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श्रीमद्भागवतमहापुराण – सप्तम स्कन्ध – अध्याय ५
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
पाँचवाँ अध्याय
हिरण्यकशिपु के द्वारा प्रह्लादजी के वध का प्रयत्न

नारदजी कहते हैं — युधिष्ठिर ! दैत्यों ने भगवान् श्रीशुक्राचार्यजी को अपना पुरोहित बनाया था । उनके दो पुत्र थे — शण्ड और अमर्क । वे दोनों राजमहल के पास ही रहकर हिरण्यकशिपु के द्वारा भेजे हुए नीतिनिपुण बालक प्रह्लाद को और दूसरे पढ़ाने योग्य दैत्य-बालकों को राजनीति, अर्थनीति आदि पढ़ाया करते थे ॥ १-२ ॥ प्रह्लाद गुरुजी का पढ़ाया हुआ पाठ सुन लेते थे और उसे ज्यों-का-त्यों उन्हें सुना भी दिया करते थे । किन्तु वे उसे मन से अच्छा नहीं समझते थे । क्योंकि उस पाठ का मूल आधार था अपने और पराये का झूठा आग्रह ॥ ३ ॥ युधिष्ठिर ! एक दिन हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को बड़े प्रेम से गोद में लेकर पूछा — बेटा ! बताओ तो सही, तुम्हें कौन-सी बात अच्छी लगती है ?’ ॥ ४ ॥

प्रहादजी ने कहा — पिताजी ! संसार के प्राणी ‘मैं’ और ‘मेरे’ के झूठे आग्रह में पड़कर सदा ही अत्यन्त उद्विग्न रहते हैं । ऐसे प्राणियों के लिये मैं यही ठीक समझता हूँ कि वे अपने अधःपतन के मूल कारण, घास से ढके हुए अंधेरे कुएं के समान इस घर को छेड़कर वन में चले जायें और भगवान् श्रीहरि की शरण ग्रहण करे ॥ ५ ॥

नारदजी कहते हैं — प्रह्लादजी के मुँह से शत्रुपक्ष की प्रशंसा से भरी बात सुनकर हिरण्यकशिपु ठठाकर हँस पड़ा । उसने कहा — ‘दूसरों के बहकाने से बच्चों की बुद्धि यों ही बिगड़ जाया करती है ॥ ६ ॥ जान पड़ता है गुरुजी के घर पर विष्णु के पक्षपाती कुछ ब्राह्मण वेष बदलकर रहते हैं । बालक की भली-भाँति देख-रेख की जाय, जिससे अब इसकी बुद्धि बहकने न पाये ॥ ७ ॥

जब दैत्यों ने प्रह्लाद को गुरुजी के घर पहुँचा दिया, तब पुरोहितों ने उनको बहुत पुचकारकर और फुसलाकर बड़ी मधुर वाणी से पूछा ॥ ८ ॥ बेटा प्रह्लाद ! तुम्हारा कल्याण हो ठीक-ठीक बतलाना । देखो, झूठ न बोलना । यह तुम्हारी बुद्धि उलटी कैसे हो गयी ? और किसी बालक की बुद्धि तो ऐसी नहीं हुई ॥ ९ ॥ कुलनन्दन प्रह्लाद ! बताओ तो बेटा ! हम तुम्हारे गुरुजन यह जानना चाहते हैं कि तुम्हारी बुद्धि स्वयं ऐसी हो गयी या किसी ने सचमुच तुमको बहका दिया है ? ॥ १० ॥

प्रह्लादजी ने कहा — जिन मनुष्यों की बुद्धि मोह से ग्रस्त हो रही है, उन्हीं को भगवान् की माया से यह झूठा दुराग्रह होता देखा गया है कि यह ‘अपना’ है और यह ‘पराया’ । उन मायापति भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ११ ॥ वे भगवान् ही जब कृपा करते हैं, तब मनुष्यों की पाशविक बुद्धि नष्ट होती हैं । इस पशुबुद्धि के कारण ही तो ‘यह मैं हूँ और यह मुझसे भिन्न है । इस प्रकार का झूठा भेदभाव पैदा होता है ॥ १२ ॥ वही परमात्मा यह आत्मा हैं । अज्ञानीलोग अपने और पराये का भेद करके उसका वर्णन किया करते हैं । उनका न जानना भी ठीक ही हैं, क्योंकि उसके तत्व को जानना बहुत कठिन हैं और ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े वेदज्ञ भी उसके विषय में मोहित हो जाते हैं । वही परमात्मा आप लोगों के शब्दों में मेरी बुद्धि ‘बिगाड़ रहा है ॥ १३ ॥ गुरुजी ! जैसे चुम्बक के पास लोहा स्वयं खिंच आता है, वैसे ही चक्रपाणि भगवान् की स्वच्छन्द इच्छाशक्ति से मेरा चित भी संसार से अलग होकर उनकी ओर बरबस खिंच जाता है ॥ १४ ॥

