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श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय २६
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
छब्बीसवाँ अध्याय
महदादि भिन्न-भिन्न तत्त्वों की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीभगवान् ने कहा — माताजी ! अब मैं तुम्हें प्रकृति आदि सब तत्त्वों के अलग-अलग लक्षण बतलाता हूँ; इन्हें जानकर मनुष्य प्रकृति के गुणों से मुक्त हो जाता है ॥ १ ॥ आत्मदर्शनरूप ज्ञान ही पुरुष के मोक्ष का कारण है और वही उसकी अहङ्काररूप हृदयग्रन्थि का छेदन करनेवाला है, ऐसा पण्डितजन कहते हैं । उस ज्ञान का मैं तुम्हारे आगे वर्णन करता हूँ ॥ २ ॥ यह सारा जगत् जिससे व्याप्त होकर प्रकाशित होता है, वह आत्मा ही पुरुष है । वह अनादि, निर्गुण, प्रकृति से परे, अन्तःकरण में स्फुरित होनेवाला और स्वयंप्रकाश है ॥ ३ ॥ उस सर्वव्यापक पुरुष ने अपने पास लीला-विलासपूर्वक आयी हुई अव्यक्त और त्रिगुणात्मिका वैष्णवी माया को स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया ॥ ४ ॥ लीलापरायण प्रकृति अपने सत्त्वादि गुणों द्वारा उन्हीं के अनुरूप प्रजा की सृष्टि करने लगी, यह देख पुरुष ज्ञान को आच्छादित करनेवाली उसकी आवरणशक्ति से मोहित हो गया, अपने स्वरूप को भूल गया ॥ ५ ॥ इस प्रकार अपने से भिन्न प्रकृति को ही अपना स्वरूप समझ लेने से पुरुष प्रकृति के गुणों द्वारा किये जानेवाले कर्मों में अपने को ही कर्ता मानने लगता है ॥ ६ ॥ इस कर्तृत्वाभिमान से ही अकर्ता, स्वाधीन, साक्षी और आनन्दस्वरूप पुरुष को जन्म-मृत्युरूप बन्धन एवं परतन्त्रता की प्राप्ति होती है ॥ ७ ॥ कार्यरूप शरीर, कारणरूप इन्द्रिय तथा कर्तारूप इन्द्रियाधिष्ठातृ-देवताओं में पुरुष जो अपनेपन का आरोप कर लेता है, उसमें पण्डितजन प्रकृति को ही कारण मानते हैं तथा वास्तव में प्रकृति से परे होकर भी जो प्रकृतिस्थ हो रहा है, उस पुरुष को सुख-दुःख भोगने में कारण मानते हैं ॥ ८ ॥

देवहूति ने कहा — पुरुषोत्तम ! इस विश्च के स्थूल-सूक्ष्म कार्य जिनके स्वरूप हैं तथा जो इसके कारण हैं, उन प्रकृति और पुरुष का लक्षण भी आप मुझसे कहिये ॥ ९ ॥

श्रीभगवान् ने कहा — जो त्रिगुणात्मक, अव्यक्त, नित्य और कार्य-कारणरूप है तथा स्वयं निर्विशेष होकर भी सम्पूर्ण विशेष धर्मों का आश्रय है, उस प्रधान नामक तत्त्व को ही प्रकृति कहते हैं ॥ १० ॥ पाँच महाभूत, पाँच तन्मात्रा, चार अन्तःकरण और दस इन्द्रिय — इन चौबीस तत्वों के समूह को विद्वान् लोग प्रकृति का कार्य मानते हैं ॥ ११ ॥ पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश — ये पाँच महाभूत हैं; गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द — ये पाँच तन्मात्र माने गये हैं ॥ १२ ॥ श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना, नासिका, वाक्, पाणि, पाद, उपस्थ और पायु — ये दस इन्द्रियाँ हैं ॥ १३ ॥ मन, बुद्धि, चित और अहङ्कार — इन चार के रूप में एक ही अन्तःकरण अपनी सङ्कल्प, निश्चय, चिन्ता और अभिमानरूपा चार प्रकार की वृत्तियों से लक्षित होता है ॥ १४ ॥ इस प्रकार तत्त्वज्ञानी पुरुषों ने सगुण ब्रह्म के सन्निवेशस्थान इन चौबीस तत्वों की संख्या बतलायी है । इनके सिवा जो काल है, वह पचीसवाँ तत्त्व है ॥ १५ ॥

