श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय १२
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
बारहवाँ अध्याय
सृष्टि का विस्तार

श्रीमैत्रेयजी ने कहा — विदुरजी ! यहाँतक मैंने आपको भगवान् की कालरूप महिमा सुनायी । अब जिस प्रकार ब्रह्माजी ने जगत् की रचना की, यह सुनिये ॥ १ ॥ सबसे पहले उन्होंने अज्ञान की पाँच वृत्तियाँ — तम् (अविद्या), मोह (अस्मिता), महामोह (राग), तामिस्र (द्वेष) और अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) रचीं ॥ २ ॥ किंतु इस अत्यन्त पापमयी सृष्टि को देखकर उन्हें प्रसन्नता नहीं हुई । तब उन्होंने अपने मन को भगवान् के ध्यान से पवित्र कर उससे दूसरी सृष्टि रची ॥ ३ ॥ इस बार ब्रह्माजी ने सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार — ये चार निवृत्तिपरायण ऊर्ध्वरेता मुनि उत्पन्न किये ॥ ४ ॥ अपने इन पुत्रों से ब्रह्माजी ने कहा, ‘पुत्रो ! तुमलोग सृष्टि उत्पन्न करो ।’ किंतु वे जन्म से ही मोक्षमार्ग (निवृत्तिमार्ग) का अनुसरण करनेवाले और भगवान् के ध्यान में तत्पर थे, इसलिये उन्होंने ऐसा करना नहीं चाहा ॥ ५ ॥ जब ब्रह्माजी ने देखा कि मेरी आज्ञा न मानकर ये मेरे पुत्र मेरा तिरस्कार कर रहे हैं, तब उन्हें असह्य क्रोध हुआ । उन्होंने उसे रोकने का प्रयत्न किया ॥ ६ ॥ किंतु बुद्धि द्वारा उनके बहुत रोकने पर भी वह क्रोध तत्काल प्रजापति की भौंहो के बीच में से एक नीललोहित (नीले और लाल रंगके) बालक के रूप में प्रकट हो गया ॥ ७ ॥ वे देवताओं के पूर्वज भगवान् भव (रुद्र) रो-रोकर कहने लगे — ‘जगत्पिता ! विधाता ! मेरे नाम और रहने के स्थान बतलाइये ॥ ८ ॥

तब कमलयोनि भगवान् ब्रह्मा ने उस बालक की प्रार्थना पूर्ण करने के लिये मधुर वाणी में कहा, ‘रोओ मत’ मैं अभी तुम्हारी इच्छा पूरी करता हूँ ॥ ९ ॥ देवश्रेष्ठ ! तुम जन्म लेते ही बालक के समान फूट-फूटकर रोने लगे, इसलिये प्रजा तुम्हें ‘रुद्र’ नामसे पुकारेगी ॥ १० ॥ तुम्हारे रहने के लिये मैंने पहले से ही हृदय, इन्द्रिय, प्राण, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा और तप — ये स्थान रच दिये हैं ॥ ११ ॥ तुम्हारे नाम मन्यु, मनु, महिनस, महान्, शिव, ऋतध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव और धृतवत होंगे ॥ १२ ॥ तथा धी, वृत्ति, उशना, उमा, नियुत्, सर्पो, इला, अम्बिका, इरावती, सुधा और दीक्षा — ये ग्यारह रुद्राणियाँ तुम्हारी पत्रियाँ होंगीं ॥ १३ ॥ तुम उपर्युक्त नाम, स्थान और स्त्रियों को स्वीकार करो और इनके द्वारा बहुत-सी प्रजा उत्पन्न करो; क्योंकि तुम प्रजापति हो’ ॥ १४ ॥

लोकपिता ब्रह्माजी से ऐसी आज्ञा पाकर भगवान् नीललोहित बल, आकार और स्वभाव में अपने-ही-जैसी प्रजा उत्पन्न करने लगे ॥ १५ ॥ भगवान् रुद्र के द्वारा उत्पन्न हुए उन रुद्रों को असंख्य यूथ बनाकर सारे संसार को भक्षण करते देख ब्रह्माजी को बड़ी शङ्का हुई ॥ १६ ॥ तब उन्होंने रुद्र से कहा, ‘सुरश्रेष्ठ ! तुम्हारी प्रजा तो अपनी भयङ्कर दृष्टि से मुझे और सारी दिशाओं को भस्म किये डालती है; अतः ऐसी सृष्टि और न रचो ॥ १७ ॥ तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम समस्त प्राणियों को सुख देने के लिये तप करो । फिर उस तप के प्रभाव से ही तुम पूर्ववत् इस संसार की रचना करना ॥ १८ ॥ पुरुष तप के द्वारा ही इन्द्रियातीत, सर्वान्तर्यामी, ज्योतिःस्वरूप श्रीहरि को सुगमता से प्राप्त कर सकता हैं ॥ १९ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — जब ब्रह्माजी ने ऐसी आज्ञा दी, तब रुद्र ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसे शिरोधार्य किया और फिर उनकी अनुमति लेकर तथा उनकी परिक्रमा करके वे तपस्या करने के लिये वन को चले गये ॥ ३० ॥

