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श्रीमद्भागवतमहापुराण – षष्ठ स्कन्ध – अध्याय २
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
दूसरा अध्याय
विष्णुदूतों द्वारा भागवतधर्म-निरूपण और अजामिल का परमधामगमन

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! भगवान् के नीतिनिपुण एवं धर्म का मर्म जाननेवाले पार्षदों ने यमदूत का यह अभिभाषण सुनकर उनसे इस प्रकार कहा — ॥ १ ॥

भगवान् के पार्षदों ने कहा — यमदूतो ! यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि धर्मज्ञों की सभा में अधर्म प्रवेश कर रहा है, क्योंकि वहाँ निरपराध और अदण्डनीय व्यक्तियों को व्यर्थ ही दण्ड दिया जाता है ॥ २ ॥ जो प्रजा के रक्षक हैं, शासक हैं, समदर्शी और परोपकारी है — यदि वे ही प्रजा के प्रति विषमता का व्यवहार करने लगें तो फिर प्रजा किसकी शरण लेगी ?॥ ३ ॥ सत्पुरुष जैसा आचरण करते हैं, साधारण लोग भी वैसा ही करते हैं । वे अपने आचरण के द्वारा जिस कर्म को धर्मानुकूल प्रमाणित कर देते हैं, लोग उसी का अनुकरण करने लगते हैं ॥ ४ ॥ साधारण लोग पशुओं के समान धर्म और अधर्म का स्वरूप न जानकर किसी सत्पुरुष पर विश्वास कर लेते हैं, उसकी गोद में सिर रखकर निर्भय और निश्चिन्त सो जाते हैं ॥ ५ ॥ वही दयालु सत्पुरुष, जो प्राणियों का अत्यन्त विश्वासपात्र है और जिसे मित्रभाव से अपना हितैषी समझकर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया है, उन अज्ञानी जीवों के साथ कैसे विश्वासघात कर सकता है ? ॥ ६ ॥

यमदूतो ! इसने कोटि-कोटि जन्मों की पाप-राशि का पूरा-पूरा प्रायश्चित्त कर लिया है । क्योंकि इसने विवश होकर ही सही, भगवान् के परम कल्याणमय (मोक्षप्रद) नाम का उच्चारण तो किया हैं ॥ ७ ॥ जिस समय इसने ‘नारायण’ इन चार अक्षरों का उच्चारण किया, उसी समय केवल उतने से ही इस पापी के समस्त पापों का प्रायश्चित्त हो गया ॥ ८ ॥ चोर, शराबी, मित्रद्रोही, ब्रह्मघाती, गुरुपत्नीगामी, ऐसे लोगों का संसर्गी; स्त्री, राजा, पिता और गाय को मारनेवाला, चाहे जैसा और चाहे जितना बड़ा पापी हो, सभी के लिये यही — इतना ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है कि भगवान् के नामों का उच्चारण किया जाय; क्योंकि भगवन्नामों के उच्चारण से मनुष्य की बुद्धि भगवान् के गुण, लीला और स्वरूप में रम जाती है और स्वयं भगवान् को उसके प्रति आत्मीयबुद्धि हो जाती है ॥ ९-१० ॥ बड़े-बड़े ब्रह्मवादी ऋषियों ने पापों के बहुत-से प्रायश्चित्त-कृच्छ्चान्द्रायण आदि व्रत बतलाये हैं; परन्तु उन प्रायश्चित्तों से पापी की वैसी जड़ से शुद्धि नहीं होती, जैसी भगवान् के नामों का, उनसे गुम्फित पदों का उच्चारण करने से होती है । क्योंकि वे नाम पवित्रकीर्ति भगवान् के गुणों का ज्ञान करानेवाले हैं ॥ ११ ॥