नारदजी कहते हैं — परमज्ञानी प्रह्लाद अपने गुरुजी से इतना कहकर चुप हो गये । पुरोहित बेचारे राजा के सेवक एवं पराधीन थे । वे डर गये । उन्होंने क्रोध से प्रह्लाद को झिड़क दिया और कहा — ॥ १५ ॥ ‘अरे, कोई मेरा बेंत तो लाओ । यह हमारी कीर्ति में कलङ्क लगा रहा है । इस दुर्बुद्धि कुलाङ्गार को ठीक करने के लिये चौथा उपाय दण्ड ही उपयुक्त होगा ॥ १६ ॥ दैत्यवंश के चन्दनवन में यह काँटेदार बबूल कहाँ से पैदा हुआ ? जो विष्णु इस वन को जड़ काटने में कुल्हाड़े का काम करते हैं, यह नादान बालक उन्हीं की बेंट बन रहा है; सहायक हो रहा है ॥ १७ ॥ इस प्रकार गुरुजी ने तरह-तरह से डॉट-डपटकर प्रह्लाद को धमकाया और अर्थ, धर्म एवं कामसम्बन्धी शिक्षा दी ॥ १८ ॥ कुछ समय के बाद जब गुरुजी ने देखा कि प्रह्लाद ने साम, दान, भेद और दण्ड के सम्बन्ध की सारी बातें जान ली है, तब वे उन्हें उनको माँ के पास ले गये । माता ने बड़े लाड़-प्यार से उन्हें नहला-धुलाकर अच्छी तरह गहने-कपड़ों से सजा दिया । इसके बाद वे उन्हें हिरण्यकशिपु के पास ले गये ॥ १९ ॥ प्रह्लाद अपने पिता के चरणों में लोट गये । हिरण्यकशिपु ने उन्हें आशीर्वाद दिया और दोनों हाथों से उठाकर बहुत देर तक गले से लगाये रखा । उस समय दैत्यराज का हृदय आनन्द से भर रहा था ॥ २० ॥ युधिष्ठिर ! हिरण्यकशिपु ने प्रसत्रमुख प्रह्लाद को अपनी गोद में बैठाकर उनका सिर सुंघा । उनके नेत्रों से प्रेम के आँसू गिर-गिरकर प्रह्लाद के शरीर को भिगोने लगे । उसने अपने पुत्र से पूछा ॥ २१ ॥

हिरण्यकशिपु ने कहा — चिरञ्जीव बेटा प्रह्लाद ! इतने दिनों में तुमने गुरुजी से जो शिक्षा प्राप्त की है, उसमें से कोई अच्छी-सी बात हमें सुनाओ ॥ २२ ॥

प्रह्लादजी ने कहा — पिताजी ! विष्णु भगवान् की भक्ति के नौ भेद हैं — भगवान् के गुण-लीला-नाम आदि का श्रवण, उन्हीं का कीर्तन, उनके रूप-नाम आदि का स्मरण, उनके चरणों की सेवा, पूजा-अर्चा, वन्दन, दास्य, सख्य, और आत्मनिवेदन । यदि भगवान् के प्रति समर्पण के भाव से यह नौ प्रकार की भक्ति की जाय, तो मैं उसी को उत्तम अध्ययन समझता हूँ’ ॥ २३-२४ ॥ प्रह्लाद की यह बात सुनते ही क्रोध के मारे हिरण्यकशिपु के ओठ फड़कने लगे । उसने गुरुपुत्र से कहा — ॥ २५ ॥ रे नीच ब्राह्मण ! यह तेरी कैसी करतूत है; दुर्बुद्धि ! तूने मेरी कुछ भी परवाह न करके इस बच्चे को कैसी निस्सार शिक्षा दे दी ? अवश्य ही तू हमारे शत्रुओं के आश्रित है ॥ २६ ॥ संसार में ऐसे दुष्टों की कमी नहीं है, जो मित्र का बाना धारणकर छिपे-छिपे शत्रु का काम करते हैं । परन्तु उनकी कलई ठीक वैसे ही खुल जाती है, जैसे छिपकर पाप करनेवालों का पाप समय पर रोग के रूप में प्रकट होकर उनकी पोल खोल देता है ॥ २७ ॥ |

