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श्रीमद्भागवतमहापुराण – दशम स्कन्ध उत्तरार्ध – अध्याय ८०
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
अस्सीवाँ अध्याय
श्रीकृष्ण के द्वारा सुदामाजी का स्वागत

राजा परीक्षित् ने पूछा — भगवन् ! प्रेम और मुक्ति के दाता परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्ण की शक्ति अनन्त हैं । इसलिये उनकी माधुर्य और ऐश्वर्य से भरी लीलाएँ भी अनन्त हैं । अब हम उनकी दूसरी लीलाएँ, जिनका वर्णन आपने अब तक नहीं किया है, सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥ ब्रह्मन् ! यह जीव विषय-सुख को खोजते-खोजते अत्यन्त दुखी हो गया हैं । वे बाण की तरह इसके चित्त में चुभते रहते हैं । ऐसी स्थिति में ऐसा कौन-सा रसिक–रस का विशेषज्ञ पुरुष होगा, जो बार-बार पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्ण की मङ्गलमयी लीलाओं का श्रवण करके भी उनसे विमुख होना चाहेगा ॥ २ ॥ जो वाणी भगवान् के गुणों का गान करती हैं, वही सच्ची वाणी हैं । वे ही हाथ सच्चे हाथ हैं, जो भगवान् की सेवा के लिये काम करते हैं । वही मन सच्चा मन है, जो चराचर प्राणियों में निवास करनेवाले भगवान् का स्मरण करता है; और वे ही कान वास्तव में कान कहने योग्य हैं, जो भगवान् की पुण्यमयी कथाओं का श्रवण करते हैं ॥ ३ ॥ वही सिर सिर है, जो चराचर जगत् को भगवान् की चल-अचल प्रतिमा समझकर नमस्कार करता है; और जो सर्वत्र भगवद्विग्रह का दर्शन करते हैं, वे ही नेत्र वास्तव में नेत्र हैं । शरीर के जो अङ्ग भगवान् और उनके भक्तों के चरणोदक का सेवन करते हैं, वे ही अङ्ग वास्तव में अङ्ग हैं; सच पूछिये तो उन्हीं का होना सफल हैं ॥ ४ ॥

सूतजी कहते हैं — शौनकादि ऋषियो ! जब राजा परीक्षित् ने इस प्रकार प्रश्न किया, तब भगवान् श्रीशुकदेवजी का हृदय भगवान् श्रीकृष्ण में ही तल्लीन हो गया । उन्होंने परीक्षित् से इस प्रकार कहा ॥ ५ ॥

श्रीशुकदेवजी ने कहा — परीक्षित् ! एक ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्ण के परम मित्र थे । वे बड़े ब्रह्मज्ञानी, विषयों से विरक्त, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय थे ॥ ६ ॥ वे गृहस्थ होने पर भी किसी प्रकार का संग्रह-परिग्रह न रखकर प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ मिल जाता, उसमें सन्तुष्ट रहते थे । उनके वस्त्र तो फटे-पुराने थे ही, उनकी पत्नी के भी वैसे ही थे । वह भी अपने पति के समान ही भूख से दुबली हो रही थी ॥ ७ ॥ एक दिन दरिद्रता की प्रतिमूर्ति दुःखिनी पतिव्रता भूख के मारे काँपती हुई अपने पतिदेव के पास गयी और मुरझाये हुए मुँह से बोली — ॥ ८ ॥ ‘भगवन् ! साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण आपके सखा हैं । वे भक्तवाञ्छाकल्पतरु, शरणागतवत्सल और ब्राह्मणों के परम भक्त हैं ॥ ९ ॥ परम भाग्यवान् आर्यपुत्र ! वे साधु-संतों के, सत्पुरुषों के एकमात्र आश्रय हैं । आप उनके पास जाइये । जब वे जानेंगे कि आप कुटुम्बी हैं । और अन्न के बिना दुखी हो रहे हैं, तो वे आपको बहुत-सा धन देंगे ॥ १० ॥ आजकल वे भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी यादवों के स्वामी के रूप में द्वारका में ही निवास कर रहे हैं और इतने उदार हैं कि जो उनके चरणकमलों का स्मरण करते हैं, उन प्रेमी भक्तों को वे अपने-आप तक का दान कर डालते हैं । ऐसी स्थिति में जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तों को यदि धन और विषय-सुख, जो अत्यन्त वाञ्छनीय नहीं है, दे दें, तो इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है ? ॥ ११ ॥

