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श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय ४
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
चौथा अध्याय
हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद  के गुणों का वर्णन

नारदजी कहते हैं — युधिष्ठिर ! जब हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी से इस प्रकार के अत्यन्त दुर्लभ वर माँगे, तब उन्होंने उसकी तपस्या से प्रसन्न होने के कारण उसे वे वर दे दिये ॥ १ ॥

ब्रह्माजी ने कहा — बेटा ! तुम जो वर मुझसे माँग रहे हो, वे जीवों के लिये बहुत ही दुर्लभ हैं, परन्तु दुर्लभ होने पर भी मैं तुम्हें वे सब वर दिये देता हूँ ॥ २ ॥

[नारदजी कहते हैं —] ब्रह्माजी के वरदान कभी झूठे नहीं होते । वे समर्थ एवं भगवद्रूप ही हैं । वरदान मिल जाने के बाद हिरण्यकशिपु ने उनकी पूजा की । तत्पश्चात् प्रजापतियों से अपनी स्तुति सुनते हुए वे अपने लोक को चले गये ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी से वर प्राप्त करने पर हिरण्यकशिपु का शरीर सुवर्ण के समान कान्तिमान् एवं हृष्ट-पुष्ट हो गया । वह अपने भाई की मृत्यु का स्मरण करके भगवान् से द्वेष करने लगा ॥ ४ ॥ उस महादेत्य ने समस्त दिशाओं, तीनों लोकों तथा देवता, असुर, नरपति, गन्धर्व, गरुड़, सर्प, सिद्ध, चारण, विद्याधर, ऋषि, पितरों के अधिपति, मनु, यक्ष, राक्षस, पिशाचराज़, प्रेत, भूतपति एवं समस्त प्राणियों के राजाओं को जीतकर अपने वश में कर लिया । यहाँ तक कि उस विश्व-विजयी दैत्य ने लोकपालों की शक्ति और स्थान भी छीन लिये ॥ ५-७ ॥ अब वह नन्दनवन आदि दिव्य उद्यानों के सौन्दर्य से युक्त स्वर्ग में ही रहने लगा था । स्वयं विश्वकर्मा का बनाया हुआ इन्द्र का भवन ही उसका निवासस्थान था । उस भवन में तीनों लोकों का सौन्दर्य मूर्तिमान् होकर निवास करता था । वह सब प्रकार की सम्पत्तियों से सम्पन्न था ॥ ८ ॥ उस महल में मुँगे की सीढ़ियाँ, पन्ने की गचें, स्फटिकमणि की दीवारें, वैदूर्यमणि के खंभे और माणिक की कुर्सियाँ थीं । रंग-बिरंगे चँदोवे तथा दूध के फेन के समान शय्याएँ, जिन पर मोतियों की झालरें लगी हुई थीं, शोभायमान हो रही थी ॥ ९-१० ॥

सर्वाङ्गसुन्दरी अप्सराएँ अपने नूपुरों से रुन-झुन ध्वनि करती हुई रत्नमय भूमि पर इधर-उधर टहला करती थी और कहीं-कहीं उसमें अपना सुन्दर मुख देखने लगती थीं ॥ ११ ॥ उस महेन्द्र के महल में महाबली और महामनस्वी हिरण्यकशिपु सब लोकों को जीतकर, सबका एकछत्र सम्राट् बनकर बड़ी स्वतन्त्रता से विहार करने लगा । उसका शासन इतना कठोर था कि उससे भयभीत होकर देव-दानव उसके चरणों की वन्दना करते रहते थे ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर ! वह उत्कट गन्धवाली मदिरा पीकर मतवाला रहा करता था । उसकी आँखें लाल-लाल और चढ़ी हुई रहती । उस समय तपस्या, योग, शारीरिक और मानसिक बल का वह भंडार था । ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के सिवा और सभी देवता अपने हाथों में भेट ले-लेकर उसकी सेवामें लगे रहते ॥ १३ ॥ जब वह अपने पुरुषार्थ से इन्द्रासन पर बैठ गया, तब युधिष्ठिर ! विश्वावसु, तुम्बुरु तथा हम सभी लोग उसके सामने गान करते थे । गन्धर्व, सिद्ध, ऋषिगण, विद्याधर और अप्सराएँ बार-बार उसकी स्तुति करती थी ॥ १४ ॥

