श्रीमद्भागवतमहापुराण – द्वादशः स्कन्ध – अध्याय ८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
आठवाँ अध्याय
मार्कण्डेयजी की तपस्या और वर-प्राप्ति

शौनकजी ने कहा — साधुशिरोमणि सूतजी ! आप आयुष्मान् हो । सचमुच आप वक्ताओं के सिरमौर हैं । जो लोग संसार के अपार अन्धकार में भूल-भटक रहे हैं, उन्हें आप वहाँ से निकालकर प्रकाशस्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार करा देते हैं । आप कृपा करके हमारे एक प्रश्न का उत्तर दीजिये ॥ १ ॥ लोग कहते हैं कि मृकण्ड-ऋषि के पुत्र मार्कण्डेय ऋषि चिरायु हैं और जिस समय प्रलय ने सारे जगत् को निगल लिया था, उस समय भी वे बचे रहे ॥ २ ॥ परन्तु सूतजी ! वे तो इसी कल्प में हमारे ही वंश में उत्पन्न हुए एक श्रेष्ठ भृगु-वंशी हैं और जहाँ तक हमें मालूम है, इस कल्प में अब तक प्राणियों का कोई प्रलय नहीं हुआ है ॥ ३ ॥ ऐसी स्थिति में यह बात कैसे सत्य हो सकती हैं कि जिस समय सारी पृथ्वी प्रलय कालीन समुद्र में डूब गयी थी, उस समय मार्कण्डेयजी उसमें डूब-उतरा रहे थे और उन्होंने अक्षयवट के पते के दोने में अत्यन्त अद्भुत और सोये हुए बालमुकुन्द का दर्शन किया ॥ ४ ॥ सूतजी ! हमारे मन में बड़ा सन्देह है और इस बात को जानने की बड़ी उत्कण्ठा हैं । आप बड़े योगी है, पौराणिकों में सम्मानित हैं । आप कृपा करके हमारा यह सन्देह मिटा दीजिये ॥ ५ ॥

सूतजी ने कहा — शौनकजी ! आपने बड़ा सुन्दर प्रश्न किया । इससे लोगों का भ्रम मिट जायगा और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस कथा में भगवान् नारायण की महिमा हैं । जो इसका गान करता है, उसके सारे कलि-मल नष्ट हो जाते हैं ॥ ६ ॥ शौनकजी ! मृकण्ड ऋषि ने अपने पुत्र मार्कण्डेय के सभी संस्कार समय-समय पर किये । मार्कण्डेयजी विधिपूर्वक वेदों का अध्ययन करके तपस्या और स्वाध्याय से सम्पन्न हो गये थे ॥ ७ ॥ उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले रखा था । शान्तभाव से रहते थे । सिर पर जटाएँ बढ़ा रखी थीं । वृक्षों की छाल का ही वस्त्र पहनते थे । वे अपने हाथों में कमण्डलु और दण्ड धारण करते, शरीर पर यज्ञोपवीत और मेखला शोभायमान रहती ॥ ८ ॥ काले मृग को चर्म, रुद्राक्षमाला और कुश — यही उनकी पूँजी थी । यह सब उन्होंने अपने आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रत की पूर्ति के लिये ही ग्रहण किया था । वे सायङ्काल और प्रातःकाल अग्निहोत्र, सूर्योपस्थान, गुरुवन्दन, ब्राह्मणसत्कार, मानस-पूजा और ‘मैं परमात्मा का स्वरूप ही हूँ ।’ इस प्रकार की भावना आदि के द्वारा भगवान् की आराधना करते ॥ ९ ॥ सायं-प्रातः भिक्षा लाकर गुरुदेव के चरणों में निवेदन कर देते और मौन हो जाते । गुरुजी की आज्ञा होती तो एक बार खा लेते, अन्यथा उपवास कर जाते ॥ १० ॥

