Print Friendly, PDF & Email

श्रीमद्भागवतमहापुराण – द्वादशः स्कन्ध – अध्याय ३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
तीसरा अध्याय
राज्य, युगधर्म और कलियुग के दोषों से बचने का उपाय — नामसङ्कीर्तन

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! जब पृथ्वी देखती है कि राजा लोग मुझ पर विजय प्राप्त करने के लिये उतावले हो रहे हैं, तब वह हँसने लगती है और कहती है —“कितने आश्चर्य की बात है कि ये राजा लोग, जो स्वयं मौत के खिलौने हैं, मुझे जीतना चाहते हैं ॥ १ ॥ राजाओं से यह बात छिपी नहीं है कि वे एक-न-एक दिन मर जायेंगे, फिर भी वे व्यर्थ में ही मुझे जीतने की कामना करते हैं । सचमुच इस कामना से अंधे होने के कारण ही वे पानी के बुलबुले के समान क्षण भर शरीर पर विश्वास कर बैठते हैं और धोखा खाते हैं ॥ २ ॥ वे सोचते हैं कि हम पहले मन सहित अपनी पाँचों इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करेंगे — अपने भीतरी शत्रुओं को वश में करेंगे, क्योंकि इनको जीते बिना बाहरी शत्रुओं को जीतना कठिन है । उसके बाद अपने शत्रु के मन्त्रियों, अमात्यों, नागरिकों, नेताओं और समस्त सेना को भी वश में कर लेंगे । जो भी हमारे विजय-मार्ग में काँटे बोयेगा, उसे हम अवश्य जीत लेगे ॥ ३ ॥ इस प्रकार धीरे-धीरे क्रम से सारी पृथ्वी हमारे अधीन हो जायगी और फिर तो समुद्र ही हमारे राज्य की खाईं का काम करेगा ।’ इस प्रकार वे अपने मन में अनेकों आशाएँ बाँध लेते हैं और उन्हें यह बात बिल्कुल नहीं सूझती कि उनके सिर पर काल सवार है ॥ ४ ॥ यहीं तक नहीं, जब एक द्वीप उनके वश में हो जाता है, तब वे दूसरे द्वीप पर विजय करने के लिये बड़ी शक्ति और उत्साह के साथ समुद्र यात्रा करते हैं । अपने मन को, इन्द्रियों को वश में करके लोग मुक्ति प्राप्त करते हैं, परन्तु ये लोग उनको वश में करके भी थोड़ा-सा भूभाग ही प्राप्त करते हैं । इतने परिश्रम और आत्मसंयम का यह कितना तुच्छ फल हैं !’॥ ५ ॥

परीक्षित् ! पृथ्वी कहती है कि “बड़े-बड़े मनु और उनके वीर पुत्र मुझे ज्यों-की-त्यों छोड़कर जहाँ से आये थे, वहीं खाली हाथ लौट गये, मुझे अपने साथ न ले जा सके । अब ये मूर्ख राजा मुझे युद्ध में जीतकर वश में करना चाहते हैं ॥ ६ ॥ जिनके चित्त में यह बात दृढमूल हो गयी है कि यह पृथ्वी मेरी हैं, उन दुष्टों के राज्य में मेरे लिये पिता-पुत्र और भाई-भाई भी आपस में लड़ बैठते हैं ॥ ७ ॥ वे परस्पर इस प्रकार कहते हैं कि ‘ओ मूढ़ ! यह सारी पृथ्वी मेरी ही है, तेरी नहीं, इस प्रकार राजा लोग एक-दूसरे को कहते-सुनते हैं, एक-दूसरे से स्पर्धा करते हैं, मेरे लिये एक-दूसरे को मारते हैं और स्वयं मर मिटते हैं ॥ ८ ॥ पृथु, पुरूरवा, गाधि, नहुष, भरत, सहस्रबाहु, अर्जुन, मान्धाता, सगर, राम, खट्वाङ्ग, धुन्धुमार, रघु, तृणविन्दु, ययाति, शांति, शन्तनु, गय, भगीरथ, कुवलयाश्व, ककुत्स्थ, नल, नृग, हिरण्यकशिपु. वृत्रासुर, लोकद्रोही रावण, नमुचि, शम्बर, भौमासुर, हिरण्याक्ष और तारकासुर तथा और बहुत-से दैत्य एवं शक्तिशाली नरपति हो गये । ये सब लोग सब कुछ समझते थे, शूर थे, सभी ने दिग्विजय में दूसरों को हरा दिया; किन्तु दूसरे लोग इन्हें न जीत सके, परन्तु सब-के-सब मृत्यु के ग्रास बन गये । राजन् ! उन्होंने अपने पूरे अन्तःकरण से मुझसे ममता की और समझा कि यह पृथ्वी मेरी है । परन्तु विकराल काल ने उनकी लालसा पूरी न होने दी । अब उनके बल-पौरुष और शरीर आदि का कुछ पता ही नहीं है । केवल उनकी कहानी-मात्र शेष रह गयी हैं ॥ ९-१३ ॥

