श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २४
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
चौबीसवाँ अध्याय
पृथु की वंशपरम्परा और प्रचेताओं को भगवान् रुद्र का उपदेश

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुजी ! महाराज पृथु के बाद उनके पुत्र परम यशस्वी विजिताश्व राजा हुए । उनका अपने छोटे भाइयों पर बड़ा स्नेह था, इसलिये उन्होंने चारों को एक-एक दिशा का अधिकार सौंप दिया ॥ १ ॥ राजा विजिताश्व ने हर्यक्ष को पूर्व, धूम्रकेश को दक्षिण, वृक को पश्चिम और द्रविण को उत्तर दिशा का राज्य दिया ॥ २ ॥ उन्होंने इन्द्र से अन्तर्धान होने की शक्ति प्राप्त की थी, इसलिये उन्हें ‘अन्तर्धान भी कहते थे । उनकी पत्नी का नाम शिखण्डिनी था । उससे उनके तीन सुपुत्र हुए ॥ ३ ॥ उनके नाम पावक, पवमान और शुचि थे । पूर्वकाल में वसिष्ठजी का शाप होने से उपर्युक्त नाम के अग्नियों ने ही उनके रूप में जन्म लिया था । आगे चलकर योगमार्ग से ये फिर अग्निरूप हो गये ॥ ४ ॥

अन्तर्धान के नभस्वती नाम की पत्नी से एक और पुत्र-रत्न हविर्धान प्राप्त हुआ । महाराज अन्तर्धान बड़े उदार पुरुष थे । जिस समय इन्द्र उनके पिता के अश्वमेध-यज्ञ का घोड़ा हरकर ले गये थे, उन्होंने पता लग जाने पर भी उनका वध नहीं किया था ॥ ५ ॥ राजा अन्तर्धान ने कर लेना, दण्ड देना, जुरमाना वसूल करना आदि कर्तव्यों को बहुत कठोर एवं दूसरों के लिये कष्टदायक समझकर एक दीर्घकालीन यज्ञ में दीक्षित होने के बहाने अपना राज-काज छोड़ दिया ॥ ६ ॥ यज्ञकार्य में लगे रहने पर भी उन आत्मज्ञानी राजा ने भक्तभयभञ्जन पूर्णतम परमात्मा की आराधना करके सुदृढ़ समाधि के द्वारा भगवान् के दिव्य लोक को प्राप्त किया ॥ ७ ॥

विदुरजी ! हविर्धानकी पत्नी हविर्भानी ने बर्हिषद्, गय, शुक्ल, कृष्ण, सत्य और जितव्रत नाम के छः पुत्र पैदा किये ॥ ८ ॥ कुरुश्रेष्ठ विदुरजी ! इनमें हविर्धान के पुत्र महाभाग बर्हिषद् यज्ञादि कर्मकाण्ड और योगाभ्यास में कुशल थे । उन्होंने प्रजापति का पद प्राप्त किया ॥ ९ ॥ उन्होंने एक स्थान के बाद दूसरे स्थान में लगातार इतने यज्ञ किये कि यह सारी भूमि पूर्व की ओर अग्रभाग करके फैलाये हुए कुशों से पट गयी थी । (इसीसे आगे चलकर ‘प्राचीनबर्हि’ नामसे विख्यात हुए) ॥ १० ॥