यदि प्रायश्चित्त करने के बाद भी मन फिर से कुमार्ग में-पाप की ओर दौड़े, तो वह चरम सीमा का पूरा-पूरा प्रायश्चित्त नहीं है । इसलिये जो लोग ऐसा प्रायश्चित्त करना चाहें कि जिससे पापकर्मों और वासनाओं की जड़ ही उखड़ जाय, उन्हें भगवान् के गुणों का ही गान करना चाहिये, क्योंकि उससे चित्त सर्वथा शुद्ध हो जाता है ॥ १२ ॥ इसलिये यमदूतो ! तुमलोग अजामिल को मत ले जाओ । इसने सारे पापों का प्रायश्चित्त कर लिया है, क्योंकि इसने मरते समय भगवान् के नाम का उच्चारण किया है ॥ १३ ॥

बड़े-बड़े महात्मा पुरुष यह बात जानते हैं कि सङ्केत में (किसी दूसरे अभिप्राय से), परिहास, तान अलापने में अथवा किसी की अवहेलना करने में भी यदि कोई भगवान् के नामों का उच्चारण करता हैं तो उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १४ ॥ जो मनुष्य गिरते समय, पैर फिसलते समय, अङ्गभङ्ग होते समय और साँप के डँसते, आग में जलते तथा चोट लगते समय भी विवशता से ‘हरि-हरि’ कहकर भगवान् के नाम का उच्चारण कर लेता है, वह यमयातना का पात्र नहीं रह जाता ॥ १५ ॥ महर्षियों ने जानबूझकर बड़े पापों के लिये बड़े और छोटे पापों के लिये छोटे प्रायश्चित्त बतलाये हैं ॥ १६ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि उन तपस्या, दान, जप आदि प्रायश्चित्त के द्वारा वे पाप नष्ट हो जाते हैं । परन्तु उन पापों से मलिन हुआ उसका हृदय शुद्ध नहीं होता । भगवान् के चरणों की सेवासे वह भी शुद्ध हो जाता है ॥ १७ ॥ यमदूतो ! जैसे जान या अनजान में ईंधन से अग्नि का स्पर्श हो जाय तो वह भस्म हो ही जाता हैं, वैसे ही जान-बूझकर या अनजान में भगवान् के नामों का सङ्कीर्तन करने से मनुष्य के सारे पाप भस्म हो जाते हैं ॥ १८ ॥

जैसे कोई परम शक्तिशाली अमृत को उसका गुण न जानकर अनजान में पी ले तो भी वह अवश्य ही पीनेवाले को अमर बना देता है, वैसे ही अनजान में उच्चारण करने पर भी भगवान् का नाम अपना फल देकर ही रहता है (वस्तुशक्ति श्रद्धा की अपेक्षा नहीं करती) ॥ १९ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजन् ! इस प्रकार भगवान् के पार्षदों ने भागवतधर्म का पूरा-पूरा निर्णय सुना दिया और अजामिल को यमदूतों के पाश से छुड़ाकर मृत्यु के मुख से बचा लिया ॥ २० ॥ प्रिय परीक्षित् ! पार्षदों की यह बात सुनकर यमदूत यमराज के पास गये और उन्हें यह सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों सुना दिया ॥ २१ ॥ अजामिल यमदूतों के फंदे से छूटकर निर्भय और स्वस्थ हो गया । उसने भगवान् के पार्षदों के दर्शनजनित आनन्द में मग्न होकर उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया ॥ २२ ॥

