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श्रीमद्भागवतमहापुराण – एकादशः स्कन्ध – अध्याय ११
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
ग्यारहवाँ अध्याय
बद्ध, मुक्त और भक्तजनों के लक्षण

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — प्यारे उद्धव ! आत्मा बद्ध है या मुक्त है, इस प्रकार की व्याख्या या व्यवहार मेरे अधीन रहनेवाले सत्त्वादि गुणों की उपाधि से ही होता है । वस्तुतः – तत्त्वदृष्टि से नहीं । सभी गुण मायामूलक हैं — इन्द्रजाल हैं — जादू के खेल के समान हैं । इसलिये न मेरा मोक्ष हैं, न तो मेरा बन्धन ही है ॥ १ ॥ जैसे स्वप्न बुद्धि का विवर्त है — उसमें बिना हुए ही भासता है — मिथ्या है, वैसे ही शोक-मोह, सुख-दुःख, शरीर की उत्पत्ति और मृत्यु — यह सब संसार का बखेड़ा माया (अविद्या) के कारण प्रतीत होने पर भी वास्तविक नहीं है ॥ २ ॥ उद्धव ! शरीरधारियों को मुक्ति का अनुभव करानेवाली आत्मविद्या और बन्धन का अनुभव करानेवाली अविद्या — ये दोनों ही मेरी अनादि शक्तियाँ हैं । मेरी माया से ही इनकी रचना हुई हैं । इनका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है ॥ ३ ॥ भाई ! तुम तो स्वयं बड़े बुद्धिमान् हो, विचार करो — जीव तो एक ही है । वह व्यवहार के लिये ही मेरे अंश के रूप में कल्पित हुआ है, वस्तुतः मेरा स्वरूप ही है । आत्मज्ञान से सम्पन्न होने पर उसे मुक्त कहते हैं और आत्मा का ज्ञान न होने से बद्ध । यह अज्ञान अनादि होने से बन्धन भी अनादि कहलाता है ॥ ४ ॥ इस प्रकार मुझ एक ही धर्मी में रहने पर भी जो शोक और आनन्दरूप विरुद्ध धर्मवाले जान पड़ते हैं, उन बद्ध और मुक्त जीव का भेद मैं बतलाता हूँ ॥ ५ ॥

(वह भेद दो प्रकार का है — एक तो नित्य-मुक्त ईश्वर से जीव का भेद, और दूसरा मुक्त-बद्ध जीव का भेद । पहला सुनो) — जीव और ईश्वर बद्ध और मुक्त के भेद से भिन्न-भिन्न होने पर भी एक ही शरीर में नियन्ता और नियन्त्रित के रूप से स्थित हैं । ऐसा समझो कि शरीर एक वृक्ष है, इसमें हृदय का घोंसला बनाकर जीव और ईश्वर नाम के दो पक्षी रहते हैं । वे दोनों चेतन होने के कारण समान हैं और कभी न बिछुड़ने के कारण सखा हैं । इनके निवास करने का कारण केवल लीला ही है । इतनी समानता होने पर भी जीव तो शरीर रूप वृक्ष के फल सुख-दुःख आदि भोगता है, परन्तु ईश्वर उन्हें न भोगकर कर्मफल सुख-दुःख आदि से असङ्ग और उनका साक्षीमात्र रहता है । अभोक्ता होने पर भी ईश्वर की यह विलक्षणता है कि वह ज्ञान, ऐश्वर्य, आनन्द और सामर्थ्य आदि में भोक्ता जीव से बढ़कर है ॥ ६ ॥ साथ ही एक यह भी विलक्षणता है कि अभोक्ता ईश्वर तो अपने वास्तविक स्वरूप और इसके अतिरिक्त जगत् को भी जानता हैं, परन्तु भोक्ता जीव ने अपने वास्तविक रूप को जानता है और न अपने से अतिरिक्त को । इन दोनों में जीव तो अविद्या से युक्त होने के कारण नित्यबद्ध है और ईश्वर विद्यास्वरूप होने के कारण नित्यमुक्त है ॥ ७ ॥

