हैं, वह उनके भक्तों के लिये तो अति सुगम है, किंतु अन्य लोगों के लिये अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १६ ॥ कोई व्यक्ति उन भगवती के पवित्र गुण- कीर्तन को कुछ-कुछ जान सकता है, किंतु ब्रह्मज्ञानी ब्रह्माजी उससे अधिक जानते हैं । ज्ञानियों के भी गुरु गणेशजी उन ब्रह्मा से भी कुछ विशेष जानते हैं और सब कुछ जानने वाले भगवान् शिव सबसे अधिक जानते हैं ॥ १७-१८ ॥ पूर्वकाल में गोलोक में अत्यन्त निर्जन वन में रासमण्डल के मध्य परमेश्वर श्रीकृष्ण ने उन शिव को ज्ञान प्रदान किया था। वहीं पर भगवान् श्रीकृष्ण ने उन्हें भगवती के कुछ पवित्र गुण बताये थे ॥ १९१/२

तत्पश्चात् स्वयं भगवान् शिव ने शिवलोक में धर्म के प्रति उसका उपदेश किया था । उसके बाद सूर्य के पूछने पर धर्म ने उनसे भगवती के गुणों का वर्णन किया था । हे साध्वि ! मेरे पिता सूर्य ने भी तपस्या के द्वारा उन देवी की आराधना करके उस ज्ञान को प्राप्त किया था ॥ २०-२१ ॥ हे सुव्रते ! पूर्वसमय में मेरे पिताजी यत्नपूर्वक मुझे अपना राज्य देना चाहते थे, किंतु मैंने स्वीकार नहीं किया। उस समय वैराग्ययुक्त होने के कारण मैं तपस्या के लिये जाना चाहता था । तब पिताजी ने मेरे सामने भगवती के गुणों का वर्णन किया। उस समय मैंने उनसे जो प्राप्त किया, उसी परम दुर्लभ तत्त्व को तुम्हें बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो ॥ २२-२३ ॥

हे वरानने! जैसे आकाश अपना ही अन्त नहीं जानता, उसी प्रकार वे भगवती भी अपने सभी गुण नहीं जानतीं, तो अन्य व्यक्ति की बात ही क्या है ! ॥ २४ ॥ सर्वात्मा, सबके भगवान्, सभी कारणों के भी कारण, सर्वेश्वर, सबके आदिरूप, सर्वज्ञ, परिपालक, नित्यस्वरूप, नित्य देहवाले, नित्यानन्द, निराकार, स्वतन्त्र, निराशंक, निर्गुण, निर्विकार, अनासक्त, सर्वसाक्षी, सर्वाधार, परात्पर तथा मायाविशिष्ट परमात्मा ही मूलप्रकृति के रूप में अभिव्यक्त हो जाते हैं; सभी प्राकृत पदार्थ उन्हीं से आविर्भूत हैं ॥ २५–२७ ॥ स्वयं परम पुरुष ही प्रकृति हैं । वे दोनों परस्पर उसी प्रकार अभिन्न हैं, जैसे अग्नि से उसकी शक्ति कुछ भी भिन्न नहीं है ॥ २८ ॥ वे ही सच्चिदानन्दस्वरूपिणी शक्ति महामाया हैं। वे निराकार होते हुए भी भक्तों पर कृपा करने के लिये रूप धारण करती हैं ॥ २९ ॥ उ

