Print Friendly, PDF & Email

श्रीमद्भागवतमहापुराण – नवम स्कन्ध – अध्याय १६
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
सोलहवाँ अध्याय
परशुरामजी के द्वारा क्षत्रियसंहार और विश्वामित्रजी के वंश की कथा

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! अपने पिता की यह शिक्षा भगवान् परशुराम ने ‘जो आज्ञा’ कहकर स्वीकार की । इसके बाद वे एक वर्ष तक तीर्थयात्रा करके अपने आश्रम पर लौट आये ॥ १ ॥ एक दिन की बात है । परशुरामजी की माता रेणुका गङ्गा तट पर गयी हुई थीं । वहाँ उन्होंने देखा कि गन्धर्वराज चित्ररथ कमलों की माला पहने अप्सराओं के साथ विहार कर रहा है ॥ २ ॥ वे जल लाने के लिये नदी तट पर गयी थीं, परन्तु वहाँ जलक्रीडा करते हुए गन्धर्व को देखने लगीं और पतिदेव के हवन का समय हो गया है इस बात को भूल गयीं । उनका मन कुछ-कुछ चित्ररथ की ओर खिंच भी गया था ॥ ३ ॥ हवन का समय बीत गया, यह जानकर वे महर्षि जमदग्नि के शाप से भयभीत हो गयीं और तुरंत वहाँ से आश्रम पर चली आयीं । वहाँ जल का कलश महर्षि के सामने रखकर हाथ जोड़ खड़ी हो गयीं ॥ ४ ॥ जमदग्नि मुनि ने अपनी पत्नी का मानसिक व्यभिचार जान लिया और क्रोध करके कहा — ‘मेरे पुत्रो ! इस पापिनी को मार डालो ।’ परन्तु उनके किसी भी पुत्र ने उनकी वह आज्ञा स्वीकार नहीं की ॥ ५ ॥ इसके बाद पिता की आज्ञा से परशुरामजी ने माता के साथ सब भाइयों को भी मार डाला । इसका कारण था — वे अपने पिताजी के योग और तपस्या का प्रभाव भलीभाँति जानते थे ॥ ६ ॥


परशुरामजी के इस काम से सत्यवतीनन्दन महर्षि जमदग्नि बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा — ‘बेटा ! तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँग लो ।’ परशुरामजी ने कहा —’पिताजी ! मेरी माता और सब भाई जीवित हो जायें तथा उन्हें इस बात की याद न रहे कि मैंने उन्हें मारा था’ ॥ ७ ॥ परशुरामजी के इस प्रकार कहते ही जैसे कोई सोकर उठे,सब-के-सब अनायास ही सकुशल उठ बैठे । परशुरामजी ने अपने पिताजी का तपोबल जानकर ही तो अपने सुहृदों का वध किया था ॥ ८ ॥

परीक्षित् ! सहस्रबाहु अर्जुन के जो लड़के परशुरामजी से हारकर भाग गये थे, उन्हें अपने पिता के वध की याद निरन्तर बनी रहती थी । कहीं एक क्षण के लिये भी उन्हें चैन नहीं मिलता था ॥ ९ ॥ एक दिन की बात है, परशुरामजी अपने भाइयों के साथ आश्रम से बाहर वन की ओर गये हुए थे । यह अवसर पाकर वैर साधने के लिये सहस्रबाहु के लड़के वहाँ आ पहुँचे ॥ १० ॥ उस समय महर्षि जमदग्नि अग्निशाला में बैठे हुए थे और अपनी समस्त वृत्तियों से पवित्रकीर्ति भगवान् के ही चिन्तन में मग्न हो रहे थे । उन्हें बाहर की कोई सुध न थी । उसी समय उन पापियों ने जमदग्नि ऋषि को मार डाला । उन्होंने पहले से ही ऐसा पापपूर्ण निश्चय कर रखा था ॥ ११ ॥ परशुराम की माता रेणुका बड़ी दीनता से उनसे प्रार्थना कर रही थीं, परन्तु उन सबों ने उनकी एक न सुनी । बलपूर्वक महर्षि जमदग्नि का सिर काटकर ले गये । परीक्षित् ! वास्तव में वे नीच क्षत्रिय अत्यन्त क्रूर थे ॥ १२ ॥ सती रेणुका दुःख और शोक से आतुर हो गयीं । वे अपने हाथों अपनी छाती और सिर पीट-पीटकर जोर-जोर से रोने लगी — परशुराम ! बेटा परशुराम ! शीघ्र आओ ॥ १३ ॥

