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श्रीमद्भागवतमहापुराण – एकादशः स्कन्ध – अध्याय ६
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
छठा अध्याय
देवताओं की भगवान् से स्वधाम सिधारने के लिये प्रार्थना तथा यादवों को प्रभासक्षेत्र जाने की तैयारी करते देखकर उद्धव का भगवान् के पास आना

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! जब देवर्षि नारद वसुदेवजी को उपदेश करके चले गये, तब अपने पुत्र सनकादिकों, देवताओं और प्रजापतियों के साथ ब्रह्माजी, भूतगणों के साथ सर्वेश्वर महादेवजी और मरुद्गणों के साथ देवराज इन्द्र द्वारका नगरी में आये । साथ ही सभी आदित्यगण, आठों वसु, अश्विनीकुमार, ऋभु, अङ्गिरा के वंशज ऋषि, ग्यारहों रुद्र, विश्वेदेव, साध्यगण, गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यक, ऋषि, पितर, विद्याधर और किन्नर भी वहीं पहुँचे । इन लोगों के आगमन को उद्देश्य यह था कि मनुष्यका-सा मनोहर वेष धारण करनेवाले और अपने श्यामसुन्दर विग्रह से सभी लोगों का मन अपनी ओर खींचकर रमा लेनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण का दर्शन करें, क्योंकि इस समय उन्होंने अपना श्रीविग्रह प्रकट करके उसके द्वारा तीनों लोकों में ऐसी पवित्र कीर्ति का विस्तार किया है, जो समस्त लोकों के पाप-ताप को सदा के लिये मिटा देती है ॥ १-४ ॥

द्वारकापुरी सब प्रकार की सम्पत्ति और ऐश्वर्यों से समृद्ध तथा अलौकिक दीप्ति से देदीप्यमान हो रही थी । वहाँ आकर उन लोगों ने अनूठी छवि से युक्त भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन किये । भगवान् की रूप-माधुरी का निर्निमेष नयनों से पान करने पर भी उनके नेत्र तृप्त न होते थे । वे एकटक बहुत देर तक उन्हें देखते ही रहे ॥ ५ ॥ उन लोगों ने स्वर्ग के उद्यान, नन्दन-वन, चैत्ररथ आदि के दिव्य पुष्पों से जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण को ढक दिया और चित्र-विचित्र पदों तथा अर्थों से युक्त वाणी के द्वारा उनकी स्तुति करने लगे ॥ ६ ॥

देवताओं ने प्रार्थना की — स्वामी ! कर्मों के विकट फंदों से छूटने की इच्छावाले मुमुक्षुजन भक्ति भाव से अपने हृदय में जिसका चिन्तन करते रहते हैं, आपके उसी चरणकमल को हमलोगों ने अपनी बुद्धि, इन्द्रिय, प्राण, मन और वाणी से साक्षात् नमस्कार किया है । अहो ! आश्चर्य है ! ॥ ७ ॥ अजित ! आप मायिक रज आदि गुणों में स्थित होकर इस अचिन्त्य नाम-रूपात्मक प्रपञ्च को त्रिगुणमयी माया के द्वारा अपने-आपमें ही रचना करते हैं, पालन करते और संहार करते हैं । यह सब करते हुए भी इन कर्मों से आप लिप्त नहीं होते हैं, क्योंकि आप राग-द्वेषादि दोषों से सर्वथा मुक्त हैं और अपने निरावरण अखण्ड स्वरूपभूत परमानन्द में मग्न रहते हैं ॥ ८ ॥ स्तुति करने योग्य परमात्मन् ! जिन मनुष्यों की चित्तवृत्ति राग-द्वेषादि से कलुषित हैं, वे उपासना, वेदाध्ययन, दान, तपस्या और यज्ञ आदि कर्म भले ही करें; परंतु उनकी वैसी शुद्धि नहीं हो सकती, जैसी श्रवण के द्वारा संपुष्ट शुद्धान्तःकरण सज्जन पुरुषों की आपकी लीलाकथा, कीर्ति के विषय में दिनोंदिन बढ़कर परिपूर्ण होनेवाली श्रद्धा से होती है ॥ ९ ॥