प्यारे उद्धव ! ज्ञानसम्पन्न पुरुष भी मुक्त ही है; जैसे स्वप्न टूट जाने पर जगा हुआ पुरुष स्वपन के स्मर्यमाण शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं रखता, वैसे ही ज्ञानी पुरुष सूक्ष्म और स्थूल-शरीर में रहने पर भी उनसे किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखता, परन्तु अज्ञानी पुरुष वास्तव में शरीर से कोई सम्बन्ध न रखने पर भी अज्ञान के कारण शरीर में ही स्थित रहता है, जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्न देखते समय स्वाप्निक शरीर में बँध जाता है ॥ ८ ॥ व्यवहारादि में इन्द्रियाँ शब्द-स्पर्शादि विषयों को ग्रहण करती हैं, क्योंकि यह तो नियम ही है कि गुण ही गुण को ग्रहण करते हैं, आत्मा नहीं । इसलिये जिसने अपने निर्विकार आत्मस्वरूप को समझ लिया है, वह उन विषयों के ग्रहण-त्याग में किसी प्रकार का अभिमान नहीं करता ॥ ९ ॥ यह शरीर प्रारब्ध के अधीन है । इससे शारीरिक और मानसिक जितने भी कर्म होते हैं, सब गुणों की प्रेरणा से ही होते हैं । अज्ञानी पुरुष झूठ-मूठ अपने को उन ग्रहण-त्याग आदि कर्मों का कर्ता मान बैठता है और इसी अभिमान के कारण वह बँध जाता है ॥ १० ॥

प्यारे उद्धव ! पूर्वोक्त पद्धति से विचार करके विवेकी पुरुष समस्त विषयों से विरक्त रहता है और सोने-बैठने, घूमने-फिरने, नहाने, देखने, छूने, सुँघने, खाने और सुनने आदि क्रियाओं में अपने को कर्ता नहीं मानता, बल्कि गुणों को ही कर्ता मानता है । गुण ही सभी कर्मों के कर्ता-भोक्ता हैं — ऐसा जानकर विद्वान् पुरुष कर्मवासना और फलों से नहीं बँधते । वे प्रकृति में रहकर भी वैसे ही असङ्ग रहते हैं, जैसे स्पर्श आदि से आकाश, जल की आर्द्रता आदि से सूर्य और गन्ध आदि से वायु । उनकी विमल बुद्धि की तलवार असङ्ग-भावना की सान से और भी तीखी हो जाती है, और वे उससे अपने सारे संशय-सन्देह को काट-कूटकर फेंक देते हैं । जैसे कोई स्वप्न से जाग उठा हो, उसी प्रकार वे इस भेदबुद्धि के भम से मुक्त हो जाते हैं ॥ ११-१३ ॥ जिनके प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि की समस्त चेष्टाएँ बिना सङ्कल्प के होती हैं, वे देह में स्थित रहकर भी उसके गुणों से मुक्त हैं ॥ १४ ॥ उन तत्त्वज्ञ मुक्त पुरुषों के शरीर को चाहे हिंसक लोग पीड़ा पहुँचायें और चाहे कभी कोई दैवयोग से पूजा करने लगे — वे न तो किसी के सताने से दुखी होते हैं और न पूजा करने से सुखी ॥ १५ ॥

जो समदर्शी महात्मा गुण और दोष की भेददृष्टि से ऊपर उठ गये हैं, वे न तो अच्छे काम करनेवाले की स्तुति करते हैं और न बुरे काम करनेवाले की निन्दा; न वे किसी की अच्छी बात सुनकर उसकी सराहना करते हैं और न बुरी बात सुनकर किसी को झिड़कते ही हैं ॥ १६ ॥ जीवन्मुक्त पुरुष न तो कुछ भला या बुरा काम करते हैं, न कुछ भला या बुरा कहते हैं और न सोचते ही हैं । वे व्यवहार में अपनी समान वृत्ति रखकर आत्मानन्द में ही मग्न रहते हैं और जड़ के समान मानो कोई मूर्ख हो इस प्रकार विचरण करते रहते हैं ॥ १७ ॥

