श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-41
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
इकतालीसवाँ अध्याय
श्रीराम का ब्रह्माजी से विजयप्राप्ति का उपाय पूछना और ब्रह्माजी द्वारा उन्हें जगदम्बा की उपासना करने का परामर्श देना
अथः एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
श्रीमहादेवनारदसंवादे ब्रह्मरामचन्द्रयोरर्मन्त्रवर्णनं

श्रीमहादेव जी बोले — इस प्रकार युद्ध में पराजित राक्षसों के स्वामी रावण ने युद्ध करने के लिए महाबलि कुम्भकर्ण को जगाया ॥ १ ॥ पाँच करोड़ लाख राक्षस-योद्धाओं के साथ कठिनता से जीता जानेवाला वह कुम्भकर्ण युद्ध के लिए तैयार हो गया ॥ २ ॥ महामते ! इस समय सभी देवता भयभीत हो गए। तब सभी लोकों के स्वामी, महाबुद्धिमान्, अविनाशी, पुराणपुरुष प्रभु भगवान् श्रीराम ने सभी देवताओं के साथ मन्त्रणा के लिए आए हुए ब्रह्माजी को देखकर उनकी पूजा कर इस प्रकार कहा — ॥ ३-४ ॥

श्रीराम जी बोले — युद्धदुर्मद रावणादि प्रमुख पराक्रमी तथा महाबली वीर राक्षसों को युद्ध में मैं कैसे जीतूँ, यह मुझे बतायें। सुरश्रेष्ठ ! मुझे बड़ा भय लग रहा है। रावण के जगत्संहारक उस पराक्रम को जिस प्रकार हमने अनेक बार अनुभव किया है वैसा वीर तीनों लोकों में कोई नहीं है ऐसा मैं मानता हूँ। इस समय ऐसा सुना जाता है कि महाबली, पराक्रमी तथा राक्षसों में श्रेष्ठ उसका भाई कुम्भकर्ण युद्ध में आएगा। वह पाँच करोड़ लाख राक्षसों से युक्त होकर अपने भाई की सहायता करने के लिए मेरे साथ युद्ध करेगा। मैं विभीषण के मुख से उसके पराक्रम की बात सुनकर भयभीत हो गया हूँ। इस समय वैसा उपाय बताइए जिससे इन वीरों को युद्ध क्षेत्र में जीत सकूँ ॥ ५-१० ॥

श्रीमहादेव जी बोले — भगवान् श्रीरामचन्द्र के इस प्रकार कहने पर लोकपितामह ब्रह्माजी ने सबके सामने सान्त्वना देते हुए श्रीराम जी से कहा — ॥ ११ ॥

ब्रह्माजी बोले — राजेन्द्र ! कमलापते ! जगन्नाथ ! आप सब कुछ जानते हैं, फिर भी युद्ध में विजयी होने के लिए आप जो पूछ रहे हैं; उसे सुनें — ॥ १२ ॥

आपको तीनों लोकों की माता ब्रह्मस्वरुपा सनातनी भगवती कात्यायनी की उपासना करनी चाहिए। वे महान् भय का निवारण करने वाली हैं तथा स्वयं अपराजित रहते हुए सभी लोगों को विजय देने वाली हैं। महाबाहो ! संकट से उबारने वाली उन भगवती दुर्गा की प्रार्थना कीजिए। शत्रुसूदन ! बिना उनकी प्रसन्नता के महाबलशाली रावणादि राक्षसों को आप युद्ध में जीतने में समर्थ नहीं हो सकते ॥ १३-१५ ॥ जिनके नाम का स्मरण करते हुए भगवान् शंकर भयानक हलाहल विष पीकर भी मृत्यु को जीतकर इस संसार में मृत्युञ्जय के नाम से विख्यात हुए। रघुश्रेष्ठ ! महामते ! उन भगवती को प्रसन्न कर आप लङ्का को जीतिए। देव ! वे दुष्टसंहारिणी हैं और उनकी सभा भी विजय प्रदान करने वाली है। आप इस समय संसार की रक्षा के लिए और युद्ध में विजय पाने के लिए अवश्य ही उनका स्मरण और पूजन कीजिए ॥ १६-१८ ॥

प्रभो ! राक्षसराज रावण की भगवती चण्डिका में परा भक्ति है। उन देवी की कृपा के बिना उसको युद्ध में जीतने में कौन समर्थ हो सकता है ॥ १९ ॥ महामते ! देवाधिदेव भगवान् शंकर और मेरे सामने उन्होंने भी आप महात्मा के लिए ऐसा ही कहा था ॥ २० ॥ मधुसूदन ! आप तो स्वयं सब कुछ जानते हैं; फिर भी आपने विजय हेतु जो पूछा है, उसे आपके लिए कहूँगा ॥ २१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘ब्रह्मरामचन्द्रमन्त्रवर्णन’ नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥

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