श्रीमद्भागवतमहापुराण – दशम स्कन्ध उत्तरार्ध – अध्याय ५०
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
पचासवाँ अध्याय
जरासन्ध से युद्ध और द्वारकापुरी का निर्माण

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — भरतवंशशिरोमणि परीक्षित् ! कंस की दो रानियाँ — अस्ति और प्राप्ति । पति की मृत्यु से उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे अपने पिता की राजधानी में चली गयीं ॥ १ ॥ उन दोनों का पिता था मगधराज जरासन्ध । उससे उन्होंने बड़े दुःख के साथ अपने विधवा होने के कारणों का वर्णन किया ॥ २ ॥ परीक्षित् ! यह अप्रिय समाचार सुनकर पहले तो जरासन्ध को बड़ा शोक हुआ, परन्तु पीछे वह क्रोध से तिलमिला उठा । उसने यह निश्चय करके कि मैं पृथ्वी पर एक भी यदुवंशी नहीं रहने दूँगा, युद्ध की बहुत बड़ी तैयारी की ॥ ३ ॥ और तेईस अक्षौहिणी सेना के साथ यदुवंशियों की राजधानी मथुरा को चारों ओर से घेर लिया ॥ ४ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा — जरासन्ध की सेना क्या है, उमड़ता हुआ समुद्र है । उन्होंने यह भी देखा कि उसने चारों ओर से हमारी राजधानी घेर ली है और हमारे स्वजन तथा पुरवासी भयभीत हो रहे हैं ॥ ५ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वी का भार उतारने के लिये ही मनुष्यका-सा वेष धारण किये हुए हैं । अब उन्होंने विचार किया कि मेरे अवतार का क्या प्रयोजन है और इस समय इस स्थान पर मुझे क्या करना चाहिये;॥ ६ ॥

उन्होंने सोचा, यह बड़ा अच्छा हुआ कि मगधराज जरासन्ध ने अपने अधीनस्थ नरपतियों की पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथियों से युक्त कई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी कर ली है । यह सब तो पृथ्वी का भार ही जुटकर मेरे पास आ पहुँचा है । मैं इसका नाश करूँगा । परन्तु अभी मगधराज जरासन्ध को नहीं मारना चाहिये; क्योंकि वह जीवित रहेगा तो फिर से असुरों की बहुत-सी सेना इकट्ठी कर लायेगा ॥ ७-८ ॥ मेरे अवतार का यही प्रयोजन हैं कि मैं पृथ्वी का बोझ हल्का कर दूँ, साधु-सज्जनों की रक्षा करूँ और दुष्ट-दुर्जनों का संहार ॥ ९ ॥ समय-समय पर धर्म-रक्षा के लिये और बढ़ते हुए अधर्म को रोकने के लिये मैं और भी अनेकों शरीर ग्रहण करता हूँ ॥ १० ॥

परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि आकाश से सूर्य के समान चमकते हुए दो रथ आ पहुँचे । उनमें युद्ध की सारी सामग्रियाँ सुसज्जित थीं और दो सारथि उन्हें हाँक रहे थे ॥ ११ ॥ इसी समय भगवान् के दिव्य और सनातन आयुध भी अपने आप वहाँ आकर उपस्थित हो गये । उन्हें देखकर भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने बड़े भाई बलरामजी से कहा — ॥ १२ ॥ ‘भाईजी ! आप बड़े शक्तिशाली हैं । इस समय जो यदुवंशी आपको ही अपना स्वामी और रक्षक मानते हैं, जो आप से ही सनाथ हैं, उन पर बहुत बड़ी विपत्ति आ पड़ी है । देखिये, यह आपका रथ है और आपके प्यारे आयुध हल-मूसल भी आ पहुँचे हैं ॥ १३ ॥ अब आप इस रथ पर सवार होकर शत्रु-सेना का संहार कीजिये और अपने स्वजनों को इस विपत्ति से बचाइये । भगवन् ! साधुओं का कल्याण करने के लिये ही हम दोनों ने अवतार ग्रहण किया है ॥ १४ ॥ अतः अब आप यह तेईस अक्षौहिणी सेना, पृथ्वी का यह विपुल भार नष्ट कीजिये । भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी ने यह सलाह करके कवच धारण किये और रथ पर सवार होकर वे मथुरा से निकले । उस समय दोनों भाई अपने-अपने आयुध लिये हुए थे और छोटी-सी सेना उनके साथ-साथ चल रही थी । श्रीकृष्ण का रथ हाँक रहा था दारुक । पुरी से बाहर निकलकर उन्होंने अपना पाञ्चजन्य शङ्ख बजाया ॥ १५-१६ ॥ उनके शङ्ख की भयङ्कर ध्वनि सुनकर शत्रुपक्ष की सेना के वीरों का हृदय डर के मारे थर्रा उठा । उन्हें देखकर मगधराज जरासन्ध ने कहा — ‘पुरुषाधम कृष्ण ! तू तो अभी निरा बच्चा है । अकेले तेरे साथ लड़ने में मुझे लाज लग रही है । इतने दिनों तक तू न जाने कहाँ-कहाँ छिपा फिरता था । मन्द ! तू तो अपने मामा का हत्यारा है । इसलिये मैं तेरे साथ नहीं लड़ सकता । जा, मेरे सामने से भाग जा ॥ १७-१८ ॥ बलराम ! यदि तेरे चित्त में यह श्रद्धा हो कि युद्ध में मरने पर स्वर्ग मिलता है तो तू आ, हिम्मत बाँधकर मुझसे लड़ । मेरे बाणों से छिन्न-भिन्न हुए शरीर को यहाँ छोड़कर स्वर्ग में जा, अथवा यदि तुझमें शक्ति हो तो मुझे ही मार डाल’ ॥ १९ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — मगधराज ! जो शूरवीर होते हैं, वे तुम्हारी तरह डींग नहीं हाँकते, वे तो अपना बल-पौरुष ही दिखलाते हैं । देखो, अब तुम्हारी मृत्यु तुम्हारे सिर पर नाच रही है । तुम वैसे ही अक-बक कर रहे हो, जैसे मरने के समय कोई सन्निपात का रोगी करे । बक लो, मैं तुम्हारी बात पर ध्यान नहीं देता ॥ २० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! जैसे वायु बादलों से सूर्य को और धूएँ से आग को ढक लेती है, किन्तु वास्तव में वे ढकते नहीं, उनका प्रकाश फिर फैलता ही है; वैसे ही मगधराज जरासन्ध ने भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम के सामने आकर अपनी बहुत बड़ी बलवान् और अपार सेना के द्वारा उन्हें चारों ओर से घेर लिया — यहाँ तक कि उनकी सेना, रथ, ध्वजा, घोड़ों और साथियों का दीखना भी बंद हो गया ॥ २१ ॥ मथुरापुरी की स्त्रियाँ अपने महलों की अटारियों, छज्जों और फाटकों पर चढ़कर युद्ध का कौतुक देख रही थीं । जब उन्होंने देखा कि युद्ध भूमि में भगवान् श्रीकृष्ण की गरुड़चिह्न से चिह्नित और बलरामजी की तालचिह्न से चिह्नित ध्वजावाले रथ नहीं दीख रहे हैं, तब वे शोक के आवेग से मूर्च्छित हो गयीं ॥ २२ ॥ जब भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि शत्रु-सेना के वीर हमारी सेना पर इस प्रकार बाणों की वर्षा कर रहे हैं, मानो बादल पानी की अनगिनत बूंदें बरसा रहे हों और हमारी सेना उससे अत्यन्त पीड़ित व्यथित हो रही है, तब उन्होंने अपने देवता और असुर — दोनों से सम्मानित शार्ङ्गधनुष का टङ्कार किया ॥ २३ ॥ इसके बाद वे तरकस में से बाण निकालने, उन्हें धनुष पर चढ़ाने और धनुष की डोरी खींचकर झुंड-के-झुंड बाण छोड़ने लगे । उस समय उनका वह धनुष इतनी फुर्ती से घूम रहा था, मानो कोई बड़े वेग से अलातचक्र (लुकारी) घुमा रहा हो । इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण जरासन्ध की चतुरङ्गिणी — हाथी, घोड़े, रथ और पैदलसेना का संहार करने लगे ॥ २४ ॥