मार्कण्डेयजी ने इस प्रकार तपस्या और स्वाध्याय में तत्पर रहकर करोड़ों वर्षों तक भगवान् की आराधना की और इस प्रकार उस मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर ली, जिसको जीतना बड़े-बड़े योगियों के लिये भी कठिन है ॥ ११ ॥ मार्कण्डेयजी की मृत्यु-विजय को देखकर ब्रह्मा, भृगु, शङ्कर, दक्ष प्रजापति, ब्रह्माजी के अन्यान्य पुत्र तथा मनुष्य, देवता, पितर एवं अन्य सभी प्राणी अत्यन्त विस्मित हो गये ॥ १२ ॥ आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रतधारी एवं योगी मार्कण्डेयजी इस प्रकार तपस्या, स्वाध्याय और संयम आदि के द्वारा अविद्या आदि सारे क्लेशों को मिटाकर शुद्ध अन्तःकरण से इन्द्रियातीत परमात्मा का ध्यान करने लगे ॥ १३ ॥ योगी मार्कण्डेयजी महायोग के द्वारा अपना चित भगवान् के स्वरूप में जोड़ते रहे । इस प्रकार साधन करते-करते बहुत समय — छः मन्वन्तर व्यतीत हो गये ॥ १४ ॥ ब्रह्मन् ! इस सातवें मन्वन्तर में जब इन्द्र को इस बात का पता चला, तब तो वे उनकी तपस्या से शंकित और भयभीत हो गये । इसलिये उन्होंने उनकी तपस्या में विघ्न डालना आरम्भ कर दिया ॥ १५ ॥

शौनकजी ! इन्द्र ने मार्कण्डेयजी की तपस्या में विघ्न डालने के लिये उनके आश्रम पर गन्धर्व, अप्सराएँ, काम, वसन्त, मलयानिल, लोभ और मद को भेजा ॥ १६ ॥ भगवन् ! वे सब उनकी आज्ञा के अनुसार उनके आश्रम पर गये । मार्कण्डेयजी का आश्रम हिमालय के उत्तर की ओर है । वहीं पुष्पभद्रा नाम की नदी बहती है और उसके पास ही चित्रा नाम की एक शिला है ॥ १७ ॥ शौनकजी ! मार्कण्डेयजी का आश्रम बड़ा ही पवित्र हैं । चारों ओर हरे-भरे पवित्र वृक्षों की पंक्तियाँ हैं, उनपर लता लहलहाती रहती हैं । वृक्षों के झुरमुट में स्थान-स्थान पर पुण्यात्मा ऋषिगण निवास करते हैं और बड़े ही पवित्र एवं निर्मल जल से भरे जलाशय सब ऋतुओं में एक-से ही रहते हैं ॥ १८ ॥ कहीं मतवाले भौरे अपनी सङ्गीतमयी गुंजार से लोगों का मन आकर्षित करते रहते हैं तो कहीं मतवाले कोकिल पञ्चम स्वर में ‘कुहू कुहू’ कूकते रहते हैं । कहीं मतवाले मोर अपने पंख फैलाकर कलापूर्ण नृत्य करते रहते हैं तो कहीं अन्य मतवाले पक्षियों का झुंड खेलता रहता है ॥ १९ ॥

मार्कण्डेय मुनि के ऐसे पवित्र आश्रम में इन्द्र के भेजे हुए वायु ने प्रवेश किया । वहाँ उसने पहले शीतल झरना की नन्ही-नन्हीं फुहिया संग्रह कीं । इसके बाद सुगन्धित पुष्पों का आलिङ्गन किया और फिर कामभाव को उत्तेजित करते हुए धीरे-धीरे बहने लगा ॥ २० ॥ कामदेव के प्यारे सखा वसन्त ने भी अपनी माया फैलायी । सन्ध्या का समय था । चन्द्रमा उदित हो अपनी मनोहर किरणों का विस्तार कर रहे थे । सहस्र-सहस्र डालियाँवाले वृक्ष लताओं का आलिङ्गन पाकर धरती तक झुके हुए थे । नयी-नयी कोपलों, फल और फूलों के गुच्छे अलग ही शोभायमान हो रहे थे ॥ २१ ॥ वसन्त का साम्राज्य देखकर कामदेव ने भी वहाँ प्रवेश किया । उसके साथ गाने-बजानेवाले गन्धर्व झुंड-के-झुंड चल रहे थे, उसके चारों ओर बहुत-सी स्वर्गीय अप्सराएँ चल रही थी और अकेला काम ही सबका नायक था । उसके हाथ में पुष्प का धनुष और उस पर सम्मोहन आदि बाण चढ़े हुए थे ॥ २२ ॥