गुरुपुत्र ने कहा — इन्द्रशत्रो ! आपका पुत्र जो कुछ कह रहा है, वह मेरे या और किसी के बहकाने से नहीं कह रहा है । राजन् ! यह तो इसकी जन्मजात स्वाभाविक बुद्धि है । आप क्रोध शान्त कौजिये । व्यर्थ में हमें दोष न लगाइये ॥ २८ ॥

नारदजी कहते हैं — युधिष्ठिर ! जब गुरूजी ने ऐसा उत्तर दिया, तब हिरण्यकशिपु ने फिर प्रह्लाद से पूछा — ‘क्यों रे ! यदि तुझे ऐसी अहित करनेवाली खोटी बुद्धि गुरुमुख से नहीं मिली तो बता, कहाँ से प्राप्त हुई ?’ ॥ २९ ॥

प्रह्लादजी ने कहा — पिताजी ! संसार के लोग तो पिसे हुए को पीस रहे हैं, चबाये हुए को चबा रहे हैं । उनकी इन्द्रियाँ वश में न होने के कारण वे भोगे हुए विषयों को ही फिर-फिर भोगने के लिये संसाररूप घोर नरक की ओर जा रहे हैं । ऐसे गृहासक्त पुरुषों की बुद्धि अपने-आप किसी के सिखाने से अथवा अपने ही जैसे लोगों के सङ्ग से भगवान् श्रीकृष्ण में नहीं लगती ॥ ३० ॥ जो इन्द्रियों से दीखनेवाले बाह्य विषय को परम इष्ट समझकर मूर्खतावश अन्धों के पीछे अन्धों की तरह गड्ढे में गिरने के लिये चले जा रहे हैं और वेदवाणीरूप रस्सी के-काम्यकर्मों के दीर्घ बन्धन में बँधे हुए हैं, उनको यह बात मालूम नहीं कि हमारे स्वार्थ और परमार्थ भगवान् विष्णु ही हैं उन्हीं की प्राप्ति से हमें सब पुरुषार्थों की प्राप्ति हो सकती है ॥ ३१ ॥ जिनकी बुद्धि भगवान् के चरणकमलों का स्पर्श कर लेती है, उनके जन्म-मृत्युरूप अनर्थ का सर्वथा नाश हो जाता है । परन्तु जो लोग अकिञ्चन भगवत्प्रेमी महात्माओं के चरणों की धूल में स्नान नहीं कर लेते, उनकी बुद्धि काम्यकर्मों का पूरा सेवन करने पर भी भगवच्चरणों का स्पर्श नहीं कर सकती ॥ ३२ ॥

प्रह्लादजी इतना कहकर चुप हो गये । हिरण्यकशिपु ने क्रोध के मारे अन्धा होकर उन्हें अपनी गोद से उठाकर भूमि पर पटक दिया ॥ ३३ ॥ प्रह्लाद की बात को वह सह न सका । रोष के मारे उसके नेत्र लाल हो गये । वह कहने लगा दैत्यो ! इसे यहाँ से बाहर ले जाओ और तुरंत मार डालो । यह मार ही डालने योग्य है ॥ ३४ ॥ देखो तो सही — जिसने इसके चाचा को मार डाला, अपने सुहृद्-स्वजनों को छोड़कर यह नीच दास के समान उसी विष्णु के चरणों की पूजा करता है ! हो-न-हो, इसके रूप में मेरे भाई को मारनेवाला विष्णु ही आ गया है ॥ ३५ ॥ अब यह विश्वास के योग्य नहीं है । पाँच बरस की अवस्था में ही जिसने अपने माता-पिता के दुस्त्यज वात्सल्य-स्त्रेह को भुला दिया — वह कृतघ्न भला विष्णु का ही क्या हित करेगा ॥ ३६ ॥