न भगवती ने सर्वप्रथम गोपालसुन्दरी का रूप धारण किया था। वह रूप अत्यन्त कोमल, सुन्दर तथा मनोहर था । किशोर गोपवेषवाला वह रूप नवीन मेघ के समान श्यामवर्णका था । वह करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर था, वह मनोहर लीलाधामस्वरूप था, उस विग्रह के नेत्र शरद् ऋतु के मध्याह्नकालीन कमलों की शोभा को तुच्छ बना देने वाले थे, मुख शरत्पूर्णिमा के करोड़ों चन्द्रमा की शोभा को तिरस्कृत कर देने वाला था, अमूल्य रत्नों से निर्मित अनेक प्रकार के आभूषणों से उनका विग्रह सुशोभित था, मुसकानयुक्त मुखमण्डल वाला वह विग्रह निरन्तर अमूल्य पीताम्बर से शोभित हो रहा था, परब्रह्मस्वरूप वह विग्रह ब्रह्मतेज से प्रकाशित था, वह रूप देखने में बड़ा ही सुखकर था, वह शान्तरूप राधा को अत्यधिक प्रसन्न करनेवाला था, मुसकराती हुई गोपियाँ उस रूप को निरन्तर निहार रही थीं, वह भगवद्विग्रह रासमण्डल के मध्य रत्नजटित सिंहासन पर विराजमान था, उनकी दो भुजाएँ थीं, वे वंशी बजा रहे थे, उन्होंने वनमाला धारण कर रखी थी, उनके वक्ष:स्थल पर मणिराज श्रेष्ठ कौस्तुभमणि निरन्तर प्रकाशित हो रही थी, उनका विग्रह कुमकुम- अगुरु- कस्तूरी से मिश्रित दिव्य चन्दन से लिप्त था, वह चम्पा और मालती की मनोहर मालाओं से सुशोभित था, वह कान्तिमान् चन्द्रमा की शोभा से परिपूर्ण तथा मनोहर चूडामणि से सुशोभित था । भक्तिरस से आप्लावित भक्तजन उनके इसी रूप का ध्यान करते हैं ॥ ३०–३८ ॥

जगत् की रचना करने वाले ब्रह्मा उन्हीं के भय से सृष्टि का विधान करते हैं तथा कर्मानुसार सभी प्राणियों के कर्मों का उल्लेख करते हैं और उन्हीं की आज्ञा से वे मनुष्यों को तपों तथा कर्मों का फल देते हैं । उन्हीं के भय से सभी प्राणियों के रक्षक भगवान् विष्णु सदा रक्षा करते हैं और उन्हीं के भय से कालाग्नि के समान भगवान् रुद्र सम्पूर्ण जगत् का संहार करते हैं । ज्ञानियों गुरु भी गुरु मृत्युंजय शिव उसी परब्रह्मरूप विग्रह को जान लेने पर ज्ञानवान्, योगीश्वर, ज्ञानविद्, परम आनन्द से परिपूर्ण तथा भक्ति – वैराग्य से सम्पन्न हो सके हैं ॥ ३९-४२ ॥ हे साध्वि ! उन्हीं के भय से तीव्र चलने वालों में प्रमुख पवनदेव प्रवाहित होते हैं और उन्हीं के भय से सूर्य निरन्तर तपते रहते हैं ॥ ४३ ॥ उन्हीं की आज्ञा से इन्द्र वृष्टि करते हैं, मृत्यु प्राणियों पर अपना प्रभाव डालती है, उन्हीं की आज्ञा से अग्नि जलाती है और जल शीतल करता है ॥ ४४ ॥ उन्हीं के आदेश से भयभीत दिक्पालगण दिशाओं की रक्षा करते हैं और उन्हीं के भय से ग्रह तथा राशियाँ अपने मार्ग पर परिभ्रमण करती हैं ॥ ४५ ॥ उन्हीं के भय से वृक्ष फलते तथा फूलते हैं और उन्हीं की आज्ञा स्वीकार करके भयभीत काल निश्चित समय पर प्राणियों का संहार करता है ॥ ४६ ॥ उनकी आज्ञा बिना जल तथा स्थल में रहनेवाले कोई भी प्राणी जीवन धारण नहीं कर सकते और संग्राम में आहत तथा विषम स्थितियों में पड़े प्राणी की भी अकाल-मृत्यु नहीं होती ॥ ४७ ॥ उन्हीं की आज्ञा से वायु जलराशि को, जल कच्छप को, कच्छप शेषनाग को, शेष पृथ्वी को और पृथ्वी सभी समुद्रों तथा पर्वतों को धारण किये रहती है। जो सब प्रकार से क्षमाशालिनी हैं, वे पृथ्वी उन्हीं की आज्ञा से नानाविध रत्नों को धारण करती हैं । उन्हीं की आज्ञा से पृथ्वी पर सभी प्राणी रहते हैं तथा नष्ट होते हैं ॥ ४८-४९ ॥

