June 1, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-द्वादशः स्कन्धः-अध्याय-14 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-द्वादशः स्कन्धः-चतुर्दशोऽध्यायः चौदहवाँ अध्याय श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण की महिमा श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण-श्रवणफलवर्णनम् सूतजी बोले — पराम्बा देवी के मुखकमल से वेद- सिद्धान्त का बोधक जो आधा श्लोक 1 निकला था और जिसका उपदेश स्वयं देवी ने वट-पट पर शयन करने वाले विष्णु को किया था, उसी को पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने सौ करोड़ श्लोकों के रूप में विस्तृत कर दिया ॥ १-२ ॥ तत्पश्चात् व्यासजी ने शुकदेवजी को पढ़ाने के लिये इसके सारभाग को एकत्र करके अठारह हजार श्लोकों तथा बारह स्कन्धों से युक्त श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण की रचना की । वह पुराण अब भी देवलोक में वैसे ही विस्तृतरूप से विद्यमान है ॥ ३-४ ॥ इस पुराण के समान पुण्यदायक, पवित्र तथा पापनाशक दूसरा कोई पुराण नहीं है । इसके एक-एक पद का पाठ करने से मनुष्य अश्वमेधयज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥ ५ ॥ हे मुने! स्वयं अपने हाथ से देवीभागवतपुराण लिखकर या किसी लेखक से लिखवाकर पुराण का वाचन करने वाले विद्वान् को इसे देकर वस्त्र तथा आभूषण आदि से उनकी पूजा करके उनके प्रति व्यासबुद्धि रखकर नियमपूर्वक उनके मुख से इस पुराण का श्रवण करना चाहिये। कथा की समाप्ति के दिन भाद्रपदपूर्णिमा तिथि को स्वर्णसिंहासन पर स्थापित करके इस पुराण का दान उस पौराणिक विद्वान् को करना चाहिये । पुनः दक्षिणा के रूप में उन्हें विविध अलंकारों तथा सोने के हार से विभूषित और बछड़े से युक्त दूध देने वाली कपिला गौ प्रदान करनी चाहिये ॥ ६–८ ॥ कथा के अन्त में पुराण में जितने अध्याय हैं; उतने ही ब्राह्मणों तथा उतनी ही सुवासिनियों को, उतनी ही कुमारियों और बालकों के साथ भोजन कराना चाहिये । उन सबमें देवी की भावना करके वस्त्र, आभूषण, चन्दन, माला, पुष्प आदि से उनकी पूजा करे एवं उत्तम पायसान्न (खीर) – का भोजन कराये ॥ ९-१० ॥ मनुष्य इस पुराण के दान से पृथ्वी के दान का फल प्राप्त करता है और इस लोक में सुख भोगकर अन्त में देवीलोक को प्राप्त होता है ॥ ११ ॥ जो इस श्रेष्ठ श्रीमद्देवीभागवत का नित्य भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, उसके लिये कुछ भी कहीं और कभी दुर्लभ नहीं है । इसके श्रवण से पुत्रहीन व्यक्ति को पुत्र, धन चाहने वाले को धन और विद्या के अभिलाषी को विद्या की प्राप्ति हो जाती है, साथ ही सम्पूर्ण पृथ्वीलोक में वह कीर्तिमान् हो जाता है ॥ १२-१३ ॥ जो स्त्री वन्ध्या, काकवन्ध्या अथवा मृतवन्ध्या हो; वह इस पुराण के श्रवण से उस दोष से मुक्त हो जाती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १४ ॥ यह पुराण जिस घर में विधिपूर्वक पूजित होकर स्थित रहता है, उस घर को लक्ष्मी तथा सरस्वती कभी नहीं छोड़तीं और वेताल, डाकिनी तथा राक्षस आदि वहाँ झाँकते तक नहीं। यदि ज्वरग्रस्त मनुष्य को स्पर्श करके एकाग्रचित्त होकर इस पुराण का पाठ किया जाय तो दाहक ज्वर उसके मण्डल को छोड़कर भाग जाता है। इसकी एक सौ आवृत्ति के पाठ से क्षयरोग समाप्त हो जाता है ॥ १५–१७ ॥ जो मनुष्य प्रत्येक सन्ध्या के अवसर पर दत्तचित्त होकर सन्ध्या-विधि सम्पन्न करके इस पुराण के एक-एक अध्याय का पाठ करता है, वह ज्ञानवान् हो जाता है ॥ १८ ॥ कार्य-अकार्य के अवसरों पर इस पुराण के द्वारा शकुन का भी विचार करना चाहिये । हे मुने ! उसकी विधि का वर्णन मेरे द्वारा पहले किया जा चुका है ॥ १९ ॥ शारदीय नवरात्र में परम भक्ति से इस पुराण का नित्य पाठ करना चाहिये। इससे जगदम्बा उस व्यक्ति पर प्रसन्न होकर उसकी अभिलाषा से भी अधिक फल प्रदान करती हैं ॥ २० ॥ वैष्णव, शैव, सौर तथा गाणपत्यजनों को अपने- अपने इष्टदेव की शक्ति की सन्तुष्टि के लिये चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ – इन मासों के चारों नवरात्रों में इस पुराण का प्रयत्नपूर्वक पाठ करना चाहिये; इससे रमा, उमा आदि शक्तियाँ उसपर सदा प्रसन्न रहती हैं । हे मुने! इसी प्रकार वैदिकों को भी अपनी गायत्री की प्रसन्नता के लिये इसका नित्य पाठ करना चाहिये। इस पुराण में कहीं किसी का विरोधवचन नहीं है। [वैष्णव, सौर आदि ] सभी जनों की उपासना सदा शक्तियुक्त ही होती है, इसलिये शक्ति को सन्तुष्ट करने के लिये द्विजों को इस पुराण का सदा पाठ करना चाहिये। स्त्रियों तथा शूद्रों को चाहिये कि वे अज्ञानवश इसका कभी पाठ न करें, अपितु वे ब्राह्मण के मुख से ही इसका नित्य श्रवण करें, यही मर्यादा है। अधिक कहने से क्या लाभ, मैं आपको इसका वास्तविक सार बताऊँगा ॥ २१-२५ ॥ हे श्रेष्ठ मुनियो ! यह पुराण परम पवित्र तथा वेदों का सारस्वरूप है। इसके पढ़ने तथा सुनने से वेदपाठ के समान फल प्राप्त होता है ॥ २६ ॥ गायत्री नाम से प्रतिपादित उन सच्चिदानन्द- स्वरूपिणी ह्रींमयी भगवती को मैं प्रणाम करता हूँ, वे हमारी बुद्धि को प्रेरणा प्रदान करें — सच्चिदानन्दरूपां तां गायत्रीप्रतिपादिताम् । नमामि ह्रींमयीं देवीं धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ २७ ॥ पौराणिकों में श्रेष्ठ सूतजी का यह वचन सुनकर नैमिषारण्यवासी तपोधन मुनियों ने बड़े समारोह के साथ उनका सम्मान किया ॥ २८ ॥ भगवती के चरणकमलों के उपासक वे सभी मुनि प्रसन्न हृदयवाले हो गये । इस पुराण के प्रभाव से वे परम शान्ति को प्राप्त हुए ॥ २९ ॥ मुनियों ने सूतजी को नमस्कार किया और बार-बार क्षमा-प्रार्थना करके कहा — हे तात! इस संसार -सागर से पार करने के लिये आप ही निश्चितरूप से हमारे लिये नौकास्वरूप हैं ॥ ३० ॥ इस प्रकार सभी श्रेष्ठ मुनियों के समक्ष सभी वेदों के गुह्य विषयरूप इस दुर्गाचरित्रप्रतिपादक श्रीमद्देवीभागवत-पुराण को विनयसम्पन्न मुनिजनों को सुनाकर तथा उनके आशीर्वाद से वृद्धि को प्राप्त होकर भगवती के चरणकमलों के भृंगस्वरूप सूतजी वहाँ से चले गये ॥ ३१ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत बारहवें स्कन्ध का ‘श्रीमद्देवीभागवतमहापुराणश्रवणफलवर्णन’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥ ॥ द्वादश स्कन्ध समाप्त ॥ ॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण सम्पूर्ण ॥ 1. सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्॥ ( श्रीमद्देवीभा० १ । १५ । ५२ ) अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ और दूसरा कोई भी सनातन नहीं है । Content is available only for registered users. 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