श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-एकादशः स्कन्धः-अध्याय-16
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-एकादशः स्कन्धः-षोडशोऽध्यायः
सोलहवाँ अध्याय
सन्ध्योपासना तथा उसका माहात्म्य
सन्ध्योपासननिरूपणम्

श्रीनारायण बोले [ हे नारद!] मैंने आपसे भस्म धारण करने के माहात्म्य का विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया; अब आप पुण्यदायक तथा उत्तम सन्ध्योपासन के विषय में सुनिये ॥ १ ॥ हे अनघ ! मैं सर्वप्रथम आपसे प्रातः कालीन सन्ध्या का विधान कह रहा हूँ । प्रातः काल की सन्ध्या आकाश में तारों के रहते-रहते, मध्याह्न की सन्ध्या सूर्य के मध्य-आकाश में आने पर और सायंकाल की सन्ध्या सूर्य के पश्चिम दिशा में रहने पर करने का विधान है; इस प्रकार इन तीनों सन्ध्याओं को करना चाहिये। हे देवर्षिश्रेष्ठ! अब मैं उनके भेद भी बताऊँगा, आप सुनिये ॥ २-३ ॥ तारों के आकाश में विद्यमान रहते की जाने वाली प्रातःसन्ध्या उत्तम, लुप्त होने से लेकर सूर्योदय के बीच की अवधि में की जाने वाली सन्ध्या मध्यम और सूर्य के उदय हो जाने पर की जाने वाली सन्ध्या अधम यह तीन प्रकार की प्रातः सन्ध्या कही गयी है। सायंकाल में सूर्य के विद्यमान रहते की गयी सायं- सन्ध्या उत्तम, सूर्य के अस्त होने तथा तारों के उदय के पूर्व की गयी सन्ध्या मध्यम और तारों के उदय के पश्चात् की गयी सन्ध्या अधम – यह तीन प्रकार की सायंसन्ध्या कही गयी है ॥ ४-५ ॥

विप्र वृक्ष है, ये सन्ध्याएँ ही उसकी जड़ें हैं, वेद उसकी शाखाएँ हैं और सभी धर्म-कर्म उसके पत्ते हैं । अतएव प्रयत्न के साथ मूल अर्थात् सन्ध्या की ही रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि मूल के कट जाने पर न तो वृक्ष रहता है और न शाखा ॥ ६ ॥ जिसने सन्ध्या का ज्ञान नहीं किया तथा जिसने सन्ध्योपासन नहीं किया, वह जीते-जी शूद्र के समान होता है और मृत्यु के अनन्तर कुत्ते की योनि में जन्म लेता है ॥ ७ ॥ अतः द्विज को नित्य उत्तम सन्ध्या करनी चाहिये । उसे न करने वाला अन्य किसी भी शुभ कर्म को करने का अधिकारी नहीं है ॥ ८ ॥ सूर्य के उदय होने तथा अस्त होने के तीन-तीन घड़ी बाद तक सन्ध्योपासना कर लेनी चाहिये । उसके बाद सन्ध्या करने पर प्रायश्चित्त करना पड़ता है ॥ ९ ॥ समय बीत जाने पर यदि सन्ध्या की जाय, तो [ तीन अर्घ्य के अतिरिक्त ] चौथा अर्घ्य देना चाहिये अथवा आरम्भ में एक सौ आठ बार गायत्री का जप करके सन्ध्या करनी चाहिये ॥ १० ॥ जिस समय जो कर्म करना हो, उस समय की अधीश्वरी उस गायत्री – स्वरूपिणी सन्ध्या की उपासना करके अनन्तर ही उस कार्य में प्रवृत्त होना चाहिये ॥ ११ ॥ घर में की गयी सन्ध्या साधारण कही गयी है, गोशाला में की गयी सन्ध्या मध्यम कोटि की होती है, नदी तट पर की गयी सन्ध्या उत्तम होती है और देवीमन्दिर में की गयी सन्ध्या उससे भी उत्तम कही गयी है ॥ १२ ॥