राजा प्राचीनबर्हि ने ब्रह्माजी के कहने से समुद्र की कन्या शतद्रुति से विवाह किया था । सर्वाङ्गसुन्दरी किशोरी शतद्रुति सुन्दर वस्त्राभूषणों से सजधज कर विवाह मण्डप में जब भाँवर देने के लिये घूमने लगी, तब स्वयं अग्निदेव भी मोहित होकर उसे वैसे ही चाहने लगे जैसे शुकी को चाहा था ॥ ११ ॥ नवविवाहिता शतद्रुति ने अपने नूपुरों की झनकार से ही दिशा-विदिशाओं के देवता, असुर, गन्धर्व, मुनि, सिद्ध, मनुष्य और नाग-सभी को वश में कर लिया था ॥ १२ ॥ शतद्रुति के गर्भ से प्राचीनबर्हि के प्रचेता नाम के दस पुत्र हुए । वे सब बड़े ही धर्मज्ञ तथा एक-से नाम और आचरणवाले थे ॥ १३ ॥ जब पिता ने उन्हें सन्तान उत्पन्न करने का आदेश दिया, तब उन सबने तपस्या करने के लिये समुद्र में प्रवेश किया । वहाँ दस हजार वर्ष तक तपस्या करते हुए उन्होंने तप का फल देनेवाले श्रीहरि की आराधना की ॥ १४ ॥ घर से तपस्या करने के लिये जाते समय मार्ग में श्रीमहादेवजी ने उन्हें दर्शन देकर कृपापूर्वक जिस तत्त्व का उपदेश दिया था, उसीका वे एकाग्रतापूर्वक ध्यान, जप और पूजन करते रहे ॥ १५ ॥

विदुरजी ने पूछा — ब्रह्मन् ! मार्ग में प्रचेताओं का श्रीमहादेवजी के साथ किस प्रकार समागम हुआ और उनपर प्रसन्न होकर भगवान् शङ्कर ने उन्हें क्या उपदेश किया, वह सारयुक्त बात आप कृपा करके मुझसे कहिये ॥ १६ ॥ ब्रह्मर्षे ! शिवजी के साथ समागम होना तो देहधारियों के लिये बहुत कठिन है । औरों की तो बात ही क्या है — मुनिजन भी सब प्रकार की आसक्ति छोड़कर उन्हें पाने के लिये उनका निरन्तर ध्यान ही किया करते हैं, किन्तु सहज पाते नहीं ॥ १७ ॥ यद्यपि भगवान् शङ्कर आत्माराम हैं, उन्हें अपने लिये न कुछ करना हैं, न पाना, तो भी इस लोकसृष्टि की रक्षा के लिये वे अपनी घोररूपा शक्ति (शिवा) के साथ सर्वत्र विचरते रहते हैं ॥ १८ ॥

श्रीमैत्रेयजी ने कहा —विदुरजी ! साधुस्वभाव प्रचेतागण पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर तपस्या में चित्त लगा पश्चिम की ओर चल दिये ॥ १९ ॥ चलते-चलते उन्होंने समुद्र के समान विशाल एक सरोवर देखा । वह महापुरुषों के चित्त के समान बड़ा ही स्वच्छ था तथा उसमें रहनेवाले मत्स्यादि जलजीव भी प्रसन्न जान पड़ते थे ॥ २० ॥ उसमें नीलकमल, लालकमल, रात में, दिन में और सायंकाल में खिलनेवाले कमल तथा इन्दीवर आदि अन्य कई प्रकार के कमल सुशोभित थे । उसके तटों पर हंस, सारस, चकवा, और काण्डव आदि जलपक्षी चहक रहे थे ॥ २१ ॥ उसके चारों ओर तरह-तरह के वृक्ष और लताएँ थीं, उनपर मतवाले भौरे गूंज रहे थे । उनकी मधुर ध्वनि से हर्षित होकर मानो उन्हें रोमाञ्च हो रहा था । कमलकोश के परागपुञ्ज वायु के झकोरों से चारों ओर उड़ रहे थे मानो वहाँ कोई उत्सव हो रहा है ॥ २२ ॥ वहाँ मृदङ्ग, पणव आदि बाजों के साथ अनेकों दिव्य राग-रागिनियों के क्रम से गायन की मधुर ध्वनि सुनकर उन राजकुमारों को बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ २३ ॥ इतने में ही उन्होंने देखा कि देवाधिदेव भगवान् शङ्कर अपने अनुचरों के सहित उस सरोवर से बाहर आ रहे हैं । उनका शरीर तप हुई सुवर्णराशि के समान कान्तिमान् हैं, कण्ठ नीलवर्ण है तथा तीन विशाल नेत्र हैं । वे अपने भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये उद्यत हैं । अनेकों गन्धर्व उनका सुयश गा रहे हैं । उनका सहसा दर्शन पाकर प्रचेताओं को बड़ा कुतूहल हुआ और उन्होंने शङ्करजी के चरणों में प्रणाम किया ॥ २४-२५ ॥ तब शरणागतभयहारी धर्मवत्सल भगवान् शङ्कर ने अपने दर्शन से प्रसन्न हुए उन धर्मज्ञ और शीलसम्पन्न राजकुमारों से प्रसन्न होकर कहा — ॥ २६ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — तुमलोग राज्ञा प्राचीनबर्हि के पुत्र हो, तुम्हारा कल्याण हो । तुम जो कुछ करना चाहते हो, वह भी मुझे मालूम है । इस समय तुमलोगों पर कृपा करने के लिये ही मैंने तुम्हें इस प्रकार दर्शन दिया हैं ॥ २७ ॥ जो व्यक्ति अव्यक्त प्रक्रति तथा जीवसंज्ञक पुरुष — इन दोनों के नियामक भगवान् वासुदेव की साक्षात् शरण लेता है, वह मुझे परम प्रिय हैं ॥ २८ ॥