उस समय मार्कण्डेय मुनि अग्निहोत्र करके भगवान् की उपासना कर रहे थे । उनके नेत्र बंद थे । वे इतने तेजस्वी थे, मानो स्वयं अग्निदेव ही मूर्तिमान् होकर बैठे हों ! उनको देखने से हो मालूम हो जाता था कि इनको पराजित कर सकना बहुत ही कठिन है । इन्द्र के आज्ञाकारी सेवकों ने मार्कण्डेय मुनि को इसी अवस्था में देखा ॥ २३ ॥ अब अप्सराएँ उनके सामने नाचने लगीं । कुछ गन्धर्व मधुर गान करने लगे तो कुछ मृदङ्ग, वीणा, ढोल आदि बाजे बड़े मनोहर स्वर में बजाने लगे ॥ २४ ॥ शौनकजी ! अब कामदेव ने अपने पुष्पनिर्मित धनुष पर पञ्चमुख बाण चढ़ाया । उसके बाण के पाँच मुख हैं — शोषण, दीपन, सम्मोहन, तापन और उन्मादन । जिस समय वह निशाना लगाने की ताक में था, उस समय इन्द्र के सेवक वसन्त और लोभ मार्कण्डेय मुनि का मन विचलित करने के लिये प्रयत्नशील थे ॥ २५ ॥

उनके सामने ही ‘पुञ्जिकस्थली’ नाम की सुन्दरी अप्सरा गेंद खेल रही थी । स्तन के भार से बार-बार उसकी कमर लचक जाया करती थी । साथ ही उसकी चोटियों में गुंथे हुए सुन्दर-सुन्दर पुष्प और मालाएँ बिखरकर धरती पर गिरती जा रही थीं ॥ २६ ॥ कभी-कभी वह तिरछी चितवन से इधर-उधर देख लिया करती थी । उसके नेत्र कभी गेंद के साथ आकाश की ओर जाते, कभी धरती की ओर और कभी हथेलियों की ओर । वह बड़े हाव-भाव के साथ गेंद की ओर दौड़ती थी । उसी समय उसकी करधनी टूट गयी और वायु ने उसकी झीनी-सी साड़ी को शरीर से अलग कर दिया ॥ २७ ॥ कामदेव ने अपना उपयुक्त अवसर देखकर और यह समझकर कि अब मार्कण्डेय मुनि को मैंने जीत लिया, उनके ऊपर अपना बाण छोड़ा । परन्तु उसकी एक न चली । मार्कण्डेय मुनि पर उसका सारा उद्योग निष्फल हो गया — ठीक वैसे ही जैसे असमर्थ और अभागे पुरुषों के प्रयत्न विफल हो जाते हैं ॥ २८ ॥

शौनकजी ! मार्कण्डेय मुनि अपरिमित तेजस्वी थे । काम, वसन्त आदि आये तो थे इसलिये कि उन्हें तपस्या से भ्रष्ट कर दें; परन्तु अब उनके तेज से जलने लगे और ठीक उसी प्रकार भाग गये, जैसे छोटे-छोटे बच्चे सोते हुए साँप को जगाकर भाग जाते हैं ॥ २९ ॥ शौनकजी ! इन्द्र सेवकों ने इस प्रकार मार्कण्डेयजी को पराजित करना चाहा, परन्तु वे रत्ती भर भी विचलित न हुए । इतना ही नहीं, उनके मन में इस बात को लेकर तनिक भी अहङ्कार का भाव न हुआ । सच हैं, महापुरुषों के लिये यह कौन-सी आश्चर्य की बात है ॥ ३० ॥ जब देवराज इन्द्र ने देखा कि कामदेव अपनी सेना के साथ निस्तेज हतप्रभ होकर लौटा हैं और सुना कि ब्रह्मर्षि मार्कडेयजी परम प्रभावशाली हैं तब उन्हें बड़ा ही आश्चर्य हुआ ॥ ३१ ॥

शौनकजी ! मार्कण्डेय मुनि तपस्या, स्वाध्याय, धारणा, ध्यान और समाधि के द्वारा भगवान् चित्त लगाने का प्रयत्न करते रहते थे । अब उनपर कृपाप्रसाद वर्षा करने के लिये मुनिजन-नयन-मनोहारी नरोत्तम नर और भगवान् नारायण प्रकट हुए ॥ ३२ ॥ उन दोनों में एक का शरीर गौरवर्ण था और दूसरे का श्याम । दोनो के ही नेत्र तुरंत के खिले हुए कमल के समान कोमल और विशाल थे । चार-चार भुजाएँ थीं । एक मृगचर्म पहने हुए थे, तो दुसरे वृक्ष की छाल । हाथों में कुश लिये हुए थे और गले में तीन-तीन सूत के यज्ञोपवीत शोभायमान थे । वे कमण्डलु और बाँस का सीधा दण्ड ग्रहण किये हुए थे ॥ ३३ ॥ कमलगट्टे की माला और जीवों को हटाने लिये वस्त्र की कूची भी रखे हुए थे । ब्रह्मा, इन्द्र आदि के भी पूज्य भगवान् नर-नारायण कुछ ऊँचे कद के थे और वेद धारण किये हुए थे । उनके शरीर से चमकती हुई बिजली के समान पीले-पीले रंग की कान्ति निकल रही थी । वे ऐसे मालूम होते थे, मानो स्वयं तप ही मूर्तिमान् हो गया हो ॥ ३४ ॥ जब मार्कण्डेय मुनि ने देखा कि भगवान् के साक्षात् स्वरूप नर-नारायण ऋषि पधारे हैं, तब वे बड़े आदरभाव से उठकर खड़े हो गये और धरती पर दण्डवत् लोटकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया ॥ ३५ ॥