[ हे साध्वि !] देवताओं के इकहत्तर युगों की इन्द्र की आयु होती है; ऐसे अट्ठाईस इन्द्रों के समाप्त होने पर ब्रह्मा का एक दिन-रात होता है। ऐसे तीस दिनों का एक महीना होता है और इन्हीं दो महीनों की एक ऋतु कही गयी है । इन्हीं छ: ऋतुओं का एक वर्ष होता है और ऐसे (सौ वर्षों) की ब्रह्मा की आयु कही गयी है ॥ ५०-५१ ॥ ब्रह्मा की आयु समाप्त होने पर श्रीहरि आँखें मूँद लेते हैं। श्रीहरि के आँखें मूँद लेने पर प्राकृत प्रलय हो जाता है। उस प्राकृतिक प्रलय के समय समस्त चराचर प्राणी, देवता, विष्णु तथा ब्रह्मा – ये सब श्रीकृष्ण के नाभिकमल में लीन हो जाते हैं ॥ ५२-५३ ॥ क्षीरसागर में शयन करने वाले तथा वैकुण्ठवासी चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु प्रलय के समय परमात्मा श्रीकृष्ण के वाम पार्श्व में विलीन होते हैं । ज्ञान के अधिष्ठाता सनातन शिव उनके ज्ञान में विलीन हो जाते हैं। सभी शक्तियाँ विष्णुमाया दुर्गा में समाविष्ट हो जाती हैं और वे बुद्धि की अधिष्ठात्री देवता दुर्गा भगवान् श्रीकृष्ण की बुद्धि में प्रविष्ट हो जाती हैं । नारायण के अंश स्वामी कार्तिकेय उनके वक्ष:स्थल में लीन हो जाते हैं ॥ ५४–५६ ॥ हे सुव्रते ! श्रीकृष्ण के अंशस्वरूप तथा गणों के स्वामी देवेश्वर गणेश श्रीकृष्ण की दोनों भुजाओं में समाविष्ट हो जाते हैं। श्रीलक्ष्मी की अंशस्वरूपा देवियाँ भगवती लक्ष्मी में तथा वे देवी लक्ष्मी राधा में विलीन हो जाती हैं। इसी प्रकार समस्त गोपिकाएँ तथा देवपत्नियाँ भी उन्हीं श्रीराधा में अन्तर्हित हो जाती हैं और श्रीकृष्ण के प्राणों की अधीश्वरी वे राधा उन श्रीकृष्ण के प्राणों में अधिष्ठित हो जाती हैं ॥ ५७-५८ ॥

सावित्री तथा जितने भी वेद और शास्त्र हैं, वे सब सरस्वती में प्रवेश कर जाते हैं और सरस्वती उन परमात्मा श्रीकृष्ण की जिह्वा में विलीन हो जाती हैं ॥ ५९ ॥ गोलोक के सभी गोप उनके रोमकूपों में प्रवेश कर जाते हैं। सभी प्राणियों की प्राणवायु उन श्रीकृष्ण के प्राणों में, समस्त अग्नियाँ उनकी जठराग्नि में तथा जल उनकी जिह्वा के अग्रभाग में विलीन हो जाते हैं । सार के भी सारस्वरूप तथा भक्तिरसरूपी अमृत का पान करने वाले वैष्णवजन परम आनन्दित होकर उनके चरणकमल में समाहित हो जाते हैं ॥ ६०-६११/२