निष्पाप परीक्षित् ! भगवान् के पार्षदों ने देखा कि अजामिल कुछ कहना चाहता है, तब वे सहसा उसके सामने ही वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २३ ॥ इस अवसर पर अजामिल ने भगवान् के पार्षदों से विशुद्ध भागवतधर्म और यमदूतों के मुख से वेदोक्त सगुण (प्रवृत्तिविषयक) घर्म का श्रवण किया था ॥ २४ ॥ सर्वपापापहारी भगवान् की महिमा सुनने से अजामिल के हृदय में शीघ्र ही भक्ति का उदय हो गया । अब उसे अपने पापों को याद करके बड़ा पश्चात्ताप होने लगा ॥ २५ ॥ (अजामिल मन-ही-मन सोचने लगा-) ‘अरे, मैं कैसा इन्द्रियों का दास हूँ । मैंने एक दासी के गर्भ से पुत्र उत्पन्न करके अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया । यह बड़े दुःख की बात है ॥ २६ ॥ धिक्कार है ! मुझे बार-बार धिक्कार है । मैं संतों के द्वारा निन्दित हूँ, पापात्मा हूँ ! मैंने अपने कुल में कलङ्क का टीका लगा दिया ! हाय-हाय, मैंने अपनी सती एवं अबोध पत्नी का परित्याग कर दिया और शराब पीनेवाली कुलटा का संसर्ग किया ॥ २७ ॥ मैं कितना नीच हूँ ! मेरे मा-बाप बुड़े और तपस्वी थे । वे सर्वथा असहाय थे, उनकी सेवा-शुश्रूषा करनेवाला और कोई नहीं था । मैंने उनका भी परित्याग कर दिया । ओह ! मैं कितना कृतघ्न हूँ ॥ २८ ॥ मैं अब अवश्य ही अत्यन्त भयावने नरक में गिरूँगा, जिसमें गिरकर धर्मघाती पापात्मा कामी पुरुष अनेकों प्रकार की यमयातना भोगते हैं ॥ २९ ॥

मैंने अभी जो अद्भुत दृश्य देखा, क्या यह स्वप्न हैं ? अथवा जाग्रत् अवस्था का ही प्रत्यक्ष अनुभव है । अभी-अभी जो हाथों में फंदा लेकर मुझे खींच रहे थे, वे कहाँ चले गये ? ॥ ३० ॥ अभी-अभी वे मुझे अपने फंदों में फंसाकर पृथ्वी के नीचे ले जा रहे थे, परन्तु चार अत्यन्त सुन्दर सिद्धों ने आकर मुझे छुड़ा लिया ! वे अब कहाँ चले गये ॥ ३१ ॥ यद्यपि मैं इस जन्म का महापापी हैं, फिर भी मैंने पूर्वजन्मों में अवश्य ही शुभकर्म किये होंगे; तभी तो मुझे इन श्रेष्ठ देवताओं के दर्शन हुए । उनकी स्मृति से मेरा हृदय अब भी आनन्द से भर रहा है ॥ ३२ ॥ मैं कुलटागामी और अत्यन्त अपवित्र हूँ । यदि पूर्वजन्म में मैंने पुण्य न किये होते, तो मरने के समय मेरी जीभ भगवान् के मनोमोहक नाम का उच्चारण कैसे कर पाती ? ॥ ३३ ॥ कहाँ तो मैं महाकपटी, पापी, निर्लज्ज और ब्रह्मतेज से नष्ट करनेवाला तथा कहाँ भगवान् का वह परम मङ्गलमय ‘नारायण’ नाम ! (सचमुच मैं तो कृतार्थ हो गया) ॥ ३४ ॥