इसके पश्चात् जब भगवान् की शक्ति से सम्पन्न ब्रह्माजी ने सृष्टि के लिये सङ्कल्प किया, तब उनके दस पुत्र और उत्पन्न हुए । उनसे लोक की बहुत वृद्धि हुई ॥ २१ ॥ उनके नाम मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष और दसवें नारद थे ॥ २२ ॥ इनमें नारदजी प्रजापति ब्रह्माजी की गोद से, दक्ष अँगूठे से, वसिष्ठ प्राण से, भृगु त्वचा से, क्रतु हाथ से, पुलह नाभि से, पुलस्त्य ऋषि कानों से, अङ्गिरा मुख से, अत्रि नेत्रों से और मरीचि मन से उत्पन्न हुए ॥ २३-२४ ॥ फिर उनके दायें स्तन से धर्म उत्पन्न हुआ, जिसकी पत्नी मूर्ति से स्वयं नारायण अवतीर्ण हुए तथा उनकी पीठ से अधर्म का जन्म हुआ और उससे संसार को भयभीत करनेवाला मृत्यु उत्पन्न हुआ ॥ २५ ॥ इसी प्रकार ब्रह्माजी के हृदय से काम, भौंहों से क्रोध, नीचे के होठ से लोभ, मुख से वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती, लिङ्ग से समुद्र, गुदा से पाप का निवासस्थान (राक्षसों के अधिपति) निर्ऋति ॥ २६ ॥ छाया से देवहूति के पति भगवान् कर्दमजी उत्पन्न हुए । इस तरह यह सारा जगत् जगत्कर्ता ब्रह्माजी के शरीर और मन से उत्पन्न हुआ ॥ २५ ॥

विदुरजी ! भगवान् ब्रह्मा की कन्या सरस्वती बड़ी ही सुकुमारी और मनोहर थी । हमने सुना हैं — एक बार उसे देखकर ब्रह्माजी काममोहित हो गये थे, यद्यपि वह स्वयं वासनाहीन थी ॥ २८ ॥ उन्हें ऐसा अधर्ममय सङ्कल्प करते देख, उनके पुत्र मरीचि आदि ऋषियों ने उन्हें विश्वासपूर्वक समझाया — ॥ २९ ॥ ‘पिताजी ! आप समर्थ हैं, फिर भी अपने मन में उत्पन्न हुए काम के वेग को न रोककर पुत्रीगमन -जैसा दुस्तर पाप करने का सङ्कल्प कर रहे हैं ! ऐसा तो आपसे पूर्ववत किसी भी ब्रह्मा ने नहीं किया और न आगे ही कोई करेगा ॥ ३ ॥ जगद्गुरो ! आप-जैसे तेजस्वी पुरुष को भी ऐसा काम शोभा नहीं देता; क्योंकि आपलोगों के आचरणों का अनुसरण करने से ही तो संसार का कल्याण होता है ॥ ३१ ॥ जिन श्रीभगवान् ने अपने स्वरूप में स्थित इस जगत् को अपने ही तेज से प्रकट किया है, उन्हें नमस्कार है । इस समय वे ही धर्म की रक्षा कर सकते हैं’ ॥ ३२ ॥ अपने पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियों को अपने सामने इस प्रकार कहते देख प्रजापतियों के पति ब्रह्माजी बड़े लज्जित हुए और उन्होंने उस शरीर को उसी समय छोड़ दिया । तब उस घोर शरीर को दिशाओं ने ले लिया । वही कुहरा हुआ, जिसे अन्धकार भी कहते हैं ॥ ३३ ॥

एक बार ब्रह्माजी यह सोच रहे थे कि ‘मैं पहले की तरह सुव्यवस्थित रूप से सब लोकों की रचना किस प्रकार करूँ ?’ इसी समय उनके चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए ॥ ३४ ॥ इनके सिवा उपवेद, न्यायशास्त्र, होता, उद्गाता, अध्वर्यु और ब्रह्मा — इन चार ऋत्विजों के कर्म, यज्ञों का विस्तार, धर्म के चार चरण और चारों आश्रम तथा उनकी वृत्तियाँ — ये सब भी ब्रह्माजी के मुख़ से ही उत्पन्न हुए ॥ ३५ ॥

विदुरजी ने पूछा —
तपोधन ! विश्वरचयिताओं के स्वामी श्रीब्रह्माजी ने जब अपने मुखों से इन वेदादि को रचा, तो उन्होंने अपने किस मुख से कौन वस्तु उत्पन्न की —यह आप कृपा करके मुझे बतलाइये ॥ ३६ ॥

श्रीमैत्रेयजी ने कहा — विदुरजी ! ब्रह्मा ने अपने पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर के मुख़ से क्रमशः ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेदों को रचा तथा इसी क्रम से शस्त्र (होता का कर्म), इज्या (अध्वर्यु का कर्म), स्तुतिस्तोम (उद्गाता कर्म) और प्रायश्चित्त (ब्रह्मा का कर्म) — इन चारों की रचना की ॥ ३७ ॥ इसी प्रकार आयुर्वेद (चिकित्साशास्त्र), धनुर्वेद (शस्त्रविद्या), गान्धर्ववेद (सङ्गीतशास्त्र) और स्थापत्यवेद (शिल्पविद्या) — इन चार उपवेदों को भी क्रमशः उन पूर्वादि मुखों से ही उत्पन्न किया ॥ ३८ ॥ फिर सर्वदर्शी भगवान् ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों से इतिहास-पुराणरूप पाँचवाँ वेद बनाया ॥ ३९ ॥ इसी क्रम से षोडशी और उक्थ, चयन और अग्निष्टोम, आप्तोर्याम और अतिरात्र तथा वाजपेय और गोसव — ये दो-दो याग भी उनके पूर्वादि मुखों से ही उत्पन्न हुए ॥ ४० ॥ विद्या, दान, तप और सत्य — ये धर्म के चार पाद और वृत्तियों के सहित चार आश्रम भी इसी क्रम से प्रकट हुए ॥ ४१ ॥

सावित्र उपनयन संस्कार के पश्चात् गायत्री का अध्ययन करने के लिये धारण किया जानेवाला तीन दिन का ब्रह्मचर्यव्रत।, प्राजापत्य एक वर्षका ब्रह्मचर्यव्रत।), {tooltip}ब्राह्म {end-texte}वेदाध्ययन की समाप्ति तक रहनेवाला ब्रह्मचर्यव्रत।) और {tooltip}बृहत् {end-texte}आयुपर्यन्त रहनेवाला ब्रह्मचर्यव्रत। — ये चार वृत्तियाँ ब्रह्मचारी की हैं तथा वार्ता कृषि आदि शास्त्रविहित वृत्तियाँ।, सञ्चय यागादि कराना ।, शालीन अयाचितवृत्ति। और शिलोच्छ खेत कट जाने पर पृथ्वी पर पड़े हुए तथा अनाज की मंडी में गिरे हुए दानों को बीनकर निर्वाह करना। — ये चार वृत्तियाँ गृहस्थ की हैं ॥ ४२ ॥ इसी प्रकार वृत्तिभेद से वैखानस बिना जोती-बोयी भूमि से उत्पन्न हुए पदार्थों से निर्वाह करनेवाले।, वालखिल्य नवीन अन्न मिलने पर पहला संचय करके रखा हुआ अन्न दान कर देनेवाले।, औदुम्बर प्रातःकाल उठने पर जिस दिशा की ओर मुख हो उसी ओर से फलादि लाकर निर्वाह करनेवाले। और फेनप अपने-आप झड़े हुए फलादि खाकर रहनेवाले। — ये चार भेद वानप्रस्थों के तथा कुटीचक  कुटी बनाकर एक जगह रहने और आश्रमके धर्मों का पूरा पालन करनेवाले।, बहुदक कर्म की ओर गौणदृष्टि रखकर ज्ञान को ही प्रधान माननेवाले।, हंस ज्ञानाभ्यासी और निष्क्रिय परमहंस – ज्ञानी जीवन्मुक्त। — ये चार भेद संन्यासियों के हैं ॥ ४३ ॥