अपने वर्णाश्रमधर्म का भलीभाँति पालन करनेवाला पुरुष सौ जन्म के बाद ब्रह्मा के पद को प्राप्त होता है और इससे भी अधिक पुण्य होने पर वह मुझे प्राप्त होता हैं । परन्तु जो भगवान् का अनन्य भक्त हैं, वह तो मृत्यु के बाद ही सीधे भगवान् विष्णु के उस सर्वप्रपंचातीत परमपद को प्राप्त हो जाता है, जिसे रुद्ररूप में स्थित मैं तथा अन्य आधिकारिक देवता अपने-अपने अधिकार की समाप्ति के बाद प्राप्त करेंगे ॥ २९ ॥ तुमलोग भगवद्भक्त होने के नाते मुझे भगवान् के समान ही प्यारे हो । इसी प्रकार भगवान् के भक्तों को भी मुझसे बढ़कर और कोई कभी प्रिय नहीं होता ॥ ३० ॥ अब मैं तुम्हें एक बड़ा ही पवित्र, मङ्गलमय और कल्याणकारी स्तोत्र सुनाता हूँ । इसका तुमलोग शुद्धभाव से जप करना ॥ ३१ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — तब नारायण-परायण करुणार्द्र हृदय भगवान् शिव ने अपने सामने हाथ जोड़े खड़े हुए उन राजपुत्रों को यह स्तोत्र सुनाया ॥ ३२ ॥

भगवान् रुद्र स्तुति करने लगे — भगवन् ! आपका उत्कर्ष उच्चकोटि के आत्मज्ञानियों के कल्याण के लिये — निजानन्द लाभ के लिये हैं, उससे मेरा भी कल्याण हो ! आप सर्वदा अपने निरतिशय परमानन्द स्वरूप में ही स्थित रहते हैं, ऐसे सर्वात्मक आत्मस्वरूप आपको नमस्कार है ॥ ३३ ॥ आप पद्मनाभ (समस्त लोकों के आदि कारण) है; भूतसूक्ष्म (तन्मात्र) और इन्द्रियों के नियन्ता, शान्त, एकरस और स्वयंप्रकाश वासुदेव (चित्त के अधिष्ठाता) भी आप ही हैं; आपको नमस्कार है ॥ ३४ ॥ आप ही सूक्ष्म (अव्यक्त), अनन्त और मुखाग्नि के द्वारा सम्पूर्ण लोकों का संहार करनेवाले अहङ्कार के अधिष्ठाता सङ्कर्षण तथा जगत् के प्रकृष्ट ज्ञान के उद्गमस्थान बुद्धि के अधिष्ठाता प्रद्युम्न हैं; आपको नमस्कार है ॥ ३५ ॥ आप ही इन्द्रियों के स्वामी मनस्तत्व के अधिष्ठाता भगवान् अनिरुद्ध हैं; आपको बार-बार नमस्कार है । आप अपने तेज से जगत् को व्याप्त करनेवाले सूर्यदेव हैं, पूर्ण होने के कारण आपमें वृद्धि और क्षय नहीं होता; आपको नमस्कार हैं ॥ ३६ ॥ आप स्वर्ग और मोक्ष के द्वार तथा निरन्तर पवित्र हृदय में रहनेवाले हैं, आपको नमस्कार है । आप ही सुर्वणरूप वीर्य से युक्त और चातुर्होत्र कर्म के साधन तथा विस्तार करनेवाले अग्निदेव हैं । आपको नमस्कार हैं ॥ ३७ ॥

