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श्रीमद्भागवतमहापुराण – पञ्चम स्कन्ध – अध्याय १४
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
चौदहवाँ अध्याय
भवाटवी का स्पष्टीकरण

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! देहाभिमानी जीवों के द्वारा सत्त्वादि गुणों के भेद से शुभ, अशुभ और मिश्र–तीन प्रकार के कर्म होते रहते हैं । उन कर्मों के द्वारा ही निर्मित नाना प्रकार के शरीरों के साथ होनेवाला जो संयोग-वियोगादिरूप अनादि संसार जीव को प्राप्त होता हैं, उसके अनुभव के छः द्वार हैं — मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ । उनसे विवश होकर यह जीवसमूह मार्ग भूलकर भयङ्कर उनमें भटकते हुए धन के लोभी बनिज़ारो के समान परम समर्थ भगवान् विष्णु के आश्रित रहनेवाली माया की प्रेरणा से बीहड़ वन के समान दुर्गम मार्ग में पड़कर संसार-वन में जा पहुँचता है । यह वन श्मशान के समान अत्यन्त अशुभ हैं । इसमें भटकते हुए उसे अपने शरीर से किये हुए कर्मों का फल भोगना पड़ता है । यहाँ अनेकों विघ्नों के कारण उसे अपने व्यापार में सफलता भी नहीं मिलती: तो भी यह उसके श्रम को शान्त करनेवाले श्रीहरि एवं गुरुदेव के चरणारविन्द-मकरन्द-मधु के रसिक भक्त-भ्रमरों के मार्ग का अनुसरण नहीं करता । इस संसार-वन में मनसहित छः इन्द्रियाँ ही अपने कर्मों की दृष्टि डाकुओं के समान हैं ॥ १ ॥

पुरुष बहुत-सा कष्ट उठाकर जो धन कमाता है, उसका उपयोग धर्म में होना चाहिये; वहीं धर्म यदि साक्षात् भगवान् परमपुरुष की आराधना के रूप में होता है तो उसे परलोक में निःश्रेयस का हेतु बतलाया गया है । किन्तु जिस मनुष्य का बुद्धिरूप सारथि विवेकहीन होता है और मन वश में नहीं होता, उसके उस धर्मोपयोगी धन को ये मन सहित छः इन्द्रियाँ देखना, स्पर्श करना, सुनना, स्वाद लेना, सुँघना, सङ्कल्प-विकल्प करना और निश्चय करना-इन वृत्तियों के द्वारा गृहस्थोचित विषयभोगों में फंसाकर उसी प्रकार लूट लेती हैं, जिस प्रकार बेईमान मुखिया को अनुगमन करनेवाले एवं असावधान बनिज़ारो के दल का धन चोर-डाकू लूट ले जाते हैं ॥ २ ॥ ये ही नहीं, उस संसार-वन में रहनेवाले उसके कुटुम्बी भी-जो नाम से तो स्त्री-पुत्रादि कहे जाते हैं, किन्तु कर्म जिनके साक्षात् भेड़ियों और गीदड़ के समान होते हैं — उस अर्थलोलुप कुटुम्बी के धन को उसकी इच्छा न रहने पर भी उसके देखते-देखते इस प्रकार छीन ले जाते हैं, जैसे भेड़िये गड़रियों से सुरक्षित भेड़ों को उठा ले जाते हैं ॥ ३ ॥ जिस प्रकार यदि किसी खेत के बीजों को अग्नि द्वारा जला न दिया गया हो, तो प्रतिवर्ष जोतने पर भी खेती का समय आने पर वह फिर झाड़-झंखाड़, लता और तृण आदि से गहन हो जाता है — उसी प्रकार यह गृहस्थाश्रम भी कर्मभूमि है, इसमें भी कर्मों का सर्वथा उच्छेद कभी नहीं होता, क्योंकि यह घर कामनाओं की पिटारी हैं ॥ ४ ॥