प्यारे उद्धव ! जो पुरुष वेदों का तो पारगामी विद्वान् हो, परन्तु परब्रह्म के ज्ञान से शून्य हो, उसके परिश्रम का कोई फल नहीं है वह तो वैसा ही हैं, जैसे बिना दूध की गाय का पालनेवाला ॥ १८ ॥ दूध न देनेवाली गाय, व्यभिचारिणी स्त्री, पराधीन शरीर, दुष्ट पुत्र, सत्पात्र के प्राप्त होने पर भी दान न किया हुआ धन और मेरे गुणों से रहित वाणी — व्यर्थ है । इन वस्तुओं की रखवाली करनेवाला दुःख-पर-दुःख ही भोगता रहता हैं ॥ १९ ॥ इसलिये उद्धव ! जिस वाणी में जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप मेरी लोक-पावन लीला का वर्णन न हो और लीलावतारों में भी मेरे लोकप्रिय राम-कृष्णादि अवतारों का जिसमें यशोगान न हो, वह वाणी वन्ध्या हैं । बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि ऐसी वाणी का उच्चारण एवं श्रवण न करे ॥ २० ॥

प्रिय उद्धव ! जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है, आत्मजिज्ञासा और विचार के द्वारा आत्मा में जो अनेकता का भ्रम है, उसे दूर कर दे और मुझ सर्वव्यापी परमात्मा में अपना निर्मल मन लगा दे तथा संसार के व्यवहारों से उपराम हो जाय ॥ २१ ॥ यदि तुम अपना मन परब्रह्म में स्थिर न कर सको, तो सारे कर्म निरपेक्ष होकर मेरे लिये ही करो ॥ २२ ॥ मेरो कथाएँ समस्त लोकों को पवित्र करनेवाली एवं कल्याणस्वरूपिणी हैं । श्रद्धा के साथ उन्हें सुनना चाहिये । बार-बार मेरे अवतार और लीलाओं का गान, स्मरण और अभिनय करना चाहिये ॥ २३ ॥ मेरे आश्रित रहकर मेरे ही लिये धर्म, काम और अर्थ का सेवन करना चाहिये । प्रिय उद्धव ! जो ऐसा करता है, उसे मुझ अविनाशी पुरुष के प्रति अनन्य प्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाती हैं ॥ २४ ॥ भक्ति की प्राप्ति सत्सङ्ग से होती है, जिसे भक्ति प्राप्त हो जाती हैं, वह मेरी उपासना करता है, मेरे सान्निध्य का अनुभव करता है । इस प्रकार जब उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब वह संतों के उपदेशों के अनुसार उनके द्वारा बताये हुए मेरे परमपद को वास्तविक स्वरूप को सहज ही में प्राप्त हो जाता है ॥ २५ ॥