इस प्रकार जब उन ब्राह्मण देवता की पत्नी ने अपने पतिदेव से कई बार बड़ी नम्रता से प्रार्थना की, तब उन्होंने सोचा कि ‘धन की तो कोई बात नहीं है; परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण का दर्शन हो जायगा, यह तो जीवन का बहुत बड़ा लाभ है’ ॥ १२ ॥ यही विचार करके उन्होंने जाने का निश्चय किया और अपनी पत्नी से बोले — ‘कल्याणी ! घर में कुछ भेंट देने योग्य वस्तु भी हैं क्या ? यदि हो तो दे दो’ ॥ १३ ॥ तब उस ब्राह्मणी ने पास-पड़ोस के ब्राह्मण के घर से चार मुट्ठी चिउड़े माँगकर एक कपड़े में बाँध दिये और भगवान् को भेंट देने के लिये अपने पतिदेव को दे दिये ॥ १४ ॥ इसके बाद वे ब्राह्मण देवता उन चिउडों को लेकर द्वारका के लिये चल पड़े । वे मार्ग में यह सोचते जाते थे कि ‘मुझे भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन कैसे प्राप्त होंगे ?’ ॥ १५ ॥

परीक्षित् ! द्वारका में पहुँचने पर वे ब्राह्मण देवता दुसरे ब्राह्मणों के साथ सैनिकों की तीन छावनियों और तीन ड्योढ़ियाँ पार करके भगवद्धर्म का पालन करनेवाले अन्धक और वृष्णिवंशी यादवों के महलों में, जहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन हैं, जा पहुँचे ॥ १६ ॥ उनके बीच भगवान् श्रीकृष्ण की सोलह हजार रानियों के महल थे । उनमें से एक में उन ब्राह्मणदेवता ने प्रवेश किया । वह महल खूब सजा-सजाया — अत्यन्त शोभायुक्त था । उसमें प्रवेश करते समय उन्हें ऐसा मालूम हुआ, मानो वे ब्रह्मानन्द के समुद्र में डूब-उतरा रहे हों !॥ १७ ॥ उस समय भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्राणप्रिया रुक्मिणीजी के पलंग पर विराजे हुए थे । ब्राह्मण देवता को दूर से ही देखकर वे सहसा उठ खड़े हुए और उनके पास आकर बड़े आनन्द से उन्हें अपने भुजपाश में बाँध लिया ॥ १८ ॥ परीक्षित् ! परमानन्दस्वरूप भगवान् अपने प्यारे सखा ब्राह्मणदेवता के अङ्ग-स्पर्श से अत्यन्त आनन्दित हुए । उनके कमल के समान कोमल नेत्रों से प्रेम के आँसू बरसने लगे ॥ १९ ॥

परीक्षित् ! कुछ समय के बाद भगवान् श्रीकृष्ण ने उन्हें ले जाकर अपने पलंग पर बैठा दिया और स्वयं पूजन की सामग्री लाकर उनकी पूजा की । प्रिय परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण सभी को पवित्र करनेवाले हैं; फिर भी उन्होंने अपने हाथों ब्राह्मणदेवता के पाँव पखारकर उनका चरणोदक अपने सिर पर धारण किया और उनके शरीर में चन्दन, अरगजा, केसर आदि दिव्य गन्धों का लेपन किया ॥ २०-२१ ॥ फिर उन्होंने बड़े आनन्द से सुगन्धित धूप और दीपावली से अपने मित्र की आरती उतारी । इस प्रकार पूजा करके पान एवं गाय देकर मधुर वचनों से भले पधारे ऐसा कहकर उनका स्वागत किया ॥ २३ ॥ ब्राह्मणदेवता फटे-पुराने वस्त्र पहने हुए थे । शरीर अत्यन्त मलिन और दुर्बल था । देह की सारी नसें दिखायी पड़ती थीं । स्वयं भगवती रुक्मिणीजी चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगीं ॥ २३ ॥ अन्तःपुर की स्त्रियाँ यह देखकर अत्यन्त विस्मित हो गयी कि पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्ण अतिशय प्रेम से इस मैले-कुचैले अवधूत ब्राह्मण की पूजा कर रहे हैं ॥ २४ ॥