सन्ध्योपासन देवी की उपासना है, अतः देवी की सन्निधि में ही तीनों कालों (प्रातः, मध्याह्न, सायं ) – की सन्ध्या करनी चाहिये, वह उन्हें अनन्त फल प्रदान करती है ॥ १३ ॥ ब्राह्मणों के लिये इन गायत्रीदेवी के अतिरिक्त अन्य देवता नहीं है। विष्णु तथा शिव की उपासना भी वैसी नित्य नहीं है, जैसी महादेवी गायत्री की वेदप्रतिपादित सन्ध्या नित्य है । गायत्रीदेवी की आराधना सम्पूर्ण वेदों का सार-स्वरूप है ॥ १४-१५ ॥ ब्रह्मा आदि देवता भी सन्ध्योपासना के समय उन गायत्रीदेवी का ध्यान तथा जप करते हैं । वेद उन गायत्री का नित्य जप करते हैं, अतएव वे ‘वेदोपास्या’ कही गयी हैं ॥ १६ ॥ इसीलिये सभी द्विज शाक्त हैं, वे न शैव हैं न वैष्णव । वे सभी वेदमाता आदिशक्ति गायत्री की उपासना करते हैं ॥ १७ ॥

केशव आदि नामों से आचमन करने के बाद प्राणायाम करने के अनन्तर सन्ध्योपासन में प्रवृत्त होना चाहिये। केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर, संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, पुरुषोत्तम, अधोक्षज, नरसिंह, अच्युत, जनार्दन, उपेन्द्र, हरि तथा श्रीकृष्ण इन चौबीस नामों के पूर्व ‘ॐकार’ तथा अन्त में ‘स्वाहा’ जोड़कर जल का प्राशन (आचमन) और इन्हीं नामों के पूर्व ‘ॐकार’ तथा अन्त में ‘नमः’ लगाकर शरीर के विभिन्न अंगों का स्पर्श करना चाहिये ॥ १८-२२ ॥ ‘ॐ केशवाय स्वाहा’ आदि ( ॐ केशवाय स्वाहा, ॐ माधवाय स्वाहा, ॐ नारायणाय स्वाहा ) तीन नाम-मन्त्रों से आचमन करके ‘ॐ गोविन्दाय नमः’, ‘ॐ विष्णवे नमः ‘ – इन दो नाम – मन्त्रों से दोनों हाथों का प्रक्षालन करना चाहिये । पुनः ‘मधुसूदन’ तथा ‘त्रिविक्रम’ – इन दो नामों से अँगूठे के मूल द्वारा दोनों ओष्ठों का प्रक्षालन और ‘वामन’ तथा ‘ श्रीधर’- इन नामों से मुख का सम्मार्जन करना चाहिये ॥ २३ ॥ ‘हृषीकेश’ – इस नामसे बायें हाथका, ‘पद्मनाभ’ नाम से दोनों पैरों का, तथा ‘दामोदर’ नाम से सिर का प्रोक्षण करना चाहिये। इसी प्रकार ‘संकर्षण’ आदि देवनामों से बारह अंगों का स्पर्श करना चाहिये । (‘संकर्षण’ नाम से परस्पर मिली हुई बीच की तीन अँगुलियों द्वारा मुख का, ‘वासुदेव’ तथा ‘प्रद्युम्न’ – इन दो नामों से अँगूठे और तर्जनी अँगुलियों द्वारा दोनों नासापुटों का, ‘अनिरुद्ध’ तथा ‘पुरुषोत्तम’ से अँगूठे और अनामिका द्वारा दोनों नेत्रों का, ‘अधोक्षज’ और ‘नारसिंह’ नामों द्वारा दोनों कानों का, ‘अच्युत’ से कनिष्ठिका और अँगूठे द्वारा नाभि का ‘जनार्दन’ से करतल द्वारा हृदय का, ‘उपेन्द्र’ से सिर का एवं ‘ॐ हरये नमः’ तथा ‘ॐ कृष्णाय नमः ‘ – इन दो नाम-मन्त्रों से दाहिनी और बायीं भुजा का स्पर्श करना चाहिये) ॥ २४ ॥

बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि दाहिने हाथ से जल पीते समय बायें हाथ से उसे स्पर्श किये रहे; क्योंकि वह जल तब तक शुद्ध नहीं होता जब तक बायें हाथ का स्पर्श नहीं होता ॥ २५ ॥ हाथी मुद्रा गाय के कान के आकार की बनाकर उससे मात्र एक माष जल से आचमन करना चाहिये । उससे अधिक या कम जल से आचमन करने वाला द्विज सुरापान करने वाले के समान होता है ॥ २६ ॥ दाहिने हाथ की कनिष्ठिका तथा अँगूठे को अलग- अलग करके शेष तीन अँगुलियों को सटाकर दाहिने हाथ से जल से आचमन करना बताया गया है ॥ २७ ॥ तत्पश्चात् प्रणव का उच्चारण करके गायत्रीशिरस् तथा गायत्री के तुरीय (चतुर्थ) पादसहित गायत्री का जप करते हुए प्राणायाम करना चाहिये ॥ २८ ॥