परीक्षित् ! संसार में बड़े-बड़े प्रतापी और महान् पुरुष हुए हैं । वे लोकों में अपने यश का विस्तार करके यहाँ से चल बसे । मैंने तुम्हें ज्ञान और वैराग्य का उपदेश करने के लिये ही उनकी कथा सुनायी हैं । यह सब वाणी का विलास मात्र है । इसमें पारमार्थिक सत्य कुछ भी नहीं है ॥ १४ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण का गुणानुवाद समस्त अमङ्गलों का नाश करनेवाला है, बड़े-बड़े महात्मा उसी का गान करते रहते हैं । जो भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य प्रेममयी भक्ति की लालसा रखता हो, उसे नित्य-निरन्तर भगवान् के दिव्य गुणानुवाद का ही श्रवण करते रहना चाहिये ॥ १५ ॥

राजा परीक्षित् ने पूछा — भगवन् ! मुझे तो कलियुग में राशि-राशि दोष ही दिखायी दे रहे हैं । उस समय लोग क्रिस उपाय से उन दोषों का नाश करेंगे । इसके अतिरिक्त युग का स्वरूप, उनके धर्म, कल्प की स्थिति और प्रलयकाल के मान एवं सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान् भगवान् के कालरूप का भी यथावत् वर्णन कीजिये ॥ १६-१७ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! सत्ययुग में धर्म के चार चरण होते हैं, वे चरण हैं — सत्य, दया, तप और दान । उस समय के लोग पूरी निष्ठा के साथ अपने अपने धर्म का पालन करते हैं । धर्म स्वयं भगवान् का स्वरूप है ॥ १८ ॥ सत्ययुग के लोग बड़े सन्तोषी और दयालु होते हैं । वे सबसे मित्रता का व्यवहार करते और शान्त रहते हैं । इन्द्रियाँ और मन उनके वश में रहते हैं और सुख-दुःख आदि द्वन्द्व को वे समान भाव से सहन करते हैं । अधिकांश लोग तो समदर्शी और आत्माराम होते हैं और बाकी लोग स्वरूपस्थिति के लिये अभ्यास में तत्पर रहते हैं ॥ १९ ॥ परीक्षित् ! धर्म के समान अधर्म के भी चार चरण है — असत्य, हिंसा, असन्तोष और कलह । त्रेतायुग में इनके प्रभाव से धीरे-धीरे धर्म के सत्य आदि चरणों का चतुर्थाँश क्षीण हो जाता हैं ॥ २० ॥ राजन् ! उस समय वर्णों में ब्राह्मण की प्रधानता अक्षुण्ण रहती है । लोगों में अत्यन्त हिंसा और लम्पटता का अभाव रहता हैं । सभी लोग कर्मकाण्ड और तपस्या में निष्ठा रखते हैं और अर्थ, धर्म एवं कामरूप त्रिवर्ग का सेवन करते हैं । अधिकांश लोग कर्मप्रतिपादक वेदों के पारदर्शी विद्वान् होते हैं ॥ २१ ॥