विराट् के अंशस्वरूप क्षुद्रविराट् महाविराट् में और महाविराट् उन श्रीकृष्ण में विलीन हो जाते हैं, जिनके रोमकूपों में सम्पूर्ण विश्व समाहित हैं, जिनके आँख मीचने पर प्राकृतिक प्रलय हो जाता है और जिनके नेत्र खुल जाने पर पुनः सृष्टिकार्य आरम्भ हो जाता है । जितना समय उनके पलक गिरने में लगता है, उतना ही समय उनके पलक उठाने में लगता है । ब्रह्मा के सौ वर्ष बीत जाने पर सृष्टि का सूत्रपात और पुनः लय होता है । हे सुव्रते ! जैसे पृथ्वी के रजःकणों की संख्या नहीं है, वैसे ही ब्रह्मा की सृष्टि तथा प्रलय की कोई संख्या नहीं है ॥ ६२–६५१/२

जिन सर्वान्तरात्मा परमेश्वर की इच्छा से उनके पलक झपकते ही प्रलय होता है तथा पलक खोलते ही पुनः सृष्टि आरम्भ हो जाती है, वे श्रीकृष्ण प्रलय के समय उन परात्पर मूलप्रकृति में लीन हो जाते हैं; उस समय एकमात्र पराशक्ति ही शेष रह जाती है, यही निर्गुण परम पुरुष भी है । यही सत्स्वरूप तत्त्व सर्वप्रथम विराजमान था — ऐसा वेदों के ज्ञाताओं ने कहा है ॥ ६६–६८ ॥ अव्यक्तस्वरूपी मूलप्रकृति ‘अव्याकृत’ नाम से कही जाती हैं। चैतन्यस्वरूपिणी वे ही केवल प्रलयकाल में विद्यमान रहती हैं। उनके गुणों का वर्णन करने में ब्रह्माण्ड में कौन समर्थ है ? ॥ ६९१/२

चारों वेदों ने चार प्रकार की मुक्तियाँ बतलायी हैं । भगवान् की भक्ति प्रधान है; क्योंकि वह मुक्ति से श्रेष्ठ है। एक मुक्ति सालोक्य प्रदान करनेवाली, दूसरी सारूप्य देनेवाली, तीसरी सामीप्य की प्राप्ति करानेवाली और चौथी निर्वाण प्रदान करनेवाली है; इस प्रकार मुक्ति चार तरह की होती है । भक्तजन उन परमात्मप्रभु की सेवा छोड़कर उन मुक्तियों की कामना नहीं करते हैं । वे शिवत्व, अमरत्व तथा ब्रह्मत्व तक की अवहेलना करते हैं। वे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, भय, शोक, धन, दिव्यरूप धारण करना, निर्वाण तथा मोक्ष की अवहेलना करते हैं । मुक्ति सेवारहित है तथा भक्ति सेवाभाव में वृद्धि करनेवाली है — भक्ति तथा मुक्ति में यही भेद है; अब निषेक खण्डन का प्रसंग सुनो ॥ ७०–७४१/२

विद्वान् पुरुषों ने निषेक (जन्म) एवं भोग के खण्डन का कल्याणकारी उपाय श्रीप्रभु की एकमात्र परम सेवा को ही कहा है । हे साध्वि ! यह तत्त्वज्ञान लोक और वेद में प्रतिष्ठित है । इसे विघ्नरहित तथा शुभप्रद बताया गया है। हे वत्से ! अब तुम सुखपूर्वक जाओ ॥ ७५-७६१/२

ऐसा कहकर सूर्यपुत्र धर्मराज उसके पति को जीवितकर और उसे आशीर्वाद प्रदान करके वहाँ से जाने के लिये उद्यत हो गये । धर्मराज को जाते देखकर सावित्री उन्हें प्रणाम करके उनके दोनों चरण पकड़कर साधुवियोग के कारण उत्पन्न दुःख से व्याकुल हो रोने लगी ॥ ७७-७८१/२

सावित्री का विलाप सुनकर कृपानिधि धर्मराज भी स्वयं रोने लगे और सन्तुष्ट होकर उससे इस प्रकार कहने लगे — ॥ ७९१/२