नासिका के दाहिने छिद्र से वायु का रेचन करना चाहिये, बायें छिद्र से वायु को उदर में भरना चाहिये तथा उस वायु को उदर में भरकर कुम्भरूप से धारण किये रहना चाहिये – इसी को विद्वानों ने प्राणायाम कहा है ॥ २९ ॥ [वायु को खींचते समय ] नासिका के दाहिने छिद्र को अँगूठे से दबाये । तत्पश्चात् कनिष्ठिका तथा अनामिका अँगुलियों से बायें नासिका छिद्र को बन्द कर ले; इसमें मध्यमा तथा तर्जनी का प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥ ३० ॥ संयमित चित्तवाले योगियों ने सभी शास्त्रों में इसी प्रकार के पूरक, कुम्भक तथा रेचक को ही प्राणायाम बताया है ॥ ३१ ॥ ‘रेचक’ वायु का सृजन करता है, ‘पूरक’ उसे पूर्ण करता है तथा साम्य स्थिति में जो उसे धारण किये रहता है, वह कुम्भक कहा गया है ॥ ३२ ॥ पूरक करते समय नीले कमल – पत्र के समान श्याम वर्ण वाले चतुर्भुज परमात्मा श्रीहरि का नाभिदेश में ध्यान करना चाहिये ॥ ३३ ॥ कुम्भक करते समय कमल के आसन पर विराजमान, चार मुखवाले, जगत् के स्वामी प्रजापति ब्रह्मा का हृदय में ध्यान करना चाहिये ॥ ३४ ॥ रेचक करते समय शुद्ध स्फटिक के सदृश, निर्मल तथा पापों का नाश करने वाले महेश्वर शिव का ललाट में ध्यान करना चाहिये ॥ ३५ ॥ मनुष्य पूरक प्राणायाम से विष्णु – सायुज्य, कुम्भक प्राणायाम से ब्रह्मा का पद तथा तीसरे रेचक प्राणायाम से माहेश्वर पद प्राप्त करता है ॥ ३६ ॥

हे देवर्षिश्रेष्ठ! मैंने पहले पौराणिक आचमन बता दिया है। हे मुने! अब आप पाप को दूर करके करने वाले ‘श्रौत आचमन’ के विषय में सुनिये ॥ ३७ ॥ पहले प्रणव (ॐ) – का उच्चारण गायत्री की ऋचा (तत्सवितुः आदि) तथा पद के आदि में तीनों व्याहृतियों से युक्त गायत्री मन्त्र को पढ़कर किया गया आचमन ‘ श्रौत – आचमन’ कहा जाता है ॥ ३८ ॥ गायत्री के पूर्व तीनों व्याहृतियाँ लगाकर तथा प्रत्येक व्याहृति में प्रणव (ॐ) जोड़कर शिरोभाग के साथ गायत्री मन्त्र का जप करना चाहिये। पूरक, कुम्भक तथा रेचक करते समय इसका तीन बार जप ही प्राणायाम है ( अब लक्षणसहित प्राणायाम का वर्णन किया जा रहा है । यह प्राणायाम नानाविध पापों का शमन करने वाला तथा महान् पुण्यफल प्रदान करने वाला है)। गृहस्थ तथा वानप्रस्थ को प्रणवमन्त्र से पाँचों अँगुलियों द्वारा नासिका के अग्रभाग को दबाना चाहिये। यह मुद्रा सभी प्रकार के पापों का हरण करने वाली है । ब्रह्मचारी और संन्यासी कनिष्ठिका. अनामिका तथा अँगूठा- इन अँगुलियों से प्राणायाम करें ॥ ३९-४०१/२