कुछ लोग काल को पुरुष से भिन्न तत्त्व न मानकर पुरुष का प्रभाव अर्थात् ईश्वर को संहारत्कारिणी शक्ति बताते हैं । जिससे माया के कार्यरूप देहादि में आत्मत्व का अभिमान करके अहङ्कार से मोहित और अपने को कर्ता माननेवाले जीव को निरन्तर भय लगा रहता है ॥ १६ ॥ मनुपुत्रि ! जिनकी प्रेरणा से गुणों की साम्यावस्थारूप निर्विशेष प्रकृति में गति उत्पन्न होती है, वास्तव में वे पुरुषरूप भगवान् ही ‘काल’ कहे जाते हैं ॥ १७ ॥ इस प्रकार जो अपनी माया के द्वारा सब प्राणियों के भीतर जीवरूप से और बाहर कालरूप से व्याप्त हैं, वे भगवान् ही पचीसवें तत्त्व हैं ॥ १८ ॥

जब परमपुरुष परमात्मा ने जीवों के अदृष्टवश क्षोभ को प्राप्त हुई सम्पूर्ण जीवों की उत्पत्तिस्थानरूपा अपनी माया से चिच्छक्तिरूप वीर्य स्थापित किया, तो उससे तेजोमय महतत्व उत्पन्न हुआ ॥ १९ ॥ लय-विक्षेपादि रहित तथा जगत् अङ्कररूप इस महत्तत्त्व ने अपने में स्थित विश्व को प्रकट करने के लिये अपने स्वरूप को आच्छादित करनेवाले प्रलयकालीन अन्धकार को अपने ही तेज से पी लिया ॥ २० ॥

जो सत्त्वगुणमय, स्वच्छ, शान्त और भगवान् की उपलब्धि का स्थानरूप चित्त है, वही महत्तत्त्व है और उसीको ‘वासुदेव’ कहते हैं  जिसे अध्यात्म में चित्त कहते हैं, उसी को अधिभूत में मह्त्तत्त्व कहा जाता है । चित्त में अधिष्ठाता ‘क्षेत्रज्ञ’ और उपास्यदेव ‘वासुदेव’ हैं । इसी प्रकार अहंकार में अधिष्ठाता ‘रुद्र’ और उपास्यदेव ‘संकर्षण’ है, बुद्धि में अधिष्ठाता ‘ब्रह्मा’ और उपास्यदेव ‘प्रद्युम्न’ है तथा मन में अधिष्ठाता ‘चन्द्रमा’ और उपास्यदेव ‘अनिरुद्ध हैं। ॥ २१ ॥ जिस प्रकार पृथ्वी आदि अन्य पदार्थों के संसर्ग से पूर्व जल अपनी स्वाभाविक (फेन-तरङ्गादिरहित) अवस्था में अत्यन्त स्वच्छ, विकारशुन्य एवं शान्त होता है, उसी प्रकार अपनी स्वाभाविकी अवस्था की दृष्टि से स्वच्छत्व, अविकारित्व और शान्तत्व ही वृत्तियोंसहित चित्त का लक्षण कहा गया है ॥ २२ ॥ तदनन्तर भगवान् की वीर्यरूप चित्-शक्ति से उत्पन्न हुए महत्तत्त्व के विकृत होनेपर उससे क्रियाशक्तिप्रधान अहङ्कार उत्पन्न हुआ । वह वैकारिक, तेजस और तामस भेद से तीन प्रकार का है । उसी से क्रमशः मन, इन्द्रियों और पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति हुई ॥ २३-२४ ॥ इस भूत, इन्द्रिय और मनरूप अहङ्कार को ही पण्डितजन साक्षात् ‘सङ्कर्षण’ नामक सहस्र सिरवाले अनन्तदेव कहते हैं ॥ २५ ॥ इस अहङ्कार का देवतारूप से कर्तृत्व, इन्द्रियरूप से करणत्व और पञ्चभूतरूप से कार्य लक्षण हैं तथा सत्त्वादि गुणों के सम्बन्ध से शान्तत्व, घोरत्व और मूढत्व भी इसी के लक्षण हैं ॥ २६ ॥ उपर्युक्त तीन प्रकार के अहङ्कार में से वैकारिक अहङ्कार के विकृत होने पर उससे मन हुआ, जिसके सङ्कल्प-विकल्पों से कामना की उत्पत्ति होती है ॥ २७ ॥ यह मनस्तत्त्व ही इन्द्रियों के अधिष्ठाता ‘अनिरुद्ध’ के नाम से प्रसिद्ध है । योगिजन शरत्कालीन नीलकमल के समान श्याम वर्णवाले इन अनिरुद्धजी की शनैः शनैः मन को वशीभूत करके आराधना करते हैं ॥ २८ ॥

