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श्रीमद्भागवतमहापुराण – एकादशः स्कन्ध – अध्याय २०
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
बीसवाँ अध्याय
ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग

उद्धवजी ने कहा — कमलनयन श्रीकृष्ण ! आप सर्वशक्तिमान् हैं । आपकी आज्ञा ही वेद है, उसमें कुछ कर्मों को करने की विधि है और कुछ करने का निषेध हैं । यह विधि-निषेध कर्मों के गुण और दोष की परीक्षा करके ही तो होता हैं ॥ १ ॥ वर्णाश्रम-भेद, प्रतिलोम और अनुलोमरूप वर्ण-संकर, कर्मों के उपयुक्त और अनुपयुक्त द्रव्य, देश, आयु और काल तथा स्वर्ग और नरक के भेदों का बोध भी वेदों से ही होता है ॥ २ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि आपकी वाणी ही वेद है, परन्तु उसमें विधि-निषेध ही तो भरा पड़ा है । यदि उसमें गुण और दोष में भेद करनेवाली दृष्टि न हो, तो वह प्राणियों का कल्याण करने में समर्थ ही कैसे हो ? ॥ ३ ॥ सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ! आपकी वाणी वेद ही पितर, देवता और मनुष्यों के लिये श्रेष्ठ मार्ग-दर्शक का काम करता है, क्योंकि उसी के द्वारा स्वर्ग-मोक्ष आदि अदृष्ट वस्तुओं का बोध होता है और इस लोक में भी किसका कौन-सा साध्य है और क्या साधन — इसका निर्णय भी उसी से होता है ॥ ४ ॥ प्रभो ! इसमें सन्देह नहीं कि गुण और दोषों में भेददृष्टि आपकी वाणी वेद के ही अनुसार है, किसी की अपनी कल्पना नहीं; परन्तु प्रश्न तो यह है कि आपकी वाणी ही भेद का निषेध भी करती है । यह विरोध देखकर मुझे भ्रम हो रहा हैं । आप कृपा करके मेरा यह भ्रम मिटाइये ॥ ५ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — प्रिय उद्धव ! मैंने ही वेदों में एवं अन्यत्र भी मनुष्यों का कल्याण करने के लिये अधिकारिभेद से तीन प्रकार के योगों का उपदेश किया है । वे हैं — ज्ञान, कर्म और भक्ति । मनुष्य के परम कल्याण के लिये इनके अतिरिक्त और कोई उपाय कहीं नहीं है ॥ ६ ॥ उद्धवजी ! जो लोग कर्मों तथा उनके फल से विरक्त हों गये हैं और उनका त्याग कर चुके हैं, वे ज्ञानयोग के अधिकारी हैं । इसके विपरीत जिनके चित्त में कर्मों और उनके फलों से वैराग्य नहीं हुआ है, उनमें दुःख-बुद्धि नहीं हुई है, वे सकाम व्यक्ति कर्मयोग के अधिकारी हैं ॥ ७ ॥ जो पुरुष न तो अत्यन्त विरक्त है और न अत्यन्त आसक्त ही है तथा किसी पूर्वजन्म के शुभकर्म से सौभाग्यवश मेरी लीला-कथा आदि में उसकी श्रद्धा हो गयी है, वह भक्तियोग का अधिकारी है । उसे भक्तियोग के द्वारा ही सिद्धि मिल सकती है ॥ ८ ॥ कर्म के सम्बन्ध में जितने भी विधि-निषेध हैं, उनके अनुसार तभी तक कर्म करना चाहिये, जब तक कर्ममय जगत् और उसे प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि सुखों से वैराग्य न हो जाय अथवा जब तक मेरी लीला-कथा के श्रवण-कीर्तन आदि में श्रद्धा न हो जाय ॥ ९ ॥ उद्धव ! इस प्रकार अपने वर्ण और आश्रम के अनुकूल धर्म में स्थित रहकर यज्ञों के द्वारा बिना किसी आशा और कामना के मेरी आराधना करता रहे और निषिद्ध कर्मों से दूर रहकर केवल विहित कर्मों का ही आचरण करे तो उसे स्वर्ग या नरक में नहीं जाना पड़ता ॥ १० ॥