उस गृहस्थाश्रम में आसक्त हुए व्यक्ति के धनरूप बाहरी प्राण को डाँस और मच्छरों के समान नीच पुरुषों से तथा टिड्डी, पक्षी, चोर और चूहे आदि से क्षति पहुँचती रहती है । कभी इस मार्ग में भटकते-भटकते यह अविद्या, कामना और कर्मों से कलुषित हुए अपने चित से दृष्टिदोष के कारण इस मर्त्यलोक को, जो गन्धर्वनगर के समान असत् है, सत्य समझने लगता है ॥ ५ ॥ फिर खान-पान और स्त्री-प्रसङ्गादि व्यसनों में फंसकर मृगतृष्णा के समान मिथ्या विषयों की ओर दौड़ने लगता है ॥ ६ ॥ कभी बुद्धि के रजोगुण से प्रभावित होनेपर सारे अनर्थों की जड़ अग्नि के मलरूप सोने को ही सुख का साधन समझकर उसे पाने के लिये लालायित हो इस प्रकार दौड़-धूप करने लगता है, जैसे वन में जाडे से ठिठुरता हुआ पुरुष अग्नि के लिये व्याकुल होकर उल्मुक पिशाच की (अगिया-बेताल की) ओर उसे आग समझकर दौड़े ॥ ७ ॥ कभी इस शरीर को जीवित रखनेवाले घर, अन्न-जल और धन आदि में अभिनिवेश करके इस संसारारण्य में इधर-उधर दौड़-धूप करता रहता है ॥ ८ ॥

कभी बवंडर के समान आँखों में धूल झोंक देनेवाली स्त्री गोद में बैठा लेतीं है, तो तत्काल रागान्ध-सा होकर सत्पुरुषों की मर्यादा का भी विचार नहीं करता । उस समय नेत्रों में रजोगुण की धूल भर जाने से बुद्धि ऐसी मलिन हो जाती हैं कि अपने कर्मों के साक्षी दिशाओं के देवताओं को भी भुला देता है ॥ ९ ॥ कभी अपने-आप ही एकाध बार विषयों का मिथ्यात्व जान लेने पर भी अनादिकाल से हमें आत्मबुद्धि रहने से विवेक-बुद्धि नष्ट हो जाने के कारण उन मरुमरीचिका-तुल्य विषयों की ओर ही फिर दौड़ने लगता हैं ॥ १० ॥ कभी प्रत्यक्ष शब्द करनेवाले उल्लु के समान शत्रुओं की और परोक्षरूप से बोलनेवाले झींगुरों के समान राजा की अति कठोर एवं दिल को दहला देनेवाली डरावनी डाँट-डपट से इसके कान और मन को बड़ी व्यथा होती है ॥ ११ ॥

पूर्वपुण्य क्षीण हो जाने पर यह जीवित ही मुर्दे के समान हो जाता है; और जो कारस्कर एवं काकतुण्ड आदि जहरीले फलोंवाले पापवृक्षों, इसी प्रकार की दूषित लताओं और विषैले कुओं के समान हैं तथा जिनका धन इस लोक और परलोक दोनों ही काम में नहीं आता और जो जीते हुए भी मुर्दे के समान हैं — उन कृपण पुरुषों का आश्रय लेता हैं ॥ १२ ॥ कभी असत् पुरुषों के सङ्ग से बुद्धि बिगड़ जाने के कारण सूखी नदी में गिरकर दुखी होने के समान इस लोक और परलोक में दुःख देनेवाले पाखण्ड में फंस जाता हैं ॥ १३ ॥ जब दूसरों को सताने से उसे अन्न भी नहीं मिलता, तब वह अपने सगे पिता-पुत्रों को अथवा पिता या पुत्र आदि का एक तिनका भी जिनके पास देखता है, उनको फाड़ खाने के लिये तैयार हो जाता है ॥ १४ ॥ कभी दावानल के समान प्रिय विषयों से शून्य एवं परिणाम में दुःखमय घर में पहुँचता हैं, तो वहाँ इष्टजनों के वियोगादि से उसके शोक की आग भड़क उठती है; उससे सन्तप्त होकर वह बहुत ही खिन्न होने लगता है ॥ १५ ॥ कभी काल के समान भयङ्कर कुलरूप राक्षस इसके परम प्रिय धन-रूप प्राणों को हर लेता है, तो यह मरे हुए के समान निर्जीव हो जाता है ॥ १६ ॥