मननशील मुमुक्षुजन मोक्ष-प्राप्ति के लिये अपने प्रेम से पिघले हुए हृदय के द्वारा जिन्हें लिये-लिये फिरते हैं, पाञ्चरात्र विधि से उपासना करनेवाले भक्तजन समान ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध — इस चतुर्व्यूह के रूप में जिनका पूजन करते हैं और जितेन्द्रिय धीरपुरुष स्वर्गलोक का अतिक्रमण करके भगवद्धाम की प्राप्ति के लिये तीनों समय जिनकी पूजा किया करते हैं, याज्ञिक लोग तीनों वेदों के द्वारा बतलायी हुई विधि से अपने संयत हाथों में हविष्य लेकर यज्ञकुण्ड में आहुति देते और उन्हीं का चिन्तन करते हैं । आपकी आत्मस्वरूपिणी माया के जिज्ञासु योगीजन हृदय के अन्तर्देश में दहविद्या आदि के द्वारा आपके चरणकमलों का ही ध्यान करते हैं और आपके बड़े-बड़े प्रेम भक्तजन उन्हीं को अपना परम इष्ट आराध्यदेव मानते हैं । प्रभो ! आपके वे ही चरणकमल हमारी समस्त अशुभ वासनाओं — विषयवासनाओं को भस्म करने के लिये अग्निस्वरूप हों । वे अग्नि के समान हमारे पाप-तापों को भस्म कर दें ॥ १०-११ ॥ प्रभो ! यह भगवती लक्ष्मी आपके वक्षःस्थल पर मुरझायी हुई बासी वनमाला से भी सौत की तरह स्पर्धा रखती हैं । फिर भी आप उनकी परवा न कर भक्तों के द्वारा इस बासी माला से की हुई पूजा भी प्रेम से स्वीकार करते हैं । ऐसे भक्तवत्सल प्रभु के चरणकमल सर्वदा हमारी विषय-वासनाओ को जलानेवाले अग्निस्वरूप हों ॥ १२ ॥

अनन्त ! वामनावतार में दैत्यराज बलि की दी हुई पृथ्वी को नापने के लिये जब आपने अपना पग उठाया था और वह सत्यलोक में पहुँच गया था, तब यह ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई बहुत बड़ा विजयध्वज हो । ब्रह्माजी के पखारने के बाद उससे गिरती हुई गङ्गाजी के जल की तीन धाराएँ ऐसी जान पड़ती थीं, मानो उसमें लगी हुई तीन पताकाएँ फहरा रहीं हों । उसे देखकर असुरों की सेना भयभीत हो गयी थी और देवसेना निर्भय । आपका वह चरणकमल साधुस्वभाव पुरुषों के लिये आपके धाम वैकुण्ठलोक की प्राप्ति का और दुष्टों के लिये अधोगति का कारण है । भगवन् ! आपका वही पादपद्म हम भजन करनेवालों के सारे पाप-ताप धो-बहा दे ॥ १३ ॥ ब्रह्मा आदि जितने भी शरीरधारी हैं, वे सत्त्व, रज, तम — इन तीनों गुणो के परस्पर विरोधी त्रिविध भावों की टक्कर से जीते-मरते रहते हैं । वे सुख-दुःख के थपेड़ों से बाहर नहीं हैं और ठीक वैसे ही आपके वश में हैं, जैसे नथे हुए बैल अपने स्वामी के वश में होते हैं । आप उनके लिये भी कालस्वरूप हैं । उनके जीवन का आदि, मध्य और अन्त आपके ही अधीन है । इतना ही नहीं, आप प्रकृति और पुरुष से भी परे स्वयं पुरुषोत्तम हैं । आपके चरणकमल हमलोगों का कल्याण करें ॥ १४ ॥