हे नारद! सूर्य को जल का अर्पण क्यों किया जाता है, उसका कारण अब सुनिये । मन्देहा नाम के महापराक्रमी तीस करोड़ राक्षस हैं। वे कृतघ्न, भयंकर तथा क्रूर राक्षस सूर्य को खा जाना चाहते हैं । ऐसी स्थिति में सभी देवता तथा तपोधन ऋषिगण भगवती महासन्ध्या की उपासना करते हैं और जलांजलि प्रदान करते हैं। इस प्रकार वज्र के समान हो जाने वाले उस जल से वे दैत्य भस्म हो जाते हैं । इसी कारण से विप्रगण नित्य सन्ध्या की उपासना करते हैं । सन्ध्योपासन महापुण्य का जनक कहा गया है ॥ ५३-५६ ॥

हे नारद! सुनिये, अब अर्घ्य का अंगरूप यह मन्त्र कहा जा रहा है, जिसके उच्चारणमात्र से सांगोपांग सन्ध्या का फल प्राप्त होता है ॥ ५७ ॥

सोऽहमर्कोऽस्म्यहं ज्योतिरात्मा ज्योतिरहं शिवः ।
आत्मज्योतिरहं शुक्लः सर्वज्योती रसोऽस्म्यहम् ॥ ५८ ॥
आगच्छ वरदे देवि गायत्रि ब्रह्मरूपिणि ।
जपानुष्ठानसिद्ध्यर्थं प्रविश्य हृदयं मम ॥ ५९ ॥
उत्तिष्ठ देवि गन्तव्यं पुनरागमनाय च ।
अर्घ्येषु देवि गन्तव्यं प्रविश्य हृदयं मम ॥ ६० ॥

वह सूर्य मैं ही हूँ, मैं ही आत्मज्योति हूँ, मैं ही शिव-सम्बन्धी ज्योति हूँ, आत्मज्योति भी मेरा ही रूप है, मैं सर्वशुक्ल ज्योति हूँ और मैं रसस्वरूप हूँ ॥ ५८ ॥ हे वरदे! हे देवि ! हे गायत्रि ! हे ब्रह्मस्वरूपिणि ! आप आइये और मेरे जप- – अनुष्ठान की सिद्धि हेतु मेरे हृदयमें प्रवेश कीजिये। हे देवि ! उठिये और पुनः आगमन के लिये यहाँ से प्रस्थान कीजिये और हे देवि ! इसी अर्घ्य के जल में स्थित होइये तथा पुनः मेरे हृदयदेश में विराजमान होइये ॥ ५९-६० ॥ तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष पवित्र स्थान पर अपना आसन लगाये और उस पर बैठकर वेदमाता गायत्री का जप करे ॥ ६१ ॥

हे मुने! इसी समय प्राणायाम के पश्चात् खेचरी मुद्रा करनी चाहिये । हे मुनिश्रेष्ठ ! प्रातः कालीन सन्ध्या के विधान में इस मुद्रा को बताया गया है। हे नारद! अब मैं इसके नाम का अर्थ बता रहा हूँ, आदरपूर्वक सुनिये। जिसके प्रभाव से चित्त आकाश में विचरण करता है, जिह्वा भी आकाश में जाकर संचरण करती है और दृष्टि दोनों भौंहों के अन्तर्गत स्थिर रहती है, वही खेचरी मुद्रा होती है । हे नारद! सिद्धासन के समान कोई आसन नहीं है, कुम्भक वायु के समान कोई वायु नहीं है और खेचरी मुद्रा के समान कोई मुद्रा नहीं है, यह ध्रुव सत्य है | घण्टा-ध्वनि के समान प्लुत स्वर से प्रणव का उच्चारण करते हुए श्वास को यत्नपूर्वक रोककर अहंकार तथा ममता से रहित होकर स्थिर भाव से स्थिरासन पर बैठना चाहिये । हे नारद! हे मुने ! अब आप सिद्धासनका लक्षण सुनिये ॥ ६२-६६ ॥

सिद्धासन में एक पैर का ‘मूल लिंग के मूलस्थान पर करके दूसरे पैर का मूल अण्डकोश के नीचे दृढ़तापूर्वक टिकाना चाहिये । हृदय आदि तथा शरीर को सीधा रखते हुए स्थाणु के रूप में तथा संयमित इन्द्रियों वाला होकर दोनों भौंहों के बीच में अचल दृष्टि से देखते हुए स्थिर रहना चाहिये। योगियों के लिये अत्यन्त सुखदायक इस आसन को सिद्धासन कहा जाता है ॥ ६७ ॥

