श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय १५
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
पंद्रहवाँ अध्याय
जय-विजय को सनकादि का शाप

श्रीमैत्रेयजी ने कहा — विदुरजी ! दिति को अपने पुत्रों से देवताओ को कष्ट पहुँचने की आशङ्का थी, इसलिये उसने दूसरों के तेज का नाश करनेवाले इस कश्यपजी के तेज (वीर्य) को सौ वर्षों तक अपने उदर में ही रखा ॥ १ ॥ उस गर्भस्थ तेज से ही लोकों में सूर्यादि का प्रकाश क्षीण होने लगा तथा इन्द्रादि लोकपाल भी तेजोहीन हो गये । तब उन्होंने ब्रह्माजी के पास जाकर कहा कि सब दिशाओं में अन्धकार के कारण बड़ी अव्यवस्था हो रही है ॥ ३ ॥

देवताओं ने कहा — भगवन् ! काल आपकी ज्ञानशक्ति को कुण्ठित नहीं कर सकता, इसलिये आपसे कोई बात छिपी नहीं है । आप इस अन्धकार के विषय में भी जानते ही होंगे, हम तो इससे बड़े ही भयभीत हो रहे हैं ॥ ३ ॥ देवाधिदेव ! आप जगत् के रचयिता और समस्त लोकपालों के मुकुटमणि हैं । आप छोटे-बड़े सभी जीवों का भाव जानते हैं ॥ ४ ॥ देव ! आप विज्ञान-बल-सम्पन्न हैं; आपने माया से ही यह चतुर्मुख रूप और रजोगुण स्वीकार किया है; आपकी उत्पत्ति के वास्तविक कारण को कोई नहीं जान सकता । हम आपको नमस्कार करते हैं ॥ ५ ॥

आपमें सम्पूर्ण भुवन स्थित हैं, कार्य-कारणरूप सारा प्रपञ्च आपका शरीर है, किन्तु वास्तव में आप इससे परे हैं । जो समस्त जीवों के उत्पत्तिस्थान आपका अनन्य भाव से ध्यान करते हैं, उन सिद्ध योगियों का किसी प्रकार भी ह्रास नहीं हो सकता; क्योंकि वे आपके कृपाकटाक्ष से कृतकृत्य हो जाते हैं तथा प्राण, इन्द्रिय और मन को जीत लेने के कारण उनका योग भी परिपक्व हो जाता है ॥ ६-७ ॥ रस्सी से बँधे हुए बैलों की भाँति आपकी वेदवाणी से जकड़ी हुई सारी प्रजा आपकी अधीनता में नियमपूर्वक कर्मानुष्ठान करके आपको बलि समर्पित करती है । आप सबके नियन्ता मुख्य प्राण है, हम आपको नमस्कार करते हैं ॥ ८ ॥

भूमन् ! इस अन्धकार के कारण दिन-रात का विभाग अस्पष्ट हो जाने से लोकों के सारे कर्म लुप्त होते जा रहे हैं, जिससे वे दुखी हो रहे हैं, उनका कल्याण कीजिये और हम शरणागतों की ओर अपनी अपार दयादृष्टि से निहारिये ॥ ९ ॥ देव ! आग जिस प्रकार ईंधन में पड़कर बढ़ती रहती है, उसी प्रकार कश्यपजी के वीर्य से स्थापित हुआ यह दिति का गर्भ सारी दिशाओं को अन्धकारमय करता हुआ क्रमशः बढ़ रहा है ॥ १० ॥

मैत्रेयजी कहते हैं — महाबाहो ! देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान् ब्रह्माजी हँसे और उन्हें अपनी मधुर वाणी से आनन्दित करते हुए कहने लगे ॥ ११ ॥