प्रभो आप इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के परम कारण है; क्योंकि शास्त्रों ने ऐसा कहा है कि आप प्रकृति, पुरुष और महत्तत्त्व के भी नियन्त्रण करनेवाले काल हैं । शीत, ग्रीष्म और वर्षाकालरूप तीन नाभियोंवाले संवत्सर के रूप में सबको क्षय की ओर ले जानेवाले काल आप ही हैं । आपकी गति अबाध और गम्भीर है । आप स्वयं पुरुषोत्तम हैं ॥ १५ ॥ यह पुरुष आपसे शक्ति प्राप्त करके अमोघवीर्य हो जाता हैं और फिर माया के साथ संयुक्त होकर विश्व के महत्तत्त्वरूप गर्भ का स्थापन करता है । इसके बाद वह महत्तत्त्व त्रिगुणमयी माया का अनुसरण करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहङ्कार और मनरूप सात आवरणों (परत) वाले इस सुवर्णवर्ण ब्रह्माण्ड की रचना करता है ॥ १६ ॥ इसलिये हृषीकेश ! आप समस्त चराचर जगत् के अधीश्वर हैं । यही कारण है कि माया की गुण-विषमता के कारण बननेवाले विभिन्न पदार्थों का उपभोग करते हुए भी आप उनमें लिप्त नहीं होते । यह केवल आपकी ही बात हैं । आपके अतिरिक्त दूसरे तो स्वयं उनका त्याग करके भी उन विषयों से डरते रहते हैं ॥ १७ ॥

सोलह हजार से अधिक रानियाँ आपके साथ रहती हैं । वे सब अपनी मन्द-मन्द मुसकान और तिरछी चितवन से युक्त मनोहर भौहों के इशारे से और सुरतालापों से प्रौढ़ सम्मोहक कामबाण चलाती हैं और कामकला की विविध रीतियों से आपका मन आकर्षित करना चाहती हैं परंतु फिर भी वे अपने परिपुष्ट कामबाण से आपका मन तनिक भी न डिगा सकीं, वे असफल ही रहीं ॥ १८ ॥ आपने त्रिलोकी की पाप-राशि को धो बहाने के लिये दो प्रकार की पवित्र नदियों बहा रक्खी हैं — एक तो आपकी अमृतमयी लीला से भरी कथा-नदी और दूसरी आपके पाद-प्रक्षालन के जल से भरी गङ्गाजी । अतः सत्सङ्गसेवी विवेकीजन कानों के द्वारा आपकी कथानदी में और शरीर के द्वारा गङ्गाजी में गोता लगाकर दोनों ही तीर्थों का सेवन करते हैं और अपने पाप-ताप मिटा देते हैं ॥ १९ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! समस्त देवताओं और भगवान् शङ्कर के साथ ब्रह्माजी ने इस प्रकार भगवान् की स्तुति की । इसके बाद वे प्रणाम करके अपने धाम में जाने के लिये आकाश में स्थित होकर भगवान् से इस प्रकार कहने लगे ॥ २० ॥