[ हे नारद! अब मैं देवी के आवाहन तथा नमस्कार का मन्त्र बताता हूँ ]

आयातु वरदा देवी अक्षरं ब्रह्मसम्मितम् ।
गायत्री छन्दसां मातरिदं ब्रह्म जुषस्व मे ॥ ६८ ॥
यदह्ना कुरुते पापं तदह्ना प्रतिमुच्यते ।
यद्‌रात्र्या कुरुते पापं तद्‌रात्र्या प्रतिमुच्यते ॥ ६९ ॥
सर्ववर्णे महादेवि सन्ध्याविद्ये सरस्वति ।
अजरे अमरे देवि सर्वदेवि नमोऽस्तु ते ॥ ७० ॥

हे छन्दों की माता ! आप वर प्रदान करने वाली भगवती गायत्री हैं। आप अक्षरब्रह्मरूप हैं । हे ब्रह्मस्वरूपिणि! आप यहाँ आइये और मुझ पर प्रसन्न होइये । मनुष्य दिन में जो पाप करता है, वह पाप सायंकालीन उपासना से नष्ट हो जाता है और जो पाप रात में करता है, वह प्रातःकालीन उपासना से मिट जाता है । हे सर्ववर्णस्वरूपिणि! हे महादेवि ! हे सन्ध्याविद्ये ! हे सरस्वति! हे अजरे! हे अमरे! हे देवि ! हे सर्वदेवि ! आपको नमस्कार है ॥ ६८-७० ॥

तदनन्तर ‘तेजोऽसीति०’ आदि मन्त्र से देवी का आवाहन करना चाहिये । पुनः इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे कि

यत्कृतं त्वदनुष्ठानं तत्सर्वं पूर्णमस्तु मे ॥ ७१ ॥

मैंने जो कुछ भी आपका अनुष्ठान किया है, मेरा वह सब कार्य पूर्ण हो ॥ ७१ ॥ तत्पश्चात् शाप से मुक्त होने के लिये सम्यक् प्रकार से यत्न करना चाहिये । ब्रह्मशाप, विश्वामित्रशाप तथा वसिष्ठशाप यह तीन प्रकार का शाप है । ब्रह्मा का स्मरण करने से ही ब्रह्मशाप मिट जाता है। इसी प्रकार विश्वामित्र का स्मरण करने से विश्वामित्र के शाप से तथा वसिष्ठ का स्मरण करने से वसिष्ठ के शाप से निवृत्ति हो जाती है ॥ ७२–७४ ॥

[हे नारद! परमात्माका इस प्रकार ध्यान करे ]  

हृत्पद्ममध्ये पुरुषं प्रमाणं सत्यात्मकं सर्वजगत्स्वरूपम् ।
ध्यायामि नित्यं परमात्मसंज्ञं चिद्‌रूपमेकं वचसामगम्यम् ॥ ७५ ॥

मैं पुरुषाकार, सत्यात्मक, सम्पूर्ण जगत् के साक्षात् विग्रह, अद्वितीय, चिद्रूप, वाणी से अगम्य, शाश्वत तथा परमात्मा संज्ञावाले परमेश्वर का अपने हृदयकमल में नित्य ध्यान करता हूँ ॥ ७५ ॥

