॥ श्रीहरिः ॥
॥ श्रीमद्भागवतकी आरती ॥
आरति अतिपावन पुरान की ।
धर्म-भक्ति-विज्ञान-खान की ॥ आरति अतिपावन पुरान की ॥

महापुरान भागवत निरमल ।
शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल ।
परमानन्द-सुधा-रसमय कल ।
लीला-रति-रस रस-निधान की ॥ आरति अतिपावन पुरान की ॥

कलि-मल-मथनि त्रिताप-निवारिनि ।
जन्म-मृत्युमय भव-भय-हारिनि ।
सेवत सतत सकल सुखकारिनि ।
सुमहौषधि हरि-चरित-गान की ॥ आरति अतिपावन पुरान की ॥

विषय-विलास-विमोह-विनाशिनि ।
विमल विराग विवेक विकाशिनि ।
भगवत्तत्त्व-रहस्य प्रकाशिनि ।
परम ज्योति परमात्म-ज्ञान की ॥ आरति अतिपावन पुरान की ॥
vadicjagat
परमहंस-मुनि-मन उल्लासिनि ।
रसिक-हृदय रस-रास-विलासिनि ।
भुक्ति, मुक्ति, रतिप्रेम सुदासिनि ।
कथा अकिञ्चनप्रिय सुजान की ॥ आरति अतिपावन पुरान की ॥

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