परशुरामजी ने बहुत दूर से माता का ‘हा राम !’ यह करुण-क्रन्दन सुन लिया । वे बड़ी शीघ्रता से आश्रम पर आये और वहाँ आकर देखा कि पिताजी मार डाले गये हैं ॥ १४ ॥ परीक्षित् ! उस समय परशुरामजी को बड़ा दुःख हुआ । साथ ही क्रोध, असहिष्णुता, मानसिक पीड़ा और शोक के वेग से वे अत्यन्त मोहित हो गये । ‘हाय पिताजी ! आप तो बड़े महात्मा थे । पिताजी ! आप तो धर्म के सच्चे पुजारी थे । आप हमलोगों को छोड़कर स्वर्ग चले गये ॥ १५ ॥ इस प्रकार विलापकर उन्होंने पिता का शरीर तो भाइयों को सौंप दिया और स्वयं हाथ में फरसा उठाकर क्षत्रियों का संहार कर डालने का निश्चय किया ॥ १६ ॥

परीक्षित् ! परशुरामजी ने माहिष्मती नगरी में जाकर सहस्रबाहु अर्जुन के पुत्रों के सिरों से नगर के बीचो-बीच एक बड़ा भारी पर्वत खड़ा कर दिया । उस नगर की शोभा तो उन ब्रह्मघाती नीच क्षत्रिय के कारण ही नष्ट हो चुकी थी ॥ १७ ॥ उनके रक्त से एक बड़ी भयङ्कर नदी बह निकली, जिसे देखकर ब्राह्मणद्रोहियों का ह्रदय भय से काँप उठता था । भगवान् ने देखा कि वर्तमान क्षत्रिय अत्याचारी हो गये हैं । इसलिये राजन् ! उन्होंने अपने पिता के वध को निमित्त बनाकर इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियहीन कर दिया और कुरुक्षेत्र के समन्तपञ्चक में ऐसे-ऐसे पाँच तालाब बना दिये, जो रक्त के जल से भरे हुए थे ॥ १८-१९ ॥ परशुरामजी ने अपने पिताजी का सिर लाकर उनके धड़ से जोड़ दिया और यज्ञों द्वारा सर्वदेवमय आत्मस्वरूप भगवान् का यजन किया ॥ २० ॥ यज्ञों में उन्होंने पूर्व दिशा होता को, दक्षिण दिशा ब्रह्मा को, पश्चिम दिशा अध्वर्यु को और उत्तर दिशा सामगान करनेवाले उद्गाता को दे दी ॥ २१ ॥ इसी प्रकार अग्निकोण आदि विदिशाएँ ऋत्विजों को दीं, कश्यपजी को मध्यभूमि दी, उपद्रष्टा को आर्यावर्त दिया तथा दूसरे सदस्यों को अन्यान्य दिशाएँ प्रदान कर दीं ॥ २२ ॥ इसके बाद यज्ञान्त-स्नान करके वे समस्त पापों से मुक्त हो गये और ब्रह्मनदी सरस्वती के तट पर मेघरहित सूर्य के समान शोभायमान हुए ॥ २३ ॥