कभी मनोरथ के पदार्थों के समान अत्यन्त असत् पिता-पितामह आदि सम्बन्ध को सत्य समझकर उनके सहवास से स्वप्न के समान क्षणिक सुख का अनुभव करता हैं ॥ १७ ॥ गृहस्थाश्रम के लिये जिस कर्मविधि का महान् विस्तार किया गया है, उसका अनुष्ठान किसी पर्वत की कड़ी चढ़ाई के समान ही हैं । लोगों को उस ओर प्रवृत्त देखकर उनकी देखादेखी जब यह भी उसे पूरा करने का प्रयत्न करता है, तब तरह-तरह की कठिनाइयों से क्लेशित होकर काँटे और कंकड़ों से भरी भूमि में पहुँचे हुए व्यक्ति के समान दुखी हो जाता है ॥ १८ ॥ कभी पेट की असह्य ज्वाला से अधीर होकर अपने कुटुम्ब पर ही बिगड़ने लगता है ॥ १९ ॥ फिर जब निद्रारूप अजगर के चंगुल में फँस जाता हैं, तब अज्ञानरूप घोर अन्धकार में डूबकर सूने वन में फेंके हुए मुर्दे के समान सोया पड़ा रहता है । उस समय इसे किसी बात की सुधि नहीं रहती ॥ २० ॥

कभी दुर्जनरूप काटनेवाले जीव इतना काटते-तिरस्कार करते हैं कि इसके गर्वरूप दाँत, जिनसे यह दूसरों को काटता था, टूट जाते हैं । तब इसे अशान्ति के कारण नींद भी नहीं आती तथा मर्मवेदना के कारण क्षण-क्षण में विवेक-शक्ति क्षीण होते रहने से अन्त में अंधे की भाँति यह नरकरूप अँधे कुएं में जा गिरता है ॥ २१ ॥ कभी विषयसुखरूप मधुकणों को ढूंढते-ढूंढते जब यह लुक-छिपकर परस्त्री या परधन को उड़ाना चाहता है, तब उनके स्वामी या राजा के हाथ से मारा जाकर ऐसे नरक में जा गिरता है जिसका ओर-छोर नहीं हैं ॥ २२ ॥ इसीसे ऐसा कहते हैं कि प्रवृत्तिमार्ग में रहकर किये हुए लौकिक और वैदिक दोनों ही प्रकार के कर्म जीव को संसार की ही प्राप्ति करानेवाले हैं ॥ २३ ॥ यदि किसी प्रकार राजा आदि के बन्धन से छूट भी गया, तो अन्याय से अपहरण किये हुए उन स्त्री और धन को देवदत्त नाम का कोई दूसरा व्यक्ति छीन लेता है और उससे विष्णुमित्र नाम का कोई तीसरा व्यक्ति झटक लेता है । इस प्रकार वे भोग एक पुरुष से दूसरे पुरुष के पास जाते रहते हैं, एक स्थान पर नहीं ठहरते ॥ २४ ॥ कभी-कभी शीत और वायु आदि अनेकों आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःख की स्थितियों के निवारण करने में समर्थ न होने से यह अपार चिन्ताओं के कारण उदास हो जाता है ॥ २५ ॥ कभी परस्पर लेन-देन का व्यवहार करते समय किसी दूसरे का थोड़ा-सा–दमड़ीभर अथवा इससे भी कम धन चुरा लेता है तो इस बेईमानी के कारण उससे वैर ठन जाता है ॥ २६ ॥

राजन् ! इस मार्ग में पूर्वोक्त विघ्नों के अतिरिक्त सुख-दुःख, राग-द्वेष, भय, अभिमान, प्रमाद, उन्माद, शोक, मोह, लोभ, मात्सर्य, ईर्ष्या, अपमान, क्षुधा-पिपासा, आधि-व्याधि, जन्म, जरा और मृत्यु आदि और भी अनेकों विघ्न हैं ॥ २७ ॥ (इस विघ्नबहुल मार्ग में इस प्रकार भटकता हुआ यह जीव) किसी समय देवमायारूपिणी स्त्री के बाहुपाश में पड़कर विवेकहीन हो जाता है । तब उसके लिये विहारभवन आदि बनवाने की चिन्ता में ग्रस्त रहता है तथा उसी के आश्रित रहनेवाले पुत्र, पुत्री और अन्यान्य स्त्रियों के मीठे-मीठे बोल, चितवन और चेष्टाओं में आसक्त होकर, उन्हीं में चित फैल जाने से वह इन्द्रियों का दास अपार अन्धकारमय नरकों में गिरता है ॥ २८ ॥