साध्वि ! फिर तैजस अहङ्कार में विकार होने पर उससे बुद्धितत्त्व उत्पन्न हुआ । वस्तु का स्फुरणरूप विज्ञान और इन्द्रियों के व्यापार में सहायक होना-पदार्थों का विशेष ज्ञान करना — ये बुद्धि के कार्य हैं ॥ २९ ॥ वृत्तियों के भेद से संशय, विपर्यय (विपरीत ज्ञान), निश्चय, स्मृति और निद्रा भी बुद्धि के ही लक्षण हैं । यह बुद्धितत्त्व ही ‘प्रद्युम्न’ है ॥ ३० ॥ इन्द्रियाँ भी तैजस अहङ्कार का ही कार्य हैं । कर्म और ज्ञान विभाग से उनके कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय दो भेद हैं । इनमें कर्म प्राण की शक्ति हैं और ज्ञान बुद्धि की ॥ ३१ ॥

भगवान् की चेतनशक्ति की प्रेरणा से तामस अहङ्कार के विकृत होनेपर उससे शब्दतन्मात्र का प्रादुर्भाव हुआ । शब्दतन्मात्र से आकाश तथा शब्द का ज्ञान करानेवाली श्रोत्रेन्द्रिय उत्पन्न हुई ॥ ३२ ॥ अर्थ का प्रकाशक होना, ओट में खड़े हुए वक्ता का भी ज्ञान करा देना और आकाश का सूक्ष्म रूप होना विद्वानों के मत में यही शब्द के लक्षण हैं ॥ ३३ ॥ भूतों को अवकाश देना, सबके बाहर-भीतर वर्तमान रहना तथा प्राण, इन्द्रिय और मन का आश्रय होना — ये आकाश के धृत्ति (कार्य) रूप लक्षण हैं ॥ ३४ ॥ फिर शब्दतन्मात्र के कार्य आकाश में कालगति से विकार होनेपर स्पर्शतन्मात्र हुआ और उससे वायु तथा स्पर्श का ग्रहण करानेवाली त्वगिन्द्रिय (त्वचा) उत्पन्न हुई ॥ ३५ ॥ कोमलता, कठोरता, शीतलता और उष्णता तथा वायु का सूक्ष्म रूप होना — ये स्पर्श के लक्षण हैं ॥ ३६ ॥ वृक्ष की शाखा आदि को हिलाना, तृणादि को इकट्ठा कर देना, सर्वत्र पहुँचना, गन्धादियुक्त द्रव्य को घ्राणादि इन्द्रियों के पास तथा शब्द को श्रोत्रेन्द्रिय के समीप ले जाना तथा समस्त इन्द्रियों को कार्यशक्ति देना–ये वायु की वृत्तियों के लक्षण हैं ॥ ३७ ॥

