May 30, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-एकादशः स्कन्धः-अध्याय-15 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-एकादशः स्कन्धः-पञ्चदशोऽध्यायः पन्द्रहवाँ अध्याय भस्म-माहात्म्य के सम्बन्ध में दुर्वासा मुनि और कुम्भीपाकस्थ जीवों का आख्यान, ऊर्ध्वपुण्ड्र का माहात्म्य त्रिपुण्ड्रोर्ध्वपुण्ड्रधारणविधिवर्णनम् श्रीनारायण बोले — द्विजों को ‘अग्निरिति भस्म’ आदि मन्त्रों से भस्म को श्रद्धापूर्वक शुद्ध करके अपने ललाट आदि पर त्रिपुण्ड्ररूप में धारण करना चाहिये ॥ १ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य — ये सब द्विज कहे गये हैं । अतः द्विजों को प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ २ ॥ हे ब्रह्मन् ! जिसका उपनयन हो गया है, उसी को द्विज कहा जाता है। अतः द्विजों को श्रुतिविहित त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ ३ ॥ जो मनुष्य भस्म-धारण का त्याग करके कुछ भी सत्कृत्य करता है, उसका सब किया हुआ न किये के बराबर हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४ ॥ बिना भस्म धारण किये गायत्रीमन्त्र का उपदेश सार्थक नहीं होता है, अतः अपने शरीर में भस्म लगाकर ही गायत्रीजप करना चाहिये ॥ ५ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! गायत्री को ही ब्राह्मणत्व का मूल कहा गया है । भस्म धारण न करने पर कोई भी उस गायत्री का उपदेश देने का अधिकारी नहीं हो सकता है ॥ ६ ॥ हे मुने! उसी प्रकार जबतक अग्निहोत्रजनित भस्म ललाट आदि अंगों में धारण नहीं किया जाता, तबतक किसी को भी गायत्रीमन्त्र लेने का अधिकार नहीं होता ॥ ७ ॥ किसी के भस्मरहित ललाट से उसके ब्राह्मणत्व का अनुमान नहीं किया जा सकता है; इसीलिये हे ब्रह्मन् ! मैंने भस्म को अत्यन्त पुण्यदायक हेतु बतलाया है ॥ ८ ॥ जिसके ललाट पर मन्त्र से पवित्र किया गया श्वेत भस्म विद्यमान रहता है, वस्तुतः वही विद्वान् ब्राह्मण है; ऐसा मैं सत्य कह रहा हूँ ॥ ९ ॥ हे ब्रह्मन् ! मणिसंग्रह करने की भाँति भस्मसंग्रह करने में जिसकी स्वाभाविक प्रीति रहती है, वस्तुतः वही ब्राह्मण है; ऐसा मैं सत्य कह रहा हूँ, किंतु मणिसंग्रह करने की भाँति भस्मसंग्रह करने में जिसकी स्वाभाविक प्रीति न हो तो ऐसा जान लेना चाहिये कि वह जन्म-जन्मान्तर में निश्चित ही चाण्डाल रहा होगा ॥ १०-११ ॥ त्रिपुण्ड्रधारण तथा भस्मोद्धूलन आदि में जिसकी सहज निष्ठा नहीं होती, उसे चाण्डाल समझना चाहिये, ऐसा मैं सत्य कह रहा हूँ ॥ १२ ॥ जो लोग भस्म-धारण का त्याग करके फल आदि का भक्षण करते हैं, वे सब घोर नरक को प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं है; ( विभूति- धारण का त्याग करके जो शिव की पूजा करता है, वह भाग्यहीन शिव से द्वेष करने वाला होता है और वह द्वेष उसके लिये नरकप्रदायक होता है। भस्म न धारण करने वाला मनुष्य सभी प्रकार के कर्मों का अनधिकारी होता है ।) विभूतिधारण का त्याग करके स्वर्ण का तुलादान करने वाला भी उस दान का फल प्राप्त नहीं कर पाता और वह अपने धर्म से भ्रष्ट हो जाता है ॥ १३-१४ ॥ जिस प्रकार यज्ञोपवीत से विहीन द्विज सन्ध्या नहीं करते, उसी प्रकार भस्मविहीन रहने पर भी द्विजों को सन्ध्या नहीं करनी चाहिये ॥ १५ ॥ यज्ञोपवीत के च्युत हो जाने पर सन्ध्या में गायत्री- जप आदि करने के लिये तथा उसी प्रकार व्रत-उपवास आदि में किसी को प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया जा सकता है, किंतु विभूतिधारण में कोई दूसरा व्यक्ति प्रतिनिधि के रूप में नहीं हो सकता । यदि विभूतिधारण का परित्याग करके कोई द्विज सन्ध्या करता है तो वह पाप का भागी होता है; क्योंकि वह उस समय सन्ध्या करने का अधिकारी ही नहीं है। जैसे अन्त्यज को वेदों का श्रवण करने से पाप लगता है, उसी प्रकार भस्म न लगाकर सन्ध्या करने वाले द्विज को भी पाप लगता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १६–१८१/२ ॥ द्विजों को सदैव यत्नपूर्वक श्रौताग्निजन्य या स्मार्ताग्निजन्य भस्म अथवा उनके अभाव में लौकिकाग्निजन्य भस्म ही अत्यन्त समाहितचित्त होकर धारण करना चाहिये । भस्म चाहे जैसा हो, वह सदा पवित्र होता है । अतः द्विजों को चाहिये कि वे सन्ध्या आदि कर्मों में उसे प्रयत्न के साथ धारण करें । भस्मनिष्ठ मनुष्य में पाप प्रविष्ट नहीं हो सकते, अतः ब्राह्मणों को यत्नपूर्वक सदा भस्म धारण किये रहना चाहिये ॥ १९–२११/२ ॥ यदि कोई अपने दाहिने हाथ की तीनों मध्य की अँगुलियों (तर्जनी, मध्यमा तथा अनामिका) – से छः अंगुल तक अथवा इससे भी अधिक लम्बे परिमाण का अथवा एक नेत्र से लेकर दूसरे नेत्र तक लम्बा देदीप्यमान त्रिपुण्ड्र भस्म से अपने ललाट पर लगाये तो वह साक्षात् रुद्ररूप हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है । अनामिका अँगुली को अकार, मध्यमा को उकार तथा तर्जनी को मकार कहा गया है। अतएव त्रिपुण्ड्र त्रिगुणात्मक है। तर्जनी, मध्यमा तथा अनामिका अँगुलियों से अनुलोमक्रम से त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ २२–२५ ॥ इस सम्बन्ध में आपसे एक प्राचीन इतिहास का वर्णन कर रहा हूँ। किसी समय तपस्वियों के शिरोमणि ऋषि दुर्वासा अपने सर्वांग में भस्म धारण किये हुए तथा रुद्राक्ष के आभूषण पहने हुए ‘हे शिव ! हे शंकर! हे सर्वात्मन्! हे श्रीमातः ! हे जगदम्बिके !’ – इन नामों का उच्च स्वर से उच्चारण करते हुए पितृलोक गये हुए थे ॥ २६-२७१/२ ॥ उन्हें देखकर कव्यवाट् (अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्ता, बर्हिषद्, सोमपा) आदि पितरों ने उठकर अभिवादन के द्वारा तथा आसन आदि उपचारों से उनका अत्यधिक सम्मान किया। तब वे अनेक प्रकार की कथाओं के माध्यम से परस्पर वार्तालाप करने लगे ॥ २८-२९ ॥ उसी समय कुम्भीपाकनरक में पड़े हुए पापियों का भयंकर चीत्कार हुआ। ‘हाय ! हमलोग मारे जा रहे हैं ‘ – वे ऐसा बोल रहे थे । उनमें कुछ चिल्ला रहे थे ‘हम मर गये’, दूसरे कह रहे थे ‘हम जल गये’, कुछ चीत्कार कर रहे थे ‘हम कट गये’ तथा कुछ चिल्ला रहे थे ‘हम छेदे जा रहे हैं’ – इस प्रकार कहकर वे रुदन कर रहे थे ॥ ३०-३१ ॥ वह करुण-क्रन्दन सुनकर मुनिराज दुर्वासा के मन में बड़ी व्यथा हुई और उन्होंने उन पितृदेवों से पूछा कि यह किन लोगों की ध्वनि है ? ॥ ३२ ॥ तब उन पितृदेवों ने कहा — हे मुने! यहीं पर संयमनी नामक एक विशाल पुरी है । यहाँ पापियों को उनके कर्मों का भोग प्रदान करने वाले यमराज रहते हैं ॥ ३३ ॥ हे अनघ! साक्षात् कालरूप तथा कृष्णवर्णवाले अनेक भयानक दूतों के साथ यमराज उस पुरी में स्वामी के रूप में निवास करते हैं ॥ ३४ ॥ उस पुरी में पापियों को उनके कुकर्म का भोग प्रदान करने वाले छियासी कुण्ड हैं, जो भयंकर रूपवाले दूतों से सदा घिरे रहते हैं ॥ ३५ ॥ उनमें सबसे मुख्य कुम्भीपाक नामक एक विशाल कुण्ड है। उस नरककुण्ड में मिलने वाली यातनाओं का वर्णन कोई भी सैकड़ों वर्षों में भी नहीं कर सकता ॥ ३६१/२ ॥ हे मुने! जो शिव तथा विष्णु के द्रोही हैं और देवी के निन्दक हैं, वे लोग इसी कुण्ड में गिरते हैं ॥ ३७१/२ ॥ जो वेद के निन्दक हैं एवं सूर्य, गणेश तथा ब्राह्मणों के द्रोही हैं, हे मुने! वे लोग इसी कुण्ड में गिरते हैं ॥ ३८१/२ ॥ जो लोग स्वेच्छाचारी हैं तथा जो तप्तमुद्रा से अंकित हैं तथा जो त्रिशूल धारण करते हैं, हे मुने ! वे इसी ‘कुम्भीपाक’ नरककुण्ड में गिरते हैं ॥ ३९१/२ ॥ जो लोग माता, पिता, गुरु, श्रेष्ठजनों, पुराणों तथा स्मृतियों के निन्दक हैं और धर्म को दूषित करने वाले हैं, हे मुने! वे लोग इसी कुण्ड में पड़ते हैं ॥ ४०१/२ ॥ [ हे मुने!] सुनने में अत्यन्त दारुण तथा महाभयानक यह ध्वनि उन्हीं लोगों की है। हम लोग यह ध्वनि नित्य सुनते रहते हैं, जिसके सुनने से वैराग्य उत्पन्न हो जाता है ॥ ४१ ॥ उन पितृगणों की यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा उन पापियों को देखने की इच्छा से वहाँ से उठकर चल दिये और शीघ्र ही कुम्भीपाक नरककुण्ड के पास पहुँच गये ॥ ४२१/२ ॥ [ श्रीनारायण कहते हैं— ] हे मुने! मुख झुकाकर जब दुर्वासामुनि नीचे की ओर देखने लगे, उसी समय उस कुण्ड में स्थित पापियों को स्वर्ग से भी अधिक सुख का अनुभव होने लगा ॥ ४३१/२ ॥ उनमें से कुछ हँसने लगे, कुछ गाने लगे तथा कुछ नाचने लगे । सुख-वृद्धि के कारण उन्मत्त होकर वे परस्पर क्रीडा करने लगे ॥ ४४१/२ ॥ मृदंग, मुरज, वीणा, ढक्का तथा दुन्दुभि की कोयल सदृश पंचम स्वर से युक्त मधुर ध्वनियाँ उत्पन्न होने लगीं और वासन्ती लता के पुष्पों के सम्पर्क से सुगन्धित हवाएँ बहने लगीं ॥ ४५-४६ ॥ यह देखकर मुनि दुर्वासा आश्चर्यचकित हो गये और यमदूत भी अत्यन्त विस्मय में पड़ गये । वे यमदूत सर्वज्ञ धर्मराज के पास शीघ्र पहुँचकर उनसे कहने लगे — हे महाराज ! हे विभो ! अभी-अभी एक अत्यन्त आश्चर्यजनक घटना घटी है। कुम्भीपाक में स्थित पापियों को स्वर्ग से भी अधिक सुख प्राप्त हो रहा है । हे विभो ! यह कैसे हो गया, इसका कारण हम नहीं जानते । हे देव! इस घटना से हम सभी लोग चकित हैं और आपके पास आये हुए हैं ॥ ४७–४९ ॥ दूतों की वह बात सुनकर धर्मराज शीघ्र ही उठ खड़े हुए और एक विशाल महिष पर आरूढ होकर उस कुम्भीपाक नरककुण्ड के लिये प्रस्थित हुए, जहाँ वे पापी पड़े हुए थे ॥ ५० ॥ उन्होंने अपने दूतों द्वारा वह सन्देश अमरावती ( इन्द्रपुरी) – में भेज दिया। उस सन्देश को सुनकर देवराज इन्द्र भी देवताओं के साथ वहाँ आ गये। इसी प्रकार ब्रह्मलोक से ब्रह्मा, वैकुण्ठलोक से विष्णु तथा अपने-अपने लोकों से समस्त दिक्पाल अपने गणोंसहित वहाँ आ गये ॥ ५१-५२ ॥ वे सभी कुम्भीपाक को इधर-उधर से घेरकर खड़े हो गये। उन्होंने वहाँ पर स्थित जीवों को स्वर्ग से भी अधिक सुखी देखा । विस्मय में पड़े हुए वे सभी देवता उसका कारण नहीं जान पाये । वे कहने लगे — ‘अहो ! यह कुण्ड तो पाप भोगने के निमित्त है । जब यहाँ पर ऐसा सुख प्राप्त हो रहा है तो फिर लोगों को पाप से क्या भय रहेगा ? परमेश्वर के द्वारा बनायी गयी वेदमर्यादा कैसे विनष्ट हो गयी ? भगवान् ने अपने ही संकल्प को मिथ्या कैसे कर दिया ? यह तो आश्चर्य है, यह तो आश्चर्य है’ – ऐसा कहते हुए वे सभी देवता उदास हो गये; वे उस घटना का कारण नहीं जान सके ॥ ५३–५६१/२ ॥ इसी बीच भगवान् विष्णु देवताओं आदि से मन्त्रणा करके कुछ देवगणों के साथ शंकरजी के निवास स्थान पर गये । वहाँपर उन्होंने पार्वती के साथ विराजमान, करोड़ों कामदेव के समान सुन्दर, परम रमणीय अंगों वाले, लावण्य की खान, अद्भुत, सदा सोलह वर्ष की अवस्था वाले, अनेकविध अलंकारों से सुशोभित, विविध गणों से घिरे हुए तथा परा शिवा को प्रमुदित करते हुए चतुर्वेदस्वरूप चन्द्रशेखर भगवान् शिव को देखा और उन्हें प्रणाम किया। तत्पश्चात् उन्होंने अत्यन्त स्पष्ट वाणी में उस आश्चर्यजनक घटनाको बताया – ‘हे देव ! हम इस घटना का कुछ भी कारण नहीं समझ पा रहे हैं । हे देव ! इसका जो कारण हो, उसे आप बताइये; क्योंकि हे प्रभो ! आप सर्वज्ञ हैं’ ॥ ५७–६११/२ ॥ तब विष्णु का कथन सुनकर प्रसन्न मुखारविन्द वाले भगवान् शिव ने मेघ के समान गम्भीर वाणी में यह मधुर वचन कहा — ‘ हे विष्णो ! उसका कारण सुनिये ।’ इस विषय में कोई आश्चर्य नहीं है । यह भस्म की महिमा है। भस्म से क्या नहीं हो सकता है ? ॥ ६२-६३१/२ ॥ शैवसम्मत होकर अर्थात् भस्म तथा त्रिपुण्ड्र आदि धारण करके दुर्वासामुनि कुम्भीपाक देखने गये थे । हे हरे ! वे मुख झुकाकर नीचे की ओर देखने लगे, तभी उनके ललाट पर स्थित भस्म के कुछ कण दैवयोग से वायु प्रभाव से उस कुण्ड में गिर पड़े। उसी से यह सारी घटना हुई है; यह तो भस्म की ही महिमा है ॥ ६४-६५१/२ ॥ अब से यह कुम्भीपाक पितृलोक में निवास करने वालों के लिये तीर्थ बन जायगा, जिसमें स्नान करके सुख प्राप्त होगा; इसमें सन्देह नहीं है । आज से उन्हीं के नाम से यह ‘पितृतीर्थ’ नाम वाला होगा । हे श्रेष्ठ ! आप वहाँ पर मेरे लिंग तथा देवी की मूर्ति की स्थापना करें, जिससे पितृलोक में रहने वाले हमारी पूजा कर सकें । तीनों लोकों में जितने तीर्थ हैं, उनमें यह श्रेष्ठ तीर्थ होगा। वहाँपर स्थापित पित्रीश्वरी की पूजामात्र से तीनों लोकों की पूजा हो जायगी ॥ ६६–६९ ॥ श्रीनारायण बोले — हे नारद! महादेवजी की यह बात सुनकर विष्णुजी ने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और उनसे आज्ञा लेकर वे देवताओं के पास चले गये । वहाँ पहुँचकर भगवान् विष्णु ने शंकरजी द्वारा बतायी गयी समस्त बातें उनसे कहीं, जिसपर वे सभी देवता सिर हिलाकर ‘साधु-साधु’ – ऐसा कहने लगे ॥ ७०-७१ ॥ ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता भस्म के माहात्म्य की प्रशंसा करने लगे और हे परंतप ! कुम्भीपाक के तीर्थ हो जाने से पितरों को बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ७२ ॥ देवताओं ने उस तीर्थ के तट पर शिवलिंग तथा देवी की मूर्ति की विधिपूर्वक स्थापना की और प्रतिदिन पूजन करने लगे ॥ ७३ ॥ अपने पापकर्मों का फल भोगने के लिये उस कुण्ड में जितने भी जीव थे, वे सब विमान पर आरूढ होकर कैलासमण्डल को चले गये। वे इस समय भी वहाँ भद्रगण नाम से निवास करते हैं; और फिर वहाँ से दूर अन्य स्थान पर ‘कुम्भीपाक’ निर्मित हुआ और उसी दिन से देवताओं ने भस्म तथा त्रिपुण्ड्रधारी शैवों का कुम्भीपाक नरककुण्ड जाना निरुद्ध कर दिया ॥ ७४-७५१/२ ॥ इस प्रकार मैंने आपसे भस्म के उत्तम माहात्म्य का सारा वर्णन कर दिया । हे मुने! इस भस्म से बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं है ॥ ७६१/२ ॥ हे मुनिशार्दूल! वैष्णवशास्त्रों के अवलोकन से प्राप्त ज्ञान के अनुसार अब अधिकार – भेद से ऊर्ध्वपुण्ड्र की विधि का भी वर्णन करूँगा ॥ ७७१/२ ॥ हे मुने! अँगुलि के नाप से दिव्य ऊर्ध्वपुण्ड्र के प्रमाण, उसके रंग, उसके मन्त्र, उसके देवता तथा उसके फलों का वर्णन करूँगा ॥ ७८१/२ ॥ इसके लिये पर्वत की चोटी, नदी के तट, विशेष रूप से शिवक्षेत्र, समुद्र के तट, वल्मीक (बाँबी) और तुलसी के वृक्ष की जड़ — इन्हीं स्थानों की मिट्टियों को लेना चाहिये, इसके अतिरिक्त अन्य मिट्टियाँ नहीं लेनी चाहिये ॥ ७९-८० ॥ श्यामवर्ण की मिट्टी शान्तिदायिनी कही गयी है तथा रक्तवर्ण की मिट्टी वश में करने वाली होती है । इसी प्रकार पीली मिट्टी श्रीदायिनी तथा श्वेत मिट्टी धर्म की ओर प्रवृत्त करने वाली कही गयी है ॥ ८१ ॥ अँगूठा पुष्टि देने वाला कहा गया है। मध्यमा अँगुली आयु प्रदान करने वाली है । अनामिका नित्य अन्न देने वाली तथा तर्जनी मुक्तिदायिनी कही गयी है । अँगुलिभेद से इन्हीं से ही ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाये तथा लगाते समय नखों से स्पर्श न करे । दीपक की बत्ती की लौ के आकार का, बाँस के पत्ते के आकार का, कमल की कली की आकृति का, मत्स्य के आकार का, कछुए के आकार का अथवा शंख के आकार का ऊर्ध्वपुण्ड्र प्रयत्नपूर्वक धारण करना चाहिये ॥ ८२–८४ ॥ दस अंगुल परिमाण वाला ऊर्ध्वपुण्ड्र उत्तम कोटि में उत्तम कहा जाता है। नौ अंगुल परिमाण वाला ऊर्ध्वपुण्ड्र उत्तम कोटि में मध्यम तथा आठ अंगुल परिमाण वाला ऊर्ध्वपुण्ड्र उत्तम कोटि में कनिष्ठ होता है ॥ ८५ ॥ इसी प्रकार सात, छः तथा पाँच अंगुल परिमाण वाला मध्यम कोटि का ऊर्ध्वपुण्ड्र भी [ क्रमशः उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ ] – तीन प्रकार का कहा गया है और चार, तीन तथा दो अंगुल परिमाणवाला कनिष्ठ कोटि का ऊर्ध्वपुण्ड्र भी [ क्रमशः उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ ] तीन प्रकार का होता है ॥ ८६ ॥ ललाट के ऊर्ध्वपुण्ड्र को ‘केशव’, उदर के ऊर्ध्वपुण्ड्र को ‘नारायण’, हृदय के ऊर्ध्वपुण्ड्र को ‘माधव’ तथा कण्ठ के ऊर्ध्वपुण्ड्र को ‘गोविन्द’ जानना चाहिये। उदर के दाहिने पार्श्व में धारित ऊर्ध्वपुण्ड्र को ‘विष्णु’ कहा जाता है । उदर के वाम पार्श्व के ऊर्ध्व-पुण्ड्र को ‘मधुसूदन’, कर्णदेश के ऊर्ध्वपुण्ड्र को ‘त्रिविक्रम’, वाम कुक्षि के ऊर्ध्वपुण्ड्र को ‘वामन’, बायें बाहु के ऊर्ध्वपुण्ड्र को ‘श्रीधर’, दाहिने कान के ऊर्ध्वपुण्ड्र को ‘हृषीकेश’, पीठ के ऊर्ध्वपुण्ड्र को ‘पद्मनाभ’, ककुद्देश के ऊर्ध्वपुण्ड्र को ‘दामोदर’ — इन बारह नामों से तथा मूर्धा ऊर्ध्वपुण्ड्र को वासुदेव के रूप में समझकर उन-उन स्थानों पर उन-उन देवताओं का स्मरण करना चाहिये । इस प्रकार प्रातः कालीन तथा सायंकालीन पूजन तथा हवन के समय शान्तचित्त होकर इन नामों का उच्चारण करके विधिपूर्वक ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ ८७–९१ ॥ कोई भी अपवित्र, अनाचारी अथवा मन से भी निरन्तर पापकर्म का चिन्तन करने वाला मनुष्य अपने सिर पर ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण कर लेने मात्र से पवित्र हो जाता है ॥ ९२ ॥ ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करने वाले चाण्डाल मनुष्य की भी मृत्यु चाहे कहीं भी हो, वह विमान में स्थित होकर मेरे लोक पहुँचकर प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ९३ ॥ विशुद्ध आत्मावाले तथा मेरे स्वरूप को जाननेवाले महाभाग्यशाली ऐकान्तिक वैष्णवजन भगवान् विष्णु के चरण के आकार वाले तथा बीच में रिक्त स्थान से युक्त ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करते हैं । इसी प्रकार एकमात्र मेरे चरणों के प्रति परायणता रखने वाले परम ऐकान्तिक भक्त निर्मल, शूल की आकृति वाले ऊर्ध्वपुण्ड्र को हल्दी के चूर्ण से धारण करते हैं ॥ ९४-९५ ॥ अन्य वैष्णवजनों को भक्तिपूर्वक दीपक की बत्ती की तरह, कमल की तरह अथवा बाँस के पत्ते की आकृति के सदृश तथा रेखाओं के मध्य रिक्तस्थान-रहित ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिये । साधारण वैष्णव गृहस्थ अच्छिद्र ( रेखाओं के बीच रिक्त स्थान से रहित) अथवा सच्छिद्र ( रेखाओं के बीच रिक्त स्थानयुक्त) कोई भी त्रिपुण्ड्र धारण कर सकते हैं । अच्छिद्र ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाने से उन्हें पाप नहीं लगता है। किंतु प्रपन्न ऐकान्तिक तथा परम ऐकान्तिक वैष्णवों को अच्छिद्र ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करने पर महान् पाप लगता है ॥ ९६-९८ ॥ जो वैष्णव दण्ड के आकार के, सुन्दर, रेखाओं के बीच में रिक्त स्थान छोड़कर पूर्वोक्त ‘केशव’ आदि के साथ ‘नमः’ जोड़कर विभिन्न अंगों में विमल ऊर्ध्वपुण्ड्रों को धारण करता है, वह उन उन स्थानों पर मानो मेरा विशाल मन्दिर ही बनाता है ॥ ९९-१०० ॥ ऊर्ध्वपुण्ड्र के मध्य विशाल तथा अत्यन्त मनोहर रिक्त स्थान में शाश्वत विष्णुजी लक्ष्मी के साथ विराजमान होकर आनन्दित होते हैं ॥ १०१ ॥ जो अधम द्विज रेखाओं के बीच में रिक्तस्थान छोड़े बिना ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करता है, वह उस स्थान पर विराजमान विष्णु तथा लक्ष्मी का तिरस्कार करता है ॥ १०२ ॥ जो मूर्ख अच्छिद्र (रेखाओं के बीच रिक्त स्थानरहित ) ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करता है, वह क्रमशः इक्कीस नरकों को प्राप्त होता रहता है ॥ १०३ ॥ स्पष्ट तथा सीधी रेखाओं वाले, बीच में रिक्त स्थान वाले, दण्ड, कमल, दीपक की लौ अथवा मत्स्य की आकृति वाले ऊर्ध्वपुण्ड्रों को धारण करना चाहिये ॥ १०४ ॥ द्विज को शिखा और यज्ञोपवीत की भाँति ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिये । हे महामुने ! इसे धारण किये बिना किये गये समस्त कर्म निष्फल हो जाते हैं। अतः बुद्धिमान् ब्राह्मण को समस्त कर्मों में त्रिशूल के आकार का गोल अथवा चौकोर ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ १०५-१०६ ॥ वेदनिष्ठ ब्राह्मण को अर्धचन्द्र के आकार का तिलक नहीं लगाना चाहिये । जन्म से ब्राह्मण जाति में उत्पन्न तथा वैदिकपन्थ के अनुयायी व्यक्ति को भूलकर भी अपने ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र के अतिरिक्त अन्य पुण्ड्र नहीं धारण करना चाहिये । श्रौत तिर्यक् त्रिपुण्ड्र छोड़कर प्रसिद्धि अथवा शारीरिक कान्ति आदि की प्राप्ति के लिये वैष्णवशास्त्रादि में वर्णित दूसरे प्रकार के पुण्ड्र वैदिक व्यक्ति को भूलकर भी नहीं धारण करने चाहिये ॥ १०७–१०९ ॥ ललाट पर भस्म से तिर्यक् त्रिपुण्ड्र धारण न करके अज्ञानवश अन्य प्रकार का त्रिपुण्ड्र धारण करने वाला वैदिक ब्राह्मण नरकगामी होता है। एकमात्र वेदमार्ग का अनुयायी व्यक्ति यदि अज्ञानवश भी भिन्न प्रकार का पुण्ड्र शरीर पर धारण कर लेता है तो वह नरक में अवश्य ही पड़ता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ११०-१११ ॥ वैदिक धर्मावलम्बी मनुष्य को अपने शरीर पर किसी प्रकार का चिह्न नहीं करना चाहिये । वैदिक धर्म का पालन करने वालों के लिये एकमात्र वैदिक चिह्न त्रिपुण्ड्र ही है। अश्रौत धर्म में निष्ठ लोगों के लिये अश्रौत चिह्न बताया गया है ॥ ११२१/२ ॥ वेदों में जो-जो देवता वर्णित हैं, उनके चिह्न वैदिक ही हैं । अश्रततन्त्र में निष्ठा रखने वाले जो लोग हैं, उनके चिह्न अश्रौत ही हैं ॥ ११३ ॥ भवबन्धन से मुक्ति प्रदान करने वाले वेदसिद्ध महादेवजी भक्तों के उपकार के लिये श्रौत चिह्न ( भस्म – त्रिपुण्ड्र ) धारण करते हैं ॥ ११४१/२ ॥ वेदसिद्ध भगवान् विष्णु का भी वैदिक चिह्न ही है, इसके अतिरिक्त दूसरा नहीं । विशेष अवतारों में भी उनका चिह्न वही [भस्म – त्रिपुण्ड्र ] रहता है ॥ ११५१/२ ॥ सर्वांग भस्म लगाने तथा त्रिपुण्ड्र धारण करने को वैदिक चिह्न समझना चाहिये । ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि अश्रौत चिह्न हैं, तिर्यक् त्रिपुण्ड्र अश्रौत नहीं है ॥ ११६१/२ ॥ एकमात्र वेदमार्ग का अनुगमन करने वाले को वेदोक्त पद्धति से भस्म द्वारा ललाट पर तिर्यक् त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये। जो भगवान् नारायण के शरणागत हो तथा उनके परमपद का अभिलाषी हो, उसे गन्ध- द्रव्य – युक्त जल से अपने ललाट पर शूल की आकृति धारण करनी चाहिये ॥ ११७-११८ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत ग्यारहवें स्कन्ध का ‘त्रिपुण्ड्र – ऊर्ध्वपुण्ड्रधारणविधिवर्णन’ नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥ Content is available only for registered users. 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