अपने धर्म में निष्ठा रखनेवाला पुरुष इस शरीर में रहते-रहते ही निषिद्ध कर्म का परित्याग कर देता है और रागादि मलों से भी मुक्त-पवित्र हो जाता है । इसी से अनायास ही उसे आत्म-साक्षात्काररूप विशुद्ध तत्त्वज्ञान अथवा द्रुत-चित्त होने पर मेरी भक्ति प्राप्त होती हैं ॥ ११ ॥ यह विधि-निषेधरूप कर्म का अधिकारी मनुष्य-शरीर बहुत ही दुर्लभ हैं । स्वर्ग और नरक दोनों ही लोकों में रहनेवाले जीव इसकी अभिलाषा करते रहते हैं: क्योंकि इसी शरीर में अन्तःकरण की शुद्धि होने पर ज्ञान अथवा भक्ति की प्राप्ति हो सकती है, स्वर्ग अथवा नरक का भोगप्रधान शरीर किसी भी साधन के उपयुक्त नहीं है । बुद्धिमान् पुरुष को न तो स्वर्ग की अभिलाषा करनी चाहिये और न नरक की ही । और तो क्या, इस मनुष्य-शरीर की भी कामना न करनी चाहिये, क्योंकि किसी भी शरीर में गुणबुद्धि और अभिमान हो जाने से अपने वास्तविक स्वरूप की प्राप्ति के साधन में प्रमाद होने लगता हैं ॥ १२-१३ ॥ यद्यपि यह मनुष्य-शरीर हैं तो मृत्युप्रस्त ही, परन्तु इसके द्वारा परमार्थकी — सत्य वस्तु की प्राप्ति हो सकती हैं । बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि यह बात जानकर मृत्यु होने के पूर्व ही सावधान होकर ऐसी साधना कर ले, जिससे वह जन्म-मृत्यु के चक्कर से सदा के लिये छूट जाय — मुक्त हो जाय ॥ १४ ॥

यह शरीर एक वृक्ष है । इसमें घोंसला बनाकर जींवरूप पक्षी निवास करता है । इसे यमराज के दूत प्रतिक्षण काट रहे हैं । जैसे पक्षी कटते हुए वृक्ष को छोड़कर उड़ जाता है, वैसे ही अनासक्त जीव भी इस शरीर को छोड़कर मोक्ष का भागी बन जाता है । परन्तु आसक्त जीव दुःख ही भोगता रहता है ॥ १५ ॥ प्रिय उद्धव ! ये दिन और रात क्षण-क्षण में शरीर की आयु को क्षीण कर रहे हैं । यह जानकर जो भय से काँप उठता है, वह व्यक्ति इसमें आसक्ति छोड़कर परमतत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर लेता है और फिर इसके जीवन-मरण से निरपेक्ष होकर अपने आत्मा में ही शान्त हो जाता है ॥ १६ ॥ यह मनुष्य-शरीर समस्त शुभ फलों की प्राप्ति का मूल है और अत्यन्त दुर्लभ होने पर भी अनायास सुलभ हो गया हैं । इस संसार-सागर से पार जाने के लिये यह एक सुदृढ़ नौका है । शरण-ग्रहणमात्र से ही गुरूदेव इसके केवट बनकर पतवार का सञ्चालन करने लगते हैं और स्मरणमात्र से ही मैं अनुकूल वायु के रूप में इसे लक्ष्य की ओर बढ़ाने लगता हूँ । इतनी सुविधा होने पर भी जो इस शरीर के द्वारा संसार-सागर से पार नहीं हो जाता, वह तो अपने हाथों अपने आत्मा का हनन-अधःपतन कर रहा है ॥ १७ ॥

प्रिय उद्धव ! जब पुरुष दोषदर्शन के कारण कर्मों से उद्विग्न और विरक्त हो जाय, तब जितेन्द्रिय होकर वह योग में स्थित हो जाय और अभ्यास-आत्मानुसन्धान के द्वारा अपना मन मुझ परमात्मा में निश्चलरूप से धारण करे ॥ १८ ॥ जब स्थिर करते समय मन चञ्चल होकर इधर-उधर भटकने लगे, तब झटपट बड़ी सावधानी से उसे मनाकर, समझा-बुझाकर, फुसलाकर अपने वश में कर ले ॥ १९ ॥ इन्द्रियों और प्राणों को अपने वश में रक्खे और मन को एक क्षण के लिये भी स्वतन्त्र न छोड़े । उसकी एक-एक चाल, एक-एक हरकत को देखता रहे । इस प्रकार सत्त्व-सम्पन्न बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे मन को अपने वश में कर लेना चाहिये ॥ २० ॥ जैसे सवार घोडे को अपने वश में करते समय उसे अपने मनोभाव की पहचान कराना चाहता है — अपनी इच्छा के अनुसार उसे चलाना चाहता है और बार-बार फुसलाकर उसे अपने वश में कर लेता है, वैसे ही मन को फुसलाकर, उसे मीठी-मीठी बातें सुनाकर वश में कर लेना भी परम योग हैं ॥ २१ ॥ सांख्यशास्त्र में प्रकृति से लेकर शरीरपर्यन्त सृष्टि का जो क्रम बतलाया गया है, उसके अनुसार सृष्टि-चिन्तन करना चाहिये और जिस क्रम से शरीर आदि को प्रकृति में लय बताया गया है, उस प्रकार लय-चिन्तन करना चाहिये । यह क्रम तब तक जारी रखना चाहिये, जब तक मन शान्त-स्थिर न हो जाय ॥ २२ ॥