आप पितर और देवताओं के पोषक सोम है तथा तीनों वेदों के अधिष्ठाता है । हम आपको नमस्कार करते हैं, आप ही समस्त प्राणियों को तृप्त करनेवाले सर्वरस (जल) रूप हैं । आपको नमस्कार है ॥ ३८ ॥ आप समस्त प्राणियों के देह, पृथ्वी और विराट्स्वरूप हैं तथा त्रिलोकी की रक्षा करनेवाले मानसिक, ऐन्द्रियिक और शारीरिक शक्तिस्वरूप वायु (प्राण) हैं; आपको नमस्कार हैं ॥ ३९ ॥ आप ही अपने गुण शब्द के द्वारा — समस्त पदार्थों का ज्ञान करानेवाले तथा बाहर-भीतर का भेद करनेवाले आकाश हैं तथा आप ही महान् पुण्यों से प्राप्त होनेवाले परम तेजोमय स्वर्ग-वैकुण्ठादि लोक हैं; आपको पुनः – पुनः नमस्कार है ॥ ४० ॥ आप पितृलोक की प्राप्ति करानेवाले प्रवृत्तिकर्मरूप और देवलोक की प्राप्ति के साधन निवृत्तिकर्मरूप हैं तथा आप ही अधर्म के फलरूप दुःखदायक मृत्यु है; आपको नमस्कार है ॥ ४१ ॥ नाथ ! आप ही पुराणपुरुष तथा सांख्य और योग के अधीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं; आप सब प्रकार की कामनाओं की पूर्ति के कारण, साक्षात् मन्त्रमूर्ति और महान् धर्मस्वरूप हैं । आपकी ज्ञानशक्ति किसी भी प्रकार कुण्ठित होनेवाली नहीं है; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४२ ॥ आप ही कर्ता, करण और कर्म — तीनों शक्तियों के एकमात्र आश्रय हैं; आप ही अहङ्कार के अधिष्ठाता रुद्र है; आप ही ज्ञान और क्रियास्वरूप हैं तथा आपसे ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी — चार प्रकार की वाणी की अभिव्यक्ति होती हैं; आपको नमस्कार है ॥ ४३ ॥

प्रभो ! हमें आपके दर्शनों की अभिलाषा है; अतः आपके भक्तजन जिसका पूजन करते हैं और जो आपके निजजन को अत्यन्त प्रिय है, अपने उस अनूप रूप की आप हमें झाँकी कराइये । आपका वह रूप अपने गुणों से समस्त इन्द्रियों को तृप्त करनेवाला है ॥ ४४ ॥ वह वर्षाकालीन मेघ के समान स्निग्ध श्याम और सम्पूर्ण सौन्दयों का सार-सर्वस्व हैं । सुन्दर चार विशाल भुजाएँ, महामनोहर मुखारविन्द, कमलदल के समान नेत्र, सुन्दर भौंहें, सुघड़ नासिका, मनमोहिनी दत्तपंक्ति, अमोलकपोलयुक्त मनोहर मुखमण्डल और शोभाशाली समान कर्णयुगल हैं ॥ ४५-४६ ॥ प्रीतिपूर्ण उन्मुक्त हास्य, तिरछी चितवन, काली-काली घुँघराली अलकें, कमलकुसुम की केसर के समान फहराता हुआ पीताम्बर, झिलमिलाते हुए कुण्डल, चमचमाते हुए मुकुट, कङ्कण, हार, नूपुर और मेखला आदि विचित्र आभूषण तथा शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, वनमाला और कौस्तुभमणि के कारण उसकी अपूर्व शोभा है ॥ ४७-४८ ॥