हे नारद! अब मैं सन्ध्या के प्रधान अंगस्वरूप न्यास की विधि का वर्णन करूँगा। सभी मन्त्रों के पूर्व ॐकार लगाना चाहिये, इसके बाद उन मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिये ॥ ७६ ॥ ‘ॐ भूः पादाभ्यां नमः ‘ ऐसा बोलकर दोनों पैरों का स्पर्श करना चाहिये। इसी प्रकार ‘ॐ भुवः जानुभ्यां नमः’ बोलकर जानु का, ‘ॐ स्वः कटिभ्यां नमः’ बोलकर कमर का, ‘ॐ महः नाभ्यै नमः ‘ बोलकर नाभि का, ‘ॐ जनः हृदयाय नमः’ बोलकर हृदय का, — ॐ तपः कण्ठाय नमः ‘ बोलकर कण्ठ का और ‘ॐ सत्यं ललाटाय नमः’ बोलकर ललाट का स्पर्श करना चाहिये ॥ ७७-७८ ॥ ‘ॐ तत्सवितुः अङ्गुष्ठाभ्यां नमः’, ‘ॐ वरेण्यं तर्जनीभ्यां नमः’, ‘ॐ भर्गो देवस्य मध्यमाभ्यां नमः’, ॐ धीमहि अनामिकाभ्यां नमः’, ‘ॐ धियो यो नः कनिष्ठाकाभ्यां नमः’, ‘ॐ प्रचोदयात् करतल- करपृष्ठाभ्यां नमः’ इस प्रकार उच्चारण करके बुद्धिमान् पुरुष को करन्यास करना चाहिये ॥ ७९-८० ॥ ॐ तत्सवितुर्ब्रह्मात्मने हृदयाय नमः’, ‘ॐ वरेण्यं विष्ण्वात्मने शिरसे नमः, ॐ भर्गो देवस्य रुद्रात्मने शिखायै नमः’, ‘ॐ धीमहि शक्त्यात्मने कवचाय नमः’, ‘ॐ धियो यो नः कालात्मने नेत्रत्रयाय नमः’, ‘ॐ प्रचोदयात् सर्वात्मने अस्त्राय नम:’  इस तरह से उच्चारण करके हृदय आदि अंगों में न्यास करना चाहिये ॥ ८१-८३ ॥

हे महामुने! अब इसके आगे मैं अक्षरन्यास बता रहा हूँ। गायत्री के वर्णों से किया जाने वाला यह न्यास श्रेष्ठ तथा सभी पापों का नाश करने वाला है । पहले प्रणव का उच्चारण करके वर्णन्यास करने की विधि बतायी गयी है। आरम्भ में ‘तत्’कार का उच्चारण करके पैर के दोनों अँगूठों में न्यास करना चाहिये । ‘स’कार का उच्चारण करके दोनों गुल्फों में तथा ‘वि’कार का उच्चारण करके दोनों जंघों में न्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् ‘तु ‘कार का उच्चारण करके दोनों जानुओं में न्यास करके ‘व’कार का दोनों उरुओं में, ‘रे’कार का गुदा में, ‘णि ‘कार का लिंग में, ‘य’कार का कटिभाग में, ‘भ’कार का नाभिमण्डल में, ‘गो’कार का हृदय में, ‘दे ‘कार का दोनों स्तनों में, ‘व’कार का हृदय में, ‘स्य’कार का कण्ठकूप में, ‘धी ‘कार का मुख में, ‘म’कार का तालुदेश में, ‘हि ‘कार का नासिका के अग्रभाग में, ‘धि’– कार का नेत्रमण्डल में, ‘यो ‘कार का भ्रूमध्य में, ‘यो ‘कार का ललाट में, ‘न’कार का मुख के पूर्व भाग में, ‘प्र’कार का मुख के दक्षिण भाग में, ‘चो ‘कार का मुख के पश्चिम भाग में, ‘द’कार का मुख के उत्तर भाग में, ‘या ‘कार का मस्तक में तथा ‘त’कार का सम्पूर्ण शरीर में न्यास करना जप में तत्पर रहने वाले कुछ लोग न्यास की इस
चाहिये ॥ ८४–९१ ॥

विधि को अभीष्ट नहीं मानते हैं । न्यास के पश्चात् जगत् को उत्पन्न करने वाली महाभगवती अम्बिका का इस प्रकार ध्यान करना चाहिये

भास्वज्जपाप्रसूनाभां कुमारीं परमेश्वरीम् ।
रक्ताम्बुजासनारूढां रक्तगन्धानुलेपनाम् ॥ ९३ ॥
रक्तमाल्याम्बरधरां चतुरास्यां चतुर्भुजाम् ।
द्विनेत्रां स्रुक्स्रुवो मालां कुण्डिकां चैव बिभ्रतीम् ॥ ९४ ॥
सर्वाभरणसन्दीप्तामृग्वेदाध्यायिनीं पराम् ।
हंसपत्रामाहवनीयमध्यस्थां ब्रह्मदेवताम् ॥ ९५ ॥
चतुष्पदामष्टकुक्षिं सप्तशीर्षां महेश्वरीम् ।
अग्निवक्त्रां रुद्रशिखां विष्णुचित्तां तु भावयेत् ॥ ९६ ॥
ब्रह्मा तु कवचं यस्या गोत्रं सांख्यायनं स्मृतम् ।
आदित्यमण्डलान्तःस्थां ध्यायेद्देवीं महेश्वरीम् ॥ ९७ ॥