धर्मराज बोले — [ हे सावित्रि!] तुम पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में एक लाख वर्ष तक सुख का भोग करके अन्त में उस लोक में जाओगी, जहाँ साक्षात् भगवती विराजमान रहती हैं ॥ ८० ॥ हे भद्रे ! अब तुम अपने घर जाओ और स्त्रियों के लिये मोक्ष के कारणरूप सावित्री व्रत का चौदह वर्ष तक पालन करो । ज्येष्ठमास के शुक्लपक्ष की `चतुर्दशी तिथि को किया गया सावित्रीव्रत उसी प्रकार अत्यन्त मंगलकारी होता है, जैसे भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को महालक्ष्मीव्रत कल्याणप्रद होता है । हे शुचिस्मिते! इस महालक्ष्मीव्रत को सोलह वर्ष तक करना चाहिये । जो स्त्री इस व्रत का अनुष्ठान करती है, वह भगवान् श्रीहरि के चरणों की सन्निधि प्राप्त कर लेती है ॥ ८१–८३१/२

प्रत्येक मंगलवार को मंगलकारिणी भगवती मंगलचण्डिका का व्रत करना चाहिये । प्रत्येक मास की षष्ठी दिन व्रतपूर्वक मंगलदायिनी देवी षष्ठी की पूजा करनी चाहिये । उसी प्रकार आषाढ़-संक्रान्ति के अवसर पर समस्त सिद्धियाँ प्रदान करने वाली देवी मनसा की पूजा करनी चाहिये ॥ ८४-८५ ॥ कार्तिक पूर्णिमा को रास के अवसर पर श्रीकृष्ण के लिये प्राणों से भी अधिक प्रिय श्रीराधा की उपासना करनी चाहिये । प्रत्येक मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को उपवासपूर्वक व्रत करके वर प्रदान करने वाली भगवती दुर्गा की पूजा करनी चाहिये। पति-पुत्रवती तथा पुण्यमयी पतिव्रताओं, प्रतिमाओं तथा यन्त्रों में दुर्गतिनाशिनी विष्णुमाया भगवती दुर्गा की भावना करके जो स्त्री धन – सन्तान की प्राप्ति के लिये भक्ति- पूर्वक उनका पूजन करती है, वह इस लोक में सुख भोगकर अन्त में ऐश्वर्यमयी भगवती के परम पद को प्राप्त होती है। इस प्रकार साधक को भगवती की विभूतियों की निरन्तर पूजा करनी चाहिये। उन सर्वरूपा परमेश्वरी की निरन्तर उपासना करनी चाहिये; इससे बढ़कर कृतकृत्यता प्रदान करने वाला और कुछ भी नहीं है ॥ ८६–९० ॥

[हे नारद!] उससे ऐसा कहकर धर्मराज अपने लोक को चले गये और अपने पति को साथ लेकर सावित्री भी अपने घर चली गयी ॥ ९१ ॥ हे नारद! सावित्री और सत्यवान् जब घर पर आ गये तब सावित्री ने अपने अन्य बन्धु – बान्धवों से यह सारा वृत्तान्त कहा ॥ ९२ ॥ धर्मराज के वर के प्रभाव से सावित्री के पिता ने पुत्र प्राप्त कर लिये, उसके ससुर की दोनों आँखें ठीक हो गयीं और उन्हें अपना राज्य मिल गया तथा उस सावित्री को भी पुत्रों की प्राप्ति हुई । इस प्रकार पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में एक लाख वर्ष तक सुख भोगकर वह पतिव्रता सावित्री अपने पति के साथ देवीलोक चली गयी ॥ ९३-९४ ॥ सविता की अधिष्ठात्री देवी होने अथवा सूर्य के ब्रह्मप्रतिपादक गायत्री मन्त्र की अधिदेवता होने तथा सम्पूर्ण वेदों की जननी होने से ये जगत् में सावित्री नाम से प्रसिद्ध हैं ॥ ९५ ॥

हे वत्स ! इस प्रकार मैंने सावित्री के श्रेष्ठ उपाख्यान तथा प्राणियों के कर्मविपाक का वर्णन कर दिया, अब आगे क्या सुनना चाहते हो ॥ ९६ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘नारायण-नारद- संवाद में सावित्री – उपाख्यानवर्णन’ नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.