युधिष्ठिर ! वह इतना तेजस्वी था कि वर्णाश्रमधर्म का पालन करनेवाले पुरुष जो बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञ करते, उनके यज्ञों की आहुति वह स्वयं छीन लेता ॥ १५ ॥ पृथ्वी के सातों द्वीपों में उसका अखण्ड राज्य था । सभी जगह बिना ही जोते-बोये धरती से अन्न पैदा होता था । वह जो कुछ चाहता, अन्तरिक्ष से उसे मिल जाता तथा आकाश उसे भाँति-भाँति की आश्चर्यजनक वस्तुएँ दिखा-दिखाकर उसका मनोरंजन करता था ॥ १६ ॥ इसी प्रकार खारे पानी, सुरा, घृत, इक्षुरस, दधि, दुग्ध और मीठे पानी के समुद्र भी अपनी पत्नी नदियों के साथ तरङ्गों के द्वारा उसके पास रत्नराशि पहुँचाया करते थे ॥ १७ ॥ पर्वत अपनी घाटियों के रूप में उसके लिये खेलने का स्थान जुटाते और वृक्ष सब ऋतुओं में फूलते-फलते । वह अकेला ही सब लोकपालों के विभिन्न गुणों को धारण करता ॥ १८ ॥ इस प्रकार दिग्विजय और एकच्छत्र सम्राट् होकर वह अपने को प्रिय लगनेवाले विषयों का स्वच्छन्द उपभोग करने लगा । परन्तु इतने विषयों से भी उसकी तृप्ति न हो सकी । क्योंकि अन्ततः वह इन्द्रियों का दास ही तो था ॥ १९ ॥

युधिष्ठिर ! इस रूप में भी वह भगवान् का वही पार्षद हैं, जिसे सनकादिकों ने शाप दिया था । वह ऐश्वर्य के मद से मतवाला हो रहा था तथा घमंड़ में चूर होकर शास्त्रों की मर्यादा का उल्लङ्घन कर रहा था । देखते-ही-देखते उसके जीवन का बहुत-सा समय बीत गया ॥ २० ॥ उसके कठोर शासन से सब लोक और लोकपाल घबरा गये । जब उन्हें और कहीं किसी का आश्रय न मिला, तब उन्होंने भगवान् की शरण ली ॥ २१ ॥ (उन्होंने मन-ही-मन् कहा — )’जहाँ सर्वात्मा जगदीश्वर श्रीहरि निवास करते हैं और जिसे प्राप्त करके शान्त एवं निर्मल संन्यासी महात्मा फिर लौटते नहीं, भगवान् के उस परम धाम को हम नमस्कार करते हैं ॥ २२ ॥ इस भाव से अपनी इन्द्रियों का संयम और मन को समाहित करके उन लोगों ने खाना-पीना और सोना छोड़ दिया तथा निर्मल हृदय से भगवान् की आराधना की ॥ २३ ॥ एक दिन उन्हें मेष के समान गम्भीर आकाशवाणी सुनायी पड़ी । उसकी ध्वनि से दिशाएँ गुंज उठी । साधुओं को अभय देनेवाली वह वाणी यो थी — ॥ २४ ॥ ‘श्रेष्ठ देवताओं ! डरो मत । तुम सब लोगों का कल्याण हो । मेरे दर्शन से प्राणियों को परम कल्याण की प्राप्ति हो जाती है ॥ २५ ॥ इस नीच दैत्य की दुष्टता का मुझे पहले से ही पता है । मैं इसको मिटा दूंगा । अभी कुछ दिनों तक समय की प्रतीक्षा करो ॥ २६ ॥ कोई भी प्राणी जब देवता, वेद, गाय, ब्राह्मण, साधु, धर्म और मुझसे द्वेष करने लगता है, तब शीघ्र ही उसका विनाश हो जाता है ॥ २७ ॥ जब यह अपने वैरहीन, शान्त और महात्मा पुत्र प्रह्लाद से द्रोह करेगा — उसका अनिष्ट करना चाहेगा, तब वर के कारण शक्तिसम्पन्न होने पर भी इसे मैं अवश्य मार डालूंगा ।’ ॥ २८ ॥