इसी क्रम से आन्वीक्षिकी मोक्ष प्राप्त करनेवाली आत्मविद्या।, त्रयी स्वर्गादि फल देनेवाली कर्मविद्या।, वार्ता खेती-व्यापारादि-सम्बन्धी विद्या। और दण्डनीति राजनीति — ये चार विद्याएँ तथा चार व्याहृतियाँ भूः भुवः स्वः – ये तीन और चौथी महः को मिलाकर, इस प्रकार चार व्याहृतियाँ आश्वलायन ने अपने गृह्यसूत्रों में बतलायी हैं – ‘एवं व्याहृतयः प्रोक्ता व्यस्ताः समस्ताः ।’ अथवा भूः, भुवः स्वः और महः – ये चार व्याहृतियाँ जैसा कि श्रुति कहती है -‘भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयस्तासामु ह स्मैतां चतुर्थमाह । वाचमस्य प्रवेदयते महः इत्यादि। भी ब्रह्माजी के चार मुखों से उत्पन्न हुई तथा उनके हृदयाकाश से -कार प्रकट हुआ ॥ ४४ ॥ उनके रोमों से उष्णिक्, त्वचा से गायत्री, मांस से त्रिष्टुप्, स्नायु से अनुष्टुप, अस्थियों से जगती, मज्जा से पंक्ति और प्राणों से बृहती छन्द उत्पन्न हुआ । ऐसे ही उनका जीव स्पर्शवर्ण (कवर्गादि पञ्चवर्ग) और देह स्वरवर्ण (अकारादि) कहलाया ॥ ४५-४६ ॥ उनकी इन्द्रियों को ऊष्मवर्ण (श स स ह) और बल को अन्तःस्थ (य र ल व) कहते हैं, तथा उनकी क्रीडा से निषाद, ऋषभ, गान्धार, षड्ज, मध्यम, धैवत और पञ्चम — ये सात स्वर हुए ॥ ४७ ॥ हे तात ! ब्रह्माजी शब्दब्रह्मस्वरूप हैं । वे वैखरीरूप से व्यक्त और ओङ्काररूप से अव्यक्त है तथा उनसे परे जो सर्वत्र परिपूर्ण परब्रह्म है, वही अनेक प्रकार की शक्तियों से विकसित होकर इन्द्रादि रूपों में भास रहा है ॥ ४८ ॥

विदुरजी ! ब्रह्माजी ने पहला कामासक्त शरीर जिससे कुहरा बना था — छोड़ने के बाद दूसरा शरीर धारण करके विश्वविस्तार का विचार किया; वे देख चुके थे कि मरीचि आदि महान् शक्तिशाली ऋषियों से भी सृष्टि का विस्तार अधिक नहीं हुआ, अतः वे मन-ही-मन पुनः चिन्ता करने लगे – “अहो ! बड़ा आश्चर्य हैं, मेरे निरन्तर प्रयत्न करने पर भी प्रजा की वृद्धि नहीं हो रही है । मालूम होता है इसमें दैव ही कुछ विघ्न डाल रहा है ।” जिस समय यथोचित क्रिया करनेवाले श्रीब्रह्माजी इस प्रकार दैव के विषय में विचार कर रहे थे उसी समय अकस्मात् उनके शरीर के दो भाग हो गये । ‘क’ ब्रह्माजी का नाम है, उन्ही से विभक्त होने के कारण शरीर को ‘काय’ कहते हैं । उन दोनों विभागों से एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ ॥ ४९-५२ ॥ उनमें जो पुरुष था वह सार्वभौम सम्राट् स्वायम्भुव मनु हुए और जो स्त्री थी, वह उनकी महारानी शतरूपा हुई ॥ ५३ ॥ तब से मिथुनधर्म (स्त्री-पुरुष-सम्भोग) से प्रजा की वृद्धि होने लगी । महाराज स्वायम्भुव मनु ने शतरूपा से पाँच सन्ताने उत्पन्न कीं ॥ ५४ ॥ साधुशिरोमणि विदुरजी ! उनमें प्रियव्रत और उत्तानपाद दो पुत्र थे तथा आकूति, देवहूति और प्रसूति — तीन कन्याएँ थीं ॥ ५५ ॥ मनुजी ने आकृति का विवाह रुचि प्रजापति से किया, मझली कन्या देवहूति कर्दमजी को दी और प्रसूति दक्ष प्रजापति को । इन तीनों कन्याओं की सन्तति से सारा संसार भर गया ॥ ५६ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे द्वादशोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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