कालचक्र साक्षात् भगवान् विष्णु का आयुध है । वह परमाणु से लेकर द्विपरार्धपर्यन्त क्षण-घटी आदि अवयवों से युक्त है । वह निरन्तर सावधान रहकर घूमता रहता है, जल्दी-जल्दी बदलनेवाली बाल्य, यौवन आदि अवस्थाएँ ही उसका वेग है । उसके द्वारा वह ब्रह्मा से लेकर क्षुद्रातिक्षुद्र तृणपर्यन्त सभी भूतों का निरन्तर संहार करता रहता है । कोई भी उसकी गति में बाधा नहीं डाल सकता । उससे भय मानकर भी जिनका यह कालचक्र निज आयुध है, उन साक्षात् भगवान् यज्ञपुरुष की आराधना छोड़कर यह मन्दमति मनुष्य पाखण्डियों के चक्कर में पड़कर उनके कंक, गिद्ध, बगुला और बटेर के समान आर्यशास्त्रबहिष्कृत देवताओं का आश्रय लेता है जिनका केवल वेदबाह्य अप्रामाणिक आगमों ने ही उल्लेख किया है ॥ २९ ॥

ये पाखण्डी तो स्वयं ही धोखे में हैं: जब यह भी उनकी ठगाई में आकर दुखी होता है, तब ब्राह्मणों की शरण लेता है । किन्तु उपनयन-संस्कार के अनन्तर श्रौत-स्मार्तकर्मों से भगवान् यज्ञपुरुष की आराधना करना आदि जो उनका शास्त्रोक्त आचार हैं, वह इसे अच्छा नहीं लगता; इसलिये वेदोक्त आचार के अनुकूल अपने में शुद्धि न होने के कारण यह कर्म शून्य शूद्रकुल में प्रवेश करता है, जिसका स्वभाव वानरों के समान केवल कुटुम्बपोषण और स्त्रीसेवन करना ही है ॥ ३० ॥ वहाँ बिना रोक-टोक स्वच्छन्द विहार करने से इसकी बुद्धि अत्यन्त दीन हो जाती है और एक दूसरे का मुख देखना आदि विषय-भोगों में फँसकर इसे अपने मृत्युकाल का भी स्मरण नहीं होता ॥ ३१ ॥ वृक्षों के समान जिनका लौकिक सुख ही फल है — उन घरों में ही सुख मानकर वानरों की भाँती स्त्री-पुत्रादि में आसक्त होकर यह अपना सारा समय मैथुनादि विषय-भोगों में ही बिता देता हैं ॥ ३२ ॥

इस प्रकार प्रवृत्तिमार्ग में पड़कर सुख-दुःख भोगता हुआ यह जीव रोगरूपी गिरि-गुहा में फँसकर उसमें रहनेवाले मृत्युरूप हाथों से डरता रहता है ॥ ३३ ॥ कभी-कभी शीत, वायु आदि अनेक प्रकार के आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखों की निवृत्ति करने में जब असफल हो जाता है, तब उस समय अपार विषयों की चिन्ता से यह खिन्न हो उठता है ॥ ३४ ॥ कभी आपस में क्रय-विक्रय आदि व्यापार करने पर बहुत कंजूसी करने से इसे थोड़ा-सा धन हाथ लग जाता है ॥ ३५ ॥ कभी धन नष्ट हो जाने से जब इसके पास सोने, बैठने और खाने आदि की भी कोई सामग्री नहीं रहती, तब अपने अभीष्ट भोग न मिलने से यह उन्हें चोरी आदि बुरे उपायों से पाने का निश्चय करता है । इससे इसे जहाँ-तहाँ दूसरों के हाथ से बहुत अपमानित होना पड़ता है ॥ ३६ ॥ इस प्रकार धन की आसक्ति से परस्पर वैरभाव बढ़ जाने पर भी यह अपनी पूर्ववासनाओं से विवश होकर आपस में विवाहादि सम्बन्ध करता और छोड़ता रहता है ॥ ३७ ॥

इस संसारमार्ग में चलनेवाला यह जीव अनेक प्रकार के क्लेश और विघ्न-बाधाओं से बाधित होने पर भी मार्ग में जिसपर जहाँ आपत्ति आती हैं, अथवा जो कोई मर जाता है; उसे जहाँ-का-तहाँ छोड़ देता है, तथा नये जन्मे हुओं को साथ लगाता है, कभी किसी के लिये शोक करता है, किसी का दुःख देखकर मूर्छित हो जाता है, किसी के वियोग होने की आशङ्का से भयभीत हो उठता है, किसी से झगड़ने लगता है, कोई आपत्ति आती हैं तो रोने-चिल्लाने लगता हैं, कहीं कोई मन के अनुकूल बात हो गयी तो प्रसन्नता के मारे फूला नहीं समाता, कभी गाने लगता है और कभी उन्हीं के लिये बँधने में भी नहीं हिचकता । साधुजन इसके पास कभी नहीं आते, यह साधुसङ्ग से सदा वञ्चित रहता है । इस प्रकार यह निरन्तर आगे ही बढ़ रहा है । जहाँ से इसकी यात्रा आरम्भ हुई है और जिसे इस मार्ग की अन्तिम अवधि कहते हैं, उस परमात्मा के पास यह अभी तक नहीं लौटा है ॥ ३८ ॥

