श्रीमद्भागवतमहापुराण – तृतीय स्कन्ध – अध्याय ९
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
नवाँ अध्याय
ब्रह्माजी द्वारा भगवान् की स्तुति

ब्रह्माजी ने कहा — प्रभो ! आज बहुत समय के बाद मैं आपको जान सका हूँ । अहो ! कैसे दुर्भाग्य की बात है कि देहधारी जीव आपके स्वरूप को नहीं जान पाते । भगवन् ! आपके सिवा और कोई वस्तु नहीं है । जो वस्तु प्रतीत होती हैं, वह भी स्वरूपतः सत्य नहीं हैं, क्योंकि माया के गुणों के क्षुभित होने के कारण केवल आप ही अनेकों रूपों में प्रतीत हो रहे हैं ॥ १ ॥ देव ! आपकी चित् शक्ति के प्रकाशित रहने के कारण अज्ञान आपसे सदा ही दूर रहता है । आपका यह रूप, जिसके नाभि-कमल से में प्रकट हुआ हूँ, सैकड़ों अवतारों का मूल कारण है । इसे आपने सत्पुरुषों पर कृपा करने के लिये ही पहले-पहल प्रकट किया है ॥ २ ॥ परमात्मन् ! आपका जो आनन्दमात्र, भेदरहित, अखण्ड तेजोमयस्वरूप है, उसे मैं इससे भिन्न नहीं समझता । इसलिये मैंने विश्व की रचना करनेवाले होनेपर भी विश्वातीत आपके इस अद्वितीय रूप की ही शरण ली है । यही सम्पूर्ण भूत और इन्द्रियों का भी अधिष्ठान है ॥ ३ ॥

हे विश्वकल्याणमय ! मैं आपका उपासक हूँ, आपने मेरे हित के लिये ही मुझे ध्यान में अपना यह रूप दिखलाया है । जो पापात्मा विषयासक्त जीव है, वे ही इसका अनादर करते हैं । मैं तो आपको इसी रूप में बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥ ४ ॥ मेरे स्वामी ! जो लोग वेदरूप वायु से लायी हुई आपके चरणरूप कमलकोश की गन्ध को अपने कर्णपुटों से ग्रहण करते हैं, उन अपने भक्तजन के हृदय-कमल से आप कभी दूर नहीं होते; क्योंकि वे पराभक्तिरूप डोरी से आपके पादपद्म को बाँध लेते हैं ॥ ५ ॥ जबतक पुरुष आपके अभयप्रद् चरणारविन्दों का आश्रय नहीं लेता, तभीतक उसे धन, घर और बन्धुजन के कारण प्राप्त होनेवाले भय, शोक, लालसा, दीनता और अत्यन्त लोभ आदि सताते हैं और तभीतक उसे मैं-मेरेपन का दुराग्रह रहता है, जो दुःख का एकमात्र कारण हैं ॥ ६ ॥

जो लोग सब प्रकार के अमङ्गल को नष्ट करनेवाले आपके श्रवण-कीर्तनादि प्रसङ्ग से इन्द्रियों को हटाकर लेशमात्र विषय-सुख के लिये दीन और मन-ही-मन लालायित होकर निरन्तर दुष्कर्मों में लगे रहते हैं, उन बेचारों की बुद्धि दैव ने हर ली है ॥ ७ ॥ अच्युत ! उरुक्रम ! इस प्रजा को भूख-प्यास, वात, पित्त, कफ, सर्दी, गर्मी, हवा और वर्षा से, परस्पर एक-दूसरे से तथा कामाग्नि और दुःसह क्रोध से बार-बार कष्ट उठाते देखकर मेरा मन बड़ा खिन्न होता है ॥ ८ ॥ स्वामिन् ! जबतक मनुष्य इन्द्रिय और विषयरूपी माया के प्रभाव से आपसे अपने को भिन्न देखता है, तबतक उसके लिये इस संसारचक्र की निवृत्ति नहीं होती । यद्यपि यह मिथ्या हैं, तथापि कर्मफल-भोग का क्षेत्र होने के कारण उसे नाना प्रकार के दुःखों में डालता रहता हैं ॥ ९ ॥