तदनन्तर दैव की प्रेरणा से स्पर्शतन्मात्र विशिष्ट वायु के विकृत होनेपर उससे रूपतन्मात्र हुआ तथा उससे तेज और रूप को उपलब्ध करानेवाली नेत्रेन्द्रिय का प्रादुर्भाव हुआ ॥ ३८ ॥ साध्वि ! वस्तु के आकार का बोध कराना, गौण होना द्रव्य अङ्गरूप से प्रतीत होना, द्रव्य का जैसा आकार-प्रकार और परिमाण आदि हो, उसी रूप में उपलक्षित होना तथा तेज का स्वरूपभूत होना — ये सब रूपतन्मात्र की वृत्तियाँ हैं ॥ ३९ ॥ चमकना, पकाना, शीत को दूर करना, सुखाना, भूख-प्यास पैदा करना और उनकी निवृत्ति के लिये भोजन एवं जलपान कराना — ये तेज की वृत्तियाँ हैं ॥ ४० ॥

फिर दैव की प्रेरणा से रूपतन्मात्रमय तेज के विकृत होने पर उससे रसतन्मात्र हुआ और उससे जल तथा रस को ग्रहण करानेवाली रसनेन्द्रिय (जिह्वा) उत्पन्न हुई ॥ ४१ ॥ रस अपने शुद्ध स्वरूप में एक ही हैं, किन्तु अन्य भौतिक पदार्थों के संयोग से वह कसैला, मीठा, तीखा, कड़वा, खट्टा और नमकीन आदि कई प्रकार का हो जाता है ॥ ४२ ॥ गीला करना, मिट्टी आदि को पिण्डाकार बना देना, तृप्त करना, जीवित रखना, प्यास बुझाना, पदार्थों को मृदु कर देना, ताप की निवृत्ति करना और कूपादि में से निकाल लिये जाने पर भी वहाँ बार-बार पुनः प्रकट हो जाना — ये जल की वृत्तियाँ हैं ॥ ४३ ॥

इसके पश्चात् दैवप्रेरित रसस्वरूप जल के विकृत होने पर उससे गन्धतन्मात्र हुआ और उससे पृथ्वी तथा गन्ध को ग्रहण करानेवाली घ्राणेन्द्रिय प्रकट हुई ॥ ४४ ॥ गन्ध एक ही है; तथापि परस्पर मिले हुए द्रव्यभागों की न्यूनाधिकता से वह मिश्रित गन्ध, दुर्गंध, सुगन्ध, मृदु, तीव्र और अम्ल (खट्टा) आदि अनेक प्रकार का हो जाता है ॥ ४५ ॥ प्रतिमादिरूप से ब्रह्मा की साकार-भावना का आश्रय होना, जल आदि कारण-तत्त्वों से भिन्न किसी दूसरे आश्रय की अपेक्षा किये बिना ही स्थित रहना, जल आदि अन्य पदार्थों को धारण करना, आकाशादि का अवच्छेदक होना (घटाकाश, मठाकाश आदि भेदों को सिद्ध करना) तथा परिणाम विशेष से सम्पूर्ण प्राणियों के [स्त्रीत्व, पुरुषत्व आदि] गुणों को प्रकट करना — ये पृथ्वी के कार्यरूप लक्षण हैं ॥ ४६ ॥

