August 4, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-39 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उनतालीसवाँ अध्याय सीताजी के शोक में श्रीराम का विलाप, सुग्रीव से मैत्री, हनुमान् जी द्वारा समुद्र-लंघन तथा अशोक-वाटिका में श्रीसीताजी का दर्शन, हनुमान् जी की प्रार्थना पर लङ्का में प्रतिष्ठित जगदम्बा द्वारा लङ्का का परित्याग करना, अशोकवाटिका का विध्वंस, लङ्कादहन तथा हनुमान् जी का श्रीरामजी के पास पहुँचकर सम्पूर्ण वृत्तान्त बताना, विभीषण का भगवान् श्रीराम की शरण ग्रहण करना अथः एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः महादेवनारदसंवादे रावरणमन्त्रणावर्णनं श्रीमहादेवजी बोले — मारीच को मारकर जब श्रीराम लक्ष्मण के साथ जब अपनी पर्णकुटी पर आए, तब उन्होंने वहाँ जानकी को नहीं देखा ॥ १ ॥ शोकाकुल होकर वे सीता का स्मरण करते हुए वन में भटकने लगे। वहाँ उन्होंने कटे पंखवाले पक्षिराज जटायु को देखकर यह अनुमान किया कि इसीने सीता का अपहरण किया होगा — ऐसा सोचकर उसे मारने की इच्छा से वे उसके पास गए। वहाँ जाने पर उन्हें पता चला कि जटायु उनके पिता दशरथजी के मित्र हैं। यह जानकर सत्यपराक्रमी श्रीराम ने उन पर बाण नहीं छोडा। जटायु ने श्रीराम को रावण के द्वारा सीता हरण की बात बताकर उनके देखते-देखते अपने प्राण त्याग दिए और स्वर्ग को प्रस्थान किया। तदनन्तर श्रीराम ने वन में ही उनकी अन्त्येष्टि की ॥ २-५ ॥ महामते ! कबन्ध नामक राक्षस का वध करके वे दोनों भाई ऋश्यमूक पर्वत की ओर चले गए, जहाँ बाली के भय से सूर्यपुत्र सुग्रीव अपने हनुमान् इत्यादि चार प्रमुख वीर मन्त्रियों के साथ रहते थे। महामते ! वहाँ महामना सुग्रीव के साथ मैत्री करके और अत्यन्त पराक्रमी बाली को युद्ध में मारकर श्रीराम ने सुग्रीव का राज्याभिषेक किया ॥ ६-८ ॥ मुनिवर ! तदनन्तर वर्षा ऋतु बीतने पर माल्यवान् पर्वत पर विराजमान श्रीराम के पास सुग्रीव ने विशाल वानर सेना को बुलाया और उन्होंने जनकनन्दिनी सीता की खोज करने के लिए भूमण्डल पर चारों दिशाओं में दूतों को भेजा। वे दूत भी सीता की खोज में निकल पड़े ॥ ९-१० ॥ दक्षिण दिशा की ओर महाबल और पराक्रम से युक्त हनुमान्, अङ्गद, जाम्बवान् इत्यादि मुख्य वीर चल पड़े। महामते ! उन्होंने सम्पाती के मुख से विस्तृत रूप से सारी बात सुनकर समुद्र को शीघ्र लाँघने के लिए विचार-विमर्श किया ॥ ११-१२ ॥ तब ऋक्षराज जाम्बवान् की बात सुनकर प्रचण्ड पराक्रमी हनुमान् जी ने सौ योजन विस्तार वाला भयंकर समुद्र पारकर सायंकाल में लङ्का में प्रवेश किया और रात्रि में लङ्का नगरी में घूम-घूमकर वे जनकनन्दिनी सीता को खोजने लगे। इस प्रकार उन्होंने सात रात्रियाँ व्यतीत कीं। तब हनुमान् जी ने अशोक वाटिका में शुभदर्शना सीता को देखा और अत्यन्त दुष्कर कार्य सम्पन्न करने का निश्चय किया ॥ १३-१५ ॥ उन्होंने देवी के साथ हुए युद्ध के पूर्व वृतान्त का स्मरण किया। तत्पश्चात् वे एक वृक्ष की चोटी पर चढ़कर देवी के अद्भुत मन्दिर को देखने की इच्छा से सभी दिशाओं में दृष्टिपात करने लगे। तब उन्हें पूर्वोत्तर दिशा में एक सुन्दर मन्दिर दिखाई दिया। उस स्वर्णरचित मन्दिर में मणि-माणिक्य जड़े हुए थे और उसके ऊपर सिंहध्वज लगा हुआ था। उसे देखकर हनुमान् जी ने निश्चय किया कि यही देवी का मन्दिर है। उस मन्दिर के द्वार पर जाकर उन्होंने सुरेश्वरी जगदम्बा के दर्शन किए। वे अपनी योगिनियों के साथ हँसती हुई नृत्य कर रही थीं। उन महादेवी की प्रदक्षिणा करके हनुमान् जी ने प्रणाम किया और अत्यन्त भक्तिपूर्वक त्रिलोक वन्दनीया जगदम्बा से वे कहने लगे —॥ १६-२१ ॥ हनुमान् जी बोले — देवि ! विश्वेश्वरी ! आप प्रसन्न हों, मैं श्रीराम का अनुचर हूँ और जानकी रूप से अवतरित लक्ष्मी जी को ढूँढने लङ्का में आया हूँ। शिवे ! आपकी ही प्रेरणा से दुरात्मा राक्षसराज रावण का वध करने हेतु भगवान् विष्णु ने मनुष्य रूप में अवतार लिया है। मैं भी शिव हूँ और पृथ्वी पर वानर रूप मे उत्पन्न होकर आपके आज्ञानुसार श्रीराम की सहायता करने आया हूँ। आपने ऐसा पहले कहा था कि मैं जब लङ्का में आऊँगा, तब आप इस नगरी का त्याग करके अपने लोक को प्रस्थान कर जाएगी। इसलिए महादेवी ! आप इस नगरी का त्याग कर दें, उस दुर्धर्ष रावण का विनाश करें और इस चराचर जगत् की रक्षा करें ॥ २२-२६ ॥ श्रीदेवी जी बोली — वानरश्रेष्ठ ! रावण द्वारा सीता के अपमान से मैं रुष्ट हूँ। पुरुषश्रेष्ठ ! मैंने पहले ही लङ्का को त्यागने का विचार कर रखा है। वानरश्रेष्ठ ! आपसे यह बात सुनने के लिए ही मैं अब तक रावण की नगरी में स्थित हूँ। अब आपके कथनानुसार मैं इस लङ्कापुरी का त्याग कर रही हूँ ॥ २७-२८ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर वे महेश्वरी भवानी हनुमान् जी के देखते-देखते सहसा लङ्का का त्याग करके अन्तर्धान हो गईं ॥ २९ ॥ तब क्रोध उन्मत्त हनुमान् जी ने राक्षसराज रावण के द्वारा पोषित अशोक वाटिका को उखाड़ डाला ॥ ३० ॥ नारदजी ! इसकी खबर मिलने पर रावण ने क्रोधपूर्वक बहुत-से राक्षसों के साथ ‘अक्ष’ नाम के अपने पुत्र को भेजा। महाबलशाली महाबाहु हनुमान् जी ने बलपूर्वक पेड़ों को उखाड़कर उन्हीं वृक्षों से उन्हें मार डाला ॥ ३१-३२ ॥ तब राक्षसराज रावण ने हनुमान् जी का अङ्ग-भंग करने के लिए उनकी पूंछ में कपड़े लपेटकर आग लगवा दी ॥ ३३ ॥ नारदजी ! वीरवर हनुमान् उसी आग से लङ्कापुरी को जलाकर पुनः समुद्र को लांघकर समुद्र के तट पर आए जहाँ वे अङ्गद, जाम्बवान् आदि प्रमुख वीर स्थित थे। उनके साथ सुग्रीव के मधुवन का उपभोग कर वे श्रीराम के निकट उपस्थित हुए ॥ ३२-३५१/२ ॥ मुनिवर ! श्रीराम ने दूर से ही उन्हें देखकर जनकनन्दिनी का संवाद पूछा। तब प्रसन्नचित्त होकर हनुमान् जी ने जैसा हुआ था, सारा वृतान्त श्रीराम को निवेदित किया ॥ ३६-३७ ॥ तब श्रीराम ने सभी वानरों के साथ श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को प्रस्थान किया और महामते ! राक्षसराज रावण के वध हेतु श्रेष्ठ वानर सेना सहित श्रीराम ने डेरा डाल दिया ॥ ३८-३९ ॥ इसी बीच राक्षसराज रावण ने भी अपने सभी मन्त्रियों को बुलाकर विचार-विमर्श करने के लिए सभा आयोजित की। वहाँ नीति कुशल महाबुद्धिमान् विभीषण ने सब प्रकार से दशानन रावण को युद्ध से रोकने वाली बातें कहीं। उन्होंने राघवेन्द्र श्रीराम का पराक्रम बताते हुए सीता को वापस भेजने की पुनः सलाह भी दी। मुने ! यह सुनकर रावण क्रोधित हो गया और उसने पैर से विभीषण पर प्रहार किया। तत्पश्चात् धर्मस्वरूप वे विभीषण भी कुपित होकर अपने चार मन्त्रियों के साथ भगवान् श्रीराम की सन्निधि में आ गए ॥ ४०-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘रावणमन्त्रणावर्णन’ नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥ Content is available only for registered users. 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