देव ! औरों की तो बात ही क्या-जो साक्षात् मुनि हैं, वे भी यदि आपके कथाप्रसङ्ग से विमुख रहते हैं तो उन्हें संसार में फँसना पड़ता है । वे दिन में अनेक प्रकार के व्यापारों के कारण विक्षिप्त-चित्त रहते हैं, रात्रि में निद्रा में अचेत पड़े रहते हैं, उस समय भी तरह-तरह के मनोरथों के कारण क्षण-क्षण में उनको नींदे टूटती रहती है तथा दैववश उनकी अर्थसिद्धि के सब उद्योग भी विफल होते रहते हैं ॥ १० ॥ नाथ ! आपका मार्ग केवल गुण-श्रवण से ही जाना जाता है । आप निश्चय ही मनुष्यों के भक्तियोग के द्वारा परिशुद्ध हुए हदयकमल में निवास करते हैं । पुण्यश्लोक प्रभो ! आपके भक्तजन जिस-जिस भावना से आपका चिन्तन करते हैं, उन साधु पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिये आप वही-वही रूप धारण कर लेते हैं ॥ ११ ॥

भगवन् ! आप एक हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तःकरणों में स्थित उनके परम हितकारी अन्तरात्मा हैं । इसलिये यदि देवतालोग भी हृदय में तरह-तरह की कामनाएँ रखकर भाँति-भाँति की विपुल सामग्रियों से आपका पूजन करते हैं, तो उससे आप उतने प्रसन्न नहीं होते जितने सब प्राणियों पर दया करने से होते हैं । किन्तु वह सर्वभूतदया असत् पुरुष को अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १२ ॥ जो कर्म आपको अर्पण कर दिया जाता है, उसका कभी नाश नहीं होता — वह अक्षय हो जाता है । अतः नाना प्रकार के कर्म-यज्ञ, दान, कठिन तपस्या और व्रतादि के द्वारा आपकी प्रसन्नता प्राप्त करना ही मनुष्य का सबसे बड़ा कर्मफल है; क्योंकि आपकी प्रसन्नता होनेपर ऐसा कौन फल है जो सुलभ नहीं हो जाता ॥ १३ ॥ आप सर्वदा अपने स्वरूप के प्रकाश से ही प्राणियों के भेद-भ्रमरूप अन्धकार का नाश करते रहते हैं तथा ज्ञान के अधिष्ठान साक्षात् परमपुरुष हैं; मैं आपको नमस्कार करता हूँ । संसार की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के निमित से जो माया की लीला होती हैं, वह आपका ही खेल है; अतः आप परमेश्वर को में बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥ १४ ॥ जो लोग प्राणत्याग करते समय आपके अवतार, गुण और कर्मों को सूचित करनेवाले देवकीनन्दन, जनार्दन, कंसनिकन्दन आदि नामों का विवश होकर भी उच्चारण करते हैं, वे अनेकों जन्मों के पापों से तत्काल छूटकर मायादि आवरणों से रहित ब्रह्मपद प्राप्त करते हैं । आप नित्य अजन्मा हैं, मैं आपकी शरण लेता हूँ ॥ १५ ॥

भगवन् ! इस विश्ववृक्ष के रूप में आप ही विराजमान हैं । आप ही अपनी मूलप्रकृति को स्वीकार करके जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के लिये मेरे, अपने और महादेवजी के रूप में तीन प्रधान शाखाओं में विभक्त हुए हैं और फिर प्रजापति एवं मनु आदि शाखा-प्रशाखाओं के रूप में फैलकर बहुत विस्तृत हो गये हैं । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ १६ ॥ भगवन् ! आपने अपनी आराधना को ही लोकों के लिये कल्याणकारी स्वधर्म बताया है, किन्तु वे इस ओर से उदासीन रहकर सर्वदा विपरीत (निषिद्ध) कर्मों में लगे रहते हैं । ऐसी प्रमाद की अवस्था में पड़े हुए इन जीवों की जीवन-आशा को जो सदा सावधान रहकर बड़ी शीघ्रता से काटता रहता है, वह बलवान् काल भी आपका ही रूप है; मैं उसे नमस्कार करता हूँ ॥ १७ ॥ यद्यपि मैं सत्यलोक का अधिष्ठाता हूँ, जो दो परार्द्धपर्यन्त रहनेवाला और समस्त लोकों का वन्दनीय है, तो भी आपके उस कालरूप से डरता रहता है । उससे बचने और आपको प्राप्त करने के लिये ही मैंने बहुत समयतक तपस्या की है । आप ही अधियज्ञरूप से मेरी इस तपस्या साक्षी हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ १८ ॥ आप पूर्णकाम हैं, आपको किसी विषयसुख की इच्छा नहीं है, तो भी आपने अपनी बनायी हुई धर्ममर्यादा की रक्षा के लिये पशु-पक्षी, मनुष्य और देवता आदि जीवयोनियों में अपनी ही इच्छा से शरीर धारण कर अनेकों लीलाएँ की हैं । ऐसे आप पुरुषोत्तम भगवान् को मेरा नमस्कार है ॥ १९ ॥ प्रभो ! आप अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश — पाँचों में से किसी के भी अधीन नहीं हैं; तथापि इस समय जो सारे संसार को अपने उदर में लीनकर भयङ्कर तरङ्गमाला से विक्षुब्ध प्रलयकालीन जल में अनन्त विग्रह की कोमल शय्या पर शयन कर रहे हैं, वह पूर्वकल्प की कर्मपरम्परा से श्रमित हुए जीवों को विश्राम देने के लिये ही है ॥ २० ॥