जो पुरुष संसार से विरक्त हो गया है और जिसे संसार के पदार्थों में दुःख-बुद्धि हो गयी हैं, वह अपने गुरुजनों के उपदेश को भलीभाँति समझकर बार-बार अपने स्वरूप के ही चिन्तन में संलग्न रहता है । इस अभ्यास से बहुत शीघ्र ही उसका मन अपनी वह चञ्चलता, जो अनात्मा शरीर आदि में आत्मबुद्धि करने से हुई है, छोड़ देता है ॥ २३ ॥ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि आदि योगमार्ग से, वस्तुतत्त्व का निरीक्षण-परीक्षण करनेवाली आत्मविद्या से तथा मेरी प्रतिमा की उपासना से — अर्थात् कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग से मन परमात्मा का चिन्तन करने लगता है; और कोई उपाय नहीं हैं ॥ २४ ॥

उद्धवजी ! वैसे तो योगी कभी कोई निन्दित कर्म करता ही नहीं; परन्तु यदि कभी उससे प्रमादवश कोई अपराध बन जाय तो योग के द्वारा ही उस पाप को जला डाले, कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि दूसरे प्रायश्चित कभी न करे ॥ २५ ॥ अपने-अपने अधिकार में जो निष्ठा हैं, वहीं गुण कहा गया है । इस गुण-दोष और विधि-निषेध के विधान से यहीं तात्पर्य निकलता है कि किसी प्रकार विषयासक्ति का परित्याग हो जाय; क्योंकि कर्म तो जन्म से ही अशुद्ध हैं, अनर्थ के मूल हैं । शास्त्र का तात्पर्य उनका नियन्त्रण, नियम ही है । जहाँ तक हो सके प्रवृत्ति का संकोच ही करना चाहिये ॥ २६ ॥ जो साधक समस्त कर्मों से विरक्त हो गया हो, उनमें दुःखबुद्धि रखता हो, मेरी लीलाकथा के प्रति श्रद्धालु हो और यह भी जानता हो कि सभी भोग और भोगवासनाएँ दुःखरूप हैं, किन्तु इतना सब जानकर भी जो उनके परित्याग में समर्थ न हो, उसे चाहिये कि उन भोगों को तो भोग ले; परन्तु उन्हें सच्चे हृदय से दुःखजनक समझे और मन-ही-मन उनकी निन्दा करे तथा उसे अपना दुर्भाग्य ही समझे । साथ ही इस दुविधा की स्थिति से छुटकारा पाने के लिये श्रद्धा, दृढ़ निश्चय और प्रेम से मेरा भजन करे ॥ २७-२८ ॥

इस प्रकार मेरे बतलाये हुए भक्तियोग के द्वारा निरन्तर मेरा भजन करने से मैं उस साधक के हृदय में आकर बैठ जाता हूँ और मेरे विराजमान होते ही उसके हृदय की सारी वासनाएँ अपने संस्कारों के साथ नष्ट हो जाती हैं ॥ २९ ॥ इस तरह जब उसे मुझ सर्वात्मा का साक्षात्कार हो जाता है, तब तो उसके हृदय की गाँठ टूट जाती है, उसके सारे संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और कर्मवासनाएँ सर्वथा क्षीण हो जाती हैं ॥ ३० ॥ इसीसे जो योगी मेरी भक्ति से युक्त और मेरे चिन्तन में मग्न रहता है, उसके लिये ज्ञान अथवा वैराग्य की आवश्यकता नहीं होती । उसका कल्याण तो प्रायः मेरी भक्ति के द्वारा ही हो जाता हैं ॥ ३१ ॥ कर्म, तपस्या, ज्ञान, वैराग्य, योगाभ्यास, दान, धर्म और दूसरे कल्याणसाधनों से जो कुछ स्वर्ग, अपवर्ग, मेरा परम धाम अथवा कोई भी वस्तु प्राप्त होती है, वह सब मेरा भक्त मेरे भक्तियोग के प्रभाव से ही, यदि चाहे तो, अनायास प्राप्त कर लेता है ॥ ३२-३३ ॥

मेरे अनन्यप्रेमी एवं धैर्यवान् साधु भक्त स्वयं तो कुछ चाहते ही नहीं; यदि मैं उन्हें देना चाहता हूँ और देता भी हूँ तो भी दूसरी वस्तुओं की तो बात ही क्या — वे कैवल्य-मोक्ष भी नहीं लेना चाहते ॥ ३४ ॥ उद्धवजी ! सबसे श्रेष्ठ एवं महान् निःश्रेयस (परम कल्याण) तो निरपेक्षता का ही दुसरा नाम है । इसलिये जो निष्काम और निरपेक्ष होता है, उसी को मेरी भक्ति प्राप्त होती हैं ॥ ३५ ॥ मेरे अनन्यप्रेमी भक्तों का और उन समदर्शी महात्माओं का; जो बुद्धि से अतीत परमतत्त्व को प्राप्त हो चुके हैं, इन विधि और निषेध से होनेवाले पुण्य और पाप से कोई सम्बन्ध ही नहीं होता ॥ ३६ ॥ इस प्रकार जो लोग मेरे बतलाये हुए इन ज्ञान, भक्ति और कर्ममार्गों का आश्रय लेते हैं, ये मेरे परम कल्याणस्वरूप धाम को प्राप्त होते हैं, क्योंकि वे परब्रह्मतत्त्व को जान लेते हैं ॥ ३७ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां एकादशस्कन्धे विंशोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

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