भगवान् के दिव्य दर्शन से उन्हें इतना आनन्द हुआ कि उनका रोम रोम, उनको सारी इन्द्रियों एवं अन्तःकरण शान्ति के समुद्र में गोता खाने लगे । शरीर पुलकित हो गया । नेत्रों में आंसू उमड़ आये, जिनके कारण वे उन्हें भर आँख देख भी न सकते ॥ ३६ ॥ तदनन्तर वे हाथ जोड़कर उठ खड़े हुए । उनका अङ्ग अङ्ग भगवान् के सामने झुका जा रहा था । उनके हृदय में उत्सुकता तो इतनी थी, मानों ने भगवान् को आलिङ्गन कर लेंगे । उनसे और कुछ तो बोला न गया, गद्गद वाणी से केवल इतना ही कहा — ‘नमस्कार ! नमस्कार’ ॥ ३७ ॥ इसके बाद उन्होंने दोनों को आसन पर बैठाया, बड़े प्रेम से उनके चरण पखारे और अर्घ्य, चन्दन, धूप और माला आदि से उनकी पूजा करने लगे ॥ ३८ ॥ भगवान् नर-नारायण सुखपूर्वक आसन पर विराजमान थे और मार्कण्डेयजी पर कृपाप्रसाद की वर्षा कर रहे थे । पूजा के अनन्तर मार्कण्डेय मुनि ने उन सर्वश्रेष्ठ मुनिवेषधारीं नर-नारायण के चरणों में प्रणाम किया और यह स्तुति की ॥ ३९ ॥

मार्कण्डेय मुनि ने कहा — ‘भगवन् ! मैं अल्पज्ञ जीव भला, आपकी अनन्त महिमा का कैसे वर्णन करूँ ? आपकी प्रेरणा से ही सम्पूर्ण प्राणियों — ब्रह्मा, शङ्कर तथा मेरे शरीर में भी प्राणशक्ति का सञ्चार होता है और फिर उसके कारण वाणी, मन तथा इन्द्रियों में भी बोलने, सोचने-विचारने और करने-जानने की शक्ति आती हैं । इस प्रकार सबके प्रेरक और परम स्वतन्त्र होने पर भी आप अपना भजन करनेवाले भक्त के प्रेम-बन्धन में बँधे हुए हैं ॥ ४० ॥ प्रभो ! आपने केवल विश्व की रक्षा के लिये ही जैसे मत्स्य-कूर्म आदि अनेकों अवतार ग्रहण किये हैं, वैसे ही आपने ये दोनों रूप भी त्रिलोकी के कल्याण, उसकी दुःख-निवृत्ति और विश्व प्राणियों की मृत्यु पर विजय प्राप्त कराने के लिये ग्रहण किया है । आप रक्षा तो करते ही हैं, मकड़ी के समान अपने से ही इस विश्व को प्रकट करते हैं और फिर स्वयं अपने में ही लीन भी कर लेते हैं ॥ ४१ ॥ आप चराचर का पालन और नियमन करनेवाले हैं । मैं आपके चरणकमलों में प्रणाम करता हूँ । जो आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण कर लेते हैं, उन्हें कर्म, गुण और कालजनित क्लेश स्पर्श भी नहीं कर सकते । वेद के मर्मज्ञ ऋषि-मुनि आपकी प्राप्ति के लिये निरन्तर आपका स्तवन, चन्दन, पूजन और ध्यान किया करते हैं ॥ ४२ ॥