वे आपस में कहने लगी — इस नंग-धडंग, निर्धन, निन्दनीय और निकृष्ट भिखमंगे ने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है, जिससे त्रिलोकी में सबसे बड़े श्रीनिवास श्रीकृष्ण स्वयं इसका आदर-सत्कार कर रहे हैं । देखो तो सहीं, इन्होंने अपने पलंग पर सेवा करती हुई स्वयं लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणीजी को छोड़कर इस ब्राह्मण को अपने बड़े भाई बलरामजी के समान हृदय से लगाया हैं’ ॥ २५-२६ ॥ प्रिय परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण और वे ब्राह्मण दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर अपने पूर्वजीवन की उन आनन्ददायक घटनाओं का स्मरण और वर्णन करने लगे, जो गुरुकुल में रहते समय घटित हुई थीं ॥ २७ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — धर्म के मर्मज्ञ ब्राह्मणदेव ! गुरु-दक्षिणा देकर जब आप गुरुकुल से लौट आये, तब आपने अपने अनुरूप स्त्री से विवाह किया या नहीं ? ॥ २८ ॥ मैं जानता हूं कि आपका चित्त गृहस्थी में रहने पर भी प्रायः विषय-भोगों में आसक्त नहीं है । विद्वान् ! यह भी मुझे मालूम हैं कि धन आदि में भी आपकी कोई प्रीति नहीं हैं ॥ २९ ॥ जगत् में विरले ही लोग ऐसे होते हैं, जो भगवान् की माया से निर्मित विषयसम्बन्धी वासनाओं का त्याग कर देते हैं और चित्त में विषयों की तनिक भी वासना न रहने पर भी मेरे समान केवल लोक-शिक्षा के लिये कर्म करते रहते हैं ॥ ३० ॥ ब्राह्मणशिरोमणे ! क्या आपको उस समय की बात याद है, जब हम दोनों एक साथ गुरुकुल में निवास करते थे । सचमुच गुरुकुल में ही द्विजातियों को अपने ज्ञातव्य वस्तु का ज्ञान होता है, जिसके द्वारा वे अज्ञानान्धकार से पार हो जाते हैं ॥ ३१ ॥ मित्र ! इस संसार में शरीर का कारण जन्मदाता पिता प्रथम गुरु है । इसके बाद उपनयन-संस्कार करके सत्कर्मों की शिक्षा देनेवाला दूसरा गुरु है । वह मेरे ही समान पूज्य है । तदनन्तर ज्ञानोपदेश करके परमात्मा को प्राप्त करानेवाला गुरु तो मेरा स्वरूप ही है । वर्णाश्रमियों के ये तीन गुरु होते हैं ॥ ३२ ॥ मेरे प्यारे मित्र ! गुरु के स्वरूप में स्वयं मैं हूँ । इस जगत् में वर्णाश्रमियों में जो लोग अपने गुरुदेव के उपदेशानुसार अनायास ही भवसागर पार कर लेते हैं, वे अपने स्वार्थ और परमार्थ के सच्चे जानकार हैं ॥ ३३ ॥ प्रिय मित्र ! मैं सबका आत्मा हूँ, सबके हृदय में अन्तर्यामीरूप से विराजमान हूँ । मैं गृहस्थ के धर्म पञ्च-महायज्ञ आदि से, ब्रह्मचारी के धर्म उपनयन-वेदाध्ययन आदि से, वानप्रस्थी के धर्म तपस्या से और सब ओर से उपरत हो जाना — इस संन्यासी के धर्म से भी उतना सन्तुष्ट नहीं होता, जितना गुरुदेव की सेवा-शुश्रूषा से सन्तुष्ट होता हूँ ॥ ३४ ॥