द्वापरयुग में हिंसा, असन्तोष, झूठ और द्वेष-अधर्म के इन चरणों की वृद्धि हो जाती है एवं इनके कारण धर्म के चारों चरण-तपस्या, सत्य, दया और दान आधे-आधे क्षीण हो जाते हैं ॥ २२ ॥ उस समय के लोग बड़े यशस्वी, कर्मकाण्डी और वेदो के अध्ययन-अध्यापन में बड़े तत्पर होते हैं । लोगों के कुटुम्ब बड़े-बड़े होते हैं, प्रायः लोग धनाढ्य एवं सुखी होते हैं । उस समय वर्णों में क्षत्रिय और ब्राहाण दो वर्णों की प्रधानता रहती है ॥ २३ ॥ कलियुग में तो अधर्म के चारों चरण अत्यन्त बढ़ जाते हैं । उनके कारण धर्म के चारों चरण क्षीण होने लगते हैं और उनका चतुर्थांश ही बच रहता है । अन्त में तो उस चतुर्थांश का भी लोप हो जाता हैं ॥ २४ ॥ कलियुग में लोग लोभी, दुराचारी और कठोरहृदय होते हैं । वे झूठमूठ एक-दूसरे से वैर मोल ले लेते हैं एवं लालसा-तृष्णा की तरङ्गों में बहते रहते हैं । उस समय के अभागे लोगों में शूद्र, केवट आदि की ही प्रधानता रहती हैं ॥ २५ ॥

सभी प्राणियों में तीन गुण होते हैं — सत्त्व, रज और तम् । काल की प्रेरणा से समय-समय पर शरीर, प्राण और मन में उनका ह्रास और विकास भी हुआ करता है ॥ २६ ॥ जिस समय मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ सत्त्वगुण में स्थित होकर अपना-अपना काम करने लगती हैं, उस समय सत्ययुग समझना चाहिये । सत्वगुण की प्रधानता के समय मनुष्य ज्ञान और तपस्या से अधिक प्रेम करने लगता हैं ॥ २७ ॥ जिस समय मनुष्यों की प्रवृत्ति और रुचि धर्म, अर्थ और लौकिक-पारलौकिक सुख-भोगों की ओर होती है तथा शरीर, मन एवं इन्द्रियाँ रजोगुण में स्थित होकर काम करने लगती हैं — बुद्धिमान् परीक्षित् ! समझना चाहिये कि उस समय त्रेतायुग अपना काम कर रहा हैं ॥ २८ ॥ जिस समय लोभ, असन्तोष, अभिमान, दम्भ और मल्सर आदि दोषों का बोलबाला हो और मनुष्य बड़े उत्साह तथा रुचि के साथ सकाम कर्मों में लगना चाहे, उस समय द्वापरयुग समझना चाहिये । अवश्य ही रजोगुण और तमोगुण की मिश्रित प्रधानता का नाम ही द्वापरयुग है ॥ २९ ॥ जिस समय झूठ-कपट, तन्द्रा-निद्रा, हिंसा-विषाद, शोक मोह, भय और दौनताकी प्रधानता हो, उसे तमोगुण-प्रधान कलियुग समझना चाहिये ॥ ३० ॥ जब कलियुग का राज्य होता हैं, तब लोगों की दृष्टि क्षुद्र हो जाती है; अधिकांश लोग होते तो हैं अत्यन्त निर्धन, परन्तु खाते हैं बहुत अधिक । उनका भाग्य तो होता है बहुत ही मन्द और चित्त में कामनाएँ होती हैं बहुत बड़ी-बड़ी । स्त्रियों में दुष्टता और कुलटापन की वृद्धि हो जाती है ॥ ३१ ॥

सारे देश में, गाँव-गाँव में लुटेरों की प्रधानता एवं प्रचुरता हो जाती हैं । पाखण्डी लोग अपने नये-नये मत चलाकर मनमाने ढंग से वेदों के तात्पर्य निकालने लगते हैं और इस प्रकार उन्हें कलंकित करते हैं । राजा कहलानेवाले लोग प्रजा की सारी कमाई हड़पकर उन्हें चूसने लगते हैं । ब्राह्मणनामधारी जीव पेट भरने और जननेन्द्रिय को तृप्त करने में ही लग जाते हैं ॥ ३२ ॥ ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्यव्रत से रहित और अपवित्र रहने लगते हैं । गृहस्थ दूसरों को भिक्षा देने के बदले स्वयं भीख माँगने लगते हैं, वानप्रस्थी गाँवों में बसने लगते हैं और संन्यासी धन के अत्यन्त लोभी-अर्थपिशाच हो जाते हैं ॥ ३३ ॥ स्त्रियों का आकार तो छोटा हो जाता है, पर भूख बढ़ जाती है । उन्हें सन्तान बहुत अधिक होती हैं और वे अपनी कुल मर्यादा का उल्लङ्घन करके लाज-हया — जो उनका भूषण हैं — छोड़ बैठती है । वे सदा-सर्वदा कड़वी बात कहती रहती हैं और चोरी तथा कपट में बड़ी निपुण हो जाती हैं । उनमें साहस भी बहुत बढ़ जाता है ॥ ३४ ॥ व्यापारियों के हृदय अत्यन्त क्षुद्र हो जाते हैं । वे कौड़ी–कौड़ी से लिपटे रहते और छदाम-दाम के लिये धोखाधड़ी करने लगते हैं । और तो क्या आपत्तिकाल न होने पर तथा धनी होने पर भी वे निम्न-श्रेणी के व्यापारों को, जिनकी सत्पुरुष निन्दा करते हैं, ठीक समझने और अपनाने लगते हैं ॥ ३५ ॥ स्वामी चाहे सर्वश्रेष्ठ ही क्यों न हों — जब सेवकलोग देखते हैं कि इसके पास धन-दौलत नहीं रही, तब उसे छोड़कर भाग जाते हैं । सेवक चाहे कितना ही पुराना क्यों न हो — परन्तु जब वह किसी विपत्ति में पड़ जाता है, तब स्वामी उसे छोड़ देते हैं । और तो क्या, जय गौएँ बकेन हो जाती हैं — दूध देना बन्द कर देती हैं, तब लोग उनका भी परित्याग कर देते हैं ॥ ३६ ॥