प्रभो ! जीव के चारों ओर भय-ही-भय का बोलवाला है । औरों की तो बात ही क्या, आपके कालरूप से स्वयं ब्रह्मा भी अत्यन्त भयभीत रहते हैं, क्योंकि उनकी आयु भी सीमित केवल दो परार्ध की हैं । फिर उनके बनाये हुए भौतिक शरीरवाले प्राणियों के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है । ऐसी अवस्था में आपके चरणकमलो की शरण ग्रहण करने के अतिरिक्त और कोई भी परम कल्याण तथा सुख-शान्ति का उपाय हमारी समझ में नहीं आता; क्योंकि आप स्वयं ही मोक्षस्वरूप हैं ॥ ४३ ॥ भगवन् ! आप समस्त जीवों के परम गुरु, सबसे श्रेष्ठ और सत्य ज्ञानस्वरूप हैं । इसलिये आत्मस्वरूप को ढक देनेवाले देह-गेह आदि निष्फल, असत्य, नाशवान् और प्रतीतिमात्र पदार्थों का त्याग कर मैं आपके चरणकमलों की ही शरण ग्रहण करता हूँ । कोई भी प्राणी यदि आपकी शरण ग्रहण कर लेता है, तो वह उससे अपने सारे अभीष्ट पदार्थ प्राप्त कर लेता है ॥ ४४ ॥ जीव के परम सुहद् प्रभो ! यद्यपि सत्त्व, रज और तम — ये तीनों गुण आपकी ही मूर्ति हैं — इन्हीं के द्वारा आप जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, लय आदि अनेकों मायामयी लीलाएँ करते हैं फिर भी आपको सत्वगुणमयी मूर्ति ही जीवों को शान्ति प्रदान करती है । रजोगुणी और तमोगुणी मूर्तियों से जीवों को शान्ति नहीं मिल सकती । उनसे तो दुःख, मोह और भय की वृद्धि ही होती है ॥ ४५ ॥

भगवन् ! इसलिये बुद्धिमान् पुरुष आपकी और आपके भक्तों की परम प्रिय एवं शुद्ध मूर्ति नर-नारायण की ही उपासना करते हैं । पाञ्चरात्र-सिद्धान्त के अनुयायी विशुद्ध सत्त्व को ही आपका श्रीविग्रह मानते हैं । उसी की उपासना से आपके नित्यधाम वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है । उस धाम की यह विलक्षणता है कि वह लोक होने पर भी सर्वथा भयरहित और भोगयुक्त होनेपर भी आत्मानन्द से परिपूर्ण है । वे रजोगुण और तमोगुण की आपकी मूर्ति स्वीकार नहीं करते ॥ ४६ ॥ भगवन् ! आप अन्तर्यामी, सर्वव्यापक, सर्वस्वरूप, जगद्गुरु परमाराध्य और शुद्धस्वरूप हैं । समस्त लौकिक और वैदिक वाणी आपके अधीन है । आप ही वेदमार्ग के प्रवर्तक हैं । मैं आपके इस युगल स्वरूप नरोत्तम नर और ऋषिवर नारायण को नमस्कार करता हूँ ॥ ४५ ॥ आप यद्यपि प्रत्येक जीव की इन्द्रियों तथा उनके विषयों में, प्राणों में तथा हृदय में भी विद्यमान हैं तो भी आपकी माया से जीव की बुद्धि इतनी मोहित हो जाती हैं — ढक जाती है कि वह निष्फल और झूठी इन्द्रियों के जाल में फँसकर आपकी झाँकी से वञ्चित हो जाता है । किन्तु सारे जगत् के गुरु तो आप ही हैं । इसलिये पहले अज्ञानी होने पर भी जब आपकी कृपा से उसे आपके ज्ञान-भण्डार वेदों की प्राप्ति होती है, तब वह आपके साक्षात् दर्शन कर लेता है ॥ ४८ ॥ प्रभो ! वेद में आपका साक्षात्कार करानेवाला वह ज्ञान पूर्णरूप से विद्यमान है, जो आपके स्वरूप का रहस्य प्रकट करता है । ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े प्रतिभाशाली मनीषी उसे प्राप्त करने का यत्न करते रहने पर भी मोह में पड़ जाते हैं । आप भी ऐसे लीलाविहारी हैं कि विभिन्न मतवाले आपके सम्बन्ध में जैसा सोचते-विचारते हैं, वैसा ही शील-स्वभाव और रूप ग्रहण करके आप उनके सामने प्रकट हो जाते हैं । वास्तव में आप देह आदि समस्त उपाधियों में छिपे हुए विशुद्ध विज्ञानघन ही हैं । हे पुरुषोत्तम ! मैं आपकी वन्दना करता हूँ ॥ ४९ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

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