August 5, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-45 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ पैंतालीसवाँ अध्याय श्रीराम की विजय हेतु ब्रह्माजी तथा देवगणों का देवी की आराधना करना, देवी द्वारा राक्षसों के वध का वरदान देना अथः पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः श्रीमहादेवनारदसंवादे ब्रह्मणा देवीस्तुतिवर्णनं श्रीमहादेव जी बोले — सुरश्रेष्ठ ब्रह्माजी बिल्ववृक्ष की छाया में भगवती जगदम्बिका का असमय में भी भक्तिपूर्वक पूजन करके और बार-बार उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम करके वेदोक्त स्तुति तथा देवीसूक्त के द्वारा भगवान् श्रीराम की विजय के लिए भगवती सुरेश्वरी का प्रबोधन करने लगे — ॥ १-२ ॥ ॥ ब्रह्माकृतः देविस्तवः ॥ [^1] ॥ ब्रह्मोवाच ॥ ॐ नमो विमलवदनायै भूर्भुवः स्वः परमकमलायै, केवलपरमानन्दसन्दोहरूपायै लोकत्रय-तिमिरापहारक-परमज्योतीरूपायै, असदभिलाषयुक्तसन्दूषितदोषापसारणपरमामृतरूपायै, मूर्तिमत्कोटिचन्द्रवदनायै दुर्गादेव्यै सर्ववेदोद्भवनारायण्यै जनशरीरे परमात्मरूपायै प्रसीद ते नमो नमः ॥ ३ ॥ ॐ करालरूपे प्रणवस्वाहास्वरूपे ह्रींस्वरूपिणि । अम्बिके भगवत्यम्ब त्रिगुणप्रसूते नमो नमः ॥ ४ ॥ सिद्धिकरे स्फ्रें स्फ्रोँ स्वाहारूपिणि स्वधारूपे । विमलमुखे चन्द्रमुखे कोलाहलमुखे शर्वे प्रसीद ॥ ५ ॥ जगन्मोदकरीं मृदुदृशीं त्वां महेशीं क्रीडास्थाने स्वागतां भुवनेशीं शत्रुस्त्वं मित्ररूपा च दुर्गा दुर्गस्य त्वं योगिनामन्तरेऽपि एकाऽनेका । सूक्ष्मरूपाविकारा ब्रह्माण्डानां कोटिकोटिप्रसूतम् ॥ ६ ॥ एकोऽहं विष्णुः कः परो वा शिवाख्यो देवाश्चान्ये स्तोतुमीशा भवामः । त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं च वौषट् त्वं चोङ्कारस्त्वं च लज्जादिबीजं त्वं च स्त्री त्वं च पुमान् सर्वरूपा त्वां नमामि बोधये नः प्रसीद ॥ ७ ॥ त्वं वै देवर्षिर्देवता कालरूपा त्वं वै मासस्त्वमृतुश्चायने द्वे । कव्यं भुङ्क्ष्व त्वं यथा स्वधा तद्वत् । स्वाहा हव्यभोक्त्री स्वयं देवि ॥ ८ ॥ त्वं वै देवाः शुक्लपक्षे प्रपूज्यास्त्वं पित्राद्याः कृष्णपक्षे प्रपूज्याः । त्वं वै सत्यं निष्कलं च स्वरूपं त्वां वै नत्वा बोधयामि प्रसीद ॥ ९ ॥ चन्द्रार्काग्निविलोचने नीचं नीचमुच्चं नत्वा याति मुक्तिं त्वत्पादध्यानयोगात् । त्वत्पादाब्जं चार्चयित्वा तु मुक्तिं को वा न प्राप्नोत्युत्तमां देवि सूक्ष्मम् ॥ १० ॥ स्थूलमुच्चं नीचं नीचमुच्चं कर्तुं समर्था त्वं तु काले शक्तिरूपा भवानि त्वां नत्वाहं बोधये नः प्रसीद । त्वं वै शक्ती राघवे रावणे च रुद्रादौ वापीहास्ति या त्वम् । सा त्वं शुद्धं वामकेन प्रवर्ध त्वां नत्वाहं बोधये नः प्रसीद ॥ ११ ॥ ॐ तत् सत् ब्रह्मणे नमः ॥ ब्रह्माजी बोले — ॐ विमल वदनवाली को नमस्कार है। भूर्लोक, भूवर्लोक तथा स्वर्लोक में व्याप्त परम कमला स्वरूपिणी, एकमात्र परमानन्द राशिस्वरूपा, तीनों लोकों के अन्धकार को दूर करने वाली, परम ज्योति स्वरुपा, असत् अभिलाषा से युक्त संदूषित दोषों को दूर करने वाली, परम अमृत स्वरूपिणी, मूर्तिमान् करोड़ों चन्द्रमा के समान मुखवाली, सभी वेदों में उद्भववाली नारायणी, शरीरमात्र में परमात्मरूप से अवस्थित दुर्गादेवी ! आप प्रसन्न हों, आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ३ ॥ ॐ विकरालरुपे ! प्रणवस्वाहास्वरूपे ! ह्रीं-स्वरूपिणी ! अम्बिके ! त्रिगुणप्रसूते ! अम्ब ! भगवती ! आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ४ ॥ सिद्धिकरी, स्फ्रें-स्फ़्रों-स्वरूपिणी, स्वाहारूपिणी, स्वधारूपा, निर्मलमुखी, चन्द्रमुखी, कोलाहलमुखी, शर्वा ! आप प्रसन्न हों ॥ ५ ॥ जगत् को हर्षित करने वाली, मधुर दृष्टि वाली, क्रीडा स्थान में स्वयं आयी हुई आप महेश्वरी भुवनेशी को मैं प्रणाम करता हूँ। आप शत्रुरूपा और मित्ररूपा भी हैं, आप दुर्ग की दुर्गा हैं, आप योगिनियों के अन्तःस्थल में स्थित रहती हुई एकरूपा, अनेकरूपा, सूक्ष्मरूपा, निर्विकारा और करोड़ों-करोड़ ब्रह्माण्डों को प्रकट करने वाली हैं ॥ ६ ॥ एकमात्र मैं, विष्णु अथवा शिव तथा अन्य देवता — हम सभी आपकी स्तुति करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं? आप स्वाहा, स्वधा, वौषट, ओंकार और लज्जादिबीजरूपा हैं, आप ही स्त्री, पुरुष तथा सर्वरूपवाली हैं। आपको नमस्कार है, आपको हम प्रबोधित कर रहे हैं। आप हम लोगों पर प्रसन्न होइये ॥ ७ ॥ आप ही देवर्षि, देवता तथा कालरूपा हैं, मास, ऋतु, दो अयन — उत्तरायण और दक्षिणायन — भी आप ही हैं। देवी ! आप स्वधास्वरूपा होकर कव्य का भोग करती हैं। उसी प्रकार स्वाहा स्वरूपा होकर स्वयं हव्यभोक्त्री हैं ॥ ८ ॥ आप ही शुक्ल पक्ष में देवता के रूप में तथा कृष्ण पक्ष में पित्रादि के रूप में प्रपूजित हैं। आप ही सत्यस्वरूपा और अखण्ड स्वरूपा हैं। मैं आपको नमस्कार कर आपका प्रबोधन करता हूँ। आप प्रसन्न हों ॥ ९ ॥ चन्द्र, सूर्य तथा अग्नि – इन तीन नेत्रों वाली देवी ! आप निम्न-से-निम्न व्यक्ति को उच्च बना देती हैं तथा वह आपको नमस्कार करके तथा आपके चरण कमल का ध्यान करके मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। आपके श्रेष्ठ पदकमल का पूजन करके कौन उत्तम मुक्ति को नहीं प्राप्त कर लेता है ॥ १० ॥ आप उच्च को निम्न तथा निम्न को उच्च करने में समर्थ हैं। भवानी ! आप समय पर शक्ति रूपा हैं। आपको नमस्कार करके मैं आपका प्रबोधन करता हूँ। आप हम पर प्रसन्न होइये। श्रीराम, रुद्रादि तथा इस संसार में शक्तिरूप से जो विराजमान हैं वे आप ही हैं, आप जो हैं सो हैं अर्थात् अगम्य स्वरूपा हैं। शुद्धाचारी श्रीराम का वाममार्ग से त्वरित अभ्युदय कीजिये। आपको नमस्कार कर मैं आपका प्रबोधन करता हूँ। आप हम पर प्रसन्न होइये ॥ ११ ॥ ॐ तत्सत ब्रह्म को नमस्कार है । श्री महादेव जी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! इस वेदसूक्त तथा स्तोत्र से ब्रह्माजी ने जब देवी की स्तुति की तब भगवती चण्डिका प्रबुद्ध हो गईं। देवी के प्रबुद्ध हो जाने पर वे लोक-पितामह ब्रह्मा सभी देवताओं के साथ हाथ जोड़कर अपने मनोवाञ्छित की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करने लगे — ॥ १२-१३ ॥ ब्रह्माजी बोले — देवी, सुरोत्तमे ! सभी प्राणियों के कल्याण, अत्यन्त भीषण संग्राम में श्रीराम की विजय तथा राक्षसों के नाश के लिए हमने असमय में आपको प्रबोधित किया है। महादेवी ! जब तक जगत् शत्रु दशानन अपने पुत्र तथा बान्धवों के साथ युद्ध में नहीं मारा जाएगा, तब तक श्रीराम के विजय की इच्छा वाले हम लोग आपकी पूजा करते रहेंगे। शिवे ! देवी ! यदि आप प्रसन्न हैं तो प्रतिदिन हम लोगों की पूजा ग्रहण कर महाशत्रुसमूह का विनाश करते रहिये ॥ १४-१७ ॥ श्रीदेवी जी बोली — महाबलशाली एवं पराक्रमी वीर कुम्भकर्ण अपने भयङ्कर सैनिकों के साथ आज ही युद्ध में मारा जायगा। इस कृष्ण पक्ष की शुद्ध नवमी से आरम्भ होकर जब तक शुक्ल पक्ष की नवमी आयेगी, तब तक प्रत्येक दिन युद्ध क्षेत्र में राक्षस मारे जायँगे। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है। अमावस्या तिथि की रात्रि में मेघनाद के मारे जाने पर संतप्त सहृदय रावण भी युद्ध हेतु भगवान् श्रीराम के पास आ जायगा ॥ १८-२०१/२ ॥ ब्रह्माजी पुनः बोले — आनन्द–राशिस्वरूपा तीनों लोकों के अन्धकार को दूर करने वाली, परम ज्योतिस्वरूपा, असत् अभिलाषा से युक्त संदूषित दोषों को दूर करने वाली, परम अमृतस्वरूपिणी,मूर्तिमान् करोड़ों चन्द्रमा के समान मुखवाली, सभी वेदों में वर्णित उद्भव वाली नारायणी, शरीरमात्र में परमात्मरूप से अवस्थित दुर्गादेवी ! आप प्रसन्न हों, आपको बार-बार नमस्कार है ॥ २१ ॥ ॐ विकरालरुपे ! प्रणव -स्वाहास्वरूपे ! ह्रीं-स्वरूपिणी ! अम्बिके ! त्रिगुणप्रसूते ! अम्ब ! भगवती ! आपको बार-बार नमस्कार है। सिद्धिकरी स्फ्रें-स्वरूपिणी ! को नमस्कार है ॥ २२ ॥ श्रीदेवी जी ने पुनः कहा — देवान्तकप्रभृति महाबली और पराक्रमी वीर राक्षसों को साथ लेकर क्रोध के वशीभूत हुआ रावण रणभूमि में आयेगा। तत्पश्चात् युद्ध भूमि में देवान्तक आदि राक्षसों के मारे जाने पर वह लोकपीड़क, क्रोध से लाल आँखों वाला महावीर रावण स्वयं युद्ध करेगा ॥ २३-२४ ॥ तब श्रीराम और रावण का ऐसा कठिन युद्ध होगा, जैसा न किसी ने देखा है और न कहीं सुना ही होगा। उसमें भी आश्विन शुक्ल सप्तमी से आरम्भ होकर नवमी तिथि तक उन दोनों योद्धाओं में महान् भयङ्कर संग्राम होगा ॥ २५-२६ ॥ युद्ध में श्रीरामचन्द्र की विजय की आकाङ्क्षा वाले आप लोगों को उस शुक्ल सप्तमी से प्रारम्भ करके नवमी तिथि पर्यन्त सर्वप्रथम मृण्मयी प्रतिमा में विशुद्ध पूजनोपचारों से मेरी विधिवत् पूजा करनी चाहिए तथा वेद-पुराणोक्त स्तोत्रों से भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन करना चाहिए ॥ २७-२८१/२ ॥ देवगण ! आश्विन मास में शुक्ल पक्ष में मूल नक्षत्र से युक्त सप्तमी तिथि को पत्रिका-प्रवेशन तथा श्रीराम के धनुष-बाण का विधिवत् पूजन करना चाहिए ॥ २९१/२ ॥ अष्टमी को प्रतिमा में पूजित होने पर मैं अष्टमी तथा नवमी के उत्तम संधिकाल में दुरात्मा दुष्ट रावण के सिर से रणभूमि में आ जाऊँगी, तदनन्तर उस संधि के क्षण में विधि-विधान से विपुल उपचारों से बारम्बार मेरी पूजा करनी चाहिए। तत्पश्चात् नवमी तिथि को भी विविध प्रकार के उपचारों से पूजित होने पर मैं अपराह्ण में युद्ध क्षेत्र में उस वीर रावण का संहार करूँगी ॥ ३०-३३१/२ ॥ श्रेष्ठ देवगण ! दशमी तिथि – विजयादशमी – में प्रातः ही मेरी पूजा कर महोत्सव पूर्वक नदियों में मेरी मृण्मयी मूर्ति विसर्जित करनी चाहिए ॥ ३४-३५ ॥ इस प्रकार इन – आश्विन कृष्ण नवमी से शुक्ल नवमी तक – पंद्रह दिन में मेरी पूजा का महोत्स करके उस दुरात्मा रावण के मारे जाने पर आप लोगों को शान्ति मिलेगी ॥ ३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘ब्रह्मा के द्वारा देवीसूक्तस्तुतिवर्णन’ नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥ Content is available only for registered users. 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