श्रीब्रह्माजी ने कहा — देवताओ ! तुम्हारे पूर्वज, मेरे मानसपुत्र सनकादि लोकों की आसक्ति त्यागकर समस्त लोकों में आकाशमार्ग से विचरा करते थे ॥ १२ ॥ एक बार वे भगवान् विष्णु के शुद्ध-सत्त्वमय सब लोकों के शिरोभाग में स्थित वैकुण्ठधाम में जा पहुँचे ॥ १३ ॥ वहाँ सभी लोग विष्णुरूप होकर रहते हैं और वह प्राप्त भी उन्हीं को होता है, जो अन्य सब प्रकार की कामनाएँ छोड़कर केवल भगवच्चरण-शरण की प्राप्ति के लिये ही अपने धर्मद्वारा उनकी आराधना करते हैं ॥ १४ ॥ वहाँ वेदान्त-प्रतिपाद्य धर्ममूर्ति श्रीआदिनारायण हम अपने भक्तों को सुख देने के लिये शुद्धसत्वमय स्वरूप धारणकर हर समय विराजमान रहते हैं ॥ १५ ॥ उस लोक में नैःश्रेयस नाम का एक वन है, जो मूर्तिमान् कैवल्य-सा ही जान पड़ता है । वह सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करनेवाले वृक्षों से सुशोभित है, जो स्वयं हर समय छहों ऋतुओं की शोभा से सम्पन्न रहते हैं ॥ १६ ॥

वहाँ विमानचारी गन्धर्वगण अपनी प्रियाओं सहित अपने प्रभु की पवित्र लीलाओं का गान करते रहते हैं, जो लोगों की सम्पूर्ण पापराशि को भस्म कर देनेवाली है । उस समय सरोवरों में खिली हुई मकरन्दपूर्ण वासन्तिक माधवी लता की सुमधुर गन्ध उनके चित को अपनी ओर खींचना चाहती है; परन्तु वे उसकी ओर ध्यान ही नहीं देते वरन् उस गंध को उड़ाकर लानेवाले वायु को ही बुरा-भला कहते हैं ॥ १७ ॥ जिस समय भ्रमरराज ऊँचे स्वर से गुंजार करते हुए मानो हरिकथा का गान करते हैं, उस समय थोड़ी देर के लिये कबूतर, कोयल, सारस, चकवे, पपीहे, हंस, तोते, तीतर और मोरों का कोलाहल बंद हो जाता है — मानो वे भी उस कीर्तनानन्द में बेसुध हो जाते हैं ॥ १८ ॥ श्रीहरि तुलसी से अपने श्रीविग्रह को सजाते हैं और तुलसी गन्ध का ही अधिक आदर करते हैं — यह देखकर वहाँ के मन्दार, कुन्द, कुरबक (तिलकवृक्ष), उत्पल (रात्रि में खिलनेवाले कमल), चम्पक, अर्ण, पुन्नाग, नागकेसर, बकुल (मौलसिरी), अम्बुज (दिन में खिलनेवाले कमल) और पारिजात आदि पुष्प सुगन्धयुक्त होनेपर भी तुलसी का ही तप अधिक मानते हैं ॥ १९ ॥ वह लोक वैदूर्य, मरकत-मणि (पन्ने) और सुवर्ण के विमानों से भरा हुआ है । ये सब किसी कर्मफल से नहीं, बल्कि एकमात्र श्रीहरि के पादपों की वन्दना करने से ही प्राप्त होते हैं । उन विमानों पर चढ़े हुए कृष्णप्राण भगवद्भक्तों के चितों में बड़े-बड़े नितम्बोंवाली सुमुखी सुन्दरियाँ भी अपनी मन्द मुसकान एवं मनोहर हास-परिहास से कामविकार नहीं उत्पन्न कर सकतीं ॥ २० ॥

परम सौन्दर्यशालिनी लक्ष्मीजी, जिनकी कृपा प्राप्त करने के लिये देवगण भी यत्नशील रहते हैं, श्रीहरि के भवन में चञ्चलतारूप दोष को त्यागकर रहती हैं । जिस समय अपने चरण-कमलों के नूपुरों की झनकार करती हुई वे अपना लीलाकमल घुमाती हैं, उस समय उस कनकभवन की स्फटिकमय दीवारों में उनका प्रतिबिम्ब पंडने से ऐसा जान पड़ता है मानो वे उन्हें बुहार रही हों ॥ २१ ॥ प्यारे देवताओ ! जिस समय दासियों साथ लिये वे अपने क्रीडावन में तुलसीदल द्वारा भगवान् का पूजन करती हैं, तब वहाँ के निर्मल जल से भरे हुए सरोवरों में, जिनमें मुंगे के घाट बने हुए हैं, अपना सुन्दर अलकावली और उन्नत नासिका से सुशोभित मुखारविन्द देखकर ‘यह भगवान् का चुम्बन किया हुआ हैं यों जानकर उसे बड़ा सौभाग्यशाली समझती हैं ॥ २२ ॥ जो लोग भगवान् की पापापहारिणी लीलाकथाओं को छोड़कर बुद्धि को नष्ट करनेवाली अर्थ-काम सम्बन्धिनी अन्य निन्दित कथाएँ सुनते हैं, वे उस वैकुण्ठलोक में नहीं जा सकते । हाय ! जब वे अभागे लोग इन सारहीन बातों को सुनते हैं, तब ये उनके पुण्यों को नष्टकर उन्हें आश्रयहीन घोर नरकों में डाल देती हैं ॥ २३ ॥

अहा ! इस मनुष्ययोनि की बड़ी महिमा हैं, हम देवतालोग भी इसकी चाह करते हैं । इसमें तत्त्वज्ञान और धर्म की भी प्राप्ति हो सकती है । इसे पाकर भी जो लोग भगवान् की आराधना नहीं करते, वे वास्तव में उनकी सर्वत्र फैली हुई माया से ही मोहित हैं ॥ २४ ॥ देवाधिदेव श्रीहरि का निरन्तर चिन्तन करते रहने के कारण जिनसे यमराज दूर रहते हैं, आपस में प्रभु के सुयश की चर्चा चलने पर अनुरागजन्य विह्वलतावश जिनके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा बहने लगती है तथा शरीर में रोमाञ्च हो जाता है और जिनके-से शील स्वभाव की हमलोग भी इच्छा करते हैं वे परमभागवत ही हमारे लोकों से ऊपर उस वैकुण्ठधाम में जाते हैं ॥ २५ ॥ जिस समय सनकादि मुनि विश्वगुरु श्रीहरि के निवासस्थान, सम्पूर्ण लोकों के वन्दनीय और श्रेष्ठ देवताओं के विचित्र विमानों से विभूषित उस परम दिव्य और अद्भुत वैकुण्ठधाम में अपने योगबल से पहुंचे, तब उन्हें बड़ा ही आनन्द हुआ ॥ २६ ॥

भगवद्दर्शन की लालसा से अन्य दर्शनीय सामग्री की उपेक्षा करते हुए वैकुण्ठधाम की छः ड्यौढ़ियाँ पार करके जब वे सातवीं पर पहुँचे, तब वहाँ उन्हें हाथ में गदा लिये दो समान आयुवाले देवश्रेष्ठ दिखलायी दिये—जो बाजूबंद, कुण्डल और किरीट आदि अनेकों अमूल्य आभूषणों से अलङ्कत थे ॥ २७ ॥ उनकी चार श्यामल भुजाओं के बीच में मतवाले मधुकरों से गुञ्जायमान वनमाला सुशोभित थी तथा बाँकी भौहें, फड़कते हुए नासिकारन्ध्र और अरुण नयनों के कारण उनके चेहरे पर कुछ क्षोभके-से चिह्न दिखायी दे रहे थे ॥ २८ ॥ उनके इस प्रकार देखते रहनेपर भी वे मुनिगण उनसे बिना कुछ पूछताछ किये, जैसे सुवर्ण और वज्रमय किवाड़ों से युक्त पहली छः ड्यौड़ी लाँघकर आये थे, उसी प्रकार उनके द्वार में भी घुस गये । उनकी दृष्टि तो सर्वत्र समान थी और वे निःशङ्क होकर सर्वत्र बिना किसी रोक-टोक के विचरते थे ॥ २९ ॥ वे चारों कुमार पूर्ण तत्त्वज्ञ थे तथा ब्रह्मा की सृष्टि में आयु में सबसे बड़े होनेपर भी देखने में पाँच वर्ष के बालकों-से जान पड़ते थे और दिगम्बर-वृत्त से (नंग-धड्ग) रहते थे । उन्हें इस प्रकार निःसङ्कोच रुप से भीतर जाते देख उन द्वारपालों ने भगवान् के शील-स्वभाव के विपरीत सनकादि के तेज की हंसी उड़ाते हुए उन्हें बेंत अड़ाकर रोक दिया, यद्यपि वे ऐसे दुर्व्यवहार के योग्य नहीं थे ॥ ३० ॥ जब उन द्वारपालों ने वैकुण्ठवासी देवताओं के सामने पूजा के सर्वश्रेष्ठ पात्र उन कुमारों को इस प्रकार रोका, तब अपने प्रियतम प्रभु के दर्शनों में विघ्न पड़ने के कारण उनके नेत्र सहसा कुछ-कुछ क्रोध से लाल हो उठे और वे इस प्रकार कहने लगे ॥ ३१ ॥

मुनियों ने कहा — अरे द्वारपालों ! जो लोग भगवान् की महती सेवा के प्रभाव से इस लोक को प्राप्त होकर यहाँ निवास करते हैं, वे तो भगवान् के समान ही समदर्शी होते हैं । तुम दोनों भी उन्हीं में से हो, किन्तु तुम्हारे स्वभाव में यह विषमता क्यों है ? भगवान् तो परम शान्तस्वभाव हैं, उनका किसी से विरोध भी नहीं है, फिर यहाँ ऐसा कौन है, जिसपर शङ्का की जा सके ? तुम स्वयं कपटी हो, इसीसे अपने ही समान दूसरों पर शङ्का करते हो ॥ ३२ ॥ भगवान् के उदर में यह सारा ब्रह्माण्ड स्थित है; इसलिये यहाँ रहनेवाले ज्ञानीजन सर्वात्मा श्रीहरि से अपना कोई भेद नहीं देखते, बल्कि महाकाश में घटाकाश की भाँति उनमें अपना अन्तर्भाव देखते हैं । तुम तो देव-रूपधारी हो; फिर भी तुम्हें ऐसा क्या दिखायी देता हैं, जिससे तुमने भगवान् के साथ कुछ भेदभाव के कारण होनेवाले भय की कल्पना कर ली ॥ ३३ ॥ तुम हो तो इन भगवान् वैकुण्ठनाथ के पार्षद, किन्तु तुम्हारी बुद्धि बहुत मन्द है । अतएव तुम्हारा कल्याण करने के लिये हम तुम्हारे अपराध के योग्य दण्ड का विचार करते हैं । तुम अपनी भेदबुद्धि के दोष से इस वैकुण्ठलोक से निकलकर उन पापमय योनियों में जाओ, जहाँ काम, क्रोध, लोभ-प्राणियों के ये तीन शत्रु निवास करते हैं ॥ ३४ ॥

सनकादि के ये कठोर वचन सुनकर और ब्राह्मणों के शाप को किसी भी प्रकार के शस्त्रसमूह से निवारण होने योग्य न जानकर श्रीहरि के वे दोनों पार्षद अत्यन्त दीनभाव से उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर लोट गये । वे जानते थे कि उनके स्वामी श्रीहरि भी ब्राह्मणों से बहुत डरते हैं ॥ ३५ ॥ फिर उन्होंने अत्यन्त आतुर होकर कहा — ‘भगवन् ! हम अवश्य अपराधी हैं; अतः आपने हमें जो दण्ड दिया है, वह उचित ही है और वह हमें मिलना ही चाहिये । हमने भगवान् का अभिप्राय न समझकर उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन किया है । इससे हमें जो पाप लगा है, वह आपके दिये हुए दण्ड से सर्वथा धुल जायगा । किन्तु हमारी इस दुर्दशा का विचार करके यदि करुणावश आपको थोड़ा-सा भी अनुताप हो, तो ऐसी कृपा कीजिये कि जिससे उन अधमाधम योनियों में जानेपर भी हमें भगवत्स्मृति को नष्ट करनेवाला मोह न प्राप्त हो ॥ ३६ ॥