ब्रह्मन् ! जिस समय हमलोग गुरुकुल में निवास कर रहे थे, उस समय की वह बात आपको याद है क्या, जब हम दोनों को एक दिन हमारी गुरुपत्नी ने ईंधन लाने के लिये जंगल में भेजा था ॥ ३५ ॥ उस समय हम लोग एक घोर जंगल में गये हुए थे और बिना ऋतु के ही बड़ा भयङ्कर आँधी-पानी आ गया था । आकाश में बिजली कड़कने लगी थी ॥ ३६ ॥ तब तक सूर्यास्त हो गया; चारों ओर अँधेरा-ही-अँधेरा फैल गया । धरती पर इस प्रकार पानी-ही-पानी हो गया कि कहाँ गड्ढा है, कहाँ किनारा, इसका पता ही न चलता था ॥ ३७ ॥ वह वर्षा क्या थी, एक छोटा-मोटा प्रलय ही था । आँधी के झटकों और वर्षा की बौछारों से हम लोगों को बड़ी पीड़ा हुई, दिशा का ज्ञान न रहा । हमलोग अत्यन्त आतुर हो गये और एक-दूसरे का हाथ पकड़कर जंगल में इधर-उधर भटकते रहे ॥ ३८ ॥ जब हमारे गुरुदेव सान्दीपनि मुनि को इस बात का पता चला, तब वे सूर्योदय होने पर अपने शिष्य हम लोगों को ढूँढते हुए जंगल में पहुंचे और उन्होंने देखा कि हम अत्यन्त आतुर हो रहे हैं ॥ ३९ ॥ वे कहने लगे — ‘आश्चर्य है, आश्चर्य है ! पुत्रों ! तुम लोगों ने हमारे लिये अत्यन्त कष्ट उठाया । सभी प्राणियों को अपना शरीर सबसे अधिक प्रिय होता है; परन्तु तुम दोनों उसकी भी परवा न करके हमारी सेवामें ही संलग्न रहे ॥ ४० ॥ गुरु के ऋण से मुक्त होने के लिये सत्-शिष्यों का इतना ही कर्तव्य है कि वे विशुद्ध भाव से अपना सब कुछ और शरीर भी गुरुदेव की सेवामें समर्पित कर दें ॥ ४१ ॥ द्विज-शिरोमणियो ! मैं तुम लोगों से अत्यन्त प्रसन्न हूँ तुम्हारे सारे मनोरथ, सारी अभिलाषाएँ पूर्ण हों और तुमलोगों ने हमसे जो वेदाध्ययन किया है, वह तुम्हें सर्वदा कण्ठस्थ रहे तथा इस लोक एवं परलोक में कहीं भी निष्फल न हो’ ॥ ४२ ॥ प्रिय मित्र ! जिस समय हमलोग गुरुकुल में निवास कर रहे थे, हमारे जीवन में ऐसी-ऐसी अनेकों घटनाएं घटित हुई थी । इसमें सन्देह नहीं कि गुरुदेव की कृपा से ही मनुष्य शान्ति का अधिकारी होता और पूर्णता को प्राप्त करता है ॥ ४३ ॥

ब्राह्मणदेवता ने कहा —
देवताओं के आराध्यदेव जगद्गुरु श्रीकृष्ण ! भला,अब हमें क्या करना बाकी है ? क्योंकि आपके साथ, जो सत्यसङ्कल्प परमात्मा हैं, हमें गुरुकुल में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था ॥ ४४ ॥ प्रभो ! छन्दोमय वेद धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — चतुर्विध पुरुषार्थ के मूल स्रोत हैं; और वे हैं आपके शरीर । वही आप वेदाध्ययन के लिये गुरुकुल में निवास करें, यह मनुष्य-लीला का अभिनय नहीं तो और क्या है ? ॥ ४५ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे शीतित्तमोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

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