उसके सिंह के समान स्थूल कंधे हैं — जिनपर हार, केयूर एवं कुण्डलादि की कान्ति झिलमिलाती रहती है – तथा कौस्तुभमणि की कान्ति से सुशोभित मनोहर ग्रीवा है । उसका श्यामल वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्न के रूप में लक्ष्मीजी का नित्य निवास होने के कारण कसौटी की शोभा को भी मात करता है ॥ ४९ ॥ उसका त्रिवली से सुशोभित, पीपल के पत्ते के समान सुडौल उदर श्वास के आने-जाने से हिलता हुआ बड़ा ही मनोहर जान पड़ता है । उसमें जो भँवर के समान चक्करदार नाभि है, वह इतनी गहरी है कि उससे उत्पन्न हुआ यह विश्व मानो फिर उसमें लीन होना चाहता है ॥ ५० ॥ श्यामवर्ण कटिभाग में पीताम्बर और सुवर्ण की मेखला शोभायमान है । समान और सुन्दर चरण, पिंडली, जाँघ और घुटनों के कारण आपका दिव्य विग्रह बड़ा ही सुघड़ जान पड़ता है ॥ ५१ ॥ आपके चरणकमलों की शोभा शरद् ऋतु के कमल-दल की कान्ति का भी तिरस्कार करती हैं । उनके नखों से जो प्रकाश निकलता है, वह जीवों के हृदयान्धकार को तत्काल नष्ट कर देता है । हमें आप कृपा करके भक्तों के भयहारी एवं आश्रयस्वरूप उसी रूप का दर्शन कराइये । जगद्गुरो ! हम अज्ञानावृत प्राणियों को अपनी प्राप्ति का मार्ग बतलानेवाले आप ही हमारे गुरु हैं ॥ ५२ ॥

प्रभो ! चित्तशुद्धि की अभिलाषा रखनेवाले पुरुष को आपके इस रूप का निरन्तर ध्यान करना चाहिये; इसकी भक्ती ही स्वधर्म का पालन करनेवाले पुरुष को अभय करनेवाली है ॥ ५३ ॥ स्वर्ग का शासन करनेवाला इन्द्र भी आपको ही पाना चाहता है तथा विशुद्ध आत्मज्ञानियों की गति भी आप ही हैं । इस प्रकार आप सभी देहधारियों के लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं; केवल भक्तिमान् पुरुष ही आपको पा सकते हैं ॥ ५४ ॥ सत्पुरुषों के लिये भी दुर्लभ अनन्य भक्ति से भगवान् को प्रसन्न करके, जिनकी प्रसन्नता किसी अन्य साधना से दुःसाध्य है, ऐसा कौन होगा जो उनके चरणतल के अतिरिक्त और कुछ चाहेगा ॥ ५५ ॥ जो काल अपने अदम्य उत्साह और पराक्रम से फड़कती हुए भौंह के इशारे से सारे संसार का संहार कर डालता है, वह भी आपके चरणों की शरण में गये हुए प्राणी पर अपना अधिकार नहीं मानता ॥ ५६ ॥ ऐसे भगवान् के प्रेमी भक्तों को यदि आधे क्षण के लिये भी समागम हो जाय तो उसके सामने में स्वर्ग और मोक्ष को कुछ नहीं समझता; फिर मर्त्यलोक के तुच्छ भोगों की तो बात ही क्या है ॥ ५७ ॥