ब्रह्माजी ने कहा — सर्वात्मन् प्रभो ! पहले हमलोगों ने आपसे अवतार लेकर पृथ्वी का भार उतारने के लिये प्रार्थना की थी । सो वह काम आपने हमारी प्रार्थना के अनुसार ही यथोचितरूप से पूरा कर दिया ॥ २१ ॥ आपने सत्यपरायण साधुपुरुषों के कल्याणार्थ धर्म की स्थापना भी कर दी और दसों दिशाओं में ऐसी कीर्ति फैला दी, जिसे सुन-सुनाकर सब लोग अपने मन का मैल मिटा देते हैं ॥ २२ ॥ आपने यह सर्वोत्तम रूप धारण करके यदुवंश में अवतार लिया और जगत् के हित के लिये उदारता और पराक्रम से भरी अनेकों लीलाएँ की ॥ २३ ॥ प्रभो ! कलियुग में जो साधुस्वभाव मनुष्य आपकी इन लीलाओं का श्रवण-कीर्तन करेंगे, वे सुगमता से ही इस अज्ञानरूप अन्धकार से पार हो जायँगे ॥ २४ ॥ पुरुषोत्तम सर्वशक्तिमान् प्रभो ! आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये एक सौ पचीस वर्ष बीत गये हैं ॥ २५ ॥ सर्वाधार ! अब हमलोगों का ऐसा कोई काम बाकी नहीं है, जिसे पूर्ण करने के लिये आपके यहाँ रहने की आवश्यकता हो । ब्राह्मणों के शाप के कारण आपका यह कुल भी एक प्रकार से नष्ट हो ही चुका है ॥ २६ ॥ इसलिये वैकुण्ठनाथ ! यदि आप उचित समझे तो अपने परमधाम में पधारिये और अपने सेवक हम लोकपाल का तथा हमारे लोक का पालन-पोषण कीजिये ॥ २७ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — ब्रह्माजी ! आप जैसा कहते हैं, मैं पहले से ही वैसा निश्चय कर चुका हूँ । मैंने आपलोगों का सब काम पूरा करके पृथ्वी का भार उतार दिया ॥ २८ ॥ परन्तु अभी एक काम बाकी है; वह यह कि यदुवंशी बल-विक्रम, वीरता-शूरता और धन-सम्पत्ति से उन्मत्त हो रहे हैं । ये सारी पृथ्वी को ग्रस लेने पर तुले हुए हैं । इन्हें मैंने ठीक वैसे ही रोक रखा है, जैसे समुद्र को उसके तट की भूमि ॥ २९ ॥ यदि मैं घमंडी और उच्छृङ्खल यदुवंशियों का यह विशाल वंश नष्ट किये बिना ही चला जाऊँगा तो ये सब मर्यादा का उल्लङ्घन करके सारे लोकों का संहार कर डालेंगे ॥ ३० ॥ निष्पाप ब्रह्माजी ! अब ब्राहाणों के शाप से इस वंश का नाश प्रारम्भ हो चुका है । इसका अन्त हो जाने पर मैं आपके धाम में होकर जाऊँगा ॥ ३१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! जब अखिललोकाधिपति भगवान् श्रीकृष्ण ने इस प्रकार कहा, तब ब्रह्माजी ने उन्हें प्रणाम किया और देवताओं के साथ वे अपने धाम को चले गये ॥ ३३ ॥ उनके जाते ही द्वारकापुरी में बड़े-बड़े अपशकुन, बड़े-बड़े उत्पात उठ खड़े हुए । उन्हें देखकर यदुवंश के बड़े-बूढ़े भगवान् श्रीकृष्ण के पास आये । भगवान् श्रीकृष्ण ने उनसे यह बात कही ॥ ३३ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — गुरुजनो ! आजकल द्वारका में जिधर देखिये, उधर हीं बड़े-बड़े अपशकुन और उत्पात हो रहे हैं । आपलोग जानते ही हैं कि ब्राह्मणों ने हमारे वंश को ऐसा शाप दे दिया है, जिसे टाल सकना बहुत ही कठिन हैं । मेरा ऐसा विचार है कि यदि हमलोग अपने प्राणों की रक्षा चाहते हों तो हमें यहाँ नहीं रहना चाहिये । अब विलम्ब करने की आवश्यकता नहीं हैं । हमलोग आज ही परम पवित्र प्रभासक्षेत्र के लिये निकल पड़े ॥ ३४-३५ ॥ प्रभासक्षेत्र की महिमा बहुत प्रसिद्ध है । जिस समय दक्ष प्रजापति के शाप से चन्द्रमा को राजयक्ष्मा रोग ने ग्रस लिया था, उस समय उन्होंने प्रभासक्षेत्र में जाकर स्नान किया और वे तत्क्षण उस पापजन्य रोग से छूट गये । साथ ही उन्हें कलाओं की अभिवृद्धि भी प्राप्त हो गयी ॥ ३६ ॥ हमलोग भी प्रभासक्षेत्र में चलकर स्नान करेंगे, देवता एवं पितरों का तर्पण करेंगे और साथ ही अनेकों गुणवाले पकवान तैयार करके श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन करायेंगे । वहाँ हमलोग उन सत्पात्र ब्राह्मणों को पूरी श्रद्धा से बड़ी-बड़ी दान-दक्षिणा देंगे और इस प्रकार उनके द्वारा अपने बड़े-बड़े सङ्कटों को वैसे ही पार कर जायेंगे, जैसे कोई जहाज के द्वारा समुद्र पार कर जाय !॥ ३७-३८ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — कुलनन्दन ! जब भगवान् श्रीकृष्ण ने इस प्रकार आज्ञा दी, तब यदुवंशियों ने एक मत से प्रभास जाने का निश्चय कर लिया और सब अपने-अपने रथ सजाने-जोतने लगे ॥ ३९ ॥ परीक्षित् ! उद्धवजी भगवान् श्रीकृष्ण के बड़े प्रेमी और सेवक थे । उन्होंने जब यदुवंशियों को यात्रा की तैयारी करते देखा, भगवान् की आज्ञा सुनी और अत्यन्त घोर अपशकुन देखे, तब वे जगत् के एकमात्र अधिपति भगवान् श्रीकृष्ण के पास एकान्त में गये, उनके चरणों पर अपना सिर रखकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करने लगे ॥ ४०-४१ ॥