आकाश का विशेष गुण शब्द जिसका विषय है, वह श्रोत्रेन्द्रिय हैं; वायु का विशेष गुण स्पर्श जिसका विषय हैं, वह त्वगिन्द्रिय है ॥ ४७ ॥ तेज का विशेष गुण रूप जिसका विषय है, वह नेत्रेन्द्रिय है; जल का विशेष गुण रस जिसका विषय है, वह रसनेन्द्रिय हैं और पृथ्वी का विशेष गुण गन्ध जिसका विषय है, उसे घ्राणेन्द्रिय कहते है ॥ ४८ ॥ वायु आदि कार्य-तत्वों में आकाशादि कारण-तत्त्वों के रहने से उनके गुण भी अनुगत देखे जाते हैं; इसलिये समस्त महाभूतों के गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध केवल पृथ्वी में ही पाये जाते हैं ॥ ४९ ॥ जब महत्तत्व, अहङ्कार और पञ्चभूत — ये सात तत्व परस्पर मिल न सके पृथक-पृथक ही रह गये, तब जगत् के आदिकारण श्रीनारायण ने काल, अदृष्ट और सत्त्वादि गुणों के सहित उनमें प्रवेश किया ॥ ५० ॥

फिर परमात्मा प्रवेश से क्षुब्ध और आपस में मिले हुए उन तत्त्वों से एक जड अण्ड उत्पन्न हुआ । उस अण्ड से इस विराट् पुरुष की अभिव्यक्ति हुई ॥ ५१ ॥ इस अण्ड का नाम विशेष है, इसके अन्तर्गत श्रीहरि के स्वरूपभूत चौदहों भुवनों का विस्तार है । यह चारों ओर से क्रमशः एक-दूसरे से दसगुने जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहङ्कार और महत्तत्त्व — इन छः आवरणों से घिरा हुआ है । इन सबके बाहर सातवाँ आवरण प्रकृति का है ॥ ५२ ॥ कारणमय जल में स्थित उस तेजोमय अण्ड से उठकर उस विराट् पुरुष ने पुनः उसमें प्रवेश किया और फिर उसमें कई प्रकार के छिद्र किये ॥ ५३ ॥ सबसे पहले उसमें मुख प्रकट हुआ, उससे वाक्-इन्द्रिय और उसके अनन्तर वाक् का अधिष्ठाता अग्नि उत्पन्न हुआ । फिर नाक के छिद्र (नथुने) प्रकट हुए, उनसे प्राणसहित घाणेन्द्रिय उत्पन्न हुई ॥ ५४ ॥ प्राण के बाद उसका अधिष्ठाता वायु उत्पन्न हुआ । तत्पश्चात् नेत्रगोलक प्रकट हुए, उनसे चक्षु-इन्द्रिय प्रकट हुई और उसके अनन्तर उसका अधिष्ठाता सूर्य उत्पन्न हुआ । फिर कानों के छिद्र प्रकट हुए, उनसे उनकी इन्द्रिय श्रोत्र और उसके अभिमानी दिग्देवता प्रकट हुए ॥ ५५ ॥

इसके बाद उस विराट् पुरुष के त्वचा उत्पन्न हुई । उससे रोम, मूंछ-दाढ़ी तथा सिर के बाल प्रकट हुए और उनके बाद त्वचा की अभिमानी ओषधियाँ (अन्न आदि) उत्पन्न हुई । इसके पश्चात् लिङ्ग प्रकट हुआ ॥ ५६ ॥ उससे वीर्य और वीर्य के बाद लिङ्ग का अभिमान आपोदेव (जल) उत्पन्न हुआ । फिर गुदा प्रकट हुई, उससे अपानवायु और अपान के बाद उसका अभिमानी लोकों को भयभीत करनेवाला मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ ॥ ५७ ॥ तदनन्तर हाथ प्रकट हुए, उनसे बल और बल के बाद हस्तेन्द्रिय का अभिमानी इन्द्र उत्पन्न हुआ । फिर चरण प्रकट हुए, उनसे गति (गमन की क्रिया) और फिर पादेन्द्रिय का अभिमान विष्णुदेवता उत्पन्न हुआ ॥ ५८ ॥

