श्रीमद्भागवतमहापुराण – दशम स्कन्ध उत्तरार्ध – अध्याय ६९
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
उनहत्तरवाँ अध्याय
देवर्षि नारदजी का भगवान् की गृहचर्या देखना

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! जब देवर्षि नारद ने सुना कि भगवान् श्रीकृष्ण ने नरकासुर (भौमासुर) को मारकर अकेले ही हजारों राजकुमारियों के साथ विवाह कर लिया है, तब उनके मन में भगवान् की रहन-सहन देखने की बड़ी अभिलाषा हुई ॥ १ ॥ वे सोचने लगे — अहो, यह कितने आश्चर्य की बात है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने एक ही शरीर से एक ही समय सोलह हज़ार महलों में अलग-अलग सोलह हजार राजकुमारियों का पाणिग्रहण किया ॥ २ ॥ देवर्षि नारद इस उत्सुकता से प्रेरित होकर भगवान् की लीला देखने के लिये द्वारका आ पहुँचे । वहाँ के उपवन और उद्यान खिले हुए रंग-बिरंगे पुष्पों से लदे वृक्षों से परिपूर्ण थे, उन पर तरह-तरह के पक्षी चहक रहे थे और भौंरें गुजार कर रहे थे ॥ ३ ॥ निर्मल जल से भरे सरोवरों में नीले, लाल और सफेद रंग के भाँति-भाँति के कमल खिले हुए थे । कुमुद (कोई) और नवजात कमलों की मानो भीड़ ही लगी हुई थी । उनमें हंस और सारस कलरव कर रहे थे ॥ ४ ॥ द्वारकापुरी में स्फटिकमणि और चाँदी के नौ लाख महल थे । वे फर्श आदि में जड़ी हुई महामरकतमणि (पन्ने) की प्रभा से जगमगा रहे थे और उनमें सोने तथा हीरों की बहुत-सी सामग्रियाँ शोभायमान थीं ॥ ५ ॥ उसके राजपथ (बड़ी-बड़ी सड़के), गलियाँ, चौराहे और बाजार बहुत ही सुन्दर-सुन्दर थे । घुड़साल आदि पशुओं के रहने के स्थान, सभा-भवन और देव-मन्दिरों के कारण उसका सौन्दर्य और भी चमक उठा था । उसकी सड़कों, चौक, गली और दरवाजों पर छिड़काव किया गया था । छोटी-छोटी झंडियाँ और बड़े-बड़े झंडे जगह-जगह फहरा रहे थे, जिनके कारण रास्तों पर धूप नहीं आ पाती थी ॥ ६ ॥

उसी द्वारकानगरी में भगवान् श्रीकृष्ण का बहुत ही सुन्दर अन्तःपुर था । बड़े-बड़े लोकपाल उसकी पूजा-प्रशंसा किया करते थे । उसका निर्माण करने में विश्वकर्मा ने अपना सारा कला-कौशल, सारी कारीगरी लगा दी थी ॥ ७ ॥ उस अन्तःपुर (रनिवास) में भगवान् की रानियों के सोलह हजार से अधिक महल शोभायमान थे, उनमें से एक बड़े भवन में देवर्षि नारदजी ने प्रवेश किया ॥ ८ ॥ उस महल में मुँगों के खंभे, वैदूर्य के उत्तम-उत्तम छज्जे तथा इन्द्रनील-मणि की दीवारें जगमगा रही थीं और वहाँ की गचें भी ऐसी इन्द्रनीलमणियों से बनी हुई थीं, जिनकी चमक किसी प्रकार कम नहीं होती ॥ ९ ॥ विश्वकर्मा ने बहुत-से ऐसे चँदोवे बना रखे थे, जिनमें मोती की लड़ियों की झालरें लटक रहीं थीं । हाथी-दाँत के बने हुए आसन और पलँग थे, जिनमें श्रेष्ठ-श्रेष्ठ मणि जड़ी हुई थी ॥ १० ॥ बहुत-सी दासियाँ गले में सोने का हार पहने और सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित होकर तथा बहुत-से सेवक भी जामा-पगड़ी और सुन्दर-सुन्दर वस्त्र पहने तथा जड़ाऊ कुण्डल धारण किये अपने-अपने काम में व्यस्त थे और महल की शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ११ ॥