उद्धवजी ने कहा — योगेश्वर ! आप देवाधिदेवों के भी अधीश्वर हैं । आपकी लीलाओं के श्रवण-कीर्तन से जीव पवित्र हो जाता है । आप सर्वशक्तिमान् परमेश्वर हैं । आप चाहते, तो ब्राह्मणों के शाप को मिटा सकते थे । परन्तु आपने वैसा किया नहीं । इससे मैं यह समझ गया कि अब आप यदुवंश का संहार करके, इसे समेटकर अवश्य ही इस लोक का परित्याग कर देंगे ॥ ४२ ॥ परन्तु घुँघराली अलकोंवाले श्यामसुन्दर ! मैं आधे क्षण के लिये भी आपके चरणकमलों के त्याग की बात सोच भी नहीं सकता । मेरे जीवनसर्वस्व ! मेरे स्वामी ! आप मुझे भी अपने धाम में ले चलिये ॥ ४३ ॥ प्यारे कृष्ण ! आपकी एक-एक लीला मनुष्यों के लिये परम मङ्गलमयी और कानों के लिये अमृतस्वरूप हैं । जिसे एक बार उस रस का चसका लग जाता है, उसके मन में फिर किसी दूसरी वस्तु के लिये लालसा हीं नहीं रह जाती । प्रभो ! हम तो उठते-बैठते, सोते-जागते, घूमते-फिरते आपके साथ रहे हैं, हमने आपके साथ स्नान किया, खेल खेले, भोजन किया; कहाँ तक गिनावें, हमारी एक-एक चेष्टा आपके साथ होती रही । आप हमारे प्रियतम है; और तो क्या आप हमारे आत्मा ही हैं । ऐसी स्थिति में हम आपके प्रेमी भक्त आपको कैसे छोड़ सकते हैं ? ॥ ४४-४५ ॥

हमने आपकी धारण की हुई माला पहनी, आपके लगाये हुए चन्दन लगाये, आपके उतारे हुए वस्त्र पहने और आपके धारण किये हुए गहनों से अपने-आपको सजाते रहे । हम आपकी जूठन खानेवाले सेवक हैं । इसलिये हम आपकी माया पर अवश्य ही विजय प्राप्त कर लेंगे । (अतः प्रभो ! हमें आपकी माया का डर नहीं है, डर है तो केवल आपके वियोग का) ॥ ४६ ॥ हम जानते हैं कि माया को पार कर लेना बहुत ही कठिन है । बड़े-बड़े ऋषि-मुनि दिगम्बर रहकर और आजीवन नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का पालन करके अध्यात्मविद्या के लिये अत्यन्त परिश्रम करते हैं । इस प्रकार की कठिन साधना से उन संन्यासियों के हृदय निर्मल हो पाते हैं और तब कहीं वे समस्त वृत्तियों की शान्तिरूप नैष्कर्म्य-अवस्था में स्थित होकर आपके ब्रह्म नामक धाम को प्राप्त होते हैं ॥ ४७ ॥ महायोगेश्वर ! हमलोग तो कर्म-मार्ग में ही भ्रम-भटक रहे हैं । परन्तु इतना निश्चित है कि हम आपके भक्तजनों के साथ आपके गुणों और लीलाओं की चर्चा करेंगे तथा मनुष्यकी-सी लीला करते हुए आपने जो कुछ किया या कहा है, उसका स्मरण-कीर्तन करते रहेंगे । साथ ही आपकी चाल-ढाल, मुसकान-चितवन और हास-परिहास की स्मृति में तल्लीन हो जायेंगे । केवल इसीसे हम दुस्तर माया को पार कर लेंगे । (इसलिये हमें मायासे पार जानेकी नहीं, आपके विरह की चिन्ता है । आप हमें छोड़िये नहीं, साथ ले चलिये) ॥ ४८-४९ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! जब उद्धवजी ने देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण से इस प्रकार प्रार्थना की तब उन्होंने अपने अनन्यप्रेमी सखा एवं सेवक उद्धवजी से कहा ॥ ५० ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां एकादशस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

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