प्रभो ! आपके चरण सम्पूर्ण पापराशि को हर लेनेवाले हैं । हम तो केवल यही चाहते हैं कि जिन लोगों ने आपकी कीर्ति और तीर्थ (गङ्गाजी) में आन्तरिक और बाह्य स्नान करके मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के पापों को धो डाला है तथा जो जीवों के प्रति दया, राग-द्वेषरहित चित्त तथा सरलता आदि गुणों से युक्त हैं, उन आपके भक्तजनों का सङ्ग हमें सदा प्राप्त होता रहे । यही हमपर आपकी बड़ी कृपा होगी ॥ ५८ ॥ जिस साधक का चित्त भक्तियोग से अनुगृहीत एवं विशुद्ध होकर न तो बाह्य विषयों में भटकता है और न अज्ञान-गुहारूप प्रकृति में ही लीन होता हैं, वह अनायास ही आपके स्वरूप का दर्शन पा जाता है ॥ ५९ ॥ जिसमें यह सारा जगत् दिखायी देता है और जो स्वयं सम्पूर्ण जगत् में भास रहा है, वह आकाश के समान विस्तृत और परम प्रकाशमय ब्रह्मतत्त्व आप ही हैं ॥ ६० ॥

भगवन् ! आपकी माया अनेक प्रकार के रूप धारण करती है । इसके द्वारा आप इस प्रकार जगत् की रचना, पालन और संहार करते हैं जैसे यह कोई सद्वस्तु हो । किन्तु इससे आपमें किसी प्रकार का विकार नहीं आता । माया के कारण दूसरे लोगों में ही भेदबुद्धि उत्पन्न होती हैं, आप परमात्मा पर वह अपना प्रभाव डालने में असमर्थ होती है । आपको तो हम परम स्वतन्त्र ही समझते हैं ॥ ६१ ॥ आपका स्वरूप पञ्चभूत, इन्द्रिय और अन्तःकरण के प्रेरकरूप से उपलक्षित होता है । जो कर्मयोगी पुरुष सिद्धि प्राप्त करने के लिये तरह-तरह के कर्मों के द्वारा आपके इस सगुण साकार स्वरूप का श्रद्धापूर्वक भली-भाँति पूजन करते हैं, वे ही वेद और शास्त्र के सच्चे मर्मज्ञ हैं ॥ ६२ ॥ प्रभो ! आप ही अद्वितीय आदिपुरुष हैं । सृष्टि के पूर्व आपकी मायाशक्ति सोयी रहती हैं । फिर उसी के द्वारा सत्त्व, रज और तमरूप गुणों का भेद होता है और इसके बाद उन्हीं गुणों से महत्तत्त्व, अहङ्कार, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, देवता, ऋषि और समस्त प्राणियों से युक्त इस जगत् की उत्पत्ति होती है ॥ ६३ ॥ फिर आप अपनी ही मायाशक्ति से रचे हुए इन जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज —भेद से चार प्रकार के शरीरों में अंशरूप से प्रवेश कर जाते हैं और जिस प्रकार मधुमक्खियाँ अपने ही उत्पन्न किये हुए मधु का आस्वादन करती हैं, उसी प्रकार वह आपका अंश उन शरीरों में रहकर इन्द्रियों के द्वारा इन तुच्छ विषयों को भोगता है । आपके उस अंश को ही पुरुष या जीव कहते हैं ॥ ६४ ॥

प्रभो ! आपका तत्त्वज्ञान प्रत्यक्ष से नहीं अनुमान से होता है । प्रलयकाल उपस्थित होने पर कालस्वरूप आप ही अपने प्रचण्ड एवं असह्य वेग से पृथ्वी आदि भूतों को अन्य भूतों से विचलित कराकर समस्त लोकों का संहार कर देते हैं — जैसे वायु अपने असहनीय एवं प्रचण्ड झोंकों से मेघों के द्वारा ही मेघों को तितर-बितर करके नष्ट कर डालती है ॥ ६५ ॥ भगवन् ! यह मोहग्रस्त जीव प्रमादवश हर समय इसी चिन्ता में रहता है कि ‘अमुक कार्य करना है । इसका लोभ बढ़ गया है और इसे विषयों की ही लालसा बनी रहती है । किन्तु आप सदा ही सजग रहते हैं; भूख से जीभ लपलपाता हुआ सर्प जैसे चूहे को चट कर जाता है, उसी प्रकार आप अपने कालस्वरूप से उसे सहसा लील जाते हैं ॥ ६६ ॥ आपकी अवहेलना करने के कारण अपनी आयु को व्यर्थ माननेवाला ऐसा कौन विद्वान् होगा, जो आपके चरणकमलों को विसारेगा ? इनकी पूजा तो काल की आशङ्का से ही हमारे पिता ब्रह्माजी और स्वायम्भुव आदि चौदह मनुओं ने भी बिना कोई विचार किये केवल श्रद्धा से ही की थी ॥ ६७ ॥ ब्रह्मन् ! इस प्रकार सारा जगत् रुद्ररूप काल के भय से व्याकुल हैं । अतः परमात्मन् ! इस तत्त्व को जाननेवाले हमलोगों के तो इस समय आप ही सर्वथा भयशून्य आश्रय हैं ॥ ६८ ॥