प्रिय परीक्षित् ! कलियुग के मनुष्य बड़े ही लम्पट हो जाते हैं, वे अपनी कामवासना को तृप्त करने के लिये ही किसी से प्रेम करते हैं । वे विषयवासना के वशीभूत होकर इतने दीन हो जाते हैं कि माता-पिता, भाई-बन्धु और मित्रों को भी छोड़कर केवल अपनी साली और सालों से ही सलाह लेने लगते हैं ॥ ३७ ॥ शुद्र तपस्वियों का वेष बनाकर अपना पेट भरते और दान लेने लगते हैं । जिन्हें धर्म का रत्तीभर भी ज्ञान नहीं है, वे ऊँचे सिंहासन पर विराजमान होकर धर्म का उपदेश करने लगते हैं ॥ ३८ ॥ प्रिय परीक्षित् ! कलियुग की प्रजा सूखा पड़ने के कारण अत्यन्त भयभीत और आतुर हो जाती है । एक तो दुर्भिक्ष और दूसरे शासकों की कर-वृद्धि ! प्रजा के शरीर में केवल अस्थि-पञ्जर और मन में केवल उद्वेग शेष रह जाता है । प्राण रक्षा के लिये रोटी का टुकड़ा मिलना भी कठिन हो जाता है ॥ ३९ ॥ कलियुग में प्रजा शरीर ढकने के लिये वस्त्र और पेट की ज्वाला शान्त करने के लिये रोटी, पीने के लिये पानी और सोने के लिये दो हाथ जमीन से भी वञ्चित हो जाती है । उसे दाम्पत्य-जीवन, स्नान और आभूषण पहनने तक की सुविधा नहीं रहती । लोगों की आकृति, प्रकृति और चेष्टाएँ पिशाचों को-सी हो जाती हैं ॥ ४० ॥

कलियुग में लोग, अधिक धन की तो बात ही क्या, कुछ कौड़ियों के लिये आपस में वैर-विरोध करने लगते और बहुत दिनों के सद्भाव तथा मित्रता को तिलाञ्जलि दे देते हैं । इतना ही नहीं, वे दमड़ी-दमड़ी के लिये अपने सगे-सम्बन्धियों तक की हत्या कर बैठते और अपने प्रिय प्राणों से भी हाथ धो बैठते हैं ॥ ४१ ॥ परीक्षित् ! कलियुग के क्षुद्र प्राणी केवल कामवासना की पूर्ति और पेट भरने की धुन में ही लगे रहते हैं । पुत्र अपने बूढ़े मा-बाप की भी रक्षा–पालन-पोषण नहीं करते, उनकी उपेक्षा कर देते हैं और पिता अपने निपुण-से-निपुण, सब कामों में योग्य पुत्रों की भी परवा नहीं करते, उन्हें अलग कर देते हैं ॥ ४२ ॥ परीक्षित् ! श्रीभगवान् ही चराचर जगत् के परम पिता और परम गुरु हैं । इन्द्र-ब्रह्मा आदि त्रिलोकाधिपति उनके चरणकमलों में अपना सिर झुकाकर सर्वस्व समर्पण करते रहते हैं । उनका ऐश्वर्य अनन्त हैं और वे एकरस अपने स्वरूप में स्थित हैं । परन्तु कलियुग में लोगों में इतनी मूढ़ता फैल जाती हैं, पाखण्डियों के कारण लोगों का चित्त इतना भटक जाता है कि प्रायः लोग अपने कर्म और भावनाओं के द्वारा भगवान् की पूजा से भी विमुख हो जाते हैं ॥ ४३ ॥