अनेकों रत्न-प्रदीप अपनी जगमगाहट से उसका अन्धकार दूर कर रहे थे । अगर की धूप देने के कारण झरोखों से धूआँ निकल रहा था । उसे देखकर रंग-बिरंगे मणिमय छज्जों पर बैठे हुए मोर बादलों के भ्रम से कूक-कूककर नाचने लगते ॥ १२ ॥ देवर्षि नारदजी ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण उस महल की स्वामिनी रुक्मिणीजी के साथ बैठे हुए हैं और वे अपने हाथों भगवान् को सोने की डाँड़ीवाले चँवर से हवा कर रही हैं । यद्यपि उस महल में रुक्मिणीजी के समान ही गुण, रूप, अवस्था और वेष-भूषावाली सहस्रों दासियाँ भी हर समय विद्यमान रहती थीं ॥ १३ ॥

नारदजी को देखते ही समस्त धार्मिकों के मुकुटमणि भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीजी के पलँग से सहसा उठ खड़े हुए । उन्होंने देवर्षि नारद के युगलचरणों में मुकुट-युक्त सिर से प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उन्हें अपने आसन पर बैठाया ॥ १४ ॥ परीक्षित् ! इसमें सन्देह नहीं कि भगवान् श्रीकृष्ण चराचर जगत् के परम गुरु हैं और उनके चरणों का धोवन गङ्गाजल सारे जगत् को पवित्र करनेवाला है । फिर भी वे परम-भक्त-वत्सल और संतों के परम आदर्श, उनके स्वामी हैं । उनका एक असाधारण नाम ‘ब्रह्मण्यदेव’ भी हैं । वे ब्राह्मणों को ही अपना आराध्यदेव मानते हैं । उनका यह नाम उनके गुण के अनुरूप एवं उचित ही हैं । तभी तो भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं ही नारदजी के पाँव पखारे और उनका चरणामृत अपने सिर पर धारण किया ॥ १५ ॥ नर-शिरोमणि नर के सखा सर्वदर्शी पुराण-पुरुष भगवान् नारायण ने शास्त्रोक्त विधि से देवर्षि-शिरोमणि भगवान् नारद की पूजा की । इसके बाद अमृत से भी मीठे किन्तु थोड़े शब्दों में उनका स्वागत-सत्कार किया और फिर कहा — “प्रभो ! आप तो स्वयं समग्र ज्ञान, वैराग्य, धर्म, यश, श्री और ऐश्वर्य से पूर्ण हैं । आपकी हम क्या सेवा करे’ ? ॥ १६ ॥

देवर्षि नारद ने कहा — भगवन् ! आप समस्त लोकों के एकमात्र स्वामी हैं । आपके लिये यह कोई नयी बात नहीं है कि आप अपने भक्तजनों से प्रेम करते हैं और दुष्टों को दण्ड देते हैं । परमयशस्वी प्रभो ! आपने जगत् की स्थिति और रक्षा के द्वारा समस्त जीवों का कल्याण करने के लिये स्वेच्छा से अवतार ग्रहण किया है । भगवन् ! यह बात हम भली-भाँति जानते हैं ॥ १७ ॥ यह बड़े सौभाग्य की बात है कि आज मुझे आपके चरणकमलों के दर्शन हुए हैं । आपके ये चरणकमल सम्पूर्ण जनता को परम साम्य, मोक्ष देने में समर्थ हैं । जिनके ज्ञान की कोई सीमा ही नहीं है, वे ब्रह्मा, शङ्कर आदि सदा-सर्वदा अपने हृदय में उनका चिन्तन करते रहते हैं । वास्तव में वे श्रीचरण ही संसाररूप कुएँ में गिरे हुए लोगों को बाहर निकलने के लिये अवलम्बन हैं । आप ऐसी कृपा कीजिये कि आपके उन चरणकमलों की स्मृति सर्वदा बनी रहे और मैं चाहे जहाँ जैसे रहूँ, उनके ध्यान में तन्मय रहूँ ॥ १८ ॥

परीक्षित् ! इसके बाद देवर्षि नारदजी योगेश्वरों के भी ईश्वर भगवान् श्रीकृष्ण की योगमाया का रहस्य जानने के लिये उनकी दूसरी पत्नी के महल में गये ॥ १९ ॥ वहाँ उन्होंने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्राणप्रिया और उद्धवजी के साथ चौसर खेल रहे हैं । यहाँ भी भगवान् ने खड़े होकर उनका स्वागत किया, आसन पर बैठाया और विविध सामग्रियों द्वारा बड़ी भक्ति से उनकी अर्चा-पूजा की ॥ २० ॥ इसके बाद भगवान् ने नारदजी से अनजान की तरह पूछा — ‘आप यहाँ कब पधारे ! आप तो परिपूर्ण आत्माराम-आप्तकाम हैं और हमलोग हैं अपूर्ण । ऐसी अवस्था में भला हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं ॥ २१ ॥ फिर भी ब्रह्मस्वरूप नारदजी ! आप कुछ-न-कुछ आज्ञा अवश्य कीजिये और हमें सेवा का अवसर देकर हमारा जन्म सफल कीजिये ।’ नारदजी यह सब देख-सुनकर चकित और विस्मित हो रहे थे । वे वहाँ से उठकर चुपचाप दूसरे महल में चले गये ॥ २२ ॥ उस महल में भी देवर्षि नारद ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपने नन्हे-नन्हे-बच्चों को दुलार रहे हैं । वहाँ से फिर दूसरे महल में गये तो क्या देखते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण स्नान की तैयारी कर रहे हैं ॥ २३ ॥ (इस प्रकार देवर्षि नारद ने विभिन्न महलों में भगवान् को भिन्न-भिन्न कार्य करते देखा ।) कहीं वे यज्ञ-कुण्डों में हवन कर रहे हैं तो कहीं पञ्चमहायज्ञों से देवता आदि की आराधना कर रहे हैं । कहीं ब्राह्मणों को भोजन करा रहे हैं, तो कहीं यज्ञ का अवशेष स्वयं भोजन कर रहे हैं ॥ २४ ॥

कहीं सन्ध्या कर रहे हैं, तो कहीं मौन होकर गायत्री का जप कर रहे हैं । कहीं हाथों में ढाल-तलवार लेकर उनको चलाने के पैंतरे बदल रहे हैं ॥ २५ ॥ कहीं घोड़े, हाथी अथवा रथ पर सवार होकर श्रीकृष्ण विचरण कर रहे हैं । कहीं पलंग पर सो रहे हैं, तो कहीं वंदीज़न उनकी स्तुति कर रहे हैं ॥ २६ ॥ किसी महल में उद्धव आदि मन्त्रियों के साथ किसी गम्भीर विषय पर परामर्श कर रहे हैं, तो कहीं उत्तमोत्तम वाराङ्गनाओं से घिरकर जलक्रीडा कर रहे हैं ॥ २७ ॥ कहीं श्रेष्ठ ब्राह्मणों को वस्त्राभूषण से सुसज्जित गौओं का दान कर रहे हैं, तो कहीं मङ्गलमय इतिहास-पुराणों का श्रवण कर रहे हैं ॥ २८ ॥ कहीं किसी पत्नी के महल में अपनी प्राणप्रिया के साथ हास्य-विनोद की बातें करके हँस रहे हैं । तो कहीं धर्म का सेवन कर रहे हैं । कहीं अर्थ का सेवन कर रहे हैं — धन-संग्रह और धनवृद्धि के कार्य में लगे हुए हैं, तो कहीं धर्मानुकूल गृहस्थोचित विषयों का उपभोग कर रहे हैं ॥ २९ ॥ कहीं एकान्त में बैठकर प्रकृति से अतीत पुराण-पुरुष का ध्यान कर रहे हैं, तो कहीं गुरुजन को इच्छित भोग-सामग्री समर्पित करके उनकी सेवा-शुश्रूषा कर रहे हैं ॥ ३० ॥

देवर्षि नारद ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण किसी के साथ युद्ध की बात कर रहे हैं, तो किसी के साथ सन्धि की । कहीं भगवान् बलरामजी के साथ बैठकर सत्पुरुषों के कल्याण के बारे में विचार कर रहे हैं ॥ ३१ ॥ कहीं उचित समय पर पुत्र और कन्याओं का उनके सदृश पत्नी और वरों के साथ बड़ी धूमधाम से विधिवत् विवाह कर रहे हैं ॥ ३२ ॥ कहीं घर से कन्याओं को विदा कर रहे हैं, तो कहीं बुलाने की तैयारी में लगे हुए हैं । योगेश्वरेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण के इन विराट् उत्सव को देखकर सभी लोग विस्मित-चकित हो जाते थे ॥ ३३ ॥ कहीं बड़े-बड़े यज्ञों के द्वारा अपनी कलारूप देवताओं का यजन-पूजन और कहीं कुएँ, बगीचे तथा मठ आदि बनवाकर इष्टापूर्त धर्म का आचरण कर रहे हैं ॥ ३४ ॥ कहीं श्रेष्ठ यादवों से घिरे हुए सिन्धुदेशीय घोडे पर चढ़कर मृगया कर रहे हैं, और उसमें यज्ञ के लिये मेध्य पशुओं का ही वध कर रहे हैं ॥ ३५ ॥ और कहीं प्रजा में तथा अन्तःपुर के महलों में वेष बदलकर छिपे रूप से सबका अभिप्राय जानने के लिये विचरण कर रहे हैं । क्यों न हो, भगवान् योगेश्वर जो हैं ॥ ३६ ॥

परीक्षित् ! इस प्रकार मनुष्यकी-सी लीला करते हुए हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्ण की योगमाया का वैभव देखकर देवर्षि नारदजी ने मुसकराते हुए उनसे कहा — ॥ ३७ ॥ योगेश्वर ! आत्मदेव ! आपकी योगमाया ब्रह्माजी आदि बड़े-बड़े मायावियों के लिये भी अगम्य है । परन्तु हम आपकी योगमाया का रहस्य जानते हैं, क्योंकि आपके चरणकमलों की सेवा करने से वह स्वयं ही हमारे सामने प्रकट हो गयी है ॥ ३८ ॥ देवताओं के भी आराध्यदेव भगवन् ! चौदहों भुवन आपके सुयश से परिपूर्ण हो रहे हैं । अब मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं आपकी त्रिभुवनपावनी लीला का गान करता हुआ उन लोकों में विचरण करूँ’ ॥ ३९ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — देवर्षि नारदजी ! मैं ही धर्म का उपदेशक, पालन करनेवाला और उसका अनुष्ठान करनेवालों का अनुमोदनकर्ता भी हूँ । इसलिये संसार को धर्म की शिक्षा देने के उद्देश्य से ही मैं इस प्रकार धर्म का आचरण करता हूँ । मेरे प्यारे पुत्र ! तुम मेरी यह योगमाया देखकर मोहित मत होना ॥ ४० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण गृहस्थों को पवित्र करनेवाले श्रेष्ठ धर्मों का आचरण कर रहे थे । यद्यपि वे एक ही हैं, फिर भी देवर्षि नारदजी ने उनको उनकी प्रत्येक पत्नी के महल में अलग-अलग देखा ॥ ४१ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण की शक्ति अनन्त है । उनकी योगमाया का परम ऐश्वर्य बार-बार देखकर देवर्षि नारद के विस्मय और कौतूहल की सीमा न रही ॥ ४२ ॥ द्वारका मे भगवान् श्रीकृष्ण गृहस्थ की भाँति ऐसा आचरण करते थे, मानो धर्म, अर्थ और कामरूप पुरुषार्थों में उनकी बड़ी श्रद्धा हो । उन्होंने देवर्षि नारद का बहुत सम्मान किया । वे अत्यन्त प्रसन्न होकर भगवान् का स्मरण करते हुए वहाँ से चले गये ॥ ४३ ॥ राजन् ! भगवान् नारायण सारे जगत् के कल्याण के लिये अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमाया को स्वीकार करते हैं और इस प्रकार मनुष्योंकी-सी लीला करते हैं । द्वारकापुरी में सोलह हजार से भी अधिक पत्नियां अपनी सलज्ज एवं प्रेमभरी चितवन तथा मन्द-मन्द मुसकान से उनकी सेवा करती थीं और वे उनके साथ विहार करते थे ॥ ४४ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने जो लीलाएँ की हैं, उन्हें दूसरा कोई नहीं कर सकता । परीक्षित् ! वे विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के परम कारण हैं । जो उनकी लीलाओं का गान, श्रवण और गान-श्रवण करनेवालों का अनुमोदन करता है, उसे मोक्ष के मार्गस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में परम प्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाती है ॥ ४५ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे एकोनसप्ततित्तमोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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