श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-26
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
छब्बीसवाँ अध्याय
हिमालय के घर में विवाह का उपक्रम प्रारम्भ, भगवान् शंकर के यहाँ सभी देवताओं के आगमन पर हर्षोल्लास
अथः षडविंशतितमोऽध्यायः
श्रीमहादेवनारदसंवादे शिवविवाहोत्सवे देवतासमागमः

श्रीमहादेवजी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! उसके बाद गिरिराज हिमालय के नगर में संसार का आनन्दवर्धन करने वाला पार्वती-विवाहोत्सव प्रारम्भ हो गया ॥ १ ॥ महामते ! भेरी, मृदङ्ग, ढोल, तुरही तथा गोमुख (वाद्यविशेष)-की ध्वनि से भूमि और आकाश का अन्तराल पूर्णरूप से गुञ्जायमान हो उठा। उस समय गन्धर्वगण अत्यन्त हर्षित होकर गा रहे थे. अप्सराएँ चित्ताकर्षक नृत्य कर रही थीं ॥ २-३ ॥ देवताओं तथा पर्वतों की कन्याएँ पार्वती का विवाह देखने के लिये पर्वताधिपति हिमालय के पुर में आ गयीं । मुनिश्रेष्ठ ! गौरी के विवाहोत्सव में उन हिमालय ने अनेक प्रकार के वस्त्रों तथा अलंकारों आदि के द्वारा उन सभी कन्याओं को सन्तुष्ट किया ॥ ४-५ ॥ इस प्रकार हिमालय के पुर में मङ्गल विवाहोत्सव का अत्यन्त सुन्दर स्वरूप विद्यमान था । सुन्दर गन्ध से युक्त वायु धीरे-धीरे प्रवाहित होने लगी। उस अवसर पर सभी प्राणियों के मन में महती प्रसन्नता छा गयी थी, सभी दिशाएँ प्रकाश से भर गयीं और सारा संसार स्वस्थ हो गया ॥ ६-७ ॥

उस समय महेश्वर के पास जाने के लिये इन्द्र ने भी समस्त देवताओं, गन्धव और किन्नरों के साथ प्रस्थान किया ॥ ८ ॥ ठीक इसी समय मुनिश्रेष्ठ शोभासम्पन्न नारदजी ने रति से कहा कि महादेव और पार्वती का शुभ विवाह सम्पन्न हो रहा है, उसमें गन्धर्वों, किन्नरों और नागों के साथ सभी देवता जा रहे हैं। तुम इस समय देवराज इन्द्र के पास जाओ, विलम्ब मत करो। विवाह की प्रसन्नता से युक्त महेश के पास जाकर यदि वे देवता तुम्हारे पति के जीवन के लिये उनसे कहेंगे तो वे शिवजी निश्चितरूप से कामदेव को पुनः शरीर की प्राप्ति करा देंगे ॥ ९-१११/२

ऐसा कहकर वे नारद मुनि शीघ्रतापूर्वक महेश्वर के पास चले गये और इधर रति भी अपने पति के जीवन के लिये प्रयत्नशील हो गयी ॥ १२१/२

अपने यहाँ आये नारदजी को देखकर महेश ने यह वचन कहा — तात ! आपका स्वागत है; इस समय जो भी कार्य करने योग्य हो, उसे आप सम्पन्न करें ॥ १३१/२

तब नारदजी ने कहा — महेश्वर ! सभी देवता, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, किन्नर और महर्षिगण आ रहे हैं। अतः शम्भो ! प्रभो! आपको देवताओं के साथ रात्रि आने पर शुभ लग्न में हिमालय के पुर के लिये प्रस्थान करना चाहिये। वहाँ महान् उत्सव के साथ आपका विवाह सम्पन्न होगा ॥ १४–१६ ॥

उसी समय सभी देवताओं, गन्धर्वों और किन्नरों को साथ लिये देवराज इन्द्र महेश के पास आ गये । समग्र जगत् के कारणस्वरूप महादेव को प्रणाम करके उन देवताओं ने कहा प्रभो ! इस समय हमारे लिये आपका क्या आदेश है ? ॥ १७-१८ ॥

इस पर उन्होंने कहा — मेरे इस विवाह में जो भी आप लोगों के करने योग्य हो, आप लोग उसे करें। इसके बाद शिव के विवाह में महान् मङ्गल आरम्भ हो गया ॥ १९ ॥ देवराज इन्द्र का मन प्रसन्नता से प्रफुल्लित था । शम्भु के उस तपोवन में भेरी आदि बाजों की ध्वनि से सभी दसों दिशाएँ गुञ्जित हो गयीं । मुनिश्रेष्ठ ! गन्धर्व लोग मनोहर गान करने लगे, पुष्पों की वर्षा होने लगी और अप्सराएँ नाचने लगीं। मुनिवर ! देवाधिदेव शिव के तपोवन में वृक्षों की शाखाएँ खिले हुए सुन्दर पुष्पगुच्छों से झुक गयीं। उस वन में हजारों कोयल और भौरे मनोहर गान करने लगे और मलयानिल बहने लगा ॥ २०-२३ ॥

तत्पश्चात् लोकपितामह ब्रह्मा महर्षि वसिष्ठ आदि अपने मानस पुत्रों के साथ वहाँ आ गये और भगवान् विष्णु भी माङ्गलिक विवाह देखने के लिये सरस्वती तथा लक्ष्मी के साथ भगवान् शिव के पास पहुँच गये ॥ २४-२५ ॥ इस प्रकार आये हुए उन देवताओं को देखकर विश्वेश्वर शिव का हृदय प्रफुल्लित हो गया और उनका मुखकमल प्रसन्नता से खिल उठा ॥ २६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘शिवविवाहोत्सव में देवतासमागम’ नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥

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