इन परमेश्वरी का विग्रह तेजोमय जपाकुसुम की आभा के तुल्य है, ये कुमारी हैं, ये रक्त-कमल के आसन पर अवस्थित हैं, इनका श्रीविग्रह रक्त-चन्दन से अनुलिप्त है, ये रक्तवर्ण की माला तथा वस्त्र धारण किये हुई हैं, ये चार मुखों तथा चार भुजाओंवाली हैं, इनके प्रत्येक मुख में दो-दो नेत्र हैं। इन्होंने अपने हाथों में स्रुक्, स्रुवा, जपमाला तथा कमण्डलु धारण कर रखा है, ये सभी प्रकार के आभूषणों से प्रकाशित हैं, ये परा भगवती ऋग्वेद का पारायण कर रही हैं, ये हंस के वाहन पर विराजमान हैं, ये आहवनीय अग्नि के मध्य स्थित हैं, ये ब्रह्माजी की उपास्य देवता हैं, चारों वेद (ऋक्, यजुः, साम, अथर्व) ही इनके चार पद हैं, आठ दिशा (पूर्व, पश्चिम,उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व, अधः, अन्तरिक्ष तथा अवान्तर) रूपी कुक्षियों से ये शोभायमान हैं, सात सिरों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, निरुक्त, ज्योतिष, इतिहास – पुराण तथा उपनिषद्) से मण्डित हैं, ये अग्निरूप मुख; रुद्ररूप शिखा तथा विष्णुरूप चित्तवाली हैं ऐसे स्वरूपवाली परमेश्वरी भगवती की भावना करनी चाहिये । ब्रह्मा जिनके कवच हैं तथा सांख्यायन जिनका गोत्र कहा गया है, आदित्यमण्डल में विराजमान ऐसी भगवती महेश्वरी का ध्यान करना चाहिये ॥ ९२-९७ ॥

इस प्रकार विधिपूर्वक वेदमाता गायत्री का ध्यान करने के अनन्तर भगवती को प्रसन्न करने वाली कल्याणकारी मुद्राएँ प्रदर्शित करनी चाहिये ॥ ९८ ॥ सुमुख, सम्पुट, वितत, विस्तृत, द्विमुख, त्रिमुख, चतुर्मुख, पंचमुख, षण्मुख, अधोमुख, व्यापकांजलि, शकट, यमपाश, ग्रथित, सम्मुखोन्मुख, विलम्ब, मुष्टिक, मत्स्य, कूर्म, वराह, सिंहाक्रान्त, महाक्रान्त, मुद्गर और पल्लव इन चौबीस मुद्राओं को गायत्री के समक्ष प्रदर्शित करना चाहिये । पुनः विद्वान् पुरुष को चाहिये कि सौ अक्षरों वाली गायत्री की एक आवृत्ति करे ॥ ९९-१०२ ॥ गायत्री के चौबीस अक्षर तो बताये ही गये हैं । उसके बाद ‘जातवेदस’ नामक ऋचा का तथा त्र्यम्बक ऋचा (त्र्यम्बकं यजामहे० ) – की आवृत्ति करने से यह सौ अक्षरों वाली गायत्री होती है 1  । विद्वानों को एक बार इस महापुण्यदायिनी गायत्री का जप करना चाहिये। तत्पश्चात् पहले ॐकार का उच्चारण करके ‘भूर्भुवः स्वः’ के बाद चौबीस अक्षरों वाली गायत्री का जप करना चाहिये । इस प्रकार ब्राह्मण को नित्य जप करना चाहिये। ऐसा करने से वह विप्रश्रेष्ठ सन्ध्या का सम्पूर्ण फल प्राप्त करके सुखी हो जाता है ॥ १०३-१०६ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत ग्यारहवें स्कन्ध का ‘सन्ध्योपासननिरूपण’ नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १६ ॥

1. ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरण्येम् । भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् । ॐ जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो निदहाति वेदः । स नः पर्षदतिदुर्गाणि विश्वा नात्रैव सिन्धुं दुरितात्यग्निः – यह सौ अक्षर की गायत्री है। इसमें ‘भूर्भुवः स्वः’ तीन व्याहृतियाँ नहीं गिनी जाती हैं। ॐ ( एक प्रणव) – से सम्पन्न है ।

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