परमात्मा तक तो योगशास्त्र की भी गति नहीं है, जिन्होंने सब प्रकार के दण्ड (शासन) का त्याग कर दिया हैं, वे निवृत्तिपरायण संयतात्मा मुनिजन ही उसे प्राप्त कर पाते हैं ॥ ३९ ॥ जो दिग्गजों को जीतनेवाले और बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान करनेवाले राजर्षि हैं उनकी भी वहाँ तक गति नहीं है । वे संग्रामभूमि में शत्रुओं का सामना करके केवल प्राण परित्याग ही करते हैं तथा जिसमें ‘यह मेरी हैं’ ऐसा अभिमान करके वैर ठाना था उस पृथ्वी में ही अपना शरीर छोड़कर स्वयं परलोक को चले जाते हैं । इस संसार से वे भी पार नहीं होते ॥ ४० ॥ अपने पुण्यकर्मरूप लता का आश्रय लेकर यदि किसी प्रकार यह जीव इन आपत्तियों से अथवा नरक से छुटकारा पा भी जाता है, तो फिर इसी प्रकार संसारमार्ग में भटकता हुआ इस जनसमुदाय में मिल जाता है । यही दशा स्वर्गादि ऊर्ध्वलोको में जानेवालों की भी है ॥ ४१ ॥

राजन् ! राजर्षि भरत के विषय में पण्डितजन ऐसा कहते हैं — ‘जैसे गरुड़ की होड़ कोई मक्खी नहीं कर सकती, उसी प्रकार राजर्षि महात्मा भरत के मार्ग का कोई अन्य राजा मन से भी अनुसरण नहीं कर सकता ॥ ४२ ॥ उन्होंने पुण्यकीर्ति श्रीहरि में अनुरक्त होकर अति मनोरम स्त्री, पुत्र, मित्र और राज्यादि को युवावस्था में ही विष्ठा के समान त्याग दिया था; दूसरों के लिये तो इन्हें त्यागना बहुत ही कठिन है ॥ ४३ ॥ उन्होंने अति दुस्त्यज पृथ्वी, पुत्र, स्वजन, सम्पत्ति और स्त्री की तथा जिसके लिये बड़े-बड़े देवता भी लालायित रहते हैं; किन्तु जो स्वयं उनकी दयादृष्टि के लिये उनपर दृष्टिपात करती रहती थी उस लक्ष्मी की भी, लेशमात्र इच्छा नहीं की । यह सब उनके लिये उचित ही था, क्योंकि जिन महानुभावों का चित्त भगवान् मधुसूदन की सेवामें अनुरक्त हो गया है, उनकी दृष्टि में मोक्षपद भी अत्यन्त तुच्छ है ॥ ४४ ॥

उन्होंने मृगशरीर छोड़ने की इच्छा होने पर उच्चस्वर से कहा था कि धर्म की रक्षा करनेवाले, धर्मानुष्ठान में निपुण, योगगम्य, सांख्य के प्रतिपाद्य, प्रकृति के अधीश्वर, यज्ञमूर्ति सर्वान्तर्यामी श्रीहरि को नमस्कार है ।’ ॥ ४५ ॥

राजन् ! राजर्षि भरत के पवित्र गुण और कर्मों की भक्तजन भी प्रशंसा करते हैं । उनका यह चरित्र बड़ा कल्याणकारी, आयु और धन की वृद्धि करनेवाला, लोक में सुयश बढ़ानेवाला और अन्त में स्वर्ग तथा मोक्ष की प्राप्ति करानेवाला है । जो पुरुष इसे सुनता या सुनाता हैं और इसका अभिनन्दन करता है, उसकी सारी कामनाएँ स्वयं ही पूर्ण हो जाती हैं । दूसरों से उसे कुछ भी नहीं माँगना पड़ता ॥ ४६ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे चतुर्दशोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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