आपके नाभिकमलरूप भवन से मेरा जन्म हुआ है । यह सम्पूर्ण विश्व आपके उदर में समाया हुआ है । आपकी कृपा से ही मैं त्रिलोकी की रचनारूप उपकार में प्रवृत्त हुआ हूँ । इस समय योगनिद्रा का अन्त हो जाने के कारण आपके नेत्र-कमल विकसित हो रहे हैं, आपको मेरा नमस्कार है ॥ २१ ॥ आप सम्पूर्ण जगत् के एकमात्र सुहृद् और आत्मा हैं तथा शरणागतों पर कृपा करनेवाले हैं । अतः अपने जिस ज्ञान और ऐश्वर्य से आप विश्व को आनन्दित करते हैं, उससे मेरी बुद्धि को भी युक्त करे — जिससे मैं पूर्वकल्प के समान इस समय भी जगत् की रचना कर सकूँ ॥ २२ ॥ आप भक्त-वाञ्छा-कल्पतरु हैं । अपनी शक्ति लक्ष्मीजी के सहित अनेकों गुणावतार लेकर आप जो-जो अद्भुत कर्म करेंगे, मेरा यह जगत् की रचना करने का उद्यम भी उन्हीं में से एक है । अतः इसे रचते समय आप मेरे चित्त को प्रेरित करें — शक्ति प्रदान करें, जिससे में सृष्टिरचनाविषयक अभिमानरूप मल से दूर रह सकूँ ॥ २३ ॥

प्रभो ! इस प्रलयकालीन जल में शयन करते हुए आप अनन्तशक्ति परमपुरुष के नाभि-कमल से मेरा प्रादुर्भाव हुआ है और मैं हूँ भी आपकी ही विज्ञानशक्ति; अतः इस जगत् के विचित्र रूप का विस्तार करते समय आपकी कृपा से मेरी वेदरूप वाणी का उच्चारण लुप्त न हो ॥ २४ ॥ आप अपार करुणामय पुराणपुरुष हैं । आप परम प्रेममयी मुसकान के सहित अपने नेत्रकमल खोलिये और शेष-शय्या से उठकर विश्व के उद्भव के लिये अपनी सुमधुर वाणी से मेरा विषाद दूर कीजिये ॥ २५ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी ! इस प्रकार तप, विद्या और समाधि के द्वारा अपने उत्पत्तिस्थान श्रीभगवान् को देखकर तथा अपने मन और वाणी की शक्ति के अनुसार उनकी स्तुति कर ब्रह्माजी थके-से होकर मौन हो गये ॥ २६ ॥ श्रीमधुसूदन भगवान् ने देखा कि ब्रह्माजी इस प्रलयजलराशि से बहुत घबराये हुए हैं तथा लोक रचना के विषय में कोई निश्चित विचार न होने के कारण उनका चित्त बहुत खिन्न है । तब उनके अभिप्राय को जानकर वे अपनी गम्भीर वाणी से उनका खेद शान्त करते हुए कहने लगे ॥ २७-२८ ॥

