August 5, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-43 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय ब्रह्माजी द्वारा श्रीराम से देवी की सर्वव्यापकता तथा विभिन्न दिव्य लोकों का वर्णन करना, देवी के लोक तथा उनके स्वरूप का वर्णन, श्रीराम द्वारा जगज्जननी जगदम्बा का पूजन अथः त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः श्रीमहादेवनारदसंवादे दुर्गालोकवर्णनं श्रीमहादेवजी बोले — महामुने ! ब्रह्माजी के मुख से इस प्रकार की बात सुनकर प्रसन्नात्मा विमल बुद्धिवाले रघुश्रेष्ठ श्रीराम ने पुनः उनसे पूछा — ॥ १ ॥ श्रीराम जी बोले — महामते ! ब्रह्मन ! यह सत्य है कि वे ही देवी विजय प्रदान करने वाली हैं, इसलिए महायुद्ध में विजयी होने की इच्छा से मैं भक्तिपूर्वक उन्हीं की पूजा करूँगा। प्रभो ! अब आप बतायें कि वे देवी जयदुर्गा महेश्वरी इस समय कहाँ है और उनका रम्यरूप किस प्रकार का है ? ॥ २-३ ॥ ब्रह्मा जी बोले — राजन ! सुनिए, यद्यपि आप स्वयं जानते हैं; फिर भी आपसे यह प्रसंग कहूँगा, क्योंकि सुनने तथा कहने वालों के लिए यह चरित्र पावन और पुण्यप्रद है ॥ ४ ॥ वे देवी सर्वत्र गमन करने वाली, सर्वत्र निवास करने वाली, समस्त शक्तिपीठों में रहने वाली, ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित तथा ब्रह्माण्ड से बाहर भी रहने वाली हैं। स्वर्ग, मृत्युलोक, हिमालय पर्वत तथा भगवान् शंकर के समीप कैलास पर्वत पर जो भगवती की मूर्ति विराजमान हैं, वही पौराणिकी मानी गयी है। जो मूर्ति ब्रह्माण्ड के बाहर स्थित है वह विशेष तान्त्रिकी मूर्ति है; वे नित्यानन्दमयी महादुर्गा अत्यन्त गोपनीया हैं। उनका स्थान जिस प्रकार का है, उसे कहने में कौन समर्थ है? फिर भी राम ! मैं कुछ वर्णन करूँगा; आप ध्यानपूर्वक मेरी बातें सुनें ॥ ५-८ ॥ राघव ! पाताल, भूतल, स्वर्ग तथा ब्रह्मलोक ये सभी ब्रह्माण्ड में उत्तरोत्तर क्रम से ऊपर की ओर बहुत दूर तक स्थित है। ब्रह्माण्ड के बाहरी भाग में स्थित दिव्य ब्रह्मलोक से ऊपर की ओर एक लाख योजन की दूरी पर निर्विकार शिवलोक अवस्थित है, जहाँ अपने प्रमथगणों के साथ आदिपुरुष अनिर्वचनीय भगवान् सदाशिव नित्य उत्सव में संलग्न होकर सदा प्रमुदित रहते हैं। जो भगवान् शंकर के भक्त हैं, वे उस सुन्दर शिवलोक को प्राप्त कर करुणानिधि देवाधिदेव भगवान् शंकर की कृपा से आनन्दित रहते हैं ॥ ९-१२ ॥ शिवलोक से एक लाख योजन ऊपर विष्णुलोक अवस्थित है, जहाँ शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए भगवान् विष्णु भगवती लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं। भगवान् कमलापति का वह लोक भी अवर्णनीय है। वह दिव्य ज्योति से प्रकाशमान रहता है और नाना प्रकार के रत्नराशि से शोभायमान है। जो भगवान् विष्णु की भक्ति में संलग्न हैं, वे भगवान् विष्णु के प्रभाव से उनका सालोक्य प्राप्त करके देवता, गन्धर्व तथा किन्नरों के साथ उस विष्णुलोक में नित्य परम आनन्दित रहते हैं। वहाँ पक्षिराज गरुड़ भगवान् विष्णु के द्वारपाल हैं ॥ १३-१६ ॥ शिवलोक के वामभाग में मनोरम गौरीलोक है, जो विचित्र मणि-माणिक्य के समूहों से अति शोभित है ॥ १७ ॥ वहाँ जो भगवती जगदम्बा की वैदिकी मूर्ति है, वह दस भुजाओं से युक्त, अतसी (अलसी) के पुष्प के समान प्रभावाली और सिंह के पीठ पर आसीन है। वे देवी सोलह द्वारों से सुशोभित रम्य मन्दिर में अवस्थित हैं। उस मन्दिर के स्तम्भ विभिन्न रत्नों से जटित तथा वह मन्दिर पताकाओं से सुशोभित है। स्तुति करते हुए देवता और मुनिन्द्रो से वह सदा सुशोभित रहता है तथा असंख्य सेविकावृन्द और भैरव उसकी रक्षा करते हैं। सभी ब्रह्माण्डवासी ब्रह्मादि देवता तथा भगवान् शंकर और विष्णु वहाँ आकर उन जगदम्बिका की पूजा करते हैं ॥ १८-२१ ॥ सभी वैकुण्ठ लोकों से विशिष्ट, दिव्य ज्योति से सम्पन्न प्रभावाले गोलोक में जहाँ भगवान् कृष्ण भगवती राधा के साथ विहार करते हैं, वह गोलोक श्रेष्ठ रत्नराशि से सुशोभित तथा कल्प वृक्षों से आच्छादित है और वह ब्रह्मर्षिगणों के द्वारा चारों ओर की गयी वेदपाठ की प्रतिध्वनियों से निनादित है। उस लोक में रत्न जटित स्तम्भों से सुशोभित मन्दिर में द्विभुज भगवान् हरि स्वयं अपनी इच्छा से देवी राधा के साथ रमण करते हैं ॥ २२-२४ ॥ रघुश्रेष्ठ ! उससे पचास करोड़ योजन ऊपर महादेवी का दिव्य लोक है, जहाँ देवी जगदम्बा अत्यन्त गुप्त रूप से विराजमान रहती हैं। भगवान् श्रीकृष्ण की अर्धाङ्गिनी राधा जी जिनकी कला के करोडवें के करोडवें अंशवाली हैं, वे ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रादि देवताओं के लिए भी दुर्लभ देवी स्वयं वहाँ विहार करती हैं ॥ २५-२६ ॥ वेद, आगम, स्मृतियों तथा वेदान्त आदि विविध दर्शनों में अनेक प्रमाणों से निश्चित जो एक परिपूर्ण ब्रह्मतत्त्व है, वही साक्षात् नित्या भगवती हैं ॥ २७ ॥ रघुपते ! वे नित्य अति सुखदायिनी, एकान्तवासिनी तथा सभी देहों में नित्य विराजमान हैं। वे ही विश्व की आश्रयदात्री और पराशक्ति हैं। सभी जन विविध कठोर तपस्या से उनके चरण कमल की नख ज्योति का दर्शन करते हैं ॥ २८ ॥ आश्चर्य है कि जिन जगदम्बा का समस्त योग साधनाओं के द्वारा निरन्तर वन्दन और ध्यान किया जाता है, उन्हें ही योगिजन निराकार ब्रह्म भी कहते हैं। उनके निजांश से उत्पन्न भगवान् शिव और विष्णुतत्त्व की जो श्रुतियों में चर्चा है, उनका भी भगवती के अंश से उत्पन्न होना आश्चर्य का ही विषय है। रघुपते ! यह पारम्परिक व्यवस्था है साक्षात् तत्त्व नहीं ॥ २९-३० ॥ जिस प्रकार गङ्गाजी सागर में मिलकर सागर से अलग नहीं होती, उसी प्रकार ब्रह्म के अंश से उत्पन्न वे ब्रह्मादि देव भी उस ब्रह्मा से अलग नहीं होते। वे ही जगदम्बा विश्व के रूप में प्रकट होती हैं, वे ही उसका पालन करती हैं और अन्त में वे ही संहार करती है, इसमें दूसरा कोई कारण नहीं है। जिस प्रकार काष्ठ के बने कृत्रिम हाथी आदि में हिलने-डुलने की प्रतीति ऐन्द्रजालिक के प्राधान्य से होती है, उसी प्रकार इस जगत् की समस्त चेष्टाओं में वे भगवती ही एकमात्र कारण हैं ॥ ३१-३३ ॥ जो लोग महामोहरूपी घोर अन्धकार में फँसकर सभी की मूल कारण स्वरूपा ब्रह्मादि देवताओं की भी देवता, अति दुर्गम ब्रह्म स्वरुपा देवी जगदम्बा को नहीं जानते हैं; रघुनन्दन ! वे लोग केवल ब्रह्मादि देवताओं को ही सृष्टि आदि में प्रधानरूप से कारण मानते हैं। जिस प्रकार मूढ़ व्यक्ति दोष के कारण घट के निर्माण में मूलभूत कारण उस कुम्हार को छोड़कर प्रधानरूप से उसके अन्य कारक – जैसे मिट्टी, चाक – को ढूंढते रहते हैं, उसी प्रकार रघुश्रेष्ठ ! इस जगत् में माया से मोहित होने के कारण विमूढ़ व्यक्ति जगत् के सृष्टि, पालन एवं संहार में प्रधानता से अन्यत्र कारण की कल्पना करते हैं ॥ ३४-३६१/२ ॥ इस संसार की आधारस्वरूपा, सभी की रक्षा करने वाली जो जगदम्बा श्रेष्ठ मोक्ष प्रदान करने वाली हैं; वे ही मोहपाश में बाँधने वाली भी हैं। उन्हीं जगदम्बा ने सागर में निमग्न भगवान् विष्णु की रक्षा के लिए बरगद के पत्ते के रूप में होकर उस महासमुद्र में उन्हें धारण किया ॥ ३७-३८१/२ ॥ रघुद्वह ! वे ही देवी जगदम्बा चेतनारूपा हैं। उनसे रहित सम्पूर्ण जगत् शव के समान प्रतीत होता है, उनसे युक्त होकर यह जगत् वैसे ही चेतनायुक्त प्रतीत होता है, जैसे की यन्त्री की चेतना से यन्त्र चेतनायुक्त प्रतीत होता है ॥ ३९-४० ॥ वे ही देवी जगदम्बा नित्य अपनी इच्छा से लीलापूर्वक देवाधिदेव भगवान् शिव के रूप में होकर सदा अपने में ही विहार करती हैं। वे ही देवी जगदम्बा दुर्गति प्राप्त लोगों का निस्तारण करती हैं, इसलिए वे संसार में वे दुर्गा दुर्गतिनाशिनी के नाम से कही जाती हैं ॥ ४१-४२ ॥ मन्दभाग्य वाला व्यक्ति भी उनके नाम के श्रेष्ठ अक्षरों का स्मरण कर सौभाग्य प्राप्त करता है, इसीलिए वे परमेश्वरी के नाम से जानी जाती हैं। वेदज्ञों के द्वारा वे मन्दभाग्य वालों का परित्राण करने वाली कही जाती हैं। रघुनन्दन ! वे ही देवी पराविद्या हैं और प्राणियों को चारों पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष – देने वाली तथा सभी विरोधियों का नाश करने वाली हैं ॥ ४३-४४१/२ ॥ वत्स ! उनका लोक जैसा है, उसका सम्यक् वर्णन कर रहा हूँ, सुनिए ! महाबाहो ! उनका लोक रत्नद्वीपमय है और अमृतसागर से घिरा हुआ है। वह कल्पवृक्षों से व्याप्त तथा सुन्दर बाजारों से सुशोभित है। वहाँ सर्वदा वसन्त ऋतु ही रहती है, दूसरी ऋतु वहाँ नहीं आती। सुख प्रदान करने वाले जल का रूप धारण करके गङ्गा नदी वहाँ बहती हैं ॥ ४५-४६ ॥ महामते ! वहाँ मनोहर ध्वनि करने वाले विभिन्न प्रकार की मणियों के समान प्रतीत होने वाले पक्षी, देवांश से उत्पन्न पुण्यात्माजन तथा असुरगण मधुर ध्वनियों से समयोचित राग में वेदों के अन्तर्गत वर्णित देवी के गुणों का आनन्दित होकर सर्वदा गान करते रहते हैं ॥ ४८-४९ ॥ रघुश्रेष्ठ ! वहाँ मलय पर्वत से उठी हुई परम सुखदायक शीतल, सुगन्धित वायु सर्वदा मन्द-मन्द बहती रहती है ॥ ५० ॥ अपने पुण्य के अनुसार जिन्होंने उनकी सालोक्य मुक्ति प्रदान कर ली है, वे ही प्राणी इस देवीलोक में निवास करते हैं, वे नित्य आनन्दस्वरूप तथा नित्य विज्ञान से परिपूर्ण रहते हैं। उनमें स्त्रियाँ देवी के समान और पुरुष भैरव के समान हैं ॥ ५१-५२ ॥ देवीलोक में रहने वाले सभी के भवन सुन्दर रत्न और सुवर्ण से अलंकृत हैं, वे भवन मनोहर रत्नों के जालों से रचित, अनेक तोरणों से सुशोभित हैं ॥ ५३ ॥ जिन लोगों ने गीत, नृत्य और वाद्य से देवी जगदम्बा को सन्तुष्ट किया है, वे उनके धाम को प्राप्त कर नित्य आनन्दित होकर उत्सुकतापूर्वक नाचते-गाते तथा बजाते हैं। इस प्रकार रघुद्वह ! वह लोक आनन्दराशिमय है। रत्न निर्मित प्राकार तथा तोरणों से युक्त भगवती का वह अद्भुत लोक अवर्णनीय हैं ॥ ५४-५६ ॥ वह चन्द्रकान्त आदि मणियों से और पर्याप्त कौस्तुभ मणियों से प्रकाशमान है, चारों दिशाओं में चार द्वार हैं जहाँ रत्नमय दण्ड तथा शूल धारण किए हुए भयानक नेत्रों वाले भैरवगण विद्यमान रहते हैं। देवी जगदम्बा के द्वार की रक्षा में तत्पर सैकड़ों भैरवियाँ गाल बजाती हुई हाथ में दण्ड लेकर दौड़ती रहती हैं। राघव ! वहाँ मनोहर तथा स्वच्छ विभिन्न पताकाएँ और ध्वजाएँ फहराती हुई सुशोभित हैं ॥ ५७-५९१/२ ॥ नगर के मध्य में बहुत से सुन्दर चबूतरे बने हुए हैं और वे ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं से घिरे हुए हैं। उन अट्टालिकाओं पर भी द्वारपाल स्थित हैं। उनके मध्य में देवी का अन्तःपुर विद्यमान है। रघुकुलोद्भव ! वहाँ द्वार पर स्थित गणों के स्वामी गणेश तथा षडानन — देवी के वे दोनों पुत्र देवी के दर्शन की इच्छा करते हुए ध्यानमग्न रहते हैं ॥ ६०-६२ ॥ राम ! महाबाहो ! उस देवी लोक में वहाँ करोड़ों-करोड़ ब्रह्माण्डों में स्थित रहने वाले करोड़ों-करोड़ ब्रह्मा, करोड़ों बलराम, करोड़ों विष्णु और करोड़ों शिव हैं। आपसे और अधिक क्या कहूँ ? ॥ ६३१/२ ॥ रघुद्वह ! उस रमणीय अन्तःपुर में विचित्र मणियों से जटित मण्डप सुशोभित है, जिसके स्तम्भ रत्नों से प्रकाशित हैं और मोतियों की उज्जवल प्रभा जिसके तोरणों पर बिखर रही है। रत्न दीप-मालिकाओं से जहाँ दिशाएँ उद्भासित हैं, वहाँ तप्त सुवर्ण, चमकते हुए सूर्य और विद्युतपुञ्ज के समान प्रभा वाला रत्नमय रमणीय सिंहासन है जिस पर देदीप्यमान, शरत्कालीन करोड़ों चन्द्रमाओं के समान कान्ति से युक्त मुखवाली त्रिलोक जननी महादुर्गा विराजमान हैं ॥ ६४-६७ ॥ चमकते हुए सुवर्ण से रचित, हजारों स्यमन्तक तथा असंख्य कौस्तुभमणियों से खचित किरीट को धारण करने वाली वे महादेवी सुशोभित हैं ॥ ६८ ॥ श्रेष्ठ माणिक्यों से जड़े हार समूहों की कान्ति से वक्षःस्थल सुशोभित है तथा श्याम आभा से युक्त नेत्रप्रान्तवाली उन भगवती का सुन्दर मुखमण्डल दन्तपङ्क्ति तथा मुस्कान से सुशोभित है ॥ ६९-७० ॥ महामते ! वे शुद्ध रत्नों से निर्मित विभिन्न प्रकार के अलङ्कारों से सुशोभित तथा चार भुजाओं वाली हैं और विशाल सिंह पर आसीन हैं। उन्होंने लाल रंग के वस्त्र धारण कर रखे हैं और उनकी सुन्दर कमर में करधनी झंकृत हो रही है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव उनके सुन्दर चरण कमलों की वंदना कर रहे हैं। उनके सामने खड़े होकर हाथ जोड़े महाब्रह्मा, महाविष्णु और महेश्वर सुन्दर स्तुति वाक्यों से उनका स्तवन कर रहे हैं ॥ ७१-७३ ॥ उनके वामभाग तथा दक्षिण भाग में जया और विजया अत्यन्त शुभ्र चँवर डुलाती हुई खड़ी रहती हैं। उनके दक्षिण भाग में देवी लक्ष्मी सुन्दर पंखा हाथ में लिए स्थित हैं और कुमकुम आदि अरुणवर्ण के सुगन्धित द्रव्य उन्हें प्रदान करती हैं। देवी जगदम्बा के वामभाग में स्थित होकर स्वयं वाग्देवी सरस्वती अपनी वीणा से वेदागम-सम्मत देवी के गुणों को गायन के रूप में प्रस्तुत करती हैं। राघव ! इस प्रकार सरस्वती आदि देवीयाँ भगवती की प्रसन्नता प्राप्ति की कामना से शुद्ध रत्नमय पात्र में अमृत भरकर देवी जगदम्बा को प्रदान करती हैं। नारदादि मुनिगण भक्तिपूर्वक गद्गद स्वर में देवी जगदम्बा की वेदोक्त रहस्यात्मक पूजा विधान का उनके समक्ष खड़े होकर गान करते हैं। चौंसठ योगिनियाँ महा माणिक्य मणि से निर्मित ताम्बूलयुक्त ताम्बूलपात्र लेकर देवी जगदम्बा को यत्नपूर्वक प्रदान करती हैं। करोड़ों भैरव आदि प्रमुख अनेक देवगण रत्नखचित दण्ड और खड्ग हाथ में लेकर वहाँ द्वारपाल के रूप में खड़े रहते हैं ॥ ७४-८० ॥ रघुनन्दन ! प्रभो ! इस प्रकार देवी जगदम्बा के अतुलनीय ऐश्वर्य का वर्णन मैं चार मुखों से कहाँ तक करूँ। जिसे कहने में करोड़ों हजार वर्षों में भी भगवान् त्र्यम्बक समर्थ नहीं हुए। श्रुतियाँ उनके गुणों की महिमा छन्दोबद्ध करके प्रस्तुत करती हैं ॥ ८१-८२ ॥ उनके अंश से उत्पन्न सावित्री तथा गायत्री और इन्द्रादि लोकपाल एवं अनेक ब्रह्माण्डों में निवास करने वाले उनके दर्शन की इच्छा से देवीलोक के बाहर एकत्रित रहते हैं। जो उनकी भक्ति और पूजा में संलग्न हैं, वे शीघ्र ही उनका दर्शन प्राप्त कर लेते हैं, किन्तु राम ! उनका पुण्यदायक दर्शन दूसरे के लिए अत्यन्त दुर्लभ है। उनके दर्शन में आधिपत्य अथवा वर्णाश्रम का कोई विचार नहीं है। जिनकी पुण्यमयी बुद्धि उन देवी की भक्ति में लगी रहती है; उनके लिए ही वे सुलभ हैं ॥ ८३-८५१/२ ॥ रघुश्रेष्ठ ! प्रभो ! तन्त्रों में वर्णित उनकी दिव्य मूर्ति तथा उनके दिव्य लोक के विषय में जिस प्रकार आपने पूछा था, उसे मैंने बता दिया ॥ ८६१/२ ॥ दस भुजाओं से युक्त तथा सिंह पर आसीन देवी की जो पुराणों में वर्णित दूसरी मूर्ति है, मैं उसे मिट्टी की प्रतिमा के रूप में बनाकर युद्ध में आपकी विजय की कामना से निश्चय ही पूजा करूँगा ॥ ८७-८९ ॥ राम ! देवी के पूजन के लिए आपने मेरा वरण कर लिया है, आज आर्द्रा नक्षत्र के योग में पूजन आरम्भ कर कृष्ण पक्ष की नवमी को भगवती का प्रबोधन करके जब तक आप राक्षसराज रावण का वध नहीं करेंगे, तब तक युद्ध में आपकी विजय की कामना से प्रतिदिन उनकी पूजा करूँगा ॥ ९०-९१ ॥ राम ! राघव ! आप पवित्र होकर ध्यानपूर्वक देवी का भक्ति से स्तवन करके राक्षसों के साथ युद्ध करें, आपकी विजय होगी ॥ ९२ ॥ श्री महादेव जी बोले — इस प्रकार कहे जाने पर भगवान् श्रीराम देवी के प्रबोधन के लिए समुद्र के उत्तरी तट पर पितामह ब्रह्मा तथा अन्य सभी देवताओं के साथ बिल्व वृक्ष के निकट गए। तब भगवान् श्रीराम ने युद्ध में विजयी होने के लिए उत्तराभिमुख हो हाथ जोड़कर जयदायिनी माँ जगदम्बा की स्तुति की ॥ ९३-९४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘दुर्गालोकवर्णन’ नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe