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श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय २३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
तेईसवाँ अध्याय
कर्दम और देवहूति का विहार

श्रीमैत्रेयजी ने कहा — विदुरजी ! माता-पिता के चले जाने पर पति के अभिप्राय को समझ लेने में कुशल साध्वी देवहूति कर्दमजी की प्रतिदिन प्रेमपूर्वक सेवा करने लगी, ठीक उसी तरह, जैसे श्रीपार्वतीजी भगवान् शङ्कर की सेवा करती हैं ॥ १ ॥ उसने काम-वासना, दम्भ, द्वेष, लोभ, पाप और मद का त्यागकर बड़ी सावधानी और लगन के साथ सेवामें तत्पर रहकर विश्वास, पवित्रता, गौरव, संयम, शुश्रूषा, प्रेम और मधुरभाषणादि गुणों से अपने परम तेजस्वी पतिदेव को सन्तुष्ट कर लिया ॥ २-३ ॥ देवहूति समझती थी कि मेरे पतिदेव दैव से भी बढ़कर हैं, इसलिये वह उनसे बड़ी-बड़ी आशाएँ रखकर उनकी सेवामें लगी रहती थी । इस प्रकार बहुत दिनों तक अपना अनुवर्तन करनेवाली उस मनुपुत्री को व्रतादि का पालन करने से दुर्बल हुई देख देवर्षिश्रेष्ठ कर्दम को दयावश कुछ खेद हुआ और उन्होंने उससे प्रेमगद्गद वाणी में कहा ॥ ४-५ ॥

कर्दमजी बोले — मनुनन्दिनि ! तुमने मेरा बड़ा आदर किया है । मैं तुम्हारी उत्तम सेवा और परम भक्ति से बहुत सन्तुष्ट हूँ । सभी देहधारियों को अपना शरीर बहुत प्रिय एवं आदर की वस्तु होता है, किन्तु तुमने मेरी सेवा के आगे उसके क्षीण होने की भी कोई परवा नहीं की ॥ ६ ॥ अतः अपने धर्म का पालन करते रहने से मुझे तप, समाधि, उपासना और योग के द्वारा जो भय और शोक से रहित भगवत्प्रसाद-स्वरूप विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं, उनपर मेरी सेवा के प्रभाव से अब तुम्हारा भी अधिकार हो गया है । मैं तुम्हें दिव्य-दृष्टि प्रदान करता हूँ, उसके द्वारा तुम उन्हें देखो ॥ ७ ॥ अन्य जितने भी भोग हैं, वे तो भगवान् श्रीहरि के भृकुटि-विलासमात्र से नष्ट हो जाते हैं; अतः वे इनके आगे कुछ भी नहीं हैं । तुम मेरी सेवासे भी कृतार्थ हो गयी हो; अपने पातिव्रत-धर्म का पालन करने से तुम्हें ये दिव्य भोग प्राप्त हो गये हैं, तुम इन्हें भोग सकती हो । हम राजा हैं, हमें सब कुछ सुलभ है, इस प्रकार जो अभिमान आदि विकार हैं, उनके रहते हुए मनुष्यों को इन दिव्य भोग की प्राप्ति होनी कठिन है ॥ ८ ॥

कर्दमजी के इस प्रकार कहने से अपने पतिदेव को सम्पूर्ण योगमाया और विद्याओं में कुशल जानकर उस अबला की सारी चिन्ता जाती रही । उसका मुख ‘किञ्चित् संकोचभरी चितवन और मधुर मुसकान से खिल उठा और वह विनय एवं प्रेम से गद्गद वाणी में इस प्रकार कहने लगी ॥ ९ ॥

देवहूति ने कहा —द्विजश्रेष्ठ ! स्वामिन ! मैं यह जानती हूँ कि कभी निष्फल न होनेवाली योगशक्ति और त्रिगुणात्मिका माया पर अधिकार रखनेवाले आपको ये सब ऐश्वर्य प्राप्त हैं । किन्तु प्रभो ! आपने विवाह के समय जो प्रतिज्ञा की थी कि गर्भाधान होने तक मैं तुम्हारे साथ गृहस्थ-सुख का उपभोग करूँगा, उसकी अब पूर्ति होनी चाहिये । क्योंकि श्रेष्ठ पति के द्वारा सन्तान प्राप्त होना पतिव्रता स्त्री के लिये महान् लाभ है ॥ १० ॥ हम दोनों के समागम के लिये शास्त्र अनुसार जो कर्तव्य हो, उसका आप उपदेश दीजिये और उबटन, गन्ध, भोजन आदि उपयोगी सामग्रियाँ भी जुटा दीजिये, जिससे मिलन की इच्छा से अत्यत्त दीन, दुर्बल हुआ मेरा यह शरीर आपके अङ्ग-संग के योग्य हो जाय; क्योंकि आपकी ही बढ़ाई हुई कामवेदना से मैं पीड़ित हो रही हूँ । स्वामिन् ! इस कार्य के लिये एक उपयुक्त भवन तैयार हो जाय, इसका भी विचार कीजिये ॥ ११ ॥

मैत्रेयजी कहते हैं —
विदुरजी ! कर्दम मुनि ने अपनी प्रिया की इच्छा पूर्ण करने के लिये उसी समय योग में स्थित होकर एक विमान रचा, जो इच्छानुसार सर्वत्र जा सकता था ॥ १२ ॥ यह विमान सब प्रकार के इच्छित भोग-सुख प्रदान करनेवाला, अत्यन्त सुन्दर, सब प्रकार के रत्नों से युक्त, सब सम्पत्तियों की उत्तरोत्तर वृद्धि से सम्पन्न तथा मणिमय खंभों से सुशोभित था ॥ १३ ॥ वह सभी ऋतुओं मे सुखदायक था और उसमें जहां-तहाँ सब प्रकार की दिव्य सामग्रियां रखी हुई थी तथा उसे चित्र-विचित्र रेशमी डंडियों और पताकाओं से खूब सजाया गया था ॥ १४ ॥ जिनपर भ्रमरगण मधुर गुंजार कर रहे थे, ऐसे रंग-बिरंगे पुष्पों की मालाओं से तथा अनेक प्रकार के सूती और रेशमी वस्त्रों से वह अत्यन्त शोभायमान हो रहा था ॥ १५ ॥ एक के ऊपर एक बनाये हुए कमरों में अलग-अलग रखी हुई शय्या, पलंग, पंखे और आसनों के कारण वह बड़ा सुन्दर जान पड़ता था ॥ १६ ॥ जहाँ-तहाँ दीवारों में की हुई शिल्परचाना से उसको अपूर्व शोभा हो रही थी । उसमें पन्ने का फर्श था और बैठने के लिये मूँगे की वेदियाँ बनायी गयी थी ॥ १७ ॥ मूँगे की ही देहलियाँ थीं । उसके द्वारों में हीरे के किवाड़ थे तथा इन्द्रनील मणि के शिखरों पर सोने के कलश रखे हुए थे ॥ १८ ॥ उसकी हीरे की दीवारों में बढ़िया लाल जड़े हुए थे, जो ऐसे जान पड़ते थे मानो विमान की आँखें हों तथा उसे रंग-बिरंगे चॅदोवे और बहुमूल्य सुनहरी बन्दनवारों से सजाया गया था ॥ १९ ॥ उस विमान में जहाँ-तहाँ कृत्रिम हंस और कबूतर आदि पक्षी बनाये गये थे, जो बिलकुल सजीव-से मालूम पड़ते थे । उन्हें अपना सजातीय समझकर बहुत-से हंस और कबूतर उनके पास बैठ-बैठकर अपनी बोली बोलते थे ॥ २० ॥ उसमें सुविधानुसार क्रीडास्थली, शयनगृह, बैठक, आँगन और चौक आदि बनाये गये थे — जिनके कारण वह विमान स्वयं कर्दम को भी विस्मित-सा कर रहा था ॥ २१ ॥

ऐसे सुन्दर घर को भी जब देवहूति ने बहुत प्रसन्न चित्त से नहीं देखा, तो सबके आन्तरिक भाव को परख लेनेवाले कर्दमजी ने स्वयं ही कहा — ॥ २२ ॥ भीरु ! तुम इसे बिन्दुसरोवर में स्नान करके विमान पर चढ़ जाओ; यह विष्णुभगवान् का रचा हुआ तीर्थ मनुष्यों को सभी कामनाओं की प्राप्ति करानेवाला है ॥ २३ ॥

कमललोचना देवहूति ने अपने पति की बात मानकर सरस्वती के पवित्र जल से भरे हुए उस सरोवर में प्रवेश किया । उस समय वह बड़ी मैली-कुचैली साड़ी पहने हुए थी, उसके सिर के बाल चिपक जाने से उनमें लटें पड़ गयी थी, शरीर में मैल जम गया था तथा स्तन कान्तिहीन हो गये थे ॥ २४-२५ ॥ सरोवर में गोता लगाने पर उसने उसके भीतर एक महल में एक हजार कन्याएँ देखीं । वे सभी किशोर अवस्था की थी और उनके शरीरों से कमल की-सी गन्ध आती थी ॥ २६ ॥ देवहूति को देखते ही वे सब स्त्रियाँ सहसा खड़ी हो गयी और हाथ जोड़कर कहने लगीं, ‘हम आपकी दासियाँ हैं; हमें आज्ञा दीजिये, आपको क्या सेवा करें ॥ २५ ॥

विदुरजी ! तब स्वामिनी को सम्मान देनेवाली उन रमणियों ने बहुमूल्य मसालों तथा गन्ध आदि से मिश्रित जल के द्वारा मनस्विनी देवहूति को स्नान कराया तथा उसे दो नवीन और निर्मल वस्त्र पहनने को दिये ॥ २८ ॥ फिर उन्होंने ये बहुत मूल्य के बड़े सुन्दर और कान्तिमान् आभूषण, सर्वगुणसम्पन्न भोजन और पीने के लिये अमृत के समान स्वादिष्ट आसव प्रस्तुत किये ॥ २९ ॥ अब देवहूति ने दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देखा तो उसे मालूम हुआ कि वह भाँति-भाँति के सुगंधित फूलों के हारों से विभूषित है, स्वच्छ वस्त्र धारण किये हुए है, उसका शरीर भी निर्मल और कान्तिमान् हो गया है तथा उन कन्याओं ने बड़े आदरपूर्वक उसका माङ्गलिक शृंगार किया है ॥ ३० ॥ उसे सिर से स्नान कराया गया है, स्नान के पश्चात् अङ्ग-अङ्ग में सब प्रकार के आभूषण सजाये गये हैं तथा उसके गले में हार-हुमेल, हाथों में कङ्कण और पैरों में छमछमाते हुए सोने के पायजेब सुशोभित हैं ॥ ३१ ॥ कमर में पड़ी हुई सोने की रत्नजटित करधनी से, बहुमूल्य मणियों के हार से और अङ्ग-अङ्ग में लगे हुए कुङ्कमादि मङ्गलद्रव्यों से उसकी अपूर्व शोभा हो रही है ॥ ३२ ॥ उसका मुख सुन्दर दन्तावली, मनोहर भौहें, कमल की कली-से स्पर्धा करनेवाले प्रेमकटाक्षमय सुन्दर नेत्र और नीली अलकावली से बड़ा ही सुन्दर जान पड़ता है ॥ ३३ ॥ विदुरजी ! जब देवहूति ने अपने प्रिय पतिदेव का स्मरण किया, तो अपने को सहेलियों के सहित वहीं पाया, जहाँ प्रजापति कर्दमजी विराजमान थे ॥ ३४ ॥ उस समय अपने को सहस्रों स्त्रियों के सहित अपने प्राणनाथ के सामने देख और इसे उनके योग का प्रभाव समझकर देवहूति को बड़ा विस्मय हुआ ॥ ३५ ॥

शत्रुविजयी विदुर ! जब कर्दमजी ने देखा कि देवहूति का शरीर स्नान करने से अत्यन्त निर्मल हो गया है और विवाहकाल से पूर्व उसका जैसा रूप था, उसी रूप को पाकर वह अपूर्व शोभा से सम्पन्न हो गयी है, उसका सुन्दर वक्षःस्थल चोली से ढका हुआ है, हजारों विद्याधरियाँ उसकी सेवामें लगी हुई हैं तथा उसके शरीर पर बढ़िया-बढ़िया वस्त्र शोभा पा रहे हैं, तब उन्होंने बड़े प्रेम से उसे विमान पर चढ़ाया ॥ ३६-३७ ॥ उस समय अपनी प्रिया के प्रति अनुरक्त होने पर भी कर्दमजी की महिमा (मन और इन्द्रियों पर प्रभुता) कम नहीं हुई । विद्याधरियाँ उनके शरीर की सेवा कर रही थी । खिले हुए कुमुद फुलों से शृंगार करके अत्यन्त सुन्दर बने हुए वे विमान पर इस प्रकार शोभा पा रहे थे, मानो आकाश में तारागण से घिरे हुए चन्द्रदेव विराजमान हों ॥ ३८ ॥ उस विमान पर निवासकर उन्होंने दीर्घकाल तक कुबेरजी के समान मेरु पर्वत की घाटियों में विहार किया । ये घाटियाँ आठों लोकपाल की विहारभूमि है । इनमें कामदेव को बढ़ानेवाली शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चलकर इनकी कमनीय शोभा का विस्तार करती है तथा श्रीगङ्गाजी के स्वर्गलोक से गिरने की मङ्गलमय ध्वनि निरन्तर गूंजती रहती है । उस समय भी दिव्य विद्याधरियों का समुदाय उनकी सेवामें उपस्थित था और सिद्धगण वन्दना किया करते थे ॥ ३९ ॥