श्रीभगवान् ने कहा — वेदगर्भ ! तुम विषाद के वशीभूत हो आलस्य न करो, सृष्टि रचना के उद्यम में तत्पर हो जाओ । तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, उसे तो मैं पहले ही कर चुका हूँ ॥ २९ ॥ तुम एक बार फिर तप करो और भागवत-ज्ञान का अनुष्ठान करो । उनके द्वारा तुम सब लोको को स्पष्टतया अपने अन्तःकरण में देखोगे ॥ ३० ॥ फिर भक्तियुक्त और समाहितचित होकर तुम सम्पूर्ण लोक और अपने में मुझको व्याप्त देखोगे तथा मुझमें सम्पूर्ण लोक और अपने आपको देखोगे ॥ ३१ ॥ जिस समय जीव काष्ठ में व्याप्त अग्नि के समान समस्त भूतों में मुझे ही स्थित देखता है, उसी समय वह अपने अज्ञानरूप मल से मुक्त हो जाता हैं ॥ ३२ ॥ जब वह अपने को भूत, इन्द्रिय, गुण और अन्तःकरण से रहित तथा स्वरूपतः मुझसे अभिन्न देखता है, तब मोक्षपद प्राप्त कर लेता हैं ॥ ३३ ॥

ब्रह्माजी ! नाना प्रकार के कर्मसंस्कारों के अनुसार अनेक प्रकार के जीव सृष्टि को रचने की इच्छा होनेपर भी तुम्हारा चित्त मोहित नहीं होता, यह मेरी अतिशय कृपा का ही फल हैं ॥ ३४ ॥ तुम सबसे पहले मन्त्रद्रष्टा हो । प्रजा उत्पन्न करते समय भी तुम्हारा मन मुझमें ही लगा रहता है, इससे पापमय रजोगुण तुमको बाँध नहीं पाता ॥ ३५ ॥ तुम मुझे भूत, इन्द्रिय, गुण और अन्तःकरण से रहित समझते हो; इससे जान पड़ता है कि यद्यपि देहधारी जीव को मेरा ज्ञान होना बहुत कठिन है, तथापि तुमने मुझे ज्ञान लिया है ॥ ३६ ॥ ‘मेरा आश्रय कोई है या नहीं इस सन्देह से तुम कमलनाल के द्वारा जल में उसका मूल खोज रहे थे, सो मैंने तुम्हें अपना यह स्वरूप अन्तःकरण में ही दिखलाया है ॥ ३७ ॥

प्यारे ब्रह्माजी ! तुमने जो मेरी कथाओं के वैभव से युक्त मेरी स्तुति की है और तपस्या में जो तुम्हारी निष्ठा है, वह भी मेरी हो कृपा का फल है ॥ ३८ ॥ लोक-रचना की इच्छा से तुमने सगुण प्रतीत होनेपर भी जो निर्गुणरूप से मेरा वर्णन करते हुए स्तुति की है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ । तुम्हारा कल्याण हो ॥ ३९ ॥ मैं समस्त कामनाओं और मनोरथों को पूर्ण करने में समर्थ हूँ । जो पुरुष नित्यप्रति इस स्तोत्र द्वारा स्तुति करके मेरा भजन करेगा, उसपर मैं शीघ्र ही प्रसन्न हो जाऊँगा ॥ ४० ॥ तत्त्ववेत्ताओं का मत है कि पूर्त, तप, यज्ञ, दान, योग और समाधि आदि साधनों से प्राप्त होनेवाला जो परम कल्याणमय फल है, वह मेरी प्रसन्नता ही है ॥ ४१ ॥ विधाता ! मैं आत्माओं का भी आत्मा और स्त्री-पुत्रादि प्रियों का भी प्रिय हूँ । देहादि भी मेरे ही लिये प्रिय हैं । अतः मुझसे ही प्रेम करना चाहिये ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी ! त्रिलोकी को तथा जो प्रजा इस समय मुझमें लीन हैं, उसे तुम पूर्वकल्प के समान मुझसे उत्पन्न हुए अपने सर्ववेदमय स्वरूप से स्वयं ही रचो ॥ ४३ ॥

मैत्रेयजी कहते हैं — प्रकृति और पुरुष के स्वामी कमलनाभ भगवान् सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी को इस प्रकार जगत् की अभिव्यक्ति करवाकर अपने उस नारायणरूप से अदृश्य हो गये ॥ ४४ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे नवमोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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