महर्षि जमदग्नि को स्मृतिरूप सङ्कल्पमय शरीर की प्राप्ति हो गयीं । परशुरामजी से सम्मानित होकर वे सप्तर्षियों के मण्डल में सातवें ऋषि हो गये ॥ २४ ॥ परीक्षित् ! कमललोचन जमदग्नि-नन्दन भगवान् परशुराम आगामी मन्वन्तर में सप्तर्षियों के मण्डल में रहकर वेदों का विस्तार करेंगे ॥ २५ ॥ वे आज भी किसी को किसी प्रकार का दण्ड न देते हुए शान्त चित्त से महेन्द्र पर्वत पर निवास करते हैं । वहाँ सिद्ध, गन्धर्व और चारण उनके चरित्र का मधुर स्वर से गान करते रहते हैं ॥ २६ ॥ सर्वशक्तिमान् विश्वात्मा भगवान् श्रीहरि ने इस प्रकार भृगुवंशियों में अवतार ग्रहण करके पृथ्वी के भारभूत राजाओं का बहुत बार वध किया ॥ २७ ॥

महाराज गाधि के पुत्र हुए प्रज्वलित अग्नि के समान परम तेजस्वी विश्वामित्रजी । इन्होंने अपने तपोबल से क्षत्रियत्व का त्याग करके ब्रह्मतेज प्राप्त कर लिया ॥ २८ ॥ परीक्षित् ! विश्वामित्रजी के सौ पुत्र थे । उनमें बिचले पुत्र का नाम था मधुच्छन्दा । इसलिये सभी पुत्र ‘मधुच्छन्दा’ के ही नाम से विख्यात हुए ॥ २९ ॥ विश्वामित्रजी ने भृगुवंशी अजीगर्त के पुत्र अपने भानजे शुनःशेप को, जिसका एक नाम देवरात भी था, पुत्ररूप में स्वीकार कर लिया और अपने पुत्रों से कहा कि ‘तुमलोग इसे अपना बड़ा भाई मानो’ ॥ ३० ॥ यह वही प्रसिद्ध भृगुवंशी शुनःशेप था, जो हरिश्चन्द्र के यज्ञ में यज्ञपशु के रूप में मोल लेकर लाया गया था । विश्वामित्रजी ने प्रजापति वरुण आदि देवताओं की स्तुति करके उसे पाशबन्धन से छुड़ा लिया था । देवताओं के यज्ञ में यह शुनःशेप देवताओं द्वारा विश्वामित्रजी को दिया गया था; अतः ‘देवैः रातः’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार गाधिवेश में यह तपस्वी देवरात के नाम से विख्यात हुआ ॥ ३१-३२ ॥

विश्वामित्रजी के पुत्रों में जो बड़े थे, उन्हें शुनःशेप का बड़ा भाई मानने की बात अच्छी न लगी । इस पर विश्वामित्रजी ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि ‘दुष्टो ! तुम सब म्लेच्छ हो जाओ’ ॥ ३३ ॥ इस प्रकार जब उनचास भाई म्लेच्छ हो गये, तब विश्वामित्रजी के बिचले पुत्र मधुच्छन्दा ने अपने से छोटे पचासों भाइयों के साथ कहा —’पिताजी ! आप हमलोगों को जो आज्ञा करते हैं, हम उसका पालन करने के लिये तैयार हैं ॥ ३४ ॥ यह कहकर मधुच्छन्दा ने मन्त्रद्रष्टा शुनःशेप को बड़ा भाई स्वीकार कर लिया और कहा कि ‘हम सब तुम्हारे अनुयायी-छोटे भाई हैं ।’ तब विश्वामित्रजी ने अपने इन आज्ञाकारी पुत्रों से कहा — ‘तुम लोगों ने मेरी बात मानकर मेरे सम्मान की रक्षा की है, इसलिये तुम लोगों — जैसे सुपुत्र प्राप्त करके मैं धन्य हुआ । मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हें भी सुपुत्र प्राप्त होंगे ॥ ३५ ॥ मेरे प्यारे पुत्रो ! यह देवरात शुन:शेप भी तुम्हारे ही गोत्र का है । तुमलोग इसकी आज्ञा में रहना ।’

परीक्षित् ! विश्वामित्रजी के अष्टक, हारीत, जय और क्रतुमान् आदि और भी पुत्र थे ॥ ३६ ॥ इस प्रकार विश्वामित्रजी की सन्तानों से कौशिकगोत्र में कई भेद हो गये और देवरात को बड़ा भाई मानने के कारण उसका प्रवर ही दूसरा हो गया ॥ ३७ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे षोडशोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.