उद्धवजी ने पूछा — भगवन् ! बड़े-बड़े संत आपकी कीर्ति का गान करते हैं । आप कृपया बतलाइये कि आपके विचार से संत पुरुष का क्या लक्षण है ? आपके प्रति कैसी भक्ति करनी चाहिये, जिसका संत लोग आदर करते हैं ? ॥ २६ ॥ भगवन् ! आप ही ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता, सत्यादि लोक और चराचर जगत् के स्वामी हैं । मैं आपका विनीत, प्रेमी और शरणागत भक्त हूँ । आप मुझे भक्ति और भक्त का रहस्य बतलाइये ॥ २७ ॥ भगवन् ! मैं जानता हूँ कि आप प्रकृति से परे पुरुषोत्तम एवं चिदाकाशस्वरूप ब्रह्म हैं । आपसे भिन्न कुछ भी नहीं है, फिर भी आपने लीला के लिये स्वेच्छा से ही यह अलग शरीर धारण करके अवतार लिया है । इसलिये वास्तव में आप ही भक्ति और भक्त का रहस्य बतला सकते हैं ॥ २८ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — प्यारे उद्धव ! मेरा भक्त कृपा की मूर्ति होता है । वह किसी भी प्राणी से वैरभाव नहीं रखता और घोर-से-घोर दुःख भी प्रसन्नतापूर्वक सहता है । उसके जीवन का सार है सत्य, और उसके मन में किसी प्रकार की पापवासना कभी नहीं आती । वह समदर्शी और सबका भला करनेवाला होता है ॥ २९ ॥ उसकी बुद्धि कामनाओं से कलुषित नहीं होती । वह संयमी, मधुरस्वभाव और पवित्र होता है । संग्रह-परिग्रह से सर्वथा दूर रहता है । किसी भी वस्तु के लिये वह कोई चेष्टा नहीं करता । परिमित भोजन करता है और शान्त रहता है । उसकी बुद्धि स्थिर होती हैं । उसे केवल मेरा ही भरोसा होता है और वह आत्मतत्त्व के चिन्तन में सदा संलग्न रहता है ॥ ३० ॥ वह प्रमादरहित, गम्भीरस्वभाव और धैर्यवान् होता है । भूख-प्यास, शोक-मोह और जन्म-मृत्यु — ये छहों उसके वश में रहते हैं । वह स्वयं तो कभी किसी से किसी प्रकार का सम्मान नहीं चाहता, परन्तु दूसरों का सम्मान करता रहता है । मेरे सम्बन्ध की बातें दूसरों को समझाने में बड़ा निपुण होता हैं । और सभी के साथ मित्रता को व्यवहार करता है । उसके हृदय में करुणा भरी होती है । मेरे तत्त्व का उसे यथार्थ ज्ञान होता है ॥ ३१ ॥

प्रिय उद्धव ! मैंने वेदों और शास्त्रों के रूप में मनुष्यों के धर्म का उपदेश किया है, उनके पालन से अन्तःकरणशुद्धि आदि गुण और उल्लङ्घन से नरकादि दुःख प्राप्त होते हैं, परन्तु मेरा जो भक्त उन्हें भी अपने ध्यान आदि में विक्षेप समझकर त्याग देता हैं और केवल मेरे ही भजन में लगा रहता है, वह परम संत हैं ॥ ३२ ॥ मैं कौन हूँ, कितना बड़ा हूँ, कैसा हूँ — इन बातों को जाने, चाहे न जाने; किन्तु जो अनन्यभाव से मेरा भजन करते हैं, वे मेरे विचार से मेरे परम भक्त हैं ॥ ३३ ॥ प्यारे उद्धव ! मेरी मूर्ति और मेरे भक्तजनों का दर्शन, स्पर्श, पूजा, सेवा-शुश्रूषा, स्तुति और प्रणाम करे तथा मेरे गुण और कर्मों का कीर्तन करे ॥ ३४ ॥ उद्धव ! मेरी कथा सुनने में श्रद्धा रक्खे और निरन्तर मेरा ध्यान करता रहे । जो कुछ मिले, वह मुझे समर्पित कर दे और दास्यभाव से मुझे आत्मनिवेदन करे ॥ ३५ ॥ मेरे दिव्य जन्म और कर्मों की चर्चा करे । जन्माष्टमी, रामनवमी आदि पर्वों पर आनन्द मनावे और संगीत, नृत्य, बाजे और समाज द्वारा मेरे मन्दिरों में उत्सव करे-करावे ॥ ३६ ॥ वार्षिक त्यौहारों के दिन मेरे स्थानों की यात्रा करे, जुलूस निकाले तथा विविध उपहारों से मेरी पूजा करे । वैदिक अथवा तान्त्रिक पद्धति से दीक्षा ग्रहण करे । मेरे व्रतों का पालन करे ॥ ३७ ॥