कोई दूसरा भी यदि औषध के समान भलाई करे तो वह एक प्रकार से पुत्र ही है । पर यदि अपना पुत्र भी अहित करने लगे तो रोग के समान वह शत्रु है । अपने शरीर के ही किसी अङ्ग से सारे शरीर को हानि होती हो तो उसको काट डालना चाहिये । क्योंकि उसे काट देने से शेष शरीर सुख से जी सकता है ॥ ३७ ॥ यह स्वजन का बाना पहनकर मेरा कोई शत्रु ही आया है । जैसे योगी की भोग-लोलुप इन्द्रियाँ उसका अनिष्ट करती हैं, वैसे ही यह मेरा अहित करनेवाला है । इसलिये खाने, सोने, बैठने आदि के समय किसी भी उपाय से इसे मार डालो’ ॥ ३८ ॥

जब हिरण्यकशिपु ने दैत्यों को इस प्रकार आज्ञा दी, तब तीखी दाढ़, विकराल वदन, लाल-लाल दाढ़ी-मूंछ एवं केशोंवाले दैत्य हाथों में त्रिशूल ले-लेकर ‘मारो, काटो’ — इस प्रकार बड़े जोर से चिल्लाने लगे । प्रह्लाद चुपचाप बैठे हुए थे और दैत्य उनके सभी मर्मस्थानों में शूल से घाव कर रहे थे ॥ ३९-४० ॥ उस समय प्रह्लादजी का चित्त उन परमात्मा में लगा हुआ था, जो मन-वाणी के अगोचर, सर्वात्मा, समस्त शक्तियों के आधार एवं परब्रह्म हैं । इसलिये उनके सारे प्रहार ठीक वैसे ही निष्फल हो गये, जैसे भाग्यहीन के बड़े-बड़े उद्योग-धंधे व्यर्थ होते हैं ॥ ४१ ॥ युधिष्ठिर ! जब शूलों की मार से प्रह्लाद के शरीर पर कोई असर नहीं हुआ, तब हिरण्यकशिपु को बड़ी शङ्का हुई । अब वह प्रह्लाद को मार डालने के लिये बड़े हठ से भाँति-भाँति के उपाय करने लगा ॥ ४२ ॥ उसने उन्हें बड़े-बड़े मतवाले हाथियों से कुचलवाया, विषधर साँपों से डँसवाया, पुरोहितों से कृत्या राक्षसी उत्पन्न करायी, पहाड़ की चोटी से नीचे डलवा दिया, शम्बरासुर से अनेकों प्रकार की माया का प्रयोग करवाया, अँधेरी कोठरियों में बंद करा दिया, विष पिलाया और खाना बंद कर दिया ॥ ४३ ॥ बर्फीली जगह, दहकती हुई आग और समुद्र में बारी-बारी से डलवाया, आँधी में छोड़ दिया तथा पर्वतों के नीचे दबवा दिया; परन्तु इनमें से किसी भी उपाय से वह अपने पुत्र निष्पाप प्रह्लाद का बाल भी बाँका न कर सका । अपनी विवशता देखकर हिरण्यकशिपु को बड़ी चिंता हुई । उसे प्रह्लाद को मारने के लिये और कोई उपाय नहीं सूझ पड़ा ॥ ४४ ॥ वह सोचने लगा-इसे मैंने बहुत कुछ बुरा-भला कहा, मार डालने के बहुत-से उपाय किये । परन्तु यह मेरे द्रोह और दुर्व्यवहारों से बिना किसी की सहायता से अपने प्रभाव से ही बचता गया ॥ ४५ ॥ यह बालक होने पर भी समझदार हैं और मेरे पास ही निःशङ्क भाव से रहता है । हो-न-हो इसमें कुछ सामर्थ्य अवश्य है । जैसे शुनःशेप (शुन:शेप — अजीगर्त का मँझला पुत्र था । उसे पिता ने वरुण के यज्ञ में बलि देने के लिये हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहिताश्व के हाथ बेच दिया था तब उसके मामा विश्वामित्रजी ने उसकी रक्षा की और वह अनपने पिता से विरुद्ध होकर उनके विपक्षी विश्वामित्रजी के ही गोत्र में हो गया । यह कथा आगे ‘नवम स्कन्ध’ के सातवें अध्याय में आवेगी।) अपने पिता की करतूतों से उसका विरोधी हो गया था, वैसे ही यह भी मेरे किये अपकारों को न भूलेगा ॥ ४६ ॥ न तो यह किसी से डरता है और न इसकी मृत्यु ही होती है । इसकी शक्ति की थाह नहीं है । अवश्य ही इसके विरोध से मेरी मृत्यु होगी । सम्भव है, न भी हो’ ॥ ४७ ॥

