August 7, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-54 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ चौवनवाँ अध्याय नारदजी का कंस को श्रीकृष्ण के देवकीपुत्र होने की बात बताना, अक्रूर का गोकुल से श्रीकृष्ण और बलराम को ले आना, कुवलयापीड, चाणूर और मुष्टिक का वध, श्रीकृष्ण द्वारा कालिकारूप से कंस का संहार करना तथा उग्रसेन का राज्याभिषेक कर माता- पिता को बन्धनमुक्त करना अथः चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः अक्रूरेण सह मधुपुर्यागमनानन्तरं कंसप्रयाणपूर्वकवसुदेवदेवकीदर्शनप्राप्तिः श्रीमहादेवजी बोले — एक समय की बात है — नारदमुनि वीणा बजाते हुए और भगवान् विष्णु की अमृतमयी कथा का गान करते हुए आकाशमार्ग से मथुरा नगर आये। मुनिश्रेष्ठ ! दुष्टहृदय वाले राजा कंस को एकान्त में समस्त गुप्त समाचार बताते हुए वे कहने लगे ॥ १-२ ॥ नारदजी बोले — राजन् ! सुनिये, मैं आपके लिये हितकर तथा अत्यन्त गोपनीय बात बता रहा हूँ। नवीन मेघ के समान श्यामवर्णवाले तथा वनमाला से सुशोभित जो वे महान् बलशाली नन्दपुत्र श्रीकृष्ण गोकुल में रहते हैं, वे ही देवकी के आठवें गर्भ से निश्चितरूप से उत्पन्न हुए हैं और प्रचण्ड पराक्रम वाले श्रीबलराम रोहिणी के गर्भ से आविर्भूत हुए हैं। वसुदेव ने उन दोनों को नन्द के घर में धरोहर के रूप में रखा और वे दोनों वहीं बढ़े। उन दोनों ने आपके तृणावर्त आदि वीरों को अपने बल से मार डाला और जो कन्या आकाश में चली गयी थी, वह नन्द की पुत्री थी । वह निश्चितरूप से आपको ठगने के लिये वसुदेव के द्वारा लायी गयी थी ॥ ३–६१/२ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — उन नारद के ऐसा कहने पर उस क्रूर कंस ने देवकीसहित वसुदेव को काट डालने की इच्छा से कुपित होकर तलवार उठा ली। इसपर उन मुनिश्रेष्ठ नारद ने उस कोपाविष्ट राजा कंस को अनेक तरह से समझाकर ऐसा करने से रोका। इसके बाद देवताओं को दर्शन प्रदान करने वाले देवर्षि नारदमुनि अपने आश्रम को लौट गये ॥ ७-९ ॥ इसके बाद कंस ने मन्त्रियों से परामर्श करके अक्रूर को [गोकुल में ] भेजा और उनसे कहा कि तुम मेरे आदेश से गोकुल में जाकर नन्द के घर में स्थित बलराम और कृष्ण — इन दोनों वसुदेवपुत्रों को इस मथुरानगरी में छलपूर्वक ले आओ । वहाँ पर मुष्टिक और चाणूर आदि प्रधान मल्ल-योद्धाओं से मल्ल-युद्ध करवाकर मैं उन दोनों महाबली वीरों को मरवा डालूँगा ॥ १०-१२ ॥ मुने ! इस प्रकार उस अत्यन्त दुरात्मा कंस से आज्ञा पाकर अक्रूर रथ पर सवार होकर शीघ्रतापूर्वक गोकुल आ गये। तत्पश्चात् नन्द के घर पहुँचकर वे अपने रथ से भूमि पर उतरे और उन्होंने घर में प्रविष्ट होकर वसुदेव के दोनों दुर्जेय वीर पुत्रों को देखा। अक्रूर ने उन दोनों को दण्डवत् प्रणाम किया और कंस ने जैसा कहा था, वैसा अपने आने का प्रयोजन बताया ॥ १३–१५ ॥ अक्रूरजी बोले — महान् बलशाली आप दोनों— श्रीबलराम और श्रीकृष्ण को मधुपुरी (मथुरा) ले जाने के लिये दुष्टस्वभाव राजा कंस के भेजने पर मैं यहाँ आया हुआ हूँ । उस कंस ने दुष्ट चेष्टाओंवाले मन्त्रियों से मन्त्रणा की है और वह पहलवानों से मल्ल-युद्ध के द्वारा आप दोनों को मरवा डालेगा ॥ १६-१७ ॥ मैं तो योगिराज के मुखारविन्द से सुनकर दृढ़ रूप से जान गया हूँ कि प्रचण्ड पराक्रमवाले आप दोनों निश्चितरूप से साधारण मनुष्य नहीं हैं। अपनी लीला से कंस आदि दुष्टों के भार से पृथ्वी को मुक्त करने के लिये आप दोनों परा प्रकृति और पुरुष अपनी माया का आश्रय लेकर पृथ्वी पर आविर्भूत हुए हैं । नन्द और यशोदा के अतिशय भाग्य के कारण छल का आश्रय लेकर दुरात्मा कंस से भय की लीला करते हुए आप दोनों यहाँ रह रहे हैं ॥ १८-२० ॥ जन्मान्तर में इन दोनों के द्वारा की गयी तपस्या का प्रधान तथा उत्तम फल इस लोक में इन्हें सम्पूर्णरूपसे प्राप्त हो गया ॥ २१ ॥ अब आप यदुराज के आदेश से मथुरा पहुँचकर पृथ्वी के भारस्वरूप इन महाबली कंस आदि दुष्टों को नष्ट कीजिये ॥ २२ ॥ महादेवजी बोले — अक्रूर की बात सुनकर मधुपुरी जाने की इच्छावाले महान् बलशाली श्रीबलराम तथा श्रीकृष्ण ने सभी गोपों से कहा — महाप्रतापी राजा कंस को विविध प्रकार के मधुर गव्य (दूध, दही, घृत आदि) प्रदान करने के लिये उन्हें लेकर आप सभी लोग कल प्रातःकाल प्रस्थान कीजियेगा। हम दोनों पृथ्वीपति कंस से मिलने के लिये निश्चितरूप से वहाँ जायँगे ॥ २३-२४१/२ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! महामते । उन दोनोंकी यह बात सुनकर आश्चर्यचकित मनवाले सभी गोपगणों ने वैसा ही किया ॥ २५३ ॥ तब उस उत्तम और विचित्र रथ पर चढ़कर प्रात:काल अक्रूर के साथ वे दोनों मथुरा जाने को तत्पर हुए। उस समय श्रीकृष्ण को देखकर व्रज की सभी गोपाङ्गनाएँ रोने लगीं। तब उन्हें आश्वासन देकर वे श्रीकृष्ण शीघ्रतापूर्वक रथ चलाते हुए प्रस्थित हुए ॥ २६-२७१/२ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! नन्द आदि गोपवृन्द भी दधि, दुग्ध आदि गव्य पदार्थ लेकर यदुनन्दन श्रीबलराम तथा श्रीकृष्ण के पीछे-पीछे चल दिये। महाबली श्रीबलराम और श्रीकृष्ण को साथ में लेकर नन्द आदि प्रमुख गोपों से घिरे हुए अक्रूर मधुपुरी पहुँचे ॥ २८-२९१/२ ॥ मुने! श्रीबलराम और श्रीकृष्ण को आया हुआ सुनकर अत्यन्त मूर्खबुद्धि उस कंस ने श्रीबलराम और श्रीकृष्ण के वध के लिये दरवाजे पर कुवलयापीड नामक भीषण पराक्रमवाले एक दुष्ट हाथी को नियुक्त कर दिया। श्रीकृष्ण ने अनायास ही उस हाथी की सूँड़ को पकड़कर उसे पृथ्वीतल पर गिरा दिया और फिर हाथ के प्रहार से उसके मस्तक के दो टुकड़े कर दिये ॥ ३०-३२ ॥ तदनन्तर महाबली तथा पराक्रमी श्रीबलराम और श्रीकृष्ण अक्रूर के साथ सिंह की भाँति दहाड़ते हुए पुर में प्रविष्ट हुए ॥ ३३ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! भय से त्रस्त नन्द आदि व्रजवासी भी दधि, दुग्ध आदि उपहारस्वरूप गव्यसामग्री लिये हुए उनके पीछे-पीछे चले। जहाँ पर राजा कंस विराजमान था, वहाँ पर शीघ्र जाकर उन व्रजवासियों ने उस दुरात्मा कंस को नमस्कार करके भेंट-सामग्री प्रदान की ॥ ३४-३५ ॥ इसके बाद मुष्टिक आदि महान् बलशाली पहलवानों ने अखाड़े में खड़े प्रचण्ड पराक्रमवाले श्रीबलराम और श्रीकृष्ण को ललकारा ॥ ३६ ॥ महान् बल तथा पराक्रम वाले रोहिणीपुत्र श्रीबलराम ने अपनी मुष्टिका के प्रहार से मुष्टिक को धराशायी कर दिया। मुनिश्रेष्ठ ! श्रीकृष्ण ने भी चाणूर को आकाश में ऊपर उठाकर और फिर पृथ्वी-तल पर पटककर मार डाला। इसी प्रकार युद्ध में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए श्रीबलराम और श्रीकृष्ण ने और भी अन्य सैकड़ों पहलवानों को आधे क्षण में ही धराशायी कर दिया ॥ ३७–३९ ॥ तदनन्तर भीषण पराक्रमवाले अपने पहलवानों के धराशायी होने का समाचार सुनकर महान् युद्ध देखने की इच्छा से वह कंस मंच के ऊपर चढ़ गया ॥ ४० ॥ महाबली श्रीबलराम और श्रीकृष्ण को देखकर भयाकुल दुष्टात्मा कंस ने दूतों से कहा कि इन दोनों को यहाँ से शीघ्र दूर हटाओ, दूर हटाओ । मैं व्रज में रहने वाले सभी दुरात्मा ग्वालों को दण्डित करूँगा और दुष्ट चेष्टावाले नन्द को तो उसकी पत्नीसहित मरवा डालूँगा ॥ ४१-४२ ॥ उस कंस को ऐसा बोलते हुए देखकर श्रीकृष्ण आधे क्षण में ब्रह्माण्ड को विक्षुब्ध करने वाला अपना वह कालिका-विग्रह धारण कर लिया ॥ ४३ ॥ तत्पश्चात् कालिकारूप श्रीकृष्ण ने उस दुष्टात्मा कंस के बालों को अपने बायें हाथ से पकड़कर और फिर उसे अपनी ओर खींचकर तलवार से उसका सिर काट डाला ॥ ४४ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! उसका सिर काटने के बाद उन कालिका ने उसे देखनेके लिये पुनः पूर्व की भाँति कृष्णस्वरूप धारण कर वे श्रीबलराम के साथ पृथ्वीतल पर नाचने लगीं ॥ ४५ ॥ नन्द आदि श्रेष्ठ गोपगणों का हृदय हर्ष से परिपूर्ण हो गया और वे भी बाँसुरी, वीणा आदि बजाते हुए उस रणक्षेत्र में नाचने लगे। देवता आकाश से पुष्प बरसाने लगे। सभी दिशाएँ प्रकाशमान तथा कोलाहल से रहित हो गयीं ॥ ४६-४७ ॥ इसके बाद श्रीकृष्ण ने बेड़ी में जकड़कर बँधे हुए वसुदेव तथा देवकी के पास जाकर उन्हें प्रणाम करके बन्धन से मुक्त किया। कमलसदृश सुन्दर मुखवाले अपने उन दोनों पुत्रों को पास में आते हुए देखकर हर्ष के आँसुओं से परिपूर्ण नेत्रोंवाले वसुदेव तथा देवकी ने उन्हें अपनी गोद में ले लिया ॥ ४८-४९ ॥ महामुने! उस समय पति के शोक से व्याकुल होकर उस कंस की सभी रानियाँ हाथों से अपने वक्षःस्थल तथा सिर पीट-पीटकर विलाप करने लगीं। उन सभी रानियों को सान्त्वना देकर कमललोचन श्रीकृष्ण ने उस राज्य पर महाराज उग्रसेन को अभिषिक्त कर दिया ॥ ५०-५१ ॥ इसके बाद आँसुओं से भरे हुए नेत्रोंवाले नन्द का आलिङ्गन कर वसुदेवजी अपने प्रिय वचनों से उन्हें प्रसन्न करते हुए कहने लगे ॥ ५२ ॥ वसुदेवजी बोले — मित्र ! मेरे ये दोनों पुत्र आपके घर में बहुत दिनों तक रहे और धर्म के ज्ञाता आपने पिता की भाँति इन दोनों का पालन-पोषण किया। धर्म को जानने वाली आपकी भार्या यशोदा ने भी सदा अपने पुत्र की भाँति ही मेरे इन पुत्रों का पालन किया है। इस प्रकार आप दोनों मेरे पुत्रों के माता- पिता हैं। आप परम दयालु हैं और मेरे बन्धु हैं । व्रजपते ! अब आप इन दोनों कुमारों को मेरे घर में छोड़कर सभी व्रजवासियों के साथ व्रज चले जाइये । मेरी प्रसन्नता के लिये अब आप इस विषय में कोई सोच-विचार न करें और सखे! यशोदा से भी मेरी यह बात बता दीजियेगा ॥ ५३–५६ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — [मुने!] वसुदेव के ऐसा कहनेपर अश्रुपूरित नेत्रोंवाले नन्द लम्बी श्वास लेते हुए श्री बलराम तथा श्रीकृष्ण को एकटक देखने लगे ॥ ५७३ ॥ महामते ! तदनन्तर आँसुओं से डबडबायी आँखों वाले श्रीराम और श्रीकृष्ण भावविह्वल गद्गद वाणी में नन्द से बोले कि यहाँ माता-पिता (देवकी तथा वसुदेव) एवं अन्य बहुत-से दुःखित लोगों को संतोष प्रदान करके आपके पास आकर आप दोनों पिता तथा माता का दर्शन करेंगे ॥ ५८-५९१/२ ॥ उन दोनों के द्वारा कही गयी यह बात सुनकर नन्द अत्यन्त दुःखित हुए और विलाप करते हुए व्रजवासियोंसहित अपने नगर व्रज में लौट आये ॥ ६०१/२ ॥ उनके आने पर कमल के समान अति सुन्दर मुखवाले श्रीबलराम और श्रीकृष्ण को न देखकर सभी गोपाङ्गनाएँ रोने लगीं। मुनिश्रेष्ठ! उन गोपियों का शोक दूर करने के लिये श्रीकृष्ण ने भक्तिपरायण उद्धव को गोकुल भेजा। वहाँ पहुँचकर उद्धव ने श्रीकृष्ण का संदेश देकर श्रीकृष्ण के वियोगजन्य दुःख से अत्यन्त व्याकुल सभी व्रजवासियों को सान्त्वना प्रदान की ॥ ६१–६३१/२ ॥ तदनन्तर वसुदेवजी ने महामुनि गर्गाचार्य को बुलाकर उन दोनों का विधिपूर्वक द्विज-संस्कार सम्पन्न कराया। महान् बलवाले महात्मा श्रीबलराम और श्रीकृष्ण को उन्होंने ही सभी शास्त्रों तथा धनुर्वेद आदि की शिक्षा दिलवायी। अपने बन्धु को प्रसन्न करते हुए वे दोनों रमणीय मथुरा में रहने लगे ॥ ६४–६६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत ‘अक्रूर के साथ मधुपुरी आगमन के अनन्तर कंसप्रयाणपूर्वक वसुदेव-देवकी दर्शनप्राप्ति’ नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥ Content is available only for registered users. 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