August 6, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-50 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ पचासवाँ अध्याय कश्यप और अदिति का वसुदेव-देवकी के रूप में जन्म, कंस द्वारा देवकी के छः पुत्रों का वध, देवी का कृष्णरूप में देवकी के गर्भ से जन्म लेना और सिंहवाहिनीरूप में आकाश में स्थित हो कंस की मृत्यु की भविष्यवाणी कर अन्तर्धान होना अथः पञ्चाशत्तमोऽध्यायः श्रीमहादेवनारदसंवादे श्रीकृष्णप्रादुर्भावोपाख्यानः श्री महादेव जी बोले — ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर साक्षात् भगवती देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये अपने अंश से वसुदेव पुत्र भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुईं और विष्णु भगवान् ने भी वसुदेव के घर में महान् बल तथा पराक्रम वाले श्रीबलराम एवं दूसरे पाण्डुपुत्र धनुर्धरों में श्रेष्ठ अर्जुन — इन दो रूपों में होकर पृथ्वीतल पर जन्म लिया ॥ १-२१/२ ॥ महामते! अब उनके जन्म के सम्बन्ध में विस्तार से सुनिए। उसमें मैं प्रारम्भ में श्रीबलराम और श्रीकृष्ण के जन्म का वर्णन करूँगा, आप उसे सुनें — ॥ ३१/२ ॥ प्राचीनकाल में देवताओं की माता अदिति तथा प्रजापति कश्यप ने दीर्घकाल तक सच्ची भक्ति से भगवती की उपासना की। उन दोनों ने निराहार रहते हुए शीतकाल में जल में खड़े होकर तथा ग्रीष्मकाल में अग्नि के मध्य स्थित रहकर दो हजार दिव्य वर्षों तक भक्तिपूर्वक कठोर तप किया। उन दोनों पर प्रसन्न होकर भगवती जगदीश्वरी साक्षात् प्रकट हो गयी और बोलीं — आप दोनों की क्या अभिलाषा है? जो भी हो उसे माँग लीजिए ॥ ४-६१/२ ॥ तब उन दोनों ने बार-बार साष्टाङ्ग प्रणाम करके उनसे कहा — माता ! आप हम दोनों के घर में लीलापूर्वक जन्म ग्रहण कीजिए ॥ ७१/२ ॥ सुरोत्तमे ! जैसे दक्ष प्रजापति के घर में आपका जन्म हुआ था, उसी प्रकार द्वापर युग के अन्त में पृथ्वीतल के किसी स्थान पर हमारे घर में भी आप जन्म लें ॥ ८-९ ॥ श्रीदेवी जी बोलीं — स्त्री रूप में अवतीर्ण शम्भु की अभिलाषा पूर्ण करने के लिये मैं अपनी इच्छा से नवीन मेघ के समान कान्तिवाले पुरुष रूप में आविर्भूत होऊँगी तथा मेरी यह मुण्डमाला भी वनमाला हो जाएगी। मेरा यह भयानक विग्रह सौम्यरूप, दो नेत्रों तथा दो भुजाओं से युक्त, पीताम्बर से सुशोभित, हाथ में वंशी लिये हुए तथा गोपियों के मन को आकर्षित करने वाला, ऐश्वर्ययुक्त भगवान् विष्णु के लक्षणों से सम्पन्न होगा ॥ १०-१२ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर वे महादेवी उन दोनों के समक्ष ही अन्तर्धान हो गईं और वे दोनों प्रसन्न होकर अपने स्थान को चले गये ॥ १३ ॥ वे प्रजापति कश्यप यदुकुल में जन्म लेकर वसुदेव — इस नाम से भूलोक में विख्यात हुए और नारद ! उन अदिति ने भी दुष्ट प्रकृति वाले राजा कंस की बहन देवकी तथा रोहिणी — इन दो रूपों में जन्म लिया। मुनिश्रेष्ठ ! शरत्कालीन चन्द्रमा के समान मुखवाली उन देवकी तथा रोहिणी के साथ वसुदेव ने विधानपूर्वक विवाह किया। रानी देवकी के उस विवाह में महान् असुर कंस ने बहन के स्नेह के कारण बहुत बड़ा मङ्गलोत्सव किया। तत्पश्चात् देवकी तथा वसुदेव के प्रस्थान के समय अत्यन्त दुष्ट बुद्धिवाला कंस भी रथ पर चढ़कर उन दोनों के साथ आया ॥ १४-१८ ॥ मुने ! इसी समय अचानक देवभाषा में आकाश से अशरीरी वाणी (आकाशवाणी) उत्पन्न हुईं कि राजन ! महीपते ! इसके आठवें गर्भ से जो बालक उत्पन्न होगा, वह निश्चित रूप से तुम्हारा संहार करनेवाला होगा ॥ १९-२० ॥ ऐसा सुनकर वह दुष्टबुद्धि कंस देवकी को काट डालने की इच्छा से तलवार लेकर अकस्मात् बड़े वेग से उनकी ओर दौड़ा। तब उन महामति वसुदेव ने उसके चरणों में गिरकर कहा कि इसके गर्भ से उत्पन्न सभी संतानें मैं आपको दे दूंगा और आप उसे लेकर जो चाहे सो कीजियेगा ॥ २१-२२१/२ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् उस दुष्टस्वभाव कंस ने वहाँ रक्षक नियुक्त कर दिये और इस प्रकार उन देवकी को जान से मारने का विचार छोड़ दिया। उस दुष्टात्मा ने रक्षकों से कह दिया कि रक्षकों ! जब इसके पुत्र उत्पन्न हों तब तुम लोग मेरे पास आकर मुझे बता देना और इसके आठवें गर्भ के होने पर तुम लोग मुझसे अवश्य कहना; तब मैं अपनी इस बहन का गर्भ सहित वध कर दूँगा ॥ २३-२५१/२ ॥ देवकी के लिये नियुक्त रक्षकों को यह आदेश देकर वह दुरात्मा कंस खिन्नमनस्क होकर मन्त्रियों के साथ अपने भवन में प्रविष्ट हो गया ॥ २६१/२ ॥ तदनन्तर उन देवकी की संतान उत्पन्न होने पर रक्षकगण उसकी आज्ञा के अनुसार उसे बता दिया करते थे और मुनिश्रेष्ठ ! वह पापात्मा कंस देवकी से उत्पन्न हुए पुत्रों के विषय में सुन-सुनकर वहाँ पहुँच जाता था तथा उन नवजात शिशुओं को हाथ से पकड़कर उन्हें पत्थर पर पटक कर मार डालता था ॥ २७-२८१/२ ॥ इस प्रकार देवकी के गर्भ से उत्पन्न छः संतानों को मारकर उस मूर्ख बुद्धि कंस ने सातवें गर्भ के लिये देवकी के रक्षकों को अत्यधिक सावधान कर दिया ॥ २९-३० ॥ इसी बीच जगत्पति ब्रह्मा जी विचार-विमर्श करने के लिये सभी देवताओं के साथ कैलास शिखर पर गये। उन्होंने महादेवी तथा सदाशिव को प्रणाम करके भगवती के समक्ष दोनों हाथ जोड़कर उनसे यह वचन कहा — ॥ ३१-३२ ॥ ब्रह्माजी बोले — माता ! आपने कहा था कि पृथ्वीतल पर देवकी के गर्भ से पुरुष रूप में जन्म लेकर मैं पृथ्वी के भार का निश्चित रूप से शमन करूँगी। अत्यन्त नीच बुद्धि वह राजा कंस पैदा होते ही उसकी सभी संतानों को शिला पर पटक कर मार डालता है। पूर्वकाल में देवकी के विवाह में उस दुर्मति कंस के लिये भयदायक बड़े ऊँचे स्वर में आकाशवाणी हुईं थी कि ‘दुर्मते ! देवकी के गर्भ से जो आठवाँ बालक उत्पन्न होगा, वह तुम्हारा विनाशकारी होगा – ऐसा तुम निश्चित रूप से जान लो’ ॥ ३३-३६ ॥ शिवे ! तब उसे सुनकर अत्यन्त नीच उस कंस ने उसी क्षण देवकी को काट डालने का प्रयास किया; तब वसुदेव ने उत्पन्न होने वाली संतानों को उसे सौंप देने की प्रतिज्ञा करके देवकी को मार देने से रोक दिया। तत्पश्चात् अत्यन्त मूर्ख बुद्धि कंस ने यह निश्चय किया कि इसके आठवें गर्भ के होने पर मैं देवकी को अवश्य ही मार डालूँगा। इसलिये उग्र प्रतापी तथा अपराजेय होते हुए भी उस कंस ने देवकी के गर्भ से उत्पन्न छः पुत्रों को पैदा होते ही मार डाला। परमेश्वरि ! अब यदि आप देवकी के सातवें गर्भ से जन्म नहीं लेंगी, तब फिर देवकी से आपका जन्म कैसे होगा और फिर आप पृथ्वी के भार का नाश किस प्रकार करेंगी; यह मुझे बताइये ॥ ३७-४१ ॥ श्रीदेवी जी बोलीं — ब्रह्मन ! आकाशवाणी अन्यथा नहीं हो सकती। देवकी के आठवें गर्भ से मेरा जन्म अवश्य होगा। कमलासन ! मैं आपको उपाय बता रही हूँ; आप उसी के अनुसार प्रयास कीजिये। अब आप विलम्ब मत कीजिये और शीघ्रतापूर्वक वैकुण्ठलोक के लिये प्रस्थान कीजिये ॥ ४२-४६ ॥ भगवान् विष्णु अपने अंश से वसुदेव के घर में मेरे बड़े भाई बलराम के रूप में पृथ्वीतल पर अवश्य उत्पन्न होंगे। पूर्वकाल में इन विष्णु के साथ मेरी इस प्रकार की वचनबद्धता भी हो चुकी है। अतः आप उन जगत्पति विष्णु से शीघ्र ही कहिये कि वे अपने अंश से पृथ्वीतल पर वसुदेव के द्वारा देवकी के गर्भ में प्रविष्ट होवे ॥ ४४-४५१/२ ॥ मैं भी अपने अंश से दो रूपों में होकर पृथ्वीतल पर रोहिणी तथा यशोदा के गर्भ मे जाऊँगी। पांचवें माह के आने पर मैं रोहिणी के गर्भ से देवकी के गर्भ में चली जाऊँगी और कमलयोनि ! विष्णुजी उनके गर्भ से रोहिणी के गर्भ में चले आएँगे। इस प्रकार देवकी के आठवें गर्भ से मेरा जन्म हो जायेगा और वह दुर्बुद्धि कंस इस आठवें गर्भ को समझ भी नहीं पायेगा ॥ ४६-५० ॥ इस प्रकार मैं देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लेकर सैनिकों सहित उस दुष्ट कंस को समय आने पर मार डालूँगी। जब तक इस कंस का पुण्यकर्म क्षीण नहीं होता, तब तक उस हेतु जो कुछ किया जाना चाहिये, उसे आप मुझसे सुनिये ॥ ५१-५२ ॥ प्रजापते ! एक ही समय में देवकी के गर्भ से पुरुषरूप तथा यशोदा के गर्भ से स्त्रीरूप में लीलापूर्वक मेरे उत्पन्न होने के पश्चात् देवकी के गर्भ से (श्रीकृष्ण रूप में) उत्पन्न हुईं मुझको तत्काल गोकुल में यशोदा के गर्भ स्त्री रूप में उत्पन्न मुझ बालिका को ले आकर वसुदेव जी को उस दुरात्मा कंस से ऐसा कहना चाहिये कि राजन ! मेरी यह कन्या उत्पन्न हुईं है; इसकी रक्षा कीजिये ॥ ५३-५५१/२ ॥ तत्पश्चात् जब वह असुर कंस उसे मारने का प्रयास करेगा, उसी समय मेरी वह मूर्ति उसके संहारक श्रीकृष्ण के विषय में कहते हुए उस दुर्बुद्धि कंस के देखते-देखते आकाश में चली जायेगी। कमलासन ! तदनन्तर उस कंस के प्रारब्ध कर्म के क्षीण होने पर मैं गोकुल से आकर उस नीच को मार डालूँगी ॥ ५६-५८ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — देवी के इस प्रकार कहने पर भगवान् ब्रह्मा वैकुण्ठ आ गये और उनके द्वारा जो कुछ भी कहा गया था, वह सब उन्होंने विष्णु जी से कह दिया ॥ ५९ ॥ महामते ! उसे सुनकर भगवान् विष्णु ने अपने अंश द्वारा रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न होने के लिये देवकी के गर्भ में प्रवेश किया और इधर जगद्धात्री भगवती भी पृथ्वी का भार मिटाने के लिये दो रूपों में विभक्त होकर रोहिणी तथा यशोदा के गर्भ में प्रतिष्ठित हुईं ॥ ६०-६१ ॥ तत्पश्चात् भादों महीने में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, वृष लग्न में अर्धरात्रि की वेला में भगवती ने देवकी के गर्भ से परम पुरुष के रूप में जन्म लिया। उस समय मेघ समुदाय गर्जना कर रहे थे, चारों ओर अन्धकार छाया हुआ था, सभी रक्षक तथा अन्य लोग निद्रावस्था में थे। उस बालक के शरीर का वर्ण नवीन मेघ के सदृश श्याम था और वह वनमाला से सुशोभित था। उसके वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिह्न विराजमान् था, दोनों नेत्र प्रभायुक्त थे, दो भुजायें थी, सभी अङ्ग दिव्य थे और वह अपने तेज से देदीप्यमान् प्रतीत हो रहा था। उस नवजात बालक को देखकर उसे साक्षात् पूर्ण ब्रह्मसवरूप समझकर देवकी ने करूण रुदन करते हुए उससे यह वचन कहा — सुलोचन ! तुम कौन हो, जो मुझ अभागिनी के गर्भ से उत्पन्न हुए हो। पैदा होते ही मेरे पुत्रों का वध कर देने वाले शत्रु रूप मेरे भाई कंस को क्या तुम नहीं जानते? मेरे पुत्र रूप में तुम्हारे जन्म लेने का समाचार सुनकर वह दुष्टात्मा कंस मुझे शोक संतप्त करके आज ही तुम्हारा वध कर देगा ॥ ६५-७१ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — उन माता देवकी का यह वचन सुनकर वह बालक महान् दुःख से व्याकुल उन देवकी को अपने अमृतरूपी वचनों से प्रसन्न करते हुए कहने लगा — ॥ ७२ ॥ बालक बोला — माता ! आप भय मत कीजिये, क्योंकि इन तीनों लोकों में असुर, देवता अथवा मनुष्य कोई भी मुझे मारने वाला नहीं है। मैं जगत् का संहार करने वाली आदिशक्ति पराविद्या हूँ — पूर्व जन्म में किये गये आप दोनों के तप से प्रसन्न होकर तथा भगवान् शिव की सम्मति से मायामयी श्रेष्ठ पुरुषाकृति में मैं इस समय देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये आपके गर्भ से उत्पन्न हुईं हूँ ॥ ७३-७५ ॥ देवकी बोलीं — वत्स ! तुम्हारा यह वचन सुनकर मुझे आश्चर्य हो रहा है। सुलोचन ! अब तुम मुझे अपने उत्कृष्ट देवी रूप का दर्शन कराओ ॥ ७६ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — देवकी के ऐसा कहते ही कमल के समान नेत्र वाले श्रीकृष्ण तत्काल शव पर आरूढ़ भयानक मुखवाली भगवती काली के स्वरूप में प्रकट हो गये। उनकी चार भुजाये, तीन नेत्र एवं लपलपाती हुईं भीषण जिह्वा थी। उनके लहराते हुए लम्बे केशपाश से उनकी पीठ ढकी हुईं थी और उन्होंने सुन्दर किरीट धारण कर रखा था। मुने ! उस समय वह चित्ताकर्षक वनमाला भी मुण्डसमूहों से बनी हुईं अत्यन्त सुन्दर तथा लम्बी माला के रूप में हो गयीं ॥ ७७-७९ ॥ उस बालक को भयानक काली रूप में देखकर देवकी ने शीघ्रतापूर्वक वसुदेव को बुलाया। उन वसुदेव ने वहाँ आकर यह सब देखा और बालक ने जन्म लिया — ऐसा सुनकर वे अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये और फिर वचन बोले — ॥ ८०-८१ ॥ वसुदेव जी बोले — मेरे सैकड़ों जन्मों की अनेक तपस्याओं तथा भाग्य के फलस्वरूप आपने माया बालक का रूप धारण करके यदि मेरे घर में जन्म लिया ही है और जिस प्रकार आपने मेरे ऊपर कृपा करके अपने इस परम दुर्लभ कालिका रूप को दिखाकर मेरे जन्म को सफल किया है, उसी प्रकार उगते हुए करोड़ों चन्द्रमाओं की आभा के समान अपने दस भुजाओं वाले सौम्य तथा सुन्दर दूसरे रूप का दर्शन भी मुझे करा दीजिए ॥ ८२-८४ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — तब उनका यह वचन सुनते ही उस रूप का त्याग कर के भगवती एकाएक सौम्य तथा दस भुजाओं से युक्त रूपवाली हो गईं। उस रूप को देखकर आनकदुन्दुभि वसुदेव जी को अत्यन्त विस्मय हुआ और वे हाथ जोड़कर महान् भक्ति से उनकी स्तुति करने लगे — ॥ ८५-८६ ॥ ॥ वसुदेव कृत काली स्तुति ॥ ॥ वसुदेव उवाच ॥ त्वं माता जगतामनादिपरमा विद्यातिसूक्ष्मात्मिका एवं तावज्जनकोऽप्यनादिपुरुषः पूर्णः स्वयं चिन्मयः । त्वं विश्वासि तथैव विश्ववनिता विश्वाश्रया विश्वगा त्वतोऽन्यन्नहि किञ्चिदस्ति भुवने विश्वेशि तुभ्यं नमः ॥ ८७ ॥ त्वं सृष्टौ चतुरानना स्थितिविधौ विष्णुः परात्मा प्रभुः संहृत्यामतिभीमरूपचरितो रुद्रः पिनाकास्त्रधृक् । तेषां सृष्टिविनाशपालनविधौ त्वं कालिकैका परा नित्या ब्रह्ममयी प्रसीद परमे कृष्णे जगद्वन्दिते ॥ ८८ ॥ त्वं सूक्ष्मा प्रकृतिर्निराकृतिसुताख्याता जगद्व्यापिनी स्त्रीपुंक्लीबविभेदतस्त्वयि पुनः स्त्रीत्वाद्यभावः सदा । तत्त्वं ते न विदन्ति केचन जगत्यत्राम्बिके तत्कथं शक्तः स्तोतुमहं भवामि परमं ब्रह्मा स्वयं मूढधीः ॥ ८९ ॥ नमोऽस्तु विश्वमोहिन्यै गौर्ये त्रिदशवन्दिते । नमस्ते कृष्णरूपिण्यै मायापुरुषरूपिणि ॥ ९० ॥ वसुदेव जी बोले — आप जगत् की माता हैं, अनादि हैं, पराविद्या हैं और अति सूक्ष्म स्वरूपिणी हैं। उसी तरह आप संसार के पिता भी हैं। आप पूर्ण चिन्मयस्वरूप साक्षात् अनादि पुरुष हैं। आप विश्वरूप हैं, समस्त स्त्रियों के रूप में आप ही प्रतिष्ठित हैं, आप विश्व का आश्रय हैं, आप विश्वव्यापिनी हैं और आपसे अतिरिक्त अन्य कोई भी इस त्रिभुवन में नहीं हैं। विश्वेशि! आपको नमस्कार है ॥ ८७ ॥ सृष्टिकार्य में आप ही चतुर्मुख ब्रह्मा के रूप में हो जाती हैं, पालन में आप ही परमात्मा प्रभु विष्णु हो जाती हैं और संहार कार्य में आप ही अत्यन्त भयानक रूप तथा चरित्र वाले पिनाकास्त्रधारी रुद्र के रूप में हो जाती हैं। उनके सृजन, पालन तथा संहार कार्य में ब्रह्ममयी, परा तथा नित्यस्वरूपिणी एकमात्र आप कालिका ही हेतु हैं। जगद्वन्दिते ! परमे ! कृष्णे ! आप मुझ पर प्रसन्न हों ॥ ८८ ॥ आप सूक्ष्मा प्रकृति हैं, आप निराकार होते हुए भी मेरे पुत्र रूप में प्रकट हुईं हैं, आप जगत् में व्याप्त है, आप में सदा स्त्रीत्वादिका का अभाव रहने पर भी आप स्त्री-पुरुष-नपुंसक भेद से संसार में व्याप्त हैं। इस संसार में कोई भी आपका वास्तविक रहस्य नहीं जान सकता तथा परमेष्ठि भगवान् ब्रह्मा भी इससे मोहित बुद्धिवाले हो जाते हैं, फिर अम्बिके ! मैं आपकी स्तुति करने में भला किस प्रकार समर्थ हो सकता हूँ ॥ ८९ ॥ देवताओं के द्वारा वन्दनीय भगवती ! विश्व को मोहित कर देने वाली आप गौरी को नमस्कार है। मायापुरुषरूपिणी ! कृष्ण का रूप धारण करने वाली आप भगवती को नमस्कार है ॥ ९० ॥ श्रीमहादेव जी बोले — इस प्रकार उनके स्तुति करने पर दस भुजाओं वाली वे भगवती तत्काल कमल के समान नेत्रों वाले बालक रूप श्रीकृष्ण के रूप में प्रत्यक्ष हो गयी। मुनिश्रेष्ठ ! वनमाला से सुशोभित उस बालकरूप श्रीकृष्ण को देखकर वसुदेव जी हाथ जोड़कर पुनः कहने लगे — ॥ ९१-९२ ॥ वसुदेव जी बोले — वत्स ! महान् बलशाली तथा उग्र कंस मेरे सभी पुत्रों को पैदा होते ही शिला के अग्रभाग पर पटक कर मार डालता है। अतः अब जब तक उस कंस के सेवक तथा रक्षक जाग नहीं जाते हैं, तब तक देव ! जगत्पते ! आपके लिये मुझे जो इस समय करना चाहिये, वह सब आप मुझे बताया दीजिए; क्योंकि पृथ्वी का भार मिटाने के लिये ही आप उत्पन्न हुए हैं ॥ ९३-९५ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — उनका यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण रूप में विद्यमान् भगवती काली ने यशोदा तथा नन्द की पूर्व तपस्या का समरण कर उनसे यह कहा — ॥ ९६ ॥ श्रीकृष्ण बोले — तात ! महामते ! अत्यन्त सतर्क दृष्टि रखने वाले मामा कंस के भय से बचने के लिये इस समय आपको जो करना है, उसे बताता हूँ, सुनिये ॥ ९७ ॥ आज ही अष्टमी तिथि के व्यतीत होने पर गोकुल में यशोदा के गर्भ से मेरी एक दूसरी कन्यामूर्ति प्रादुर्भूत हुईं है। मेरी माया से मोहित होने के कारण निद्रा में निमग्न यशोदा को उन कमल सदृश नेत्रोंवाली सर्वाङ्गसुन्दरी गौरी के विषय में जानकारी नहीं है। आप शीघ्रतापूर्वक [वहाँ जाइये और] मुझे वहाँ रखकर तथा उस कन्या को यहाँ लाकर यह बात प्रचारित कर दीजिए की मेरी एक सुन्दर कन्या उत्पन्न हुईं है ॥ ९८-१०० ॥ तत्पश्चात् उस कन्या को मारने के लिये जब मेरा मामा वह दुष्ट कंस कुपित होकर शिला पर पटकने के लिये मुझे ऊपर उठायेगा, तब पिताजी, देवताओं के कार्य सिद्ध करने के लिये उस कंस का वध करने वाले मेरे विषय में बताकर वह कन्या उसके देखते-देखते आकाश में चली जायगी। तत्पश्चात् कुछ समय तक गोकुल में रहने के बाद यहाँ आकर मैं दुष्टात्मा मामा कंस का वध करूँगा ॥ १०१-१०३ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — महामुने ! उस बालक की यह बात सुनकर वसुदेव जी उसे लेकर गोकुल की ओर चल पड़े ॥ १०४ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! उस समय वासुदेव श्रीकृष्ण की अपरम्पार माया से मोहित हो जाने के कारण कोई भी व्यक्ति जाग नहीं सका ॥ १०५ ॥ अपने पुर से निकलकर वसुदेव जी ने अपने तेज से देदीप्यमान् पुत्र को बार-बार देखकर अत्यन्त दुःखी होकर इस प्रकार कहते हुए बहुत रुदन किया — हा वत्स ! तुम मुझ पापी के घर में किसलिये पैदा हो गये हो, अब तुम्हें गोकुल में बिना रक्षित किए फिर घर कैसे लौट आऊँ ॥ १०६-१०७ ॥ इस प्रकार अनेक प्रकार से रोते-कलपते और अपने आंसुओं से उस बालक को सींचते हुए वसुदेव जी ने श्रीकृष्णा की कृपा से यमुना नदी को पार कर बालक रूप भगवती के साथ नन्द जी के भवन में अज्ञातरूप से प्रवेश किया और वहाँ पर सुन्दर-सी कन्या को जन्म देने वाली यशोदा को देखा। इस समय वे यशोदा जी सोयी हुईं थी, उन्हें अपने उदर से उत्पन्न कन्या की जानकारी नहीं थी और उनके साथ उनकी सखियाँ भी इधर-उधर सोयी पड़ी थीं। तत्पश्चात् वसुदेव जी श्रीकृष्णा को वहीं पर रखकर और उस कन्या को लेकर तत्काल घर से निकल गये ॥ १०८-१११ ॥ मुने ! उस समय दस भुजाओं से युक्त तथा मनोरम तेज से प्रदीप्त वे भगवती वसुदेव की गोद में अत्यन्त सुशोभित हो रही थी। समस्त लोकों की एकमात्र जननी तथा ब्रह्मस्वरूपिणी उन देवी को देखकर आनन्द से परिपूर्ण मनवाले वसुदेव जी मथुरापुरी पहुँच गये और घर में प्रवेश करके देवकी को वह कन्या समर्पित कर दी। इसके बाद उन महामति वसुदेव जी ने रक्षकों को बताया की कन्या ने जन्म लिया है ॥ ११२-११४ ॥ तदनन्तर उन रक्षकों ने भी घोर दुष्टात्मा उस कंस से तत्काल जाकर कहा — राजन ! देवकी के आठवें गर्भ से एक कन्या उत्पन्न हुईं है ॥ ११५ ॥ महामुने ! इसे सुनकर उस पापात्मा कंस ने उन रक्षकों से कहा — उसे यहाँ शीघ्र लाओ; मैं बिना कुछ सोच-विचार के उसका वध कर दूंगा। उसकी बात सुनकर रक्षकों ने वह कन्या लाकर उस नीच बुद्धि कंस को दे दी। उस कन्या को अत्यन्त सुदृढ़ देखकर मानो वह पत्थरों से बनी हुईं हो, वह पापात्मा कंस नहीं जान सका कि यह कन्या सृजन, पालन तथा संहार करने वाली परमेश्वरी भगवती देवी ही हैं और उसे मारने की इच्छा से उसने अपने बाएँ हाथ की मुट्ठी से कसकर पकड़ लिया। उस समय कठोर विग्रहवाली उस कन्या को शिला से निर्मित मानकर उसने उस कन्या को पत्थर पर पटकने की इच्छा से ऊपर उछाला। तत्पश्चात् आकाश में स्थित होकर सिंह के पृष्ठ पर आरूढ़ और महान् तेज से जाज्वल्यमान् भगवती देवी ने उस पाप बुद्धि कंस से कहा – ॥ ११६-१२०१/२ ॥ श्रीमहादेवी जी बोलीं — दुरात्मन ! तुम्हारे विनाश के लिये मैं ही अपने अंश से माया के प्रभाव से वसुदेव के द्वारा देवकी के गर्भ से पुरुष रूप में उत्पन्न होकर गोकुल में नन्दगोप के घर में विराजमान हूँ ॥ १२१-१२२ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — ऐसा कहकर सिंह पर विराजमान वे भगवती देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये उस नीच बुद्धि कंस के देखते-देखते अन्तरिक्ष में चली गयी ॥ १२३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीकृष्णप्रादुर्भावोपाख्यान’ नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५० ॥ Content is available only for registered users. 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