इस प्रकार सोच-विचार करते-करते उसका चेहरा कुछ उतर गया। शुक्राचार्य पुत्र शण्ड और अमर्क ने जब देखा कि हिरण्यकशिपु तो मुँह लटकाकर बैठा हुआ है, तब उन्होंने एकान्त में जाकर उससे यह बात कहीं — ॥ ४८ ॥ स्वामी ! आपने अकेले ही तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली । आपके भौहें टेढ़ी करने पर ही सारे लोकपाल काँप उठते हैं । हमारे देखने में तो आपके लिये चिन्ता की कोई बात नहीं है । भला, बच्चों के खिलवाड़ में भी भलाई-बुराई सोचने की कोई बात है ॥ ४९ ॥ जबतक हमारे पिता शुक्राचार्यजी नहीं आ जाते, तबतक यह डरकर कहीं भाग न जाय । इसलिये इसे वरुण के पाशों से बाँध रखिये । प्रायः ऐसा होता हैं कि अवस्था की वृद्धि के साथ-साथ और गुरुजनों की सेवा से बुद्धि सुधर जाया करती हैं’ ॥ ५० ॥

हिरण्यकशिपु ने ‘अच्छा, ठीक है’ कहकर गुरुपुत्रों की सलाह मान ली और कहा कि ‘इसे उन धर्मों का उपदेश करना चाहिये, जिनका पालन गृहस्थ नरपति किया करते हैं ॥ ५१ ॥ युधिष्ठिर ! इसके बाद पुरोहित उन्हें लेकर पाठशाला में गये और क्रमशः धर्म, अर्थ और काम — इन तीन पुरुषार्थों की शिक्षा देने लगे । प्रह्लाद वहाँ अत्यन्त नम्र सेवक की भाँति रहते थे ॥ ५२ ॥ परन्तु गुरुओं की वह शिक्षा प्रह्लाद को अच्छी न लगी; क्योंकि गुरुजी उन्हें केवल अर्थ, धर्म और काम की ही शिक्षा देते थे । यह शिक्षा केवल उन लोगों के लिये हैं, जो राग-द्वेष आदि द्वन्द्व और विषय-भोगों में रस ले रहे हों ॥ ५३ ॥ एक दिन गुरुजी गृहस्थी काम से कहीं बाहर चले गये थे । छुट्टी मिल जाने के कारण समवयस्क बालकों ने प्रह्लादजी को खेलने के लिये पुकारा ॥ ५४ ॥ प्रह्लादजी परम ज्ञानी थे, उनका प्रेम देखकर उन्होंने उन बालकों को ही बड़ी मधुर वाणी से पुकारकर अपने पास बुला लिया । उनसे उनके जन्म-मरण की गति भी छिपी नहीं थी । उनपर कृपा करके हँसते हुए-से उन्हें उपदेश करने लगे ॥ ५५ ॥ युधिष्ठिर ! वे सब अभी बालक ही थे, इसलिये राग-द्वेषपरायण विषयभोगी पुरुषों के उपदेशों से और चेष्टाओं से उनकी बुद्धि अभी दूषित नहीं हुई थी । इसीसे, और प्रह्लादजी के प्रति आदर-बुद्धि होने से उन सबने अपनी खेल-कूद की सामग्रियों को छोड़ दिया तथा प्रह्लादजी के पास जाकर उनके चारों ओर बैठ गये और उनके उपदेश मन लगाकर बड़े प्रेम से एकटक उनकी ओर देखने लगे । भगवान् के परम प्रेमी भक्त प्रह्लाद का हृदय उनके प्रतिं करुणा और मैत्री भाव से भर गया तथा वे उनसे कहने लगे ॥ ५६-५७ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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