इसी प्रकार प्राणप्रिया देवहूति के साथ उन्होंने वैश्रम्भक, सुरसन, नन्दन, पुष्पभद्र और चैत्ररथ आदि अनेकों देवोद्यानों तथा मानस सरोवर में अनुरागपूर्वक विहार किया ॥ ४० ॥ उस कान्तिमान् और इच्छानुसार चलनेवाले श्रेष्ठ विमान पर बैठकर वायु के समान सभी लोकॉ में विचरते हुए कर्दमजी विमानविहारी देवताओं से भी आगे बढ़ गये ॥ ४१ ॥ विदुरजी ! जिन्होंने भगवान् भवभयहारी पवित्र पादपद्मों का आश्रय लिया है, उन धीर पुरुषों के लिये कौन-सी वस्तु या शक्ति दुर्लभ है ॥ ४२ ॥

इस प्रकार महायोगी कर्दमजी यह सारा भूमण्डल, जो द्वीप-वर्ष आदि की विचित्र रचना के कारण बड़ा आश्चर्यमय प्रतीत होता है, अपनी प्रिया को दिखाकर अपने आश्रम को लौट आये ॥ ४३ ॥ फिर उन्होंने अपने को नौ रूप में विभक्तकर रतिसुख के लिये अत्यन्त उत्सुक मनुकुमारी देवहूति को आनन्दित करते हुए उसके साथ बहुत वर्षों तक विहार किया, किन्तु उनका इतना लम्बा समय एक मुहूर्त के समान बीत गया ॥ ४४ ॥ उस विमान में रतिसुख को बढ़ानेवाली बड़ी सुन्दर शय्या का आश्रय ले अपने परम रूपवान् प्रियतम के साथ रहती हुई देवहूति को इतना काल कुछ भी न जान पड़ा ॥ ४५ ॥ इस प्रकार उस कामासक्त दम्पति को अपने योगबल से सैकड़ों वर्षों तक विहार करते हुए भी वह काल बहुत थोड़े समय के समान निकल गया ॥ ४६ ॥ आत्मज्ञानी कर्दमजी सब प्रकार के संङ्कल्पों को जानते थे; अतः देवहूति को सन्तानप्राप्ति के लिये उत्सुक देख्न तथा भगवान् के आदेश को स्मरणकर उन्होंने अपने स्वरूप के नौ विभाग किये तथा कन्याओं की उत्पत्ति के लिये एकाग्रचित्त से अर्धाङ्गरूप में अपनी पत्नी की भावना करते हुए उसके गर्भ में वीर्य स्थापित किया ॥ ४७ ॥ इससे देवहूति के एक ही साथ नौ कन्याएँ पैदा हुई । वे सभी सर्वाङ्गसुन्दरी थी और उनके शरीर से लाल कमलकी-सी सुगन्ध निकलती थी ॥ ४८ ॥

इसी समय शुद्ध स्वभाववाली सती देवहूति ने देखा कि पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार उसके पतिदेव संन्यासाश्रम ग्रहण करके वन को जाना चाहते हैं, तो उसने अपने आँसुओं को रोककर ऊपर से मुसकराते हुए व्याकुल एवं संतप्त हृदय से धीरे-धीरे अति मधुर वाणी में कहा । उस समय वह सिर नीचा किये हुए अपने नखमणिमण्डित चरणकमल से पृथ्वी को कुरेद रही थीं ॥ ४९-५० ॥

देवहूति ने कहा — भगवन् ! आपने जो कुछ प्रतिज्ञा की थी, वह सब तो पूर्णतः निभा दी; तो भी मैं आपकी शरणागत हूँ, अतः आप मुझे अभयदान और दीजिये ॥ ५१ ॥ ब्रह्मन् ! इन कन्याओं के लिये योग्य वर खोजने पड़ेंगे और आपके वन को चले जाने के बाद मेरे जन्म-मरणरूप शोक को दूर करने के लिये भी कोई होना चाहिये ॥ ५२ ॥ प्रभो ! अबतक परमात्मा से विमुख रहकर मेरा जो समय इन्द्रियसुख भोगने में बीता है, वह तो निरर्थक ही गया ॥ ५३ ॥ आपके परम प्रभाव को न जानने के कारण ही मैंने इन्द्रियों के विषयों में आसक्त रहकर आपसे अनुराग किया । तथापि यह भी मेरे संसार-भय को दूर करनेवाला ही होना चाहिये ॥ ५४ ॥ अज्ञानवश असत्पुरुषों के साथ किया हुआ जो संग संसार-बन्धन का कारण होता है, वही सत्पुरुषों के साथ किये जानेपर असङ्गता प्रदान करता है ॥ ५५ ॥ संसार में जिस पुरुष के कर्मों से न तो धर्म का सम्पादन होता है, न वैराग्य उत्पन्न होता है और न भगवान् की सेवा ही सम्पन्न होती हैं, वह पुरुष जीते ही मुर्दे के समान है ॥ ५६ ॥ अवश्य ही मैं भगवान् की माया से बहुत ठगी गयी, जो आप-जैसे मुक्तिदाता पतिदेव को पाकर भी मैंने संसार-बन्धन से छूटने की इच्छा नहीं की ॥ ५७ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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