इधर जब साधुजनक हृदयधन भगवान् कमलनाभ को मालूम हुआ कि मेरे द्वारपालों ने सनकादि साधुओं का अनादर किया है, तब वे लक्ष्मीजी सहित अपने उन्हीं श्रीचरणों से चलकर ही वहाँ पहुँचे, जिन्हें परमहंस मुनिजन भी ढूंढ़ते रहते हैं — सहज में पाने नहीं ॥ ३७ ॥ सनकादि ने देखा कि उनकी समाधि विषय श्रीवैकुण्ठनाथ स्वयं उनके नेत्रगोचर होकर पधारे हैं, उनके साथ-साथ पार्षदगण छत्र-चामरादि लिये चल रहे हैं तथा प्रभु के दोनों ओर राजहंस के पंखों के समान दो श्वेत चँवर डुलाये जा रहे हैं । उनकी शीतल वायु से उनके श्वेत छत्र में लगी हुई मोतियों की झालर हिलती हुई ऐसी शोभा दे रही है मानो चन्द्रमा की किरणों से अमृत की बूंदें झर रही हों ॥ ३८ ॥

प्रभु समस्त सद्गुणों के आश्रय हैं, उनकी सौम्य मुखमुद्रा को देखकर जान पड़ता था मानो वे सभी पर अनवरत कृपासुधा की वर्षा कर रहे हैं । अपनी स्नेहमय चितवन से वे भक्तों का हृदय स्पर्श कर रहे थे तथा उनके सुविशाल श्याम वक्षःस्थल पर स्वर्णरेखा के रूप में जो साक्षात् लक्ष्मी विराजमान थी, उनसे मानो वे समस्त दिव्यलोकों के चूडामणि वैकुण्ठधाम को सुशोभित कर रहे थे ॥ ३९ ॥ उनके पीताम्बरमण्डित विशाल नितम्बों पर झिलमिलाती हुई करधनी और गले में भ्रमरों से मुखरित वनमाला विराज रही थी; तथा वे कलाइयों में सुन्दर कंगन पहने अपना एक हाथ गरुड़जी के कंधे पर रख दूसरे से कमल का पुष्प घुमा रहे थे ॥ ४० ॥ उनके अमोल कपोल बिजली की प्रभा को भी लजानेवाले मकराकृत कुण्डलों की शोभा बढ़ा रहे थे, उभरी हुई सुघड़ नासिका थी, बड़ा ही सुन्दर मुख था, सिरपर मणिमय मुकुट विराजमान था तथा चारों भुजाओं के बीच महामूल्यवान् मनोहर हार की और गले में कौस्तुभमणि की अपूर्व शोभा थी ॥ ४१ ॥ भगवान् का श्रीविग्रह बड़ा ही सौन्दर्यशाली था । उसे देखकर भक्तों के मन में ऐसा वितर्क होता था कि इसके सामने लक्ष्मीजी का सौन्दर्याभिमान भी गलत हो गया है । ब्रह्माजी कहते है — देवताओ ! इस प्रकार मेरे, महादेवजी के और तुम्हारे लिये परम सुन्दर विग्रह धारण करनेवाले श्रीहरि को देखकर सनकादि मुनीश्वरों ने उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया । उस समय उनकी अद्भुत छवि को निहारते-निहारते उनके नेत्र तृप्त नहीं होते थे ॥ ४२ ॥