इससे बहुत-से हाथियों के सिर फट गये और वे मर-मरकर गिरने लगे । बाणों की बौछार से अनेकों घोड़ों के सिर धड़ से अलग हो गये । घोड़े, ध्वजा, सारथि और रथियों के नष्ट हो जाने से बहुत-से रथ बेकाम हो गये । पैदल सेना की बाँहें, जाँघ और सिर आदि अंग-प्रत्यङ्ग कट-कटकर गिर पड़े ॥ २५ ॥ उस युद्ध में अपार तेजस्वी भगवान् बलरामजी ने अपने मूसल की चोट से बहुत-से मतवाले शत्रुओं को मार-मारकर उनके अङ्ग-प्रत्यङ्ग से निकले हुए खून की सैकड़ों नदियाँ बहा दीं । कहीं मनुष्य कट रहे हैं तो कहीं हाथी और घोड़े छटपटा रहे हैं । उन नदियों में मनुष्यों की भुजाएँ साँप के समान जान पड़ती और सिर इस प्रकार मालूम पड़ते, मानो कछुओं की भीड़ लग गयी हो । मरे हुए हाथी दीप — जैसे और घोड़े ग्राहों के समान जान पड़ते । हाथ और जाँघ मछलियों की तरह, मनुष्यों के केश सेवार के समान, धनुष तरङ्गों की भाँति और अस्त्र-शस्त्र लता एवं तिनकों के समान जान पड़ते । ढालें ऐसी मालूम पड़तीं, मानो भयानक भँवर हों । बहुमूल्य मणियाँ और आभूषण पत्थर के रोड़ों तथा कंकड़ों के समान बहे जा रहे थे । उन नदियों को देखकर कायर पुरुष डर रहे थे और वीरों का आपस में खूब उत्साह बढ़ रहा था ॥ २६-२८ ॥

परीक्षित् ! जरासन्ध की वह सेना समुद्र के समान दुर्गम, भयावह और बड़ी कठिनाई से जीतने योग्य थी । परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी ने थोड़े ही समय में उसे नष्ट कर डाला । वे सारे जगत् के स्वामी हैं । उनके लिये एक सेना का नाश कर देना केवल खिलवाड़ हीं तो हैं ॥ २९ ॥ परीक्षित् ! भगवान् के गुण अनन्त हैं । वे खेल-खेल में ही तीनों लोकों की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हैं । उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है कि वे शत्रुओं की सेना का इस प्रकार बात-की-बात में सत्यानाश कर दें । तथापि जब वे मनुष्यका-सा वेष धारण करके मनुष्यकी-सी लीला करते हैं, तब उसका भी वर्णन किया ही जाता है ॥ ३० ॥

इस प्रकार जरासन्ध की सारी सेना मारी गयी । रथ भी टूट गया । शरीर में केवल प्राण बाकी रहे । तब भगवान् श्रीबलरामजी ने जैसे एक सिंह दूसरे सिंह को पकड़ लेता है, वैसे ही बलपूर्वक महाबली जरासन्ध को पकड़ लिया ॥ ३१ ॥ जरासन्ध ने पहले बहुत से विपक्षी नरपतियों का वध किया था, परन्तु आज उसे बलरामजी वरुण की फाँसी और मनुष्यों के फंदे से बाँध रहे थे । भगवान् श्रीकृष्ण ने यह सोचकर कि यह छोड़ दिया जायगा तो और भी सेना इकट्ठी करके लायेगा तथा हम सहज ही पृथ्वी का भार उतार सकेंगे, बलरामजी को रोक दिया ॥ ३२ ॥ बड़े-बड़े शूरवीर जरासन्ध का सम्मान करते थे । इसलिये उसे इस बात पर बड़ी लज्जा मालूम हुई कि मुझे श्रीकृष्ण और बलराम ने दया करके दीन की भाँति छोड़ दिया है । अब उसने तपस्या करने का निश्चय किया । परन्तु रास्ते में उसके साथी नरपतियों ने बहुत समझाया कि ‘राजन् ! यदुवंशियों में क्या रखा है ? वे आपको बिल्कुल ही पराजित नहीं कर सकते थे । आपको प्रारब्धवश ही नीचा देखना पड़ा है ।’ उन लोगों ने भगवान् की इच्छा, फिर विजय प्राप्त करने की आशा आदि बतलाकर तथा लौकिक दृष्टान्त एवं युक्तियाँ दे-देकर यह बात समझा दी कि आपको तपस्या नहीं करनी चाहिये ॥ ३३-३४ ॥

परीक्षित् ! उस समय मगधराज जरासन्ध की सारी सेना मर चुकी थी । भगवान् बलरामजी ने उपेक्षापूर्वक उसे छोड़ दिया था, इससे वह बहुत उदास होकर अपने देश मगध को चला गया ॥ ३५ ॥ परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण की सेना में किसी का बाल भी बाँका न हुआ और उन्होंने जरासन्ध की तेईस अक्षौहिणी सेना पर, जो समुद्र के समान थी, सहज ही विजय प्राप्त कर ली । उस समय बड़े-बड़े देवता उन पर नन्दनवन के पुष्पों की वर्षा और उनके इस महान् कार्य का अनुमोदन–प्रशंसा कर रहे थे ॥ ३६ ॥ जरासन्ध की सेना के पराजय से मथुरावासी भयरहित हो गये थे और भगवान् श्रीकृष्ण की विजय से उनका हृदय आनन्द से भर रहा था । भगवान् श्रीकृष्ण आकर उनमें मिल गये । सूत, मागध और वन्दीजन उनकी विजय के गीत गा रहे थे ॥ ३७ ॥ जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण ने नगर में प्रवेश किया, उस समय वहाँ शङ्ख नगारे, भेरी, तुरही, वीणा, बाँसुरी और मृदङ्ग आदि बाजे बजने लगे थे ॥ ३८ ॥

मथुरा की एक-एक सड़क और गली में छिड़काव कर दिया गया था । चारों ओर हँसते-खेलते नागरिकों की चहल-पहल थी । सारा नगर छोटी-छोटी झंडियों और बड़ी-बड़ी विजय-पताकाओं से सजा दिया गया था । ब्राह्मणों की वेदध्वनि पूँज रहीं थीं और सब ओर आनन्दोत्सव के सूचक बंदनवार बाँध दिये गये थे ॥ ३९ ॥ जिस समय श्रीकृष्ण नगर में प्रवेश कर रहे थे, उस समय नगर की नारियाँ प्रेम और उत्कण्ठा से भरे हुए नेत्रों से उन्हें स्नेहपूर्वक निहार रही थीं और फूलों के हार, दही, अक्षत और जौ आदि के अङ्कुरों की उनके ऊपर वर्षा कर रही थीं ॥ ४० ॥ भगवान् श्रीकृष्ण रणभूमि से अपार धन और वीरों के आभूषण ले आये थे । वह सब उन्होंने यदुवंशियों के राजा उग्रसेन के पास भेज दिया ॥ ४१ ॥

परीक्षित् ! इस प्रकार सत्रह बार तेईस तेईस अक्षौहिणी सेना इकट्ठी करके मगधराज जरासन्ध ने भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा सुरक्षित यदुवंशियों से युद्ध किया ॥ ४२ ॥ किन्तु यादवों ने भगवान् श्रीकृष्ण की शक्ति से हर बार उसकी सारी सेना नष्ट कर दी । जब सारी सेना नष्ट हो जाती, तब यदुवंशियों के उपेक्षापूर्वक छोड़ देने पर जरासन्ध अपनी राजधानी में लौट जाता ॥ ४३ ॥ जिस समय अठारहवाँ संग्राम छिड़ने ही वाला था, उसी समय नारदजी का भेजा हुआ वीर कालयवन* दिखायी पड़ा ॥ ४४ ॥ युद्ध में कालयवन के सामने खड़ा होनेवाला वीर संसार में दूसरा कोई न था । उसने जब यह सुना कि यदुवंशी हमारे ही-जैसे बलवान् हैं और हमारा सामना कर सकते हैं, तब तीन करोड़ म्लेच्छों की सेना लेकर उसने मथुरा को घेर लिया ॥ ४५ ॥

कालयवन की यह असमय चढ़ाई देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने बलरामजी के साथ मिलकर विचार किया ‘अहो ! इस समय तो यदुवंशियों पर जरासन्ध और कालयवन —ये दो-दो विपत्तियों एक साथ ही मँडरा रही हैं ॥ ४६ ॥ आज इस परम बलशाली यवन ने हमें आकर घेर लिया है और जरासन्ध भी आज, कल या परसों में आ ही जायगा ॥ ४७ ॥ यदि हम दोनों भाई इसके साथ लड़ने में लग गये और उसी समय जरासन्ध आ पहुँचा, तो वह हमारे बन्धुओं को मार डालेगा या तो कैद करके अपने नगर में ले जायगा; क्योंकि वह बहुत बलवान् है ॥ ४८ ॥ इसलिये आज हमलोग एक ऐसा दुर्ग — ऐसा किला बनायेंगे, जिसमें किसी भी मनुष्य का प्रवेश करना अत्यन्त कठिन होगा । अपने स्वजन-सम्बन्धियों को उसी किले में पहुँचाकर फिर इस यवन का वध करायेंगे’ ॥ ४९ ॥

बलरामजी से इस प्रकार सलाह करके भगवान् श्रीकृष्ण ने समुद्र के भीतर एक ऐसा दुर्गम नगर बनवाया, जिसमें सभी वस्तुएँ अद्भुत थीं और उस नगर की लंबाई-चौड़ाई अड़तालीस कोस की थी ॥ ५० ॥ उस नगर की एक-एक वस्तु विश्वकर्मा का विज्ञान (वास्तुविज्ञान) और शिल्पकला की निपुणता प्रकट होती थी । उसमें वास्तुशास्त्र के अनुसार बड़ी-बड़ी सड़कों, चौराहों और गलियों का यथास्थान ठीक-ठीक विभाजन किया गया था ॥ ५१ ॥ वह नगर ऐसे सुन्दर-सुन्दर उद्यानों और विचित्र-विचित्र उपवनों से युक्त था, जिनमें देवताओं के वृक्ष और लताएँ लहलहाती रहती थीं । सोने के इतने ऊँचे-ऊँचे शिखर थे, जो आकाश से बातें करते थे । स्फटिकमणि की अटारियाँ और ऊँचे-ऊँचे दरवाजे बड़े ही सुन्दर लगते थे ॥ ५२ ॥ अन्न रखने के लिये चाँदी और पीतल के बहुत-से कोठे बने हुए थे । वहाँ के महल सोने के बने हुए थे और उनपर कामदार सोने के कलश सजे हुए थे । उनके शिखर रत्नों के थे तथा गच पन्ने की बनी हुई बहुत भली मालूम होती थी ॥ ५३ ॥ इसके अतिरिक्त उस नगर में वास्तुदेवता के मन्दिर और छज्जे भी बहुत सुन्दर-सुन्दर बने हुए थे । उसमें चारों वर्ण के लोग निवास करते थे और सबके बीच में यदुवंशियों के प्रधान उग्रसेनजी, वसुदेवजी, बलरामजी तथा भगवान् श्रीकृष्ण के महल जगमगा रहे थे ॥ ५४ ॥

परीक्षित् ! उस समय देवराज इन्द्र ने भगवान् श्रीकृष्ण के लिये पारिजात वृक्ष और सुधर्मा-सभा को भेज दिया । वह सभा ऐसी दिव्य थी कि उसमें बैठे हुए मनुष्य को भूख-प्यास आदि मर्त्यलोक के धर्म नहीं छू पाते थे ॥ ५५ ॥ वरुणजी ने ऐसे बहुत से श्वेत घोड़े भेज दिये, जिनका एक-एक कान श्यामवर्ण का था, और जिनकी चाल मन के समान तेज थी । धनपति कुबेरजी ने अपनी आठों निधियाँ भेज दीं और दूसरे लोकपालों ने भी अपनी-अपनी विभूतियाँ भगवान् के पास भेज दीं ॥ ५६ ॥ परीक्षित् ! सभी लोकपालों को भगवान् श्रीकृष्ण ने ही उनके अधिकार के निर्वाह के लिये शक्तियाँ और सिद्धियाँ दी हैं । जब भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर लीला करने लगे, तब सभी सिद्धियाँ उन्होंने भगवान् के चरणों में समर्पित कर दी ॥ ५७ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने समस्त स्वजन-सम्बन्धियों को अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमाया के द्वारा द्वारका में पहुँचा दिया । शेष प्रजा की रक्षा के लिये बलरामजी को मथुरापुरी में रख दिया और उनसे सलाह लेकर गले में कमलों की माला पहने, बिना कोई अस्त्र-शस्त्र लिये स्वयं नगर के बड़े दरवाजे से बाहर निकल आये ॥ ५८ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

* कालयवन ऋषि शेशिरायण का पुत्र था। ऋषि शेशिरायण त्रिगत राज्य के कुलगुरु थे। वे ‘गर्ग गोत्र’ के थे। एक बार वे किसी सिद्धि की प्राप्ति के लिए अनुष्ठान कर रहे थे, जिसके लिए 12 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करना था। उन्हीं दिनों एक गोष्ठी में किसी ने उन्हें ‘नपुंसक’ कह दिया जो उन्हें चुभ गया। उन्होंने निश्चय किया कि उन्हें ऐसा पुत्र होगा जो अजेय हो, कोई योद्धा उसे जीत न सके। इसलिए वे शिव के तपस्या में लग गए। भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हो गए और कहा- “हे मुनि! हम प्रसन्न हैं, जो मांगना है मांगो।” मुनि ने कहा- “मुझे ऐसा पुत्र दें जो अजेय हो, जिसे कोई हरा न सके। सारे शस्त्र निस्तेज हो जायें। कोई उसका सामना न कर सके।” “तुम्हारा पुत्र संसार में अजेय होगा। किसी भी अस्त्र-शस्त्र से उसकी हत्या नहीं होगी। सूर्यवंशी या चंद्रवंशी कोई योद्धा उसे परास्त नहीं कर पायेगा। यह वरदान मांगने के पीछे तुम्हारे भोग विलास की इच्छा छिपी हुई है। हमारे वरदान से तुम्हें राजसी वैभव प्राप्त होगा।” वरदान देने के पश्चात् शिव अंतर्ध्यान हो गए। उसके बाद ऋषि शेशिरायण का शरीर अति सुन्दर हो गया। वरदान प्राप्ति के पश्चात् ऋषि शेशिरायण एक झरने के पास से जा रहे थे कि उन्होंने एक स्त्री को जल क्रीडा करते देखा जो अप्सरा रम्भा थी। दोनों एक दूसरे पर मोहित हो गए और उनका पुत्र कालयवन हुआ। रम्भा समय समाप्ति पर स्वर्गलोक वापस चली गयी और अपना पुत्र ऋषि को सौंप गयी। रम्भा के जाते ही ऋषि का मन पुन: भक्ति में लग गया।
वीर प्रतापी राजा काल जंग मलीच देश पर राज करता था। समस्त राजा उससे डरते थे। उसे कोई संतान न थी, जिसके कारण वह परेशान रहता था। उसका मंत्री उसे आनंदगिरी पर्वत के बाबा के पास ले गया। उन्होंने उसे बताया की वह ऋषि शेशिरायण से उनका पुत्र मांग ले। ऋषि शेशिरायण पहले तो नहीं माने, पर जब उन्हें बाबा की वाणी और यह कि उन्हें शिव के वरदान के बारे में पता था, यह सुन उन्होंने अपने पुत्र को काल जंग को दे दिया। इस प्रकार कालयवन यवन देश का राजा बना। उसके समान वीर कोई नहीं था। एक बार उसने नारद से पूछा कि वह किससे युद्ध करे, जो उसके समान वीर हो। नारद ने उसे श्री कृष्ण का नाम बताया।

 

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