नारदजी कहते हैं — सबके हृदय में ज्ञान का सञ्चार करनेवाले भगवान् ने जब देवताओं को यह आदेश दिया, तब वे उन्हें प्रणाम करके लौट आये । उनका सारा उद्वेग मिट गया और उन्हें ऐसा मालूम होने लगा कि हिरण्यकशिपु मर गया ॥ २९ ॥

युधिष्ठिर ! दैत्यराज हिरण्यकशिपु के बड़े ही विलक्षण चार पुत्र थे । उनमें प्रह्लाद यों तो सबसे छोटे थे, परन्तु गुणों में सबसे बड़े थे । वे बड़े संतसेवी थे ॥ ३० ॥ ब्राह्मणभक्त, सौम्यस्वभाव, सत्यप्रतिज्ञ एवं जितेन्द्रिय थे तथा समस्त प्राणियों के साथ अपने ही समान समता का बर्ताव करते और सबके एकमात्र प्रिय और सच्चे हितैषी थे ॥ ३१ ॥ बड़े लोगों के चरणों में सेवक की तरह झुककर रहते थे । गरीबों पर पिता के समान स्नेह रखते थे । बराबरीवालों से भाई के समान प्रेम करते और गुरुजनों में भगवद्भाव रखते थे । विद्या, धन, सौन्दर्य और कुलीनता से सम्पन्न होने पर भी घमंड और हेकड़ी उन्हें छू तक नहीं गयी थी ॥ ३२ ॥ बड़े-बड़े दुःखों में भी वे तनिक भी घबराते न थे । लोक-परलोक के विषयों को उन्होंने देखा-सुना तो बहुत था, परन्तु वे उन्हें निःसार और असत्य समझते थे । इसलिये उनके मन में किसी भी वस्तु की लालसा न थी । इन्द्रिय, प्राण, शरीर और मन उनके वश में थे । उनके चित्त में कभी किसी प्रकार की कामना नहीं उठतीं थी । जन्म से असुर होने पर भी उनमें आसुरी सम्पत्ति का लेश भी नहीं था ॥ ३३ ॥ जैसे भगवान् के गुण अनन्त हैं, वैसे ही प्रह्लाद के श्रेष्ठ गुणों की भी कोई सीमा नहीं है । महात्मालोग सदा से उनका वर्णन करते और उन्हें अपनाते आये हैं । तथापि वे आज भी ज्यों-के-त्यों बने हुए हैं ॥ ३४ ॥ युधिष्ठिर ! यों तो देवता उनके शत्रु है; परन्तु फिर भी भक्तों का चरित्र सुनने के लिये जब उन लोगों की सभा होती है, तब वे दूसरे भक्तों को प्रह्लाद के समान कहकर उनका सम्मान करते हैं । फिर आप-जैसे अजातशत्रु भगवद्भक्त उनका आदर करेंगे, इसमें तो सन्देह ही क्या है ॥ ३५ ॥

उनकी महिमा का वर्णन करने के लिये अगणित गुणों के कहने-सुनने की आवश्यकता नहीं । केवल एक ही गुण-भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में स्वाभाविक, जन्मजात प्रेम उनकी महिमा को प्रकट करने के लिये पर्याप्त है ॥ ३६ ॥

