May 28, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-दशम स्कन्धः-अध्याय-09 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-दशम स्कन्धः-नवमोऽध्यायः नौवाँ अध्याय चाक्षुष मनु की कथा, उनके द्वारा देवी की आराधना का वर्णन चाक्षुषमनुवृत्तवर्णनम् श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] अब आप जगदम्बा का अद्भुत तथा उत्तम माहात्म्य और अंग के पुत्र मनु ने जिस तरह से श्रेष्ठ राज्य प्राप्त किया था, उसे सुनिये ॥ १ ॥ राजा अंग के उत्तम पुत्र चाक्षुष छठें मनु हुए। वे सुपुलह नामक ब्रह्मर्षि की शरण में गये ॥ २ ॥ [उन्होंने सुपुलह से कहा — ] शरणागतों के कष्टों को दूर करने वाले हे ब्रह्मर्षे ! मैं आपकी शरण में आया हूँ । हे स्वामिन्! मुझ सेवक को ऐसी शिक्षा दीजिये; जिससे मैं ‘श्री’ प्राप्त कर सकूँ, पृथ्वी पर मेरा अखण्ड आधिपत्य हो जाय, मेरी भुजाओं में अप्रतिहत बल हो जाय तथा अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में मैं निपुण तथा समर्थ हो जाऊँ, मेरी सन्तानें चिरकाल तक जीवित रहें, मैं अखण्ड उत्तम आयु वाला हो जाऊँ तथा आपके उपदेश से अन्त में मुझे मोक्षलाभ हो जाय ॥ ३–५ ॥ उन चाक्षुष मनु का यह वचन जब मुनि पुलह के कान में पड़ा तब उन श्रीमान् ने कहा — हे राजन् ! कानों को महान् सुख प्रदान करने वाली मेरी बात सुनिये — देवी की आराधना सबसे बढ़कर है। इस समय आप कल्याणी जगदम्बा की उपासना कीजिये; उन्हीं के अनुग्रह से आपको यह सब सुलभ हो जायगा ॥ ६-७ ॥ चाक्षुष बोले — उन देवी की परम पावन आराधना का क्या स्वरूप है तथा उसे किस प्रकार करना चाहिये ? इसे आप मेरे ऊपर दया करके बतायें ॥ ८ ॥ मुनि बोले — हे राजन् ! देवी के परम सनातन पूजन के विषय में सुनिये । देवी के अव्यक्त वाग्भव मन्त्र का सतत जप करना चाहिये । इस मन्त्र को त्रिकाल जपने वाला मनुष्य भोग तथा मोक्ष प्राप्त कर लेता है। हे राजनन्दन ! इस वाग्भव बीज से बढ़कर अन्य कोई बीजमन्त्र नहीं है ॥ ९-१० ॥ जप करने से यह मन्त्र श्रेष्ठ सिद्धियाँ प्रदान करता है और वीर्य तथा बल की वृद्धि करता है। इस मन्त्र का जप करके ही ब्रह्माजी महाबली तथा सृजन करने की क्षमता वाले बन गये । हे राजन् ! इसी बीज का जप करके भगवान् विष्णु सृष्टिपालक कहे गये तथा इसी के जप से भगवान् शंकर जगत् का संहार करने वाले हुए ॥ ११-१२ ॥ इन्हीं का आश्रय लेकर अन्यान्य लोकपाल भी निग्रह तथा अनुग्रह करने में समर्थ और बल तथा वीर्य से सम्पन्न हुए हैं ॥ १३ ॥ हे राजन्य ! इसी प्रकार आप भी महेश्वरी जगदम्बा की सम्यक् आराधना करके थोड़े ही समय में महान् समृद्धि प्राप्त कर लेंगे ॥ १४ ॥ इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ पुलह से उपदिष्ट होकर वे अंगपुत्र चाक्षुष मनु तप करने के लिये विरजानदी के तट पर् गये ॥ १५ ॥ वे ऐश्वर्यशाली राजा चाक्षुष जीर्ण-शीर्ण पत्तों के आहार पर रहकर भगवती के वाग्भव बीज के जप में निरन्तर रत रहते हुए उग्र तपस्या करने लगे ॥ १६ ॥ वे प्रथम वर्ष में पत्तों के आहार पर, दूसरे वर्ष में जल पीकर और तीसरे वर्ष में केवल वायु का आहार करते हुए ठूंठ वृक्ष की भाँति अविचल स्थित रहे ॥ १७ ॥ आहार छोड़कर बारह वर्षों तक वाग्भव बीज का निरन्तर जप करते हुए राजा चाक्षुष की बुद्धि परम पवित्र हो गयी ॥ १८ ॥ इस प्रकार देवी के उस परम पवित्र मन्त्र का एकान्त में जप करते हुए उन राजा के समक्ष जगन्माता परमेश्वरी भगवती साक्षात् प्रकट हो गयीं। किसी से भी पराभूत न होने वाली तेजस्विनी सर्वदेवमयी भगवती प्रसन्न होकर ललित वाणी में उन अंगपुत्र चाक्षुष से कहने लगीं — ॥ १९-२० ॥ देवी बोलीं — हे पृथ्वीपाल ! तुमने अपने मन में जो भी श्रेष्ठ वर सोचा हो, उसे बताओ, तुम्हारे तप से परम सन्तुष्ट मैं उसे अवश्य दूँगी ॥ २१ ॥ चाक्षुष बोले — हे देवदेवेश्वरि ! हे देवपूजिते ! मैं जिस मनोवांछित वर के लिये आपसे प्रार्थना करना चाहता हूँ, उसे आप अन्तर्यामी स्वरूपवाली होने के कारण भलीभाँति जानती हैं, तथापि हे देवि ! मेरे सौभाग्य से यदि आपका दर्शन हो गया है तो मैं आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ कि आप मुझे मन्वन्तर से सम्बन्धित राज्य प्रदान करें ॥ २२-२३ ॥ देवी बोलीं — हे नृपश्रेष्ठ ! इस मन्वन्तर का राज्य मैंने तुम्हें दे दिया, तुम्हारे पुत्र भी अत्यधिक गुणवान् तथा महान् बलशाली होंगे। तुम्हारा राज्य निष्कंटक होगा तथा अन्त में तुम्हें निश्चितरूप से मोक्ष मिलेगा ॥ २४१/२ ॥ इस प्रकार उन चाक्षुष मनु के द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुत वे देवी उन्हें अत्यन्त उत्तम वर प्रदान करके शीघ्र ही अन्तर्धान हो गयीं ॥ २५१/२ ॥ वे राजा चाक्षुष मनु भी भगवती की कृपा से उनका आश्रय प्राप्तकर छठें मनु के रूप में प्रतिष्ठित हुए और वे सम्मान्य मनु सार्वभौम सुखों से सम्पन्न हो गये । उनके पुत्र बलवान्, कार्यभार सँभालने में दक्ष, देवीभक्त, शूरवीर, महान् बलशाली, पराक्रमी, सर्वत्र समादर प्राप्त करने वाले तथा महान् राज्यसुख के अधिष्ठान थे ॥ २६–२८ ॥ इस प्रकार प्रभुतासम्पन्न वे चाक्षुष मनु भगवती की आराधना के प्रभाव से मनुश्रेष्ठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए और अन्त में देवी के परम धाम को प्राप्त हुए ॥ २९ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत दसवें स्कन्ध का ‘देवीचरित्र में चाक्षुषमनुवृत्तवर्णन’ नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe