श्रीमद्भागवतमहापुराण – दशम स्कन्ध उत्तरार्ध – अध्याय ७०
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
सत्तरवाँ अध्याय
भगवान् श्रीकृष्ण की नित्यचर्या और उनके पास जरासन्ध के कैदी राजाओं के दूत का आना

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! जब सबेरा होने लगता, कुक्कुट (मुरगे) बोलने लगते, तब वे श्रीकृष्ण-पत्नियाँ, जिनके कण्ठ में श्रीकृष्ण ने अपनी भुजा डाल रखीं हैं, उनके विछोह की आशङ्का से व्याकुल हो जातीं और उन मुरगों को कोसने लगतीं ॥ १ ॥ उस समय पारिजात की सुगन्ध से सुवासित भीनी-भीनी वायु बहने लगती । भौंरें तालस्वर से अपनी सङ्गीत की तान छेड़ देते । पक्षियों की नींद उचट जाती और वे वंदीजनों की भाँति भगवान् श्रीकृष्ण को जगाने के लिये मधुर स्वर से कलरव करने लगते ॥ २ ॥ रुक्मिणीजी अपने प्रियतम के भुजपाश से बँधी रहने पर भी आलिङ्गन छूट जाने की आशङ्का से अत्यन्त सुहावने और पवित्र ब्राह्ममुहूर्त को भी असह्य समझने लगती थीं ॥ ३ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्त में ही उठ जाते और हाथ-मुँह धोकर अपने मायातीत आत्मस्वरूप का ध्यान करने लगते । उस समय उनका रोम-रोम आनन्द से खिल उठता था ॥ ४ ॥ परीक्षित् ! भगवान् का वह आत्मस्वरूप सजातीय, विजातीय और स्वगतभेद से रहित एक, अखण्ड है । क्योंकि उसमें किसी प्रकार की उपाधि या उपाधि के कारण होनेवाला अन्य वस्तु का अस्तित्व नहीं है । और यही कारण है कि वह अविनाशी सत्य है । जैसे चन्द्रमा-सूर्य आदि नेत्र-इन्द्रिय के द्वारा और नेत्र-इन्द्रिय चन्द्रमा-सूर्य आदि के द्वारा प्रकाशित होती है, वैसे वह आत्मस्वरूप दूसरे के द्वारा प्रकाशित नहीं, स्वयंप्रकाश है । इसका कारण यह है कि अपने स्वरूप में ही सदा-सर्वदा और काल की सीमा के परे भी एकरस स्थित रहने के कारण अविद्या उसका स्पर्श भी नहीं कर सकती । इससे प्रकाश्य-प्रकाशकभाव उसमें नहीं है । जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और नाश की कारणभूता ब्रह्मशक्ति, विष्णुशक्ति और रुद्रशक्तियों के द्वारा केवल इस बात का अनुमान हो सकता है कि वह स्वरूप एकरस सत्तारूप और आनन्द-स्वरूप है । उसी को समझाने के लिये ‘ब्रह्म’ नाम से कहा जाता है । भगवान् श्रीकृष्ण अपने उसी आत्मस्वरूप को प्रतिदिन ध्यान करते ॥ ५ ॥ इसके बाद वे विधिपूर्वक निर्मल और पवित्र जल में स्नान करते । फिर शुद्ध धोती पहनकर, दुपट्टा ओढ़कर यथाविधि नित्यकर्म सन्ध्या-वन्दन आदि करते । इसके बाद हवन करते और मौन होकर गायत्री का जप करते । क्यों न हो, वे सत्पुरुषों के पात्र आदर्श जो हैं ॥ ६ ॥ इसके बाद सूर्योदय होने के समय सूर्योपस्थान करते और अपने कलास्वरुप देवता, ऋषि तथा पितरों का तर्पण करते । फिर कुल के बड़े-बूढ़ों और ब्राह्मणों की विधिपूर्वक पूजा करते । इसके बाद परम मनस्वी श्रीकृष्ण दुधारू, पहले-पहल ब्यायी हुई, बछडोंवाली सीधी-शान्त गौओं को दान करते । उस समय उन्हें सुन्दर वस्त्र और मोतियों की माला पहना दी जाती । सींग में सोना और खुरों में चाँदी मढ़ दी जाती । वे ब्राह्मणों को वस्त्राभूषणों से सुसज्जित करके रेशमी वस्त्र, मृगचर्म और तिल के साथ प्रतिदिन तेरह हजार चौरासी गौएँ इस प्रकार दान करते ॥ ७-९ ॥ तदनन्तर अपनी विभूतिरूप गौ, ब्राह्मण, देवता, कुल के बड़े-बूढ़े, गुरुजन और समस्त प्राणियों को प्रणाम करके माङ्गलिक वस्तुओं का स्पर्श करते ॥ १० ॥

परीक्षित् ! यद्यपि भगवान् के शरीर का सहज सौन्दर्य ही मनुष्य-लोक का अलङ्कार है, फिर भी वे अपने पीताम्बरादि दिव्य वस्त्र, कौस्तुभादि आभूषण, पुष्पों के हार और चन्दनादि दिव्य अङ्गराग से अपने को आभूषित करते ॥ ११ ॥ इसके बाद वे घी और दर्पण में अपना मुखारविन्द देखते; गाय, बैल, ब्राह्मण और देव-प्रतिमाओं का दर्शन करते । फिर पुरवासी और अन्तःपुर में रहनेवाले चारों वर्गों के लोगों की अभिलाषाएँ पूर्ण करते और फिर अपनी अन्य (ग्रामवासी) प्रजा की कामनापूर्ति करके उसे सन्तुष्ट करते और इन सबको प्रसन्न देखकर स्वयं बहुत ही आनन्दित होते ॥ १२ ॥ वे पुष्पमाला, ताम्बूल, चन्दन और अङ्गराग आदि वस्तुएँ पहले ब्राहाण, स्वजन-सम्बन्धी, मन्त्री और रानियों को बाँट देते; और उनसे बची हुई स्वयं अपने काम में लाते ॥ १३ ॥ भगवान् यह सब करते होते, तब तक दारुक नाम का सारथि सुग्रीव आदि घोड़ों से जुता हुआ अत्यन्त अद्भुत रथ ले आता और प्रणाम करके भगवान् के सामने खड़ा हो जाता ॥ १४ ॥ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण सात्यकि और उद्धवजी के साथ अपने हाथ से सारथि का हाथ पकड़कर रथ पर सवार होते — ठीक वैसे ही जैसे भुवन-भास्कर भगवान् सूर्य उदयाचल पर आरूढ़ होते हैं ॥ १५ ॥ उस समय रनिवास की स्त्रियाँ लज्जा एवं प्रेम से भरी चितवन से उन्हें निहारने लगतीं और बड़े कष्ट से उन्हें विदा करतीं । भगवान् मुसकराकर उनके चित्त को चुराते हुए महल से निकलते ॥ १६ ॥

परीक्षित् । तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण समस्त यदुवंशियों के साथ सुधर्मा नाम की सभा में प्रवेश करते । उस सभा की ऐसी महिमा है कि जो लोग उस सभा में जा बैठते हैं, उन्हें भूख-प्यास, शोक-मोह और जरा-मृत्यु — ये छः ऊर्मियाँ नहीं सतातीं ॥ १७ ॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण सब रानियों से अलग-अलग विदा होकर एक ही रूप में सुधर्मा-सभा में प्रवेश करते और वहाँ जाकर श्रेष्ठ सिंहासन पर विराज जाते । उनकी अङ्गकान्ति से दिशाएँ प्रकाशित होती रहतीं । उस समय यदुवंशी वीरों के बीच में यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण की ऐसी शोभा होती, जैसे आकाश में तारों से घिरे हुए चन्द्रदेव शोभायमान होते हैं ॥ १८ ॥ परीक्षित् ! सभा में विदूषकलोग विभिन्न प्रकार के हास्य-विनोद से, नटाचार्य अभिनय से और नर्तकियाँ कलापूर्ण नृत्यों से अलग-अलग अपनी टोलियों के साथ भगवान् की सेवा करतीं ॥ १९ ॥ उस समय मृदङ्ग, वीणा, पखावज, बाँसुरी, झाँझ और शङ्ख बजने लगते और सूत, मागध तथा वंदीजन नाचते-गाते और भगवान् की स्तुति करते ॥ २० ॥ कोई-कोई व्याख्या-कुशल ब्राह्मण वहाँ बैठकर वेदमन्त्रों की व्याख्या करते और कोई पूर्वकालीन पवित्रकीर्ति नरपतियों के चरित्र कह-कहकर सुनाते ॥ २१ ॥

एक दिन की बात है, द्वारकापुरी में राजसभा के द्वार पर एक नया मनुष्य आया । द्वारपालों ने भगवान् को उसके आने की सूचना देकर उसे सभाभवन में उपस्थित किया ॥ २२ ॥ उस मनुष्य ने परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण को हाथ जोड़कर नमस्कार किया और उन राजाओं का, जिन्होंने जरासन्ध के दिग्विजय के समय उसके सामने सिर नहीं झुकाया था और बलपूर्वक कैद कर लिये गये थे, जिनकी संख्या बीस हजार थी, जरासन्ध के बंदी बनने का दुःख श्रीकृष्ण के सामने निवेदन किया — ॥ २३-२४ ॥ ‘सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण ! आप मन और वाणी के अगोचर हैं । जो आपकी शरण में आता है, उसके सारे भय आप नष्ट कर देते हैं । प्रभो ! हमारी भेद-बुद्धि मिटी नहीं है । हम जन्म-मृत्युरुप संसार के चक्कर से भयभीत होकर आफ्की शरण में आये हैं ॥ २५ ॥ भगवन् ! अधिकांश जीव ऐसे सकाम और निषिद्ध कर्मो में फँसे हुए हैं कि वे आपके बतलाये हुए अपने परम कल्याणकारी कर्म, आपकी उपासना से विमुख हो गये हैं और अपने जीवन एवं जीवन-सम्बन्धी आशा-अभिलाषाओं में भ्रम-भटक रहे हैं । परन्तु आप बड़े बलवान् हैं । आप कालरूप से सदा-सर्वदा सावधान रहकर उनकी आशालता का तुरंत समूल उच्छेद कर डालते हैं । हम आपके उस कालरूप को नमस्कार करते हैं ॥ २६ ॥

आप स्वयं जगदीश्वर हैं और आपने जगत् में अपने ज्ञान, बल आदि कलाओं के साथ इसलिये अवतार ग्रहण किया है कि संतो की रक्षा करें और दुष्टों को दण्ड दें । ऐसी अवस्था में प्रभो ! जरासन्ध आदि कोई दूसरे राजा आपकी इच्छा और आज्ञा के विपरीत हमें कैसे कष्ट दे रहे हैं, यह बात हमारी समझ में नहीं आती । यदि यह कहा जाय कि जरासन्ध हमें कष्ट नहीं देता, उसके रूप में — उसे निमित्त बनाकर हमारे अशुभ कर्म ही हमें दुःख पहुँचा रहे हैं तो यह भी ठीक नहीं । क्योंकि जब हमलोग आपके अपने हैं, तब हमारे दुष्कर्म हमें फल देने में कैसे समर्थ हो सकते हैं ? इसलिये आप कृपा करके अवश्य ही हमें इस क्लेश से मुक्त कीजिये ॥ २७ ॥ प्रभो ! हम जानते हैं कि राजापने का सुख प्रारब्ध के अधीन एवं विषयसाध्य हैं । और सच कहे तो स्वप्न-सुख के समान अत्यन्त तुच्छ और असत् है । साथ ही उस सुख को भोगनेवाला यह शरीर भी एक प्रकार से मुर्दा ही है और इसके पीछे सदा-सर्वदा सैकड़ों प्रकार के भय लगे रहते हैं । परन्तु हम तो इसके द्वारा जगत् के अनेकों भार ढो रहे हैं और यही कारण है के हमने अन्तःकरण के निष्कामभाव और निस्संकल्प स्थिति से प्राप्त होनेवाले आत्मसुख का परित्याग कर दिया है । सचमुच हम अत्यन्त अज्ञानी हैं और आपकी माया के फँदे में फँसकर क्लेश-पर-क्लेश भोगते जा रहे हैं ॥ २८ ॥

भगवन् ! आपके चरणकमल शरणागत पुरुषों के समस्त शोक और मोहों को नष्ट कर देनेवाले हैं । इसलिये आप ही जरासन्धरूप कर्मों के बन्धन से हमें छुड़ाइये । प्रभो ! यह अकेला ही दस हजार हाथियों की शक्ति रखता है और हमलोगों को उसी प्रकार बंदी बनाये हुए है, जैसे सिंह भेड़ों को घेर रखे ॥ २९ ॥ चक्रपाणे ! आपने अठारह बार जरासन्ध से युद्ध किया और सत्रह बार उसका मान-मर्दन करके उसे छोड़ दिया । परन्तु एक बार उसने आपको जीत लिया । हम जानते हैं कि आपकी शक्ति, आपका बल-पौरुष अनन्त हैं । फिर भी मनुष्योंका-सा आचरण करते हुए आपने हारने का अभिनय किया । परन्तु इसी से उसका घमंड बढ़ गया है । हे अजित ! अब वह यह जानकर हमलोगों को और भी सताता है कि हम आपके भक्त हैं, आपकी प्रजा हैं । अब आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिये ॥ ३० ॥

दूत ने कहा — भगवन् ! जरासन्ध के बंदी नरपतियों ने इस प्रकार आपसे प्रार्थना की है । वे आपके चरणकमलों की शरण में हैं और आपका दर्शन चाहते हैं । आप कृपा करके उन दीनों का कल्याण कीजिये ॥ ३१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! राजाओं का दूत इस प्रकार कह ही रहा था कि परम तेजस्वी देवर्षि नारदजी वहाँ आ पहुँचे । उनकी सुनहरी जटाएँ चमक रही थीं । उन्हें देखकर ऐसा मालूम हो रहा था, मानो साक्षात् भगवान् सूर्य ही उदय हो गये हों ॥ ३२ ॥ ब्रह्मा आदि समस्त लोकपालों के एकमात्र स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें देखते ही सभासदों और सेवकों के साथ हर्षित होकर उठ खड़े हुए और सिर झुकाकर उनकी वन्दना करने लगे ॥ ३३ ॥ जब देवर्षि नारद आसन स्वीकार करके बैठ गये, तब भगवान् ने उनकी विधिपूर्वक पूजा की और अपनी श्रद्धा से उनको सन्तुष्ट करते हुए वे मधुर वाणी से बोले — ॥ ३४ ॥ देवर्षे ! इस समय तीनों लोकों में कुशल-मंगल तो है न ? आप तीनों लोकों में विचरण करते रहते हैं, इससे हमें यह बहुत बड़ा लाभ है कि घर बेठे सबका समाचार मिल जाता है ॥ ३५ ॥ ईश्वर के द्वारा रचे हुए तीनों लोकों में ऐसी कोई बात नहीं है, जिसे आप न जानते हों । अतः हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि युधिष्ठिर आदि पाण्डव इस समय क्या करना चाहते है ?’ ॥ ३६ ॥

देवर्षि नारदजी ने कहा — सर्वव्यापक अनन्त ! आप विश्व के निर्माता हैं और इतने बड़े मायावी हैं कि बड़े-बड़े मायावी ब्रह्माजी आदि भी आपकी माया का पार नहीं पा सकते । प्रभो ! आप सबके घट-घट में अपनी अचिन्त्य शक्ति से व्याप्त रहते हैं — ठीक वैसे ही जैसे अग्नि लकड़ियों में अपने को छिपाये रखता है । लोगों की दृष्टि सत्त्व आदि गुणों पर ही अटक जाती है, इससे आपको वे नहीं देख पाते । मैंने एक बार नहीं, अनेकों बार आपकी माया देखीं हैं । इसलिये आप जो यों अनजान बनकर पाण्डवों का समाचार पूछते हैं, इससे मुझे कोई कौतूहल नहीं हो रहा है ॥ ३७ ॥ भगवन् ! आप अपनी माया से ही इस जगत् की रचना और संहार करते हैं, और आपकी माया के कारण ही यह असत्य होने पर भी सत्य के समान प्रतीत होता है । आप कब क्या करना चाहते हैं, यह बात भली-भाँति कौन समझ सकता है । आपका स्वरूप सर्वथा अचिन्तनीय है । में तो केवल बार-बार आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ३८ ॥ शरीर और इससे सम्बन्ध रखनेवाली वासनाओं में फँसकर जीव जन्म-मृत्यु के चक्कर में भटकता रहता है तथा यह नहीं जानता कि मैं इस शरीर से कैसे मुक्त हो सकता हूँ । वास्तव में उसी के हित के लिये आप नाना प्रकार के लीलावतार ग्रहण करके अपने पवित्र यश का दीपक जला देते हैं, जिसके सहारे वह इस अनर्थकारी शरीर से मुक्त हो सके । इसलिये मैं आपकी शरण में हूँ ॥ ३९ ॥

प्रभो ! आप स्वयं परब्रह्म है, तथापि मनुष्यों की-सी लीला का नाट्य करते हुए मुझसे पूछ रहे हैं । इसलिये आपके फुफेरे भाई और प्रेमी भक्त राजा युधिष्ठिर क्या करना चाहते हैं, यह बात मैं आपको सुनाता हूँ ॥ ४० ॥ इसमें सन्देह नहीं कि ब्रह्मलोक में किसी को जो भोग प्राप्त हो सकता है, वह राजा युधिष्ठिरको यहीं प्राप्त हैं । उन्हें किसी वस्तु की कामना नहीं है । फिर भी वे श्रेष्ठ यज्ञ राजसूय के द्वारा आपकी प्राप्ति के लिये आपकी आराधना करना चाहते हैं । आप कृपा करके उनकी इस अभिलाषा का अनुमोदन कीजिये ॥ ४१ ॥

भगवन् ! उस श्रेष्ठ यज्ञ में आपका दर्शन करने के लिये बड़े-बड़े देवता और यशस्वी नरपतिगण एकत्र होंगे ॥ ४२ ॥ प्रभो ! आप स्वयं विज्ञानानन्दघन ब्रह्म हैं । आपके श्रवण, कीर्तन और ध्यान करनेमात्र से अन्त्यज [अंत्यज संज्ञा पुं॰ [सं॰ अन्त्यज] [वि॰ स्त्री॰ अंत्यजा] वह व्यक्ति जो अंतिम वर्ण में उत्पन्न हुआ हो ।] भी पवित्र हो जाते हैं । फिर जो आपका दर्शन और स्पर्श प्राप्त करते हैं, उनके सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है ॥ ४३ ॥ त्रिभुवनमङ्गल ! आपकी निर्मल कीर्ति समस्त दिशाओं में छा रही है तथा स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में व्याप्त हो रही है; ठीक वैसे ही, जैसे आपकी चरणामृत-धारा स्वर्ग में मन्दाकिनी, पाताल में भोगवती और मर्त्यलोक में गङ्गा के नाम से प्रवाहित होकर सारे विश्व को पवित्र कर रही हैं ॥ ४४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! सभा में जितने यदुवंशी बैठे थे, वे सब इस बात के लिये अत्यन्त उत्सुक हो रहे थे कि पहले जरासन्ध पर चढ़ाई करके उसे जीत लिया जाय । अतः उन्हें नारदजी की बात पसंद न आयी । तब ब्रह्मा आदि के शासक भगवान् श्रीकृष्ण ने तनिक मुसकराकर बड़ी मीठी वाणी में उद्धवजी से कहा — ॥ ४५ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — ‘उद्धव ! तुम मेरे हितैषी सुहृद् हो । शुभ सम्मति देनेवाले और कार्य के तत्त्व को भली-भाँति समझनेवाले हो, इसीलिये हम तुम्हें अपना उत्तम नेत्र मानते हैं । अब तुम्हीं बताओ कि इस विषय में हमें क्या करना चाहिये । तुम्हारी बात पर हमारी श्रद्धा है । इसलिये हम तुम्हारी सलाह के अनुसार ही काम करेंगे’ ॥ ४६ ॥ जब उद्धवजी ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण सर्वज्ञ होने पर भी अनजान की तरह सलाह पूछ रहे हैं, तब वे उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके बोले ॥ ४७ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे सप्ततित्तमोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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