राजकुमारो ! तुमलोग विशुद्ध भाव से स्वधर्म का आचरण करते हुए भगवान् में चित्त लगाकर मेरे कहे हुए इस स्तोत्र का जप करते रहो; भगवान् तुम्हारा मङ्गल करेंगे ॥ ६९ ॥ तुमलोग अपने अन्तःकरण में स्थित उन सर्वभूतान्तर्यामी परमात्मा श्रीहरि का ही बार-बार स्तवन और चिन्तन करते हुए पूजन करो ॥ ७० ॥ मैंने तुम्हें यह ‘योगादेश’ नाम का स्तोत्र सुनाया है । तुमलोग इसे मन से धारणकर मुनिव्रत का आचरण करते हुए इसका एकाग्रता से आदरपूर्वक अभ्यास करो ॥ ७१ ॥ यह स्तोत्र पूर्वकाल में जगद्विस्तार के इच्छुक प्रजापतियों के प्रति भगवान् ब्रह्माजी ने प्रजा उत्पन्न करने की इच्छवाले हम भृगु आदि अपने पुत्रों को सुनाया था ॥ ७२ ॥ जब हम प्रजापतियों को प्रजा का विस्तार करने की आज्ञा हुई, तब इसके द्वारा हमने अपना अज्ञान निवृत्त करके अनेक प्रकार की प्रजा उत्पन्न की थी ॥ ७३ ॥

अब भी जो भगवत्परायण पुरुष इसका एकाग्र चित्त से नित्यप्रति जप करेगा, उसका शीघ्र ही कल्याण हो जायगा ॥ ७४ ॥ इस लोक में सब प्रकार के कल्याणसाधनों में मोक्षदायक ज्ञान ही सबसे श्रेष्ठ है । ज्ञान-नौका पर चढ़ा हुआ पुरुष अनायास ही इस दुस्तर संसारसागर को पार कर लेता हैं ॥ ७५ ॥ यद्यपि भगवान् की आराधना बहुत कठिन है किन्तु मेरे कहे हुए इस स्तोत्र का जो श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा, वह सुगमता से ही उनकी प्रसन्नता प्राप्त कर लेगा ॥ ६ ॥ भगवान् ही सम्पूर्ण कल्याण साधनों के एकमात्र प्यारे-प्राप्तव्य है ।

अतः मेरे गाये हुए इस स्तोत्र के गान से उन्हें प्रसन्न करके वह स्थिरचित्त होकर उनसे जो कुछ चाहेगा, प्राप्त कर लेगा ॥ ७७ ॥ जो पुरुष उषःकाल में उठकर इसे श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर सुनता या सुनाता है, वह सब प्रकार के कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाता हैं ॥ ७८ ॥ राजकुमारो ! मैंने तुम्हें जो यह परमपुरुष परमात्मा का स्तोत्र सुनाया है, इसे एकाग्रचित्त से जपते हुए तुम महान् तपस्या करो । तपस्या पूर्ण होनेपर इसीसे तुम्हें अभीष्ट फल प्राप्त हो जायगा ॥ ७९ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे रुद्रगीतं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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