युधिष्ठिर ! प्रह्लाद बचपन में ही खेल-कूद छोड़कर भगवान् के ध्यान में जडवत् तन्मय हो जाया करते । भगवान् श्रीकृष्ण के अनुग्रहरूप ग्रह ने उनके हृदय को इस प्रकार खींच लिया था कि उन्हें जगत् की कुछ सुध-बुध ही न रहती ॥ ३७ ॥ उन्हें ऐसा जान पड़ता कि भगवान् मुझे अपनी गोद में लेकर आलिङ्गन कर रहे हैं । इसलिये उन्हें सोते-बैठते, खाते-पीते, चलते-फिरते और बातचीत करते समय भी इन बातों का ध्यान बिल्कुल न रहता ॥ ३८ ॥ कभी-कभी भगवान् मुझे छोड़कर चले गये, इस भावना में उनका हृदय इतना डूब जाता कि वे जोर-जोर से रोने लगते । कभी मन-ही-मन उन्हें अपने सामने पाकर आनन्दोद्रेक से ठठाकर हँसने लगते । कभी उनके ध्यान के मधुर आनन्द का अनुभव करके जोर से गाने लगते ॥ ३१ ॥ वे कभी उत्सुक हो बेसुरा चिल्ला पड़ते । कभी-कभी लोक-लज्जा का त्याग करके प्रेम में छककर नाचने भी लगते थे । कभी-कभी उनकी लीला के चिन्तन में इतने तल्लीन हो जाते कि उन्हें अपनी याद ही न रहती, उन्हीं का अनुकरण करने लगते ॥ ४० ॥ कभी भीतर-ही-भीतर भगवान् का कोमल संस्पर्श अनुभव करके आनन्द में मग्न हो जाते और चुपचाप शान्त होकर बैठ रहते । उस समय उनका रोम-रोम पुलकित हो उठता । अधखुले नेत्र अविचल प्रेम और आनन्द के आँसुओं से भरे रहते ॥ ४१ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों की यह भक्ति अकिञ्चन भगवत्प्रेमी महात्माओं के सङ्ग से ही प्राप्त होती हैं । इसके द्वारा वे स्वयं तो परमानन्द में मग्न रहते ही थे, जिन बेचारों का मन कुसङ्ग के कारण अत्यन्त दीन-हीन हो रहा था, उन्हें भी बार-बार शान्ति प्रदान करते थे ॥ ४२ ॥ युधिष्ठिर ! प्रह्लाद भगवान् के परम प्रेमी भक्त, परम भाग्यवान् और ऊँची कोटि के महात्मा थे । हिरण्यकशिपु ऐसे साधु पुत्र को भी अपराधी बतलाकर उनका अनिष्ट करने की चेष्टा करने लगा ॥ ४३ ॥

युधिष्ठिर ने पूछा — नारदजी ! आपका व्रत अखण्ड है । अब हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि हिरण्यकशिपु ने पिता होकर भी ऐसे शुद्ध हृदय महात्मा पुत्र से द्रोह क्यों किया ॥ ४४ ॥ पिता तो स्वभाव से ही अपने पुत्रों से प्रेम करते हैं । यदि पुत्र कोई उलटा काम करता है, तो वे उसे शिक्षा देने के लिये ही डाँटते हैं, शत्रु की तरह वैर-विरोध तो नहीं करते ॥ ४५ ॥ फिर प्रह्लादजी-जैसे अनुकूल, शुद्धहृदय एवं गुरुजनों में भगवद्भाव करनेवाले पुत्रों से भला, कोई द्वेष कर ही कैसे सकता है । नारदजी ! आप सब कुछ जानते हैं । हमें यह जानकर बड़ा कौतूहल हो रहा है कि पिता ने द्वेष के कारण पुत्र को मार डालना चाहा । आप कृपा करके मेरा यह कुतूहल शान्त कीजिये ॥ ४६ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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