मनुष्य मरते समय आतुरता की स्थिति अथवा गिरते या फिसलते समय विवश होकर भी यदि भगवान् के किसी एक नाम का उच्चारण कर ले, तो उसके सारे कर्मबन्धन छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और उसे उत्तम-से-उत्तम गति प्राप्त होती है । परन्तु हाय रे कलियुग ! कलियुग से प्रभावित होकर लोग उन भगवान् की आराधना से भी विमुख हो जाते हैं ॥ ४४ ॥ परीक्षित् ! कलियुग के अनेकों दोष हैं । कुल वस्तुएँ दूषित हो जाती हैं, स्थानों में भी दोष की प्रधानता हो जाती है । सब दोषों का मूल स्रोत तो अन्तःकरण है ही, परन्तु जब पुरुषोत्तम भगवान् हृदय में आ विराजते हैं, तब उनकी सन्निधिमात्र ही सब-के-सब दोष नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥ भगवान् के रूप, गुण, लीला, धाम और नाम के श्रवण, सङ्कीर्तन, ध्यान, पूजन और आदर से वे मनुष्य के हृदय में आकर विराजमान हो जाते हैं । और एक-दो जन्म के पापों की तो बात ही क्या, हज़ारों जन्मों के पाप के ढेर-के-ढेर भी क्षणभर में भस्म कर देते हैं ॥ ४६ ॥ जैसे सोने के साथ संयुक्त होकर अग्नि उसके धातुसम्बन्धी मलिनता आदि दोषों को नष्ट कर देती है, वैसे ही साधकों के हदय में स्थित होकर भगवान् विष्णु उनके अशुभ संस्कारों को सदा के लिये मिटा देते हैं ॥ ४७ ॥

परीक्षित् ! विद्या, तपस्या, प्राणायाम, समस्त प्राणियों प्रति मित्रभाव, तीर्थस्नान, व्रत, दान और जप आदि किसी भी साधन से मनुष्य के अन्तःकरण की वैसी वास्तविक शुद्धि नहीं होती, जैसी शुद्धि भगवान् पुरुषोत्तम के हृदय में विराजमान हो जाने पर होती हैं ॥ ४८ ॥ परीक्षित् ! अब तुम्हारी मृत्यु का समय निकट आ गया हैं । अब सावधान हो जाओ । पूरी शक्ति से और अन्तःकरण की सारी वृत्तियों से भगवान् श्रीकृष्ण को अपने हृदय-सिंहासन पर बैठा लो । ऐसा करने से अवश्य ही तुम्हें परमगति की प्राप्ति होगी ॥ ४९ ॥ जो लोग मृत्यु के निकट पहुँच रहे हैं, उन्हें सब प्रकार से परम ऐश्वर्यशाली भगवान् का ही ध्यान करना चाहिये । प्यारे परीक्षित् ! सबके परम आश्रय और सर्वात्मा भगवान् अपना ध्यान करनेवाले को अपने स्वरूप में लीन कर लेते हैं, उसे अपना स्वरुप बना लेते हैं ॥ ५० ॥ परीक्षित् ! यों तो कलियुग दोषों का खजाना है, परन्तु इसमें एक बहुत बड़ा गुण है । वह गुण यही है कि कलियुग में केवल भगवान् श्रीकृष्ण का मङ्गलकीर्तन करनेमात्र से ही सारी आसक्तियां छूट जाती हैं और परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है ॥ ५१ ॥ सत्ययुग में भगवान् का ध्यान करने से, त्रेता में बड़े-बड़े यज्ञों के द्वारा उनकी आराधना करने से और द्वापर में विधिपूर्वक उनकी पूजा-सेवा से जो फल मिलता है, वह कलियुग में केवल भगवन्नाम का कीर्तन करने से ही प्राप्त हो जाता हैं ॥ ५२ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे तृतीयोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.