सनकादि मुनीश्वर निरन्तर ब्रह्मानन्द में निमग्न रहा करते थे । किन्तु जिस समय भगवान् कमलनयन के चरणारविन्दमकरन्द से मिली हुई तुलसीमञ्जरी के गन्ध से सुवासित वायु ने नासिकारन्घ्रों के द्वारा उनके अन्तःकरण में प्रवेश किया, उस समय वे अपने शरीर को सँभाल न सके और उस दिव्य गन्ध ने उनके मन में भी खलबली पैदा कर दी ॥ ४३ ॥ भगवान् का मुख नीलकमल के समान था, अति सुन्दर अधर और कुन्दकली के समान मनोहर हास से उसकी शोभा और भी बढ़ गयी थी । उसकी झाँकी करके कृतकृत्य हो गये और फिर पद्मराग के समान लाल-लाल नखों से सुशोभित उनके चरणकमल देखकर उन्हीं का ध्यान करने लगे ॥ ४४ ॥ इसके पश्चात् वे मुनिगण अन्य साधनों से सिद्ध न होनेवाली, स्वाभाविक अष्टसिद्धियों से सम्पन्न श्रीहरि की स्तुति करने लगे — जो योगमार्ग द्वारा मोक्षपद की खोज करनेवाले पुरुषों के लिये उनके ध्यान का विषय, अत्यन्त आदरणीय और नयनानन्द की वृद्धि करनेवाला पुरुषरूप प्रकट करते हैं ॥ ४५ ॥

सनकादि मुनियों ने कहा — अनन्त ! यद्यपि आप अन्तर्यामीरूप से दुष्टचित्त पुरुषों के हृदय में भी स्थित रहते हैं, तथापि उनकी दृष्टि से ओझल ही रहते हैं । किन्तु आज हमारे नेत्रों के सामने तो आप साक्षात् विराजमान हैं । प्रभो ! जिस समय आपसे उत्पन्न हुए हमारे पिता ब्रह्माजी ने आपका रहस्य वर्णन किया था, उसी समय श्रवणरन्ध्रों द्वारा हमारी बुद्धि में तो आप आ विराजे थे; किन्तु प्रत्यक्ष दर्शन का महान् सौभाग्य तो हमें आज ही प्राप्त हुआ है ॥ ४६ ॥ भगवन् ! हम आपको साक्षात् परमात्मतत्त्व ही जानते हैं । इस समय आप अपने विशुद्ध सत्त्वमय विग्रह से अपने इन भक्तों को आनन्दित कर रहे हैं । आपकी इस सगुण-साकार मूर्ति को राग और अहङ्कार से मुक्त मुनिजन आपकी कृपादृष्टि से प्राप्त हुए सुदृढ़ भक्तियोग के द्वारा अपने हृदय में उपलब्ध करते हैं ॥ ४७ ॥ प्रभो ! आपका सुयश अत्यन्त कीर्तनीय और सांसारिक दुःखों की निवृति करनेवाला है । आपके चरणों की शरण में रहनेवाले जो महाभाग आपकी कथाओं के रसिक हैं, वे आपके आत्यन्तिक प्रसाद मोक्षपद को भी कुछ अधिक नहीं गिनते; फिर जिन्हें आपकी जरा-सी टेढ़ी भौह ही भयभीत कर देती हैं, उन इन्द्रपट आदि अन्य भोगों के विषय में तो कहना ही क्या हैं ॥ ४८ ॥

भगवन् ! यदि हमारा चित्त भौंरे की तरह आपके चरण-कमलों में ही रमण करता रहे, हमारी वाणी तुलसी के समान आपके चरण-सम्बन्ध से ही सुशोभित हो और हमारे कान आपकी सुयश-सुधा से परिपूर्ण रहें तो अपने पापों के कारण भले ही हमारा जन्म नरकादि योनियों में हो जाय — इसकी हमें कोई चिन्ता नहीं है ॥ ४९ ॥ विपुलकीर्ति प्रभो ! आपने हमारे सामने जो यह मनोहर रूप प्रकट किया है, उससे हमारे नेत्रों को बड़ा ही सुख मिला है; विषयासक्त अजितेन्द्रिय पुरुषों के लिये इसका दृष्टिगोचर होना अत्यन्त कठिन है । आप साक्षात् भगवान् हैं और इस प्रकार स्पष्टतया हमारे नेत्रों के सामने प्रकट हुए हैं । हम आपको प्रणाम करते हैं ॥ ५० ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे जयविजययोः सनकादिशापो पञ्चदशोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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