इसी प्रकार जब विराट् पुरुष के नाडियाँ प्रकट हुई, तो उनसे रुधिर उत्पन्न हुआ और उससे नदियाँ हुई । फिर उसके उदर (पेट) प्रकट हुआ ॥ ५९ ॥ उससे क्षुधा-पिपासा की अभिव्यक्ति हुई और फिर उदर का अभिमानी समुद्रदेवता उत्पन्न हुआ । तत्पश्चात् उसके हृदय प्रकट हुआ, हृदय से मन का प्राकट्य हुआ ॥ ६० ॥ मन के बाद उसका अभिमानी देवता चन्द्रमा हुआ । फिर हृदय से ही बुद्धि और उसके बाद उसका अभिमानी ब्रह्मा हुआ । तत्पश्चात् अहङ्कार और उसके अनन्तर उसका अभिमानी रुद्रदेवता उत्पन्न हुआ । इसके बाद चित्त और उसका अभिमानी क्षेत्रज्ञ प्रकट हुआ ॥ ६१ ॥

जब ये क्षेत्रज्ञ के अतिरिक्त सारे देवता उत्पन्न होकर भी विराट् पुरूष को उठाने में असमर्थ रहे, तो उसे उठाने के लिये क्रमशः फिर अपने-अपने उत्पत्ति स्थानों में प्रविष्ट होने लगे ॥ ६२ ॥ अग्नि ने वाणी के साथ मुख में प्रवेश किया, परन्तु इससे विराट् पुरुष न उठा । वायु ने घ्राणेन्द्रिय के सहित नासाछिद्रों में प्रवेश किया, फिर भी विराट् पुरुष न उठा ॥ ६३ ॥ सूर्य ने चक्षु के सहित नेत्रों में प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा । दिशाओं ने श्रवणेन्द्रिय के सहित कानों में प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा ॥ ६४ ॥ ओषधियों ने रोमों के सहित त्वचा में प्रवेश किया फिर भी विराट् पुरुष न उठा । जल ने वीर्य के साथ लिङ्ग में प्रवेश किया, तब भी विराट पुरुष न उठा ॥ ६५ ॥ मृत्यु ने अपान के साथ गुदा में प्रवेश किया, फिर भी विराट् पुरुष न उठा । इन्द्र ने बल के साथ हाथों में प्रवेश किया, परन्तु इससे भी विराट् पुरुष न उठा ॥ ६६ ॥ विष्णु ने गति के सहित चरणों में प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा । नदियों ने रुधिर के सहित नाडियों में प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा ॥ ६७ ॥ समुद्र क्षुधा-पिपासा के सहित उदर में प्रवेश किया, फिर भी विराट् पुरुष न उठा । चन्द्रमा ने मन के सहित हृदय में प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा ॥ ६८ ॥ ब्रह्मा ने बुद्धि सहित हृदय में प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा । रुद्र ने अहङ्कार के सहित उसी हृदय में प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा ॥ ६९ ॥

किन्तु जब चित्त के अधिष्ठाता क्षेत्रज्ञ ने चित्त के सहित हृदय में प्रवेश किया, तो विराट् पुरुष उसी समय जल से उठकर खड़ा हो गया ॥ ७० ॥ जिस प्रकार लोक में प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि चित्त के अधिष्ठाता क्षेत्रज्ञ की सहायता के बिना सोये हुए प्राणी को अपने बल से नहीं उठा सकते, उसी प्रकार विराट् पुरुष को भी वे क्षेत्रज्ञ परमात्मा के बिना नहीं उठा सके ॥ ७१ ॥ अतः भक्ति, वैराग्य और चित्त की एकाग्रता से प्रकट हुए ज्ञान के द्वारा उस अन्तरात्मस्वरूप क्षेत्रज्ञ को इस शरीर में स्थित जानकर उसका चिन्तन करना चाहिये ॥ ७२ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कापिलेये तत्त्वसमाम्नाये षड्विंशोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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