अब मैं अपने मन, इन्द्रिय और प्राणों को वश में करके ऐसा प्रयत्न करूंगा कि फिर अपने को घोर अन्धकारमय नरक में न डालें ॥ ३५ ॥ अज्ञानवश मैंने अपने को शरीर समझकर उसके लिये बड़ी-बड़ी कामनाएँ की और उनकी पूर्ति के लिये अनेको कर्म किये । उन्हीं का फल है यह बन्धन ! अब मैं इसे काटकर समस्त प्राणियों का हित करूंगा, वासनाओं को शान्त कर दूंगा, सबसे मित्रता का व्यवहार करूंगा, दुखियों पर दया करूँगा और पूरे संयम के साथ रहूँगा ॥ ३६ ॥ भगवान् की माया ने स्त्री का रूप धारण करके मुझ अधम को फाँस लिया और क्रीडामृग की भाँति मुझे बहुत नाच नचाया । अब मैं अपने-आपको उस माया से मुक्त करूंगा ॥ ३७ ॥ मैंने सत्य वस्तु परमात्मा को पहचान लिया हैं; अतः अब मैं शरीर आदि में ‘मैं तथा ‘मेरे’ का भाव छोड़कर भगवन्नाम के कीर्तन आदि से अपने मन को शुद्ध करूँगा और उसे भगवान् में लगाऊँगा ॥ ३८ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! उन भगवान् के पार्षद महात्माओं का केवल थोड़ी ही देर के लिये सत्सङ्ग हुआ था । इतने से ही अजामिल के चित में संसार के प्रति तीव्र वैराग्य हो गया । वे सबके सम्बन्ध और मोह को छोड़कर हरद्वार चले गये ॥ ३९ ॥ उस देवस्थान में जाकर वे भगवान् के मन्दिर में आसन से बैठ गये और उन्होंने योगमार्ग का आश्रय लेकर अपनी सारी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर मन में लीन कर लिया और मन को बुद्धि में मिला दिया ॥ ४० ॥ इसके बाद आत्मचिन्तन के द्वारा उन्होंने बुद्धि को विषयों से पृथक् कर लिया तथा भगवान् के धाम अनुभव स्वरूप परब्रह्म में जोड़ दिया ॥ ४१ ॥ इस प्रकार जब अजामिल की बुद्धि त्रिगुणमयी प्रकृति से ऊपर उठकर भगवान् के स्वरूप में स्थित हो गयी, तब उन्होंने देखा कि उनके सामने वे ही चारों पार्षद, जिन्हें उन्होंने पहले देखा था, खड़े हैं । अजामिल ने सिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया ॥ ४२ ॥ उनका दर्शन पाने के बाद उन्होंने उस तीर्थस्थान में गङ्गा के तट पर अपना शरीर त्याग दिया और तत्काल भगवान् पार्षदों का स्वरूप प्राप्त कर लिया ॥ ४३ ॥ अजामिल भगवान् के पार्षदों के साथ स्वर्णमय विमान पर आरूढ़ होकर आकाशमार्ग से भगवान् लक्ष्मीपति के निवासस्थान वैकुण्ठ को चले गये ॥ ४४ ॥

परीक्षित् ! अजामिल ने दासी का सहवास करके साय धर्म-कर्म चौपट कर दिया था । वे अपने निन्दित कर्मों के कारण पतित हो गये थे । नियमों से च्युत हो जाने के कारण उन्हें नरक में गिराया जा रहा था । परन्तु भगवान् के एक नाम का उच्चारण करने मात्र से वे उससे तत्काल मुक्त हो गये ॥ ४५ ॥ जो लोग इस संसार-बन्धन से मुक्त होना चाहते हैं, उनके लिये अपने चरण स्पर्श से तीर्थ को भी तीर्थ बनानेवाले भगवान् के नाम से बढ़कर और कोई साधन नहीं है, क्योंकि नाम का आश्रय लेने से मनुष्य का मन फिर कर्म के पचड़ों में नहीं पड़ता । भगवन्नाम के अतिरिक्त और किसी प्रायश्चित्त का आश्रय लेने पर मन रजोगुण और तमोगुण से ग्रस्त हीं रहता है तथा पापों का पूरा-पूरा नाश भी नहीं होता ॥ ४६ ॥

परीक्षित् ! यह इतिहास अत्यन्त गोपनीय और समस्त पापों का नाश करनेवाला है । जो पुरुष श्रद्धा और भक्ति के साथ इसका श्रवण-कीर्तन करता है, वह नरक में कभी नहीं जाता । यमराज के दूत तो आँख उठाकर उसकी और देख तक नहीं सकते । उस पुरुष का जीवन चाहे पापमय ही क्यों न रहा हो, वैकुण्ठलोक में उसकी पूजा होती है ॥ ४७-४८ ॥ परीक्षित् ! देखो-अजामिल जैसे पापी ने मृत्यु के समय पुत्र के बहाने भगवान् के नाम का उच्चारण किया ! उसे भी वैकुण्ठ की प्राप्ति हो गयी ! फिर जो लोग श्रद्धा के साथ भगवन्नाम का उच्चारण करते हैं, उनकी तो बात ही क्या है ॥ ४९ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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