मन्दिरों में मेरी मूर्तियों की स्थापना में श्रद्धा रखे । यदि यह काम अकेला न कर सके, तो औरों के साथ मिलकर उद्योग करे । मेरे लिये पुष्पवाटिका, बगीचे, क्रीड़ा के स्थान, नगर और मन्दिर बनवावे ॥ ३८ ॥ सेवक की भाँति श्रद्धाभक्ति के साथ निष्कपट भाव से मेरे मन्दिरों की सेवा-शुश्रूषा करे — झाड़े-बुहारे, लीपे-पोते, छिड़काव करे और तरह-तरह के चौक पूरे ॥ ३९ ॥ अभिमान न करे, दम्भ न करे । साथ ही अपने शुभ कर्मों का ढिंढोरा भी न पीटे । प्रिय उद्धव ! मेरे चढ़ावे को अपने काम में लगाने की बात तो दूर रही, मुझे समर्पित दीपक के प्रकाश से भी अपना काम न ले । किसी दूसरे देवता की चढ़ायी हुई वस्तु मुझे न चढ़ावे ॥ ४० ॥ संसार में जो वस्तु अपने को सबसे प्रिय, सबसे अभीष्ट जान पड़े वह मुझे समर्पित कर दे । ऐसा करने से वह वस्तु अनन्त फल देनेवाली हो जाती है ॥ ४१ ॥ .

भद्र ! सूर्य, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, वैष्णव, आकाश, वायु, जल, पृथ्वी, आत्मा और समस्त प्राणी — ये सब मेरी पूजा के स्थान हैं ॥ ४२ ॥ प्यारे उद्धव ! ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के मन्त्रों द्वारा सूर्य में मेरी पूजा करनी चाहिये । हवन के द्वारा अग्नि में, आतिथ्य द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मण में और हरी-हरी घास आदि के द्वारा गौ में मेरी पूजा करे ॥ ४३ ॥ भाई-बन्धु के समान सत्कार के द्वारा वैष्णव में, निरन्तर ध्यान में लगे रहने से हृदयाकाश में, मुख्य प्राण समझने से वायु में और जल-पुष्प आदि सामग्रियों द्वारा जल में मेरी आराधना की जाती हैं ॥ ४४ ॥ गुप्तमन्त्रों द्वारा न्यास करके मिट्टी की वेदी में, उपयुक्त भोगों द्वारा आत्मा में और समदृष्टि द्वारा सम्पूर्ण प्राणियों में मेरी आराधना करनी चाहिये; क्योंकि मैं सभी में क्षेत्रज्ञ आत्मा के रूप में स्थित हूँ ॥ ४५ ॥

इन सभी स्थानों में शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म धारण किये चार भुजाओंवाले शान्तमूर्ति श्रीभगवान् विराजमान हैं, ऐसा ध्यान करते हुए एकाग्रता के साथ मेरी पूजा करनी चाहिये ॥ ४६ ॥ इस प्रकार जो मनुष्य एकाग्र चित से यज्ञ-यागादि इष्ट और कुआँ-बावली बनवाना आदि पृर्तकर्मों के द्वारा मेरी पूजा करता है, उसे मेरी श्रेष्ठ भक्ति प्राप्त होती है तथा संतपुरुषों की सेवा करने से मेरे स्वरूप का ज्ञान भी हो जाता हैं ॥ ४७ ॥ प्यारे उद्धव ! मेरा ऐसा निश्चय है कि सत्सङ्ग और भक्तियोग — इन दो साधनों का एक साथ ही अनुष्ठान करते रहना चाहिये । प्रायः इन दोनों के अतिरिक्त संसारसागर से पार होने का और कोई उपाय नहीं है, क्योंकि संतपुरुष मुझे अपना आश्रय मानते हैं और मैं सदा सर्वदा उनके पास बना रहता हूँ ॥ ४८ ॥ प्यारे उद्धव ! अब मैं तुम्हें एक अत्यन्त गोपनीय परम रहस्य की बात बतलाऊँगा; क्योंकि तुम मेरे प्रिय सेवक, हितैषी, सुहद् और प्रेमी सखा हो; साथ ही सुनने के भी इच्छुक हो ॥